ऊँ नमशिवाया ।

ऊँ नमशिवाया ।

ऊँ नमशिवाया ।

यह चित्र काठमांडू श्री पशुपतिनाथ का है, यह सब जानते हैं और इस शिव लिंग कि तस्वीर निकालना मुश्किल भी है । कृपया इस दुर्लभ चित्र को जरूर शेयर कीजिए ।

Om Namashivaya.

Please  share  Kathmandu Shri Pashupati nath photo to all your known people as it is not only difficult to visit but most difficult to photograph the Shivlinga.

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Anita Sharma Jan 19, 2021

🍃🌼"नंदा नाई"🌼🍃 🌼🍃एक नाई जिसका नाम नंदा था वह एक कृष्ण भक्त था। सुबह उठकर कृष्ण की सेवा करता, उन्हें भोग लगाता, कीर्तन करता फिर अपने काम पर निकलता था। 🌼🍃 सबसे पहले राजा की हजामत करता था क्योंकि राजा को दरबार जाना होता था। राजा की हजामत के बाद नगर के लिए निकलता था। एक दिन कृष्ण सेवा के बाद कीर्तन करते-करते कृष्ण के ध्यान में खो गया। पत्नी ने देर होते देख और राजा के क्रोध की बात सोचकर नंदा को झंझोड़ते हुये कहा - अजी सुनते हो! राजा के दरबार जाने का समय हो गया है। राजा की हजामत करनी है, राजा क्रोधित हो जायेंगे। नंदा ने जल्दी अपना सामान लिया और महल की ओर चल दिया। महल पहुंचा तो देखा कि वहां से राजा दरबार के लिए निकल रहे थे। राजा ने नंदा को देखकर कहा - अभी तो हजामत करके गये हो! क्या तुम्हे कोई परेशानी है या किसी चीज आवश्यकता है? नंदा ने कहा - जी नहीं! मुझे लगा मैं शायद कुछ भूल रहा था। नंदा मन में सोचने लगा; मैं तो अभी आ रहा हूं, मैं तो कीर्तन में मुग्ध था तो राजा की हजामत किसने की? नंदा को मन मे विचार आया, मेरी लाज रखने और राजा के क्रोध से बचाने मेरे कृष्ण ही मेरे रूप में आये होंगे। ईश्वर कहते हैं - डर मत! मैं तेरे साथ हूं और कही नहीं तेरे आस-पास हूं। आँखे बंद करके मुझे याद कर और कोई नही मैं तेरा विश्वास हूँ।।

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आशुतोष Jan 19, 2021

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Shakti Jan 19, 2021

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मनुष्य के कर्मों का साक्षी कौन है ? मृत्युलोक में प्राणी अकेला ही पैदा होता है, अकेले ही मरता है। प्राणी का धन-वैभव घर में ही छूट जाता है। मित्र और स्वजन श्मशान में छूट जाते हैं। शरीर को अग्नि ले लेती है। पाप-पुण्य ही उस जीव के साथ जाते हैं। अकेले ही वह पाप-पुण्य का भोग करता है परन्तु धर्म ही उसका अनुसरण करता है। ‘शरीर और गुण (पुण्यकर्म) इन दोनों में बहुत अंतर है, क्योंकि शरीर तो थोड़े ही दिनों तक रहता है किन्तु गुण प्रलयकाल तक बने रहते हैं। जिसके गुण और धर्म जीवित हैं, वह वास्तव में जी रहा है।’ पाप और पुण्य : - वेदों में जिन कर्मों का विधान है, वे धर्म (पुण्य) हैं और उनके विपरीत कर्म अधर्म (पाप) कहलाते हैं। मनुष्य एक दिन या एक क्षण में ऐसे पुण्य या पाप कर सकता है कि उसका भोग सहस्त्रों वर्षों में भी पूर्ण न हो। मनुष्य के कर्म के चौदह साक्षी!!! सूर्य, अग्नि, आकाश, वायु, इन्द्रियां, चन्द्रमा, संध्या, रात, दिन, दिशाएं, जल, पृथ्वी, काल और धर्म–ये सब मनुष्य के कर्मों के साक्षी हैं। सूर्य रात्रि में नहीं रहता और चन्द्रमा दिन में नहीं रहता, जलती हुई अग्नि भी हरसमय नहीं रहती; किन्तु रात-दिन और संध्या में से कोई एक तो हर समय रहता ही है। दिशाएं, आकाश, वायु, पृथ्वी, जल सदैव रहते हैं, मनुष्य इन्हें छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता, इनसे छुप नहीं सकता। मनुष्य की इन्द्रियां, काल और धर्म भी सदैव उसके साथ रहते हैं। कोई भी कर्म किसी-न किसी इन्द्रिय द्वारा किसी-न-किसी समय (काल) होगा ही। उस कर्म का प्रभाव मनुष्य के ग्रह-नक्षत्रों व पंचमहाभूतों पर पड़ता है। जब मनुष्य कोई गलत कार्य करता है तो धर्मदेव उस गलत कर्म की सूचना देते हैं और उसका दण्ड मनुष्य को अवश्य मिलता है। कर्म से ही देह मिलता है!!!!!! पृथ्वी पर जो मनुष्य-देह है उसमें एक सीमा तक ही सुख या दु:ख भोगने की क्षमता है। जो पुण्य या पाप पृथ्वी पर किसी मनुष्य-देह के द्वारा भोगने संभव नही, उनका फल जीव स्वर्ग या नरक में भोगता है। पाप या पुण्य जब इतने रह जाते हैं कि उनका भोग पृथ्वी पर संभव हो, तब वह जीव पृथ्वी पर किसी देह में जन्म लेता है। कर्मों के अवशेष भाग को भोगने के लिए मनुष्य मृत्युलोक में स्थावर-जंगम अर्थात् वृक्ष, गुल्म (झाड़ी), लता, बेल, पर्वत और तृण–आदि योनि प्राप्त करता है। ये सब दु:खों के भोग की योनियां हैं। वृक्षयोनि में दीर्घकाल तक सर्दी-गर्मी सहना, काटे जाने व अग्नि में जलाये जाने सम्बधी दु:ख भोगना पड़ता है। यदि जीव कीटयोनि प्राप्त करता है तो अपने से बलवान प्राणियों द्वारा दी गयी पीड़ा सहता है, शीत-वायु और भूख के क्लेश सहते हुए मल-मूत्र में विचरण करना आदि दारुण दु:ख उठाता है। इसी तरह से पशुयोनि में आने पर अपने से बलवान पशु द्वारा दी गयी पीड़ा का कष्ट पाता रहता है। पक्षी की योनि में आने पर कभी वायु पीकर रहना तो कभी अपवित्र वस्तुओं को खाने का कष्ट उठाना पड़ता है। यदि भार ढोने वाले पशुओं की योनि में जीव आता है तो रस्सी से बांधे जाने, डण्डों से पीटे जाने व हल जोतने का दारुण दु:ख जीव को सहना पड़ता है। विभिन्न पापयोनियां!!!!!! इस संसार-चक्र में मनुष्य घड़ी के पेण्डुलम की भांति विभिन्न पापयोनियों में जन्म लेता और मरता है– –माता-पिता को कष्ट पहुंचाने वाले को कछुवे की योनि में जाना पड़ता है। –मित्र का अपमान करने वाला गधे की योनि में जन्म लेता है। –छल-कपट कर जीवनयापन करने वाला बंदर की योनि में जाता है। –अपने पास रखी किसी की धरोहर को हड़पने वाला मनुष्य कीड़े की योनि में जन्म लेता है। –विश्वासघात करने से मनुष्य को मछली की योनि मिलती है। –विवाह, यज्ञ आदि शुभ कार्यों में विघ्न डालने वाले को कृमियोनि मिलती है। –देवता, पितर व ब्राह्मणों को भोजन न कराकर स्वयं खा लेता है वह काकयोनि (कौए) में जाता है। दुर्लभ है मनुष्ययोनि : - इस प्रकार बहुत-सी योनियों में भ्रमण करके जीव किसी महान पुण्य के कारण मनुष्ययोनि प्राप्त करता है। मनुष्ययोनि प्राप्त करके भी यदि दरिद्र, रोगी, काना या अपाहिज जीवन मिले तो बहुत अपमान व कष्ट भोगना पड़ता है। इसलिए दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर संसार-बंधन से मुक्त होने के लिए प्राणी को भगवान विष्णु की सेवा-आराधना करनी चाहिए क्योंकि वे ही कर्मफल के दाता व संसार-बंधन से छुड़ाने वाले मोक्षदाता हैं। भगवान विष्णु के जो-जो स्वरूप हैं, उनकी भक्ति करने से मनुष्य संसार-सागर आसानी से पार कर परमधाम को प्राप्त करता है। भगवान विष्णु ने बताया संसार-सागर से पार होने का उपाय? भगवान विष्णु ने संसार-सागर से पार होने का उपाय भगवान रुद्र को बताते हुए कहा कि ‘विष्णुसहस्त्रनाम’ स्तोत्र से मेरी नित्य स्तुति करने से मनुष्य भवसागर को सहज ही पार कर लेता है। ‘जिनका मन भगवान विष्णु की भक्ति में अनुरक्त है, उनका अहोभाग्य है, अहोभाग्य है; क्योंकि योगियों के लिए भी दुर्लभ मुक्ति उन भक्तों के हाथ में ही रहती है।’ (नारदपुराण) भक्तों की गति : - भक्त अपने आराध्य के लोक में जाते हैं। भगवान के लोक में कुछ भी बनकर रहना सालोक्य-मुक्ति है। भगवान के समान ऐश्वर्य प्राप्त करना सार्ष्टि-मुक्ति है। भगवान के समान रूप पाकर वहां रहना सारुप्य-मुक्ति है। भगवान के आभूषणादि बनकर रहना सामीप्य-मुक्ति कहलाती है। भगवान के श्रीविग्रह में मिल जाना सायुज्य-मुक्ति है। जिस जीव को भगवान का धाम प्राप्त हो जाता है, वह भगवान की इच्छा से उनके साथ या अलग से संसार में दिव्य जन्म ले सकता है। वह कर्मबन्धन में नहीं बंधा होता है। संसार में भगवत्कार्य समाप्त करके वह पुन: भगवद्धाम चला जाता है। मुक्त पुरुष : - मनुष्य बिना कर्म किए रह नहीं सकता। कर्म करेगा तो पाप-पुण्य दोनों होंगे। लेकिन जो मनुष्य सबमें भगवत्दृष्टि रखकर भगवान की सेवा के लिए, उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए और भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करता है तो उसके कर्म भी अकर्म बन जाते हैं और कर्म-बंधन में नहीं बांधते हैं। वह संसार में रहते हुए भी नित्यमुक्त है। तत्त्वज्ञानी पुरुष संसार के आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। उनके प्राण निकलकर कहीं जाते नहीं बल्कि परमात्मा में लीन हो जाते हैं। सती स्त्रियां, युद्ध में मारे गए वीर और उत्तरायण के शुक्ल-मार्ग से जाने वाले योगी मुक्त हो जाते हैं। गीता में शुक्ल तथा कृष्ण मार्ग कहकर दो गतियों का वर्णन है– जिनमें वासना शेष है, वे धुएं, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन के देवताओं द्वारा ले जाए जाते हैं। ऊर्ध्वलोक में अपने पुण्य भोगकर वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं। जिनमें कोई वासना शेष नहीं है, वे अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के देवताओं द्वारा ले जाये जाते हैं। वे फिर पृथ्वी पर जन्म लेकर नहीं लौटते हैं। पितृलोक : - यह एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है। एक जीव को पृथ्वी पर जिस माता-पिता से जन्म लेना है, जिस भाई-बहिन व पत्नी को पाना है, जिन लोगों के द्वारा उसे सुख-दु:ख मिलना है; वे सब लोग अलग-अलग कर्म करके स्वर्ग या नरक में हैं। जब तक वे सब भी इस जीव के अनुकूल योनि में जन्म लेने की स्थिति में न आ जाएं, इस जीव को प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पितृलोक इसलिए एक प्रकार का प्रतीक्षालोक है। प्रेतलोक : - यह नियम है कि मनुष्य की अंतिम इच्छा या भावना के अनुसार ही उसे गति प्राप्त होती है। जब मनुष्य किसी प्रबल राग-द्वेष, लोभ या मोह के आकर्षण में फंसकर देह त्यागता है तो वह उस राग-द्वेष के बंधन में बंधा आस-पास ही भटकता रहता है। वह मृत पुरुष वायवीय देह पाकर बड़ी यातना भरी योनि प्राप्त करता है। इसीलिए कहा जाता है–‘अंत मति सो गति।’ इसी सत्य को प्रकट करता हुआ एक सुन्दर भजन है– इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले, गोविन्द नाम लेकर, फिर प्राण तन से निकले, श्रीगंगा जी का तट हो, यमुना का वंशीवट हो, मेरा सांवरा निकट हो, जब प्राण तन से निकले, इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।। पीताम्बरी कसी हो, छवि मन में यह बसी हो, होठों पे कुछ हसी हो, जब प्राण तन से निकले, इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।। श्रीवृन्दावन का स्थल हो, मेरे मुख में तुलसी दल हो, विष्णु चरण का जल हो, जब प्राण तन से निकले, इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।। जब कंठ प्राण आवे, कोई रोग ना सतावे, यम दर्शना दिखावे, जब प्राण तन से निकले, इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।। उस वक़्त जल्दी आना, नहीं श्याम भूल जाना, राधा को साथ लाना, जब प्राण तन से निकले, इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।। सुधि होवे नाही तन की, तैयारी हो गमन की, लकड़ी हो ब्रज के वन की, जब प्राण तन से निकले, इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।। एक भक्त की है अर्जी, खुदगर्ज की है गरजी, आगे तुम्हारी मर्जी, जब प्राण तन से निकले, इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।। ये नेक सी अरज है, मानो तो क्या हरज है, कुछ आप का फरज है, जब प्राण तन से निकले, इतना तो करना स्वामी जब प्राण तन से निकले।।

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Garima Gahlot Rajput Jan 19, 2021

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आक्रोश Jan 19, 2021

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