AARYAM
AARYAM Sep 4, 2017

बच्चों की प्रतिभा कैसे निखारें ? आर्यम

बच्चों की प्रतिभा कैसे निखारें ? आर्यम

*"आर्यम-सूत्र"*

*"बच्चों की प्रतिभा कैसे बढ़ाएं?"*

आज के युग में अक्सर सभी माता-पिता अपने बच्चों को कुछ न कुछ सिखाते रहते हैं ऐसे माता-पिताओं के बच्चों के जीवन थिरता कभी नही आती! संतुलन-ठहराव कभी नही आता! उनके जीवन में शांति कभी नही आती। किसी व्यक्तित्व के विकास हेतु जिन आयामों की आवश्यकता होती है उनमें कुछ महत्वपूर्ण मिसिंग रह जाता है, छूट जाता है बिल्कुल उसी तरह जिस प्रकार किसी भगोने में दही जमाने के लिए ढूध रखा है और उस भगोने को लगातार हम हिलाते रहें उसे थिर न रहने दें! तो उस दूध में दही कभी नही जम पाएगा! वैसे ही हमारे व्यक्तित्व में बहुत से गुण स्थापित करने के लिए या उन गुणों को प्रस्फुटित होने के लिए या फिर उन सभी गुणों को विकास के उच्चतम आयामों तक जाने के लिए एक विराम-ठहराव की आवश्यकता होती है। कुछ क्षण शांति पूर्ण ढंग से बैठ जाने की आवश्यकता होती है ताकि बच्चों के समग्र व्यक्तित्व का संतुलित विकास हो सके। बच्चों को मशीन की भांति यांत्रिकी रोबोट मत बनने दीजिए और न ही आप उन्हें बनाने की कोशिश कीजिए।
'ओशो' जब बोलते थे तो उनके हाँथ की कलाई में बंधी रीको की घड़ी बंद हो जाती थी जो हाँथ की नब्ज़-कंपन व हाँथ की गति से काम करती थी, क्योंकि 'वे' थिर हो कर काम करते थे। जब हम शांत और थिर होते हैं तो पूरी ऊर्ज़ा का प्रवाह हमारे जीवन के संतुलन और विकास में सहयोगी संजीवनी की तरह काम करती है।
यदि हमारी चाह है कि हमारे बच्चे बहुत मेधावी हों, प्रतिभाशाली हों, उनकी स्मरणशक्ति अद्भुत हो! ताकि अपने जीवन में वे जो करना चाहें वह कर पाएं तो उन्हें "शांत"रहना होगा। उन्हें कम से कम चीज़े सिखानी चाहिए ताकि वे ज़्यादा सीख पाएं। भरे हुए पात्र में अगर कुछ डाला जाए तो सबकुछ बाहर की ओर ही आएगा! अगर उस बर्तन में कुछ भी डालना है तो उसके लिए थोड़ी रिक्तत्व या थोड़ा स्पेस चाहिए होता है ताकि हम उसमें जो भी डालें वह उस पात्र में आ जाए। अगर पात्र पहले से ही पूरा भरा हुआ है तो हम इसमें कुछ भी नही डालेंगे और किसी कारणवश यदि डाल भी दी तो उस भरे पात्र में से एक न एक वस्तु बाहर आएगी ही या तो पहले डाली हुई या बाद में डाली हुई। समस्याओं को गिनाने मात्र से कर्तव्यों की इतिश्री नही होती है। मेरी देशना,बातें, प्रार्थनाएँ, विचार, अनुमोदन, निवेदन यदि मनुष्य के जीवन के रूपांतरण की कीमिया बन जाएं तभी मेरे ध्येय की पूर्ति और मेरी सफलता होगी। ऐसे में एक विचार बहुत सहज आता होगा कि- इसका समाधान क्या है कि हम अपने बच्चों को रोबोट बनने से कैसे रोकें? इसके हल हेतु प्रत्येक अभिभावक को अपने बच्चों की जीवनशैली में-उनकी दिनचर्या में कुछ घंटे अवश्य सुनिश्चित करने चाहिए जिसमें उन्हें शांत-मौन बैठना सीखाएं। जब बच्चे मौन रहना सीख जाते हैं तो बहुत तेजी से उनकी बुद्धि का विकास होता है।
साधना पथ में साधकों ने मौन को अति उच्च स्थान दिया गया है। भारतीय वांग्मय में कई ऋषि-मुनियों ने 'मौन' को इतना महत्व दिया है कि वहीं से मौन व्रत की प्रथा का दिग्दर्शन भी हमें मिलता है। समस्याएं अधिक बोलने से प्रारंभ होती हैं कम बोलने से कभी नही होती हैं। उक्ति और मुहावरों में तो स्पष्टतः प्रचलन में आने वाला वाक्य है कि- 'एक चुप सौ सुख"। जीवन के अध्यायों में कभी-कभी चुप रहने से अनेक सुख उदित होते हैं। विशेषकर जिन दंपति व परिवारों में छोटे बच्चे हैं वे सब अपने बच्चों को मशीन न बनाएं बल्कि उनकी पूरी दिनचर्या में से कुछ समय उनके अभ्यास में अवश्य लाएं! जब वे बिना कुछ किए बिल्कुल शांत मन से बैठें यह ध्यान की प्राथमिक अवस्था है, यहीं से ध्यान प्रारम्भ होता है। तब बच्चे अपने जीवन के बारे में थिरता को प्राप्त होते हैं और वहीं से ही अस्तित्व में ऊर्जा मान चीज़ें उनके जीवन को अंगीकार करना शुरू करती हैं।

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कामेंट्स

🍃🌿के पी एस🌿🍃 Sep 4, 2017
ध्यान से बढ़ता गया हैं बड़ी अच्छी ज्ञान की बात धन्यवाद जय श्रीकृष्णजी

Radhe Shyam Mamgain Sep 4, 2017
हरिऊँ नारायण हरी सब परमात्मा का खेल है हंसाता भी वही है सुलाता भी वही है और रुलाता भी मैं मेरा जीवन लेकर आया तो रहुंगा भी वैसे सहूँगा भी क्योंकि शक्ति कहो या प्राण या आत्मा वो कोई व्यक्ति नहीं बनाता शरीर के अंग भी भगवान बनाता है उसकी आने व जाने का समय भी समस्या तब उठती है जब हम अपना मान बैठते हैं कई को देखते हैं अपने बच्चों को आप कहाँ जा रहे हैं आपने खाना खाया आपने होमवर्क किया और कोई बुजुर्ग उनके यहाँ काम करता हो तो उन्हें कहेंगे तू कहाँ था अब तक तू जल्दी क्यों नहीं लाया क्या बच्चे यह शिक्षा नहीं अपनायेंगे अपने कर्म अच्छे करने की सोचे बाकी राम जाने मै तो पढा भी नहीं हूँ गलती क्षमा करना बगीचा आम का अलग अलग हैं नाम करलो कुछ अच्छा जाना सब एक धाम।।जै श्री हरी राधेश्याम ममगाई सेवक।।

वैदेही Sep 4, 2017
very nice आपके यूट्यूब चैनल का क्या नाम है।

Neha Sharma, Haryana Jan 24, 2020

जय माता दी शुभ प्रभात वंदन *ईश्वर का न्याय* एक बार दो आदमी एक मंदिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे। वहां अंधेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे। थोड़ी देर में वहां एक आदमी आया और वो भी उन दोनों के साथ बैठकर गपशप करने लगा। कुछ देर बाद वो आदमी बोला उसे बहुत भूख लग रही है, उन दोनों को भी भूख लगने लगी थी। पहला आदमी बोला मेरे पास 3 रोटी हैं, दूसरा बोला मेरे पास 5 रोटी हैं, हम तीनों मिल बांट कर खा लेते हैं। उसके बाद सवाल आया कि 8 (3+5) रोटी तीन आदमियों में कैसे बांट पाएंगे?? पहले आदमी ने राय दी कि ऐसा करते हैं कि हर रोटी के 3 टुकडे करते हैं, अर्थात 8 रोटी के 24 टुकडे (8 X 3 = 24) हो जाएंगे और हम तीनों में 8 - 8 टुकडे बराबर बराबर बंट जाएंगे। तीनों को उसकी राय अच्छी लगी और 8 रोटी के 24 टुकडे करके प्रत्येक ने 8 - 8 रोटी के टुकड़े खाकर भूख शांत की और फिर बारिश के कारण मंदिर के प्रांगण में ही सो गए। सुबह उठने पर तीसरे आदमी ने उनके उपकार के लिए दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से 8 रोटी के टुकडो़ के बदले दोनों को उपहार स्वरूप 8 सोने की गिन्नी देकर अपने घर की ओर चला गया। उसके जाने के बाद पहला आदमी ने दुसरे आदमी से कहा हम दोनों 4 - 4 गिन्नी बांट लेते हैं। दुसरा बोला नहीं मेरी 5 रोटी थी और तुम्हारी सिर्फ 3 रोटी थी अतः मै 5 गिन्नी लुंगा, तुम्हें 3 गिन्नी मिलेंगी। इस पर दोनों में बहस और झगड़ा होने लगा। इसके बाद वे दोनों सलाह और न्याय के लिए मंदिर के पुजारी के पास गए और उसे समस्या बताई तथा न्यायपूर्ण समाधान के लिए प्रार्थना की। पुजारी भी असमंजस में पड़ गया, उसने कहा तुम लोग ये 8 गिन्नियाँ मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो, मैं कल सबेरे जवाब दे पाऊंगा। पुजारी को दिल में वैसे तो दूसरे आदमी की 3 - 5 की बात ठीक लगी रही थी पर फिर भी वह गहराई से सोचते सोचते गहरी नींद में सो गया। कुछ देर बाद उसके सपने में भगवान प्रगट हुए तो पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायिक मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की और बताया कि मेरे ख्याल से 3 - 5 बंटवारा ही उचित लगता है। भगवान मुस्कुरा कर बोले- नहीं। पहले आदमी को 1 गिन्नी मिलनी चाहिए और दुसरे आदमी को 7 गिन्नी मिलनी चाहिए। भगवान की बात सुनकर पुजारी अचंभित हो गया और अचरज से पूछा- *प्रभू ऐसा कैसे ?* भगवन फिर एकबार मुस्कुराए और बोले : इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी 3 रोटी के 9 टुकड़े किये परंतु उन 9 में से उसने सिर्फ 1 बांटा और 8 टुकड़े स्वयं खाया अर्थात उसका *त्याग* सिर्फ 1 रोटी के टुकड़े का था इसलिए वो सिर्फ 1 गिन्नी का ही हकदार है। दुसरे आदमी ने अपनी 5 रोटी के 15 टुकड़े किये जिसमें से 8 तुकडे उसने स्वयं खाऐ और 7 टुकड़े उसने बांट दिए। इसलिए वो न्यायानुसार 7 गिन्नी का हकदार है .. ये ही मेरा गणित है और ये ही मेरा न्याय है! ईश्वर की न्याय का सटीक विश्लेषण सुनकर पुजारी उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। इस कहानी का सार ये ही है कि हमारा वस्तुस्थिति को देखने का, समझने का दृष्टिकोण और ईश्वर का दृष्टिकोण एकदम भिन्न है। हम ईश्वरीय न्यायलीला को जानने समझने में सर्वथा अज्ञानी हैं। हम अपने त्याग का गुणगान करते है परंतु ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य एवं भोग तौर कर यथोचित निर्णय करते हैं। किसी के पास 3000 रुपये हैं और उसमें से भी वो 300 रुपये सेवाभाव से दान कर देता है और किसी के पास 10 करोड़ रुपये है और उसमें से वो 1 लाख रुपये सेवाभाव से दान कर देता है तो भी ईश्वर की नजर में 1 लाख वाले दानदाता की जगह 300 रुपये दान करने वाला ज्यादा कीमती और *श्रेष्ठ* है क्योंकि उसने अपने कमतर भोग साधन में भी त्याग और परोपकार की भावना का सम्मान किया। 1 लाख रूपये वाला दानदाता भी जरूर अच्छा ही कहा जाएगा क्योंकि उसमें भी सेवाभाव त्याग की भावना विद्यमान है, परंतु *श्रेष्ठत्व* की तुलना में कमजोर का त्याग ईश्वर की नजर में और भी सर्वश्रेष्ठ कहलाता है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम कितने धन संपन्न है, महत्वपूर्ण यहीं है कि हमारे सेवाभाव कार्य में त्याग कितना है। 🙏🙏 [🔱🔥🔱🔥🔱🔥🔱🔥🔱🔥🔱 : एक बार यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी । जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे । भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्भार के पास पहुँचे । कुम्भार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था । लेकिन जैसे ही कुम्भार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ । कुम्भार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं । तब प्रभु ने कुम्भार से कहा कि 'कुम्भार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है । मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है । भैया, मुझे कहीं छुपा लो ।' तब कुम्भार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया । कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्भार से पूछने लगी - 'क्यूँ रे, कुम्भार ! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या ?' कुम्भार ने कह दिया - 'नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा ।' श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे । मैया तो वहाँ से चली गयीं । अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्भार से कहते हैं - 'कुम्भार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो ।' कुम्भार बोला - 'ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।' भगवान मुस्कुराये और कहा - 'ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ । अब तो मुझे बाहर निकाल दो ।' कुम्भार कहने लगा - 'मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा ।' प्रभु जी कहते हैं - 'चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ । अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।' अब कुम्भार कहता है - 'बस, प्रभु जी ! एक विनती और है । उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।' भगवान बोले - 'वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?' कुम्भार कहने लगा - 'प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है । मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।' भगवान ने कुम्भार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया ।' प्रभु बोले - 'अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।' तब कुम्भार कहता है - 'अभी नहीं, भगवन ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है । उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है - जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे । बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।' कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्भार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया । फिर कुम्भार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया । उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया । प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया । अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये । जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे । लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर । कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते । ! जय जय श्रीराधेकृष्णा.. [ 💐 सोच का फ़र्क 💐 🚩एक शहर में एक धनी व्यक्ति रहता था, उसके पास बहुत पैसा था और उसे इस बात पर बहुत घमंड भी था| एक बार किसी कारण से उसकी आँखों में इंफेक्शन हो गया| आँखों में बुरी तरह जलन होती थी, वह डॉक्टर के पास गया लेकिन डॉक्टर उसकी इस बीमारी का इलाज नहीं कर पाया| सेठ के पास बहुत पैसा था उसने देश विदेश से बहुत सारे नीम- हकीम और डॉक्टर बुलाए| एक बड़े डॉक्टर ने बताया की आपकी आँखों में एलर्जी है| आपको कुछ दिन तक सिर्फ़ हरा रंग ही देखना होगा और कोई और रंग देखेंगे तो आपकी आँखों को परेशानी होगी| अब क्या था, सेठ ने बड़े बड़े पेंटरों को बुलाया और पूरे महल को हरे रंग से रंगने के लिए कहा| वह बोला- मुझे हरे रंग से अलावा कोई और रंग दिखाई नहीं देना चाहिए मैं जहाँ से भी गुजरूँ, हर जगह हरा रंग कर दो| इस काम में बहुत पैसा खर्च हो रहा था लेकिन फिर भी सेठ की नज़र किसी अलग रंग पर पड़ ही जाती थी क्यूंकी पूरे नगर को हरे रंग से रंगना को संभव ही नहीं था, सेठ दिन प्रतिदिन पेंट कराने के लिए पैसा खर्च करता जा रहा था| वहीं शहर के एक सज्जन पुरुष गुजर रहा था उसने चारों तरफ हरा रंग देखकर लोगों से कारण पूछा| सारी बात सुनकर वह सेठ के पास गया और बोला सेठ जी आपको इतना पैसा खर्च करने की ज़रूरत नहीं है मेरे पास आपकी परेशानी का एक छोटा सा हल है.. आप हरा चश्मा क्यूँ नहीं खरीद लेते फिर सब कुछ हरा हो जाएगा| सेठ की आँख खुली की खुली रह गयी उसके दिमाग़ में यह शानदार विचार आया ही नहीं वह बेकार में इतना पैसा खर्च किए जा रहा था| तो जीवन में हमारी सोच और देखने के नज़रिए पर भी बहुत सारी चीज़ें निर्भर करतीं हैं कई बार परेशानी का हल बहुत आसान होता है लेकिन हम परेशानी में फँसे रहते हैं| तो इसे कहते हैं सोच का फ़र्क| 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 💐💐💐💐💐💐💐

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Pankaj Khandelwal Jan 24, 2020

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C.L.Kumavat Jan 24, 2020

|| ओ३म् || वेद सबके लिये है । मनुष्य मात्र के लिये । क्या आप जानते हैं? ------------------------ वेदों की प्रकांड 21 विदुषियां ************* देवमाता अदिति देवमाता अदिति चारों वेदों की प्रकांड विदुषि थी। ये दक्ष प्रजापति की कन्या एवं महर्षि कश्यप की पत्नी थीं। इन्होंने अपने पुत्र इंद्र को वेदों एवं शास्त्रों की इतनी अच्छी शिक्षा दी कि उस ज्ञान की तुलना किसी से संभव नहीं थी, यही कारण है कि इंद्र अपने ज्ञान के बल पर तीनों लोकों का अधिपति बना। इंद्र का माता के नाम पर एक नाम आदितेय पडा। अदिति को अजर-अमर माना जाता है। देवसम्राज्ञी शची देवसम्राज्ञी शची इंद्र की पत्नी थीं, वे वेदों की प्रकांड विद्वान थी। ऋग्वेद के कई सूक्तों पर शची ने अनुसंधान किया। शचीदेवी पतिव्रता स्त्रियों में श्रेष्ठ मानी जाती हैं। शची को इंद्राणी भी कहा जाता है। ये विदुषी के साथ-साथ महान नीतिवान भी थी। इन्होंने अपने पति द्वारा खोया गया सम्राज्य एवं पद प्रतिष्ठा ज्ञान के बल पर ही दोबारा प्राप्त की थी। सती शतरूपा सती शतरूपा स्वायम्भुव मनु की पत्नी थीं। वे चारों वेदों की प्रकांड विदुषी थी। जल प्रलय के बाद मनु और शतरूपा से ही दोबारा सृष्टि का आरंभ हुआ। ये योगशास्त्र की भी प्रकाड विद्वान और साधक थी। शाकल्य देवी शाकल्य देवी महाराज अश्वपति की पत्नी थी। एक बार अश्वपति महाराज ने ऋषियों से कहा कि मैं राष्ट्र में कन्याओं का भी निर्वाचन चाहता हूं। देश में ऐसी कौन महान वेदों की विदुषी है जो देवकन्याओं को वेदों की शिक्षा प्रदान करे। ऋषियों ने बताया कि आपकी पत्नी से बढ़कर वेदों की विदुषी और कोई नहीं है। तो राजा ने अपनी पत्नी शाकल्य देवी को वनवास दे दिया, ताकि वे वनों में रहकर कन्याओं के गुरुकुल स्थापित करें, आश्रम बनाएं और उसमें देश की कन्याएं शिक्षा पाएं। उन्होंने ऐसा ही किया। शाकल्य देवी ऐसी पहली विदुषी हैं, जिन्होंने कन्याओं के लिए शिक्षणालय स्थापित किए थे। सन्ध्या सन्ध्या वेदों की प्रकांड विद्वान थी। इन्होंने महर्षि मेधातिथि को शास्त्रार्थ में पराजित किया। वे यज्ञ को संपन्न कराने वाली पहली महिला पुरोहित थी। उन्हीं के नाम पर प्रातः संध्या और सायं सन्ध्या का नामकरण हुआ। विदुषी अरून्धती विदुषी अरून्धती ब्रहर्षि वशिष्ठ जी की धर्मपत्नी थी। ये भी वेदों की प्रकांड विद्वान थी। अपने ज्ञान के बल पर ही ये एकमात्र ऐसी विदुषी हैं, जिन्होंने सप्तर्षि मंडल में ऋषि पत्नी के रूप में गौरवशाली स्थान पाया। महर्षि मेधातिथि के यज्ञ में ये बचपन से ही भाग लेती थीं और यज्ञ के बाद वेदों की बातों पर तर्क-वितर्क किया करती थी। ब्रह्मवादिनी घोषा घोषा काक्षीवान् की कन्या थी। इनको कोढ रोग हो गया था, लेकिन उसकी चिकित्सा के लिए इन्होंने वेद और आयुर्वेद का गहन अध्ययन किया और ये कोढी होते हुए भी विदुषी और ब्रह्मवादिनी बन गई। अश्विनकुमारों ने इनकी चिकित्सा की और ये अपने काल की विश्वसुंदरी भी बनी। ब्रह्मवादिनी विश्ववारा ब्रह्मवादिनी विश्ववारा वेदों पर अनुसंधान करने वाली महान विदुषी थी। ऋग्वेद के पांचवें मंडल के द्वितीय अनुवाक के अटठाइसवें सूक्त षड्ऋकों का सरल रूपांतरण इन्होंने ही किया था। अत्रि महर्षि के वंश मंे पैदा होने वली इस विदुषी ने वेदज्ञान के बल पर ऋषि पद प्राप्त किया था। ब्रह्मवादिनी अपाला ब्रह्मवादिनी अपाला भी अत्रि मुनि के वंश में ही उत्पन्न हुई थी। अपाला को भी कुष्ठ रोग हो गया था, जिसके कारण इनके पति ने इन्हें घर से निकाल दिया था। ये पिता के घर चली गई और आयुर्वेद पर अनुसंधान करने लगी। सोमरस की खोज इन्होंने ही की थी। इंद्र देव ने सोमरस इनसे प्राप्त कर इनके ठीक होने में चिकित्सीय सहायता की। आयुर्वेद चिकित्सा से ये विश्वसुंदरी बन गई और वेदों के अनुसंधान में संलग्न हो गई। ऋग्वेद के अष्टम मंडल के 91वें सूक्त की 1 से 7 तक ऋचाएं इन्होंने संकलित की, एवं उन पर गहन अनुसंधान किया। तपती विदुषी तपती आदित्य की पुत्री और सावित्री की छोटी बहन थी। देव, दैत्य, गांधर्व और नागलोक में उन दिनों उनसे अधिक सुंदरी कोई और नहीं थी। वे वेदों की भी प्रकांड विद्वान थी। उनके रूप और गुणों से प्रभावित होकर ही अयोध्या के महाराजा संवरण ने उनसे विवाह किया था। तपती ने अपने पुत्र कुरु को स्वयं वेदों की शिक्षा दी, जिनके नाम पर कुरूकुल प्रतिष्ठित हुआ। ब्रह्मवादिनी वाक् ब्रह्मवादिनी वाक् अभृण ऋषि की कन्या थी। ये प्रसिद्ध ब्रह्मज्ञानिनीं थीं। इन्होंने अन्न पर अनुसंधान किया और अपने युग में उन्नत खेती के लिए वेदों के आधार पर नए-नए बीजों को खेती के लिए किसानों को अनुसंधान से पैदा करके दिया। ब्रह्मवादिनी रोमशा ब्रह्मवादिनी रोमशा बृहस्पति की पुत्री और भावभव्य की धर्मपत्नी थी। इनके सारे शरीर में रोमावली थी, इससे इनके पति इन्हें नहीं चाहते थे। लेकिन इन्होंने ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया, ऐसी बातों का प्रचार किया, जिससे नारी शक्ति में बुद्धि का विकास होता हो, वेद और शास्त्रों की अनेक शाखाओं पर इन्होंने अनुसंधान किया। ब्रह्मवादिनी गार्गी ब्रह्मवादिनी गार्गी के पिता का नाम वचक्नु था, जिसके कारण इन्हें वाचक्नवी भी कहते हैं। गर्ग गोत्र में उत्पन्न होने के कारण इन्हें गार्गी कहा जाता है। ये वेद शास्त्रों की महान विद्वान थी। इन्होंने शास्त्रार्थ में अपने युग में महान विद्वान महिर्ष याज्ञवल्कय तक को हरा दिया था। विदुषी मैत्रेयी विदुषी मैत्रेयी महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी थीं। इन्होंने पति के श्रीचरणों में बैठकर वेदों का गहन अध्ययन किया है। पति परमेश्वर की उपाधि इन्हीं के कारण जग में प्रसिद्ध हुई, क्योंकि इन्होंने पति से ज्ञान प्राप्त किया था और फिर उस ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए कन्या गुरुकुल स्थापित किए। विदुषी सुलभा विदुषी सुलभा महाराज जनक के राज्य की परम विदुषी थी। इन्होंने शास्त्रार्थ में राजा जनक को हराया एवं स्त्री शिक्षा के लिए शिक्षणालय की स्थापना की। विदुषी लोपामुद्रा विदुषी लोपामुद्रा महिर्ष अगस्त्य की धर्मपत्नी थीं। ये विदर्भ देश के राजा की बेटी थी। राजकुल में जन्म लेकर भी ये सादा जीवन उच्च विचार की समर्थक थी, तभी तो इनके पति ने इन्हें कहा था तुष्टोअहमस्मि कल्याणि तव वृत्तेन शोभने, यानी कल्याणी तुम्हारे सदाचार से मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूं। ये इतनी महान विदुषी थी कि एक बार इन्होंने अपने आश्रम में राम, सीता एवं लक्ष्मण को ज्ञान की बहुत सी बातों की शिक्षा दी थी। विदुषी उशिज विदुषी उशिज, ममता के पुत्र दीर्घतमा ऋषि की धर्मपत्नी थी। महर्षि काक्षीवान इन्हीं के सुपुत्र थे। इनके दूसरे पुत्र दीर्घश्रवा महान ऋषि थे। वेदों की शिक्षा इन्होंने ही अपने पुत्रों को प्रदान की थी। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 116 से 121 तक के मंत्र पर अनुसंधान किया। विदुषी प्रातिथेयी विदुषी प्रातिथेयी महर्षि दधिचि की धर्मपत्नी थी। ये विदर्भ देश के राजा की कन्या और लोपामुद्रा की बहिन थीं। इनका पुत्र पिप्पललाद बहुत बडा विद्वान हुआ है। ममता ममता दीर्घतमा ऋषि की माता थी। ये बहुत बडी विदुषी एवं ब्रह्मज्ञानसंपन्ना थीं। विदुषी भामती विदुषी भामती वाचस्पति मिश्र की पत्नी थी। ये वेदों की प्रकांड विद्वान थी और इनके पति भी। इनके बारे में एक कहानी प्रचलित है। संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान वाचस्पति मिश्र को विवाह हुए छत्तीस वर्ष गुजर गये थे, किन्तु वे यह भी नहीं जानते थे कि उनकी पत्नी कौन हैं? एक दिन वे ब्रह्मसूत्र के शंकर भाष्य पर टीका लिख रहे थे, किन्तु एक पंक्ति कुछ ढंग से नहीं लिखी जा रही थी। दीपक भी कुछ धुंधला हो चला, शायद ठीक तरह से दिख भी नहीं रहा था। उनकी पत्नी दीपक की लौ बढ़ा रही थी। इतने में वाचस्पति मिश्र की नजर उस पर पड़ी। उन्होंने पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’ ‘‘मैं आपकी पत्नी हूँ। आज से छत्तीस वर्ष पहले हमारा विवाह हुआ था।’’ ‘‘तुम्हारे साथ मेरा विवाह हुआ। शास्त्रों का भाष्य करते-करते मैं तो यह बात भूल ही चुका था। छत्तीस वर्ष तुमने मौन रहकर मेरी सेवा की है। हे देवी! तुम्हारे त्याग व उपकार अनंत हैं। अपनी इच्छा बताओ?’’ ‘‘स्वामी मेरी कोई इच्छा नहीं है। आपने मानव जाति के कल्याण के लिए अनेक शास्त्रों की टीकाएँ लिखी हैं। मैं आपकी सेवा से कृतकृत्य हूँ।’’ ‘‘हे देवी! तुम्हारा नाम क्या है?’’ ‘‘इस दासी को भामती कहते हैं स्वामी।’’ ‘‘मैं शंकर भाष्य पर जो टीका लिख रहा हूँ, उसका नाम मैं भामती टीका रखूँगा।’’ और वे पिफर लिखने में व्यस्त हो गये। विद्योत्तमा ब्रह्मज्ञानी विदुषी विद्योत्तमा से परास्त होकर पण्डितों ने एक मूर्ख को मौनी गुरु बताकर संकेत से शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। पण्डितों ने दो अंगुली और मुक्का आदि के अलग अर्थ बताकर विद्योत्तमा को परास्त घोषित करके मूर्ख से विवाह करने को विवश कर दिया। विद्योत्तमा ने पति से उष्ट्र को उसट सुनकर उसे रात में ही घर से भगाकर दरवाजा बंद कर दिया। ‘‘अनावृतकपाटं द्वारं देहि।’’-कुछ वर्ष बाद एक घनघोर रात्रि में पति ने पुकारा। विद्योत्तमा ने द्वार खोलकर कहा, ‘‘अस्ति कश्चित वाक् विशेषः।’’ पत्नी के उपरोक्त तीन शब्दों पर अस्ति से कुमार संभव महाकाव्य, कश्चित् से मेघदूत खण्डकाव्य और वाक्विशेषः से रघुवंश महाकाव्य की रचना पति महोदय ने कर डाली। इन तीनों कालजयी ग्रंथ के रचनाकार थे वही अतीत के मूर्ख, विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्कृत साहित्यकार अमर महाकवि कालिदास। 🌺🌻🌼🌷🌸☘

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Neha Sharma, Haryana Jan 22, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ प्रभात वंदन *कुएँ का गिरगिट अर्थात राजा नृग की कथा:* श्रीकृष्ण उन दिनों अपनी राजधानी द्वारका पुरी में ही रह रहे थे। जरासंध के उत्पातों से तंग आकर उन्होंने वहाँ से दूर पश्चिमी समुद्र के पास द्वारका में अपनी राजधानी बनाई थी। यह राजधानी अत्यन्त सुंदर थी। इसमें ऊँचे-ऊँचे महल और अट्टालिकाएँ थीं। ऊँचे शिखरों और लहराते ध्वजों वाले मन्दिर थे। सुन्दर और आकर्षक वस्तुओं से पटे बड़े-बड़े बाजार थे। इसकी सड़कें चौड़ी और चिकनी थीं। इन पर दोनों शाम सुगन्धित जल का छिड़काव होता था। बाजार में सुन्दर-सुन्दर सरोवर और जलाशय थे जिनकी सीढ़ियाँ सफेद संगमरमर की बनी हुई थीं। इन तालाबों में सदा जल भरा रहता था जिसमें कमल, कुमुदनी आदि विविधरंगी और सुगन्धपूरित पुष्प खिले रहते थे। फूलों पर भौरे मंडराते रहते थे, जिसके फलस्वरूप कोई उनके पास जाकर उन्हें तोड़ने का प्रयास नहीं करता था। इन जलाशयों में विविध मछलियाँ अठखेलियाँ करती थीं, जिसके फलस्वरूप इन सरोवरों की शोभा निराली हो उठती थी। नगर के भीतर ऐसी शोभा थी तो बाहर भी वह कुछ कम नहीं थी। नगर के किनारे-किनारे बड़े-बड़े और मन मोहक उपवन लगे थे। कुछ में सभी ऋतुओं में फल देने वाले फलदार वृक्ष लगे थे तो कुछ में सभी प्रकार के गन्ध-पूरित फूल। उन फूलों में सभी थे-गुलाब, जूही चमेली बेला, रातरानी कनैल, अड़हुल, गेंदा, गन्धराज आदि। इन सुन्दर उपवनों में नगरवासी प्रायः भ्रमण-हेतु आते ही रहते थे शुद्ध वायु के लिए उपवनों से अच्छा स्थान नहीं हो सकता था। एक दिन श्रीकृष्ण-पुत्र प्रद्युम्न अपने कुछ साथियों के साथ जैसे चारुभानु, गद और साम्ब आदि के साथ उपवन के परिभ्रमण को आए। वह देर तक इधर-उधर घूमते फूलों की शोभा निहारते रहे और उनकी गन्ध से अपने को तृप्त करते रहे। घूमते-घूमते उन्हें प्यास लग आई। वे प्यास बुझाने के लिए पानी ढूँढ़ते रहे पर दुर्भाग्यवश पानी उन्हें कहीं नहीं मिला। नगर के अन्दर तो कई सरोवर थे पर नई बस रही राजधानी के उपवनों में अभी तक जलाशय की व्यवस्था करने की बात किसी के ध्यान में नहीं आई थी। श्रीकृष्ण-पुत्र प्रद्युम्न ने सोचा, वह पिता से कहकर इन उपवनों में सुन्दर स्वच्छ जलाशयों का निर्माण कराएँगे जिससे आगे चलकर किसी को पेयजल के संकट का सामना नहीं करना पड़े। पर यह तो भविष्य की बात थी। अभी जो सभी पिपासा से पीड़ित हो रहे थे, उसका क्या उपाय था। घूमते-घूमते वे एक कुएँ के पास पहुँचे। उन्हें कुएँ को देखकर बहुत प्रसन्नता हुई। प्यास से व्याकुल उन लोगों ने सोचा कि उनकी प्यास अब शान्त होकर रहेगी। वे कुएँ के पास गये और उसके भीतर झाँका तो उनकी सारी आशा निराशा में परिवर्तित हो गई। कुएँ में एक बूँद जल नहीं था। पता नहीं वह कब से सूखा पड़ा था किन्तु उसमें एक विचित्र जीव को देख कर उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उसमें एक बहुत बड़ा गिरगिट पड़ा था। कुआँ काफी लम्बा-चौड़ा और गहरा था। गिरगिट का आकार किसी पर्वत की तरह लग रहा था। कुछ देर तक तो इन लोगों ने गिरगिट को कौतूहल पूर्वक देखा किन्तु शीघ्र ही उसकी छटपटाहट से द्रवित हो गये। वह कुएँ से निकलने को बेचैन था किन्तु लाख प्रयासों के बाद भी वह उससे बाहर नहीं निकल पा रहा था। वह कुएँ की दीवार पर, शक्ति लगाकर चढ़ने का प्रयास करता किन्तु थोड़ा ऊपर जाने के बाद ही फिसल कर गिर पड़ता। वह बारी-बारी से कुएँ के चारों दीवारों पर चढ़ने का प्रयास करता किन्तु थोड़ा ऊपर जाने के बाद ही फिसलकर गिर पड़ता। इन लोगों को उसके कष्ट के निवारण का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। दीवारों से फिसलने और गिरने के कारण उसका शरीर लहूलुहान हो रहा था। दर्शकों को इन पर बहुत दया आई। उन्होंने पेड़ की डालियों और रस्सियों के सहारे उसको निकालने का प्रयास किया किन्तु इस पर्वताकार गिरगिट को निकालना आसान नहीं था। कोई भी रस्सी या पेड़ की डाली उसके भार को सहन नहीं कर पाती और टूट जाती। वे निराश हो गए और उन्होंने मन ही मन भगवान कृष्ण को स्मरण किया। वह तत्काल उस कुएँ के पास पहुँच गए। जिसमें वह गिरगिट गिरा पड़ा था। दर्शकों ने उन्हें बताया कि इस दुःखी जीव को निकालने का उन्होंने बहुत प्रयास किया परन्तु वे उसे निकालने में सफल नहीं हो सके। उसके दुःख से सभी दुःखी हैं। उन्होंने आगे कहा, *"पता नहीं कब से भूख-प्यास से पीड़ित इस अन्धे कुएँ में पड़ा है। आप सर्व-शक्तिमान हैं। कृपाकर इस निरीह प्राणी को इस अन्धकूप से निकालिए।"* भगवान श्रीकृष्ण के लिए यह कौन-सी बड़ी बात थी ? उन्होंने बाएँ हाथ से ही उस विशाल गिरगिट को कुएँ से बाहर निकाल दिया। निकलते ही वह गिरगिट गिरगिट नहीं रहा। एक प्रकाशवान पुरुष के रूप में वह परिवर्तित हो गया। उसके सिर पर मुकुट और शेष शरीर पर बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण शोभा पा रहे थे। उसका रंग इतना गोरा था कि लगता था कि वह कच्चे सोने से बना है। इस तेजोमय पुरुष को देखकर भगवान श्रीकृष्ण सब कुछ समझ गए किन्तु अन्य लोगों की जानकारी के लिए उन्होंने उससे पूछा *"आप देखने से ही कोई देवपुरुष लगते हैं। आपको गिरगिट की योनि में जन्म लेकर इतना कष्ट क्यों सहना पड़ा ? निश्चित ही आप पूर्व जन्म में कोई पराक्रमी राजा-महराजा थे।"* उस पुरुष ने श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हुए कहा, *"आपका सोचना एकदम ठीक है। आप कोई अन्तर्यामी हैं ? आप से क्या छिपा है फिर भी आप पूछते हैं तो बताना ही पड़ेगा। क्योंकि आपकी मुझ पर अपार कृपा है। आपके दर्शन-मात्र से बिना कोई यज्ञ जाप या तपस्या किए गिरगिट की योनि से मेरा उद्धार हो गया।"* *"मैं पहले नृग नामक राजा था। मेरे पास अपार सम्पत्ति थी। मैं उसे अपने भोग-विलास में नहीं लगाकर दूसरों के मध्य उनके दान में लगा रहता था। दान लेने वालों की मेरे यहां भीड़ लगी रहती थी। विशेषकर ब्राह्मणों की।"* *"मैंने कई दुधारी गायों को बछड़ों के साथ ब्राह्मणों को दान दिया। दान देने के पूर्व मैं गायों के सींगों को सोने से मढ़वाना नहीं भूलता था।"* *"उनके खुरों में चाँदी मढ़वाता था तथा उन्हें रेशमी वस्त्र, स्वर्णनिर्मित हार और अन्य आभूषणों से सजाकर ही दान करता था। भगवान ! मेरी दानशीलता प्रसिद्ध थी। मैंने गायें ही नहीं, भूमि, सोना, घर, घोड़े, हाथी, तिलों के पर्वत, चाँदी, शय्या, वस्त्र, रत्न आदि दान किए। अनेक यज्ञों का अनुष्ठान किया। बहुत से कुएँ जलाशय आदि बनवाए।"* भगवान कृष्ण ने पूछा, *"इतना सब करने के बाद भी आपको यह निकृष्ट गिरगिट योनि क्यों प्राप्त हुई ?"* राजा नृग ने कहा *"भगवान ने ठीक ही पूछा। एक अनजानी गलती से मेरी यह दुर्दशा हुई। एक दिन ऐसे तपस्वी ब्राह्मण की गाय, जो कभी दान नहीं लेता था मेरी गायों के झुण्ड में आ मिली। मुझे इसका कोई पता नहीं था। मैंने अन्य गायों की तरह उसे भी सजा-सँवार कर किसी अन्य ब्राह्मण को दान में दे दिया।"* *"जब वह ब्राह्मण इस सजी-सजाई गाय को लेकर चला तो गाय के वास्तविक मालिक से उसकी मुलाकात हो गई।"* *"उसने कहा, ‘यह गाय मेरी है तुम कहाँ लिये जा रहे हो ? इसको सजाने-सँवारने से मैं इसको पहचानने में भूल नहीं सकता।’"* *"दान लिए ब्राह्मण ने कहा, ‘गाय तुम्हारी नहीं मेरी है क्योंकि राजा नृग ने मुझे इसे दान में दिया है। वे दोनों ब्राह्मण आपस में झगड़ते हुए मेरे समीप पहुँचे। एक ने कहा—‘यह गाय मुझे अभी-अभी दान में दी गई है।’ दूसरे ने कहा, ‘यदि ऐसी बात है तो राजा द्वारा मेरी गाय चुरा ली गई है।"* *मैंने दोनों ब्राह्मणों से अनुनय-विनय की और कहा, ‘मैं लाख उच्चकोटि की गाय दूँगा। आप लोग यह गाय मुझे वापिस कर दीजिए।"* *"गाय के वास्तविक मालिक ने कहा, ‘मैं अपनी गाय के बदले कुछ नहीं लूँगा और वह चला गया।"* *"दूसरे ने कहा, ‘एक लाख क्या कई लाख गाएँ भी मुझे दीजिए तो भी मैं लेने को तैयार नहीं।’ और दूसरा ब्राह्मण भी चला गया।"* *"कालक्रम से मेरी मृत्यु हुई। मैं यमलोक पहुँचा।’ यमराज ने पूछा, ‘आप ने बहुत पुण्य कार्य किए हैं किन्तु एक छोटा-सा पाप भी आपसे हुआ है। भले ही अनजाने में हुआ हो। आप बताइए कि आप पहले अपने पाप का फल भोगेंगे अथवा पुण्य का ?"* *‘‘मैंने कहा, ‘पहले पाप का ही भोग लेता हूँ।’ मेरे कहते ही मैं विशाल गिरगिट बन कर धरती पर आ गिरा। यही मेरी कहानी है"* शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।

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Rammurti Gond Jan 23, 2020

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