Sankat Mochan Mandir
Sankat Mochan Mandir Mar 25, 2020

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Shuchi Singhal May 9, 2020

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Jay Lalwani May 9, 2020

🌅CHARAMMANGAL VIRAAT VICHAR ✍jyotishacharya *VInay virat ji 🗓 8 मई 2020 💁🏻‍♂ कहाँ छोटा रहना कहाँ बड़ा होना .... 🗣अक्सर एक कहावत कही जाती है कि “ बनिया हमेशा रोता भला “ मतलब बिज़्नेस 📊करने वाला हमेशा रोता रहे तो बढ़िया है ..! 🙋🏻‍♂जब मैं law of attraction पढ़ रहा था जो कहती है कि व्यक्ति को हमेशा सकारात्मक और आत्मविश्वासी होना चाहिए जैसे अभी लॉकडाउन है और आपको कोई पूछे कि आप कैसे हो तो जवाब होना चाहिए “ “एकदम मस्त “ ... इसी law of attraction के कारण पूरे social media में लोग ऐसे बता रहे हैं जैसे घर बैठे वो बहुत enjoy कर रहे है और हम सब यह अच्छी तरह जानते है कि इतने दिनो बिना काम के बैठना वाक़ई बहुत 🙇उबाऊ काम है लेकिन आकर्षण के सिद्धांत की अपनी महत्त्वता है और चाणक्य भी नीति शास्त्र में कहते है कि व्यक्ति को हमेशा दूसरों के सामने अपनी एक मज़बूत छवि 👤रखनी चाहिए ... जैसे अगर आपके दोस्तों को पता है कि आपकी आर्थिक हालत कमज़ोर है तो बिज़्नेस में या ज़रूरत पड़ने पर वो आपको पैसे उधार 🙅🏻‍♂नही देंगे ... तो चाणक्य नीति और law of attraction दोनो यह कहती है कि हमेशा अपनी powerful और आत्मविश्वास से भरपूर छवि दूसरों के सामने रखिए ....! 🤔🤔फिर मैं सोच रहा था कि यह क्यूँ कहा गया कि बनिया रोता हुआ भला .. फिर एक दो घटनाओं से मुझे समझ आया कि यह कितनी गहरी बात है ... जब आप अपने दोस्तों और रिश्तेदार जो आपको अच्छे से जानते है उनके सामने अपनी extra image रखते है तब यह आपको नुक़सान देगा .. ऐसा क्यूँ ..? समझिए जब चार मित्र होते हैं और कोई एक बहुत ज़्यादा विकास 📶करता होता है तो बाक़ी तीन लोगों को लगता है कि यह उनके zone से बाहर जा रहा है इसलिए उनके अंदर 🤨ईर्ष्या का भाव आने लगता है और ये भाव आपको नुक़सान करते हैं जिसे आप नज़र भी कह सकते है शायद यह बात आप 3 idiot मूवी से समझ सकते है जहाँ कहते है ..” दोस्त पीछे रहे तो उसके लिए बुरा फ़ील होता है लेकिन अगर वो हमसे आगे निकल जाए तो और ज़्यादा बुरा फ़ील होता है “ ... 🤷🏻‍♂🤷🏻‍♂इसलिए अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के सामने थोड़ा कमज़ोर होना अच्छा है .. दूसरा जिस व्यक्ति पर आप निर्भर हो मतलब जिससे आपको बहुत काम पड़ता है और जिससे आपने उधार लिया हो ऐसे व्यक्ति के सामने थोड़ा कमज़ोर रहना अच्छा है अगर आप वहाँ ख़ुद की होशियारी बघारेंगे तो यह आपको नुक़सान करेगी ... 🛐तीसरा अपने गुरु और 👥माता पिता के सामने थोड़ा कमज़ोर छवि अच्छी है .. एक बार एक व्यक्ति 🙌🏻गुरु कृपा के कारण सामान्य जीवन से बहुत ज़्यादा grow कर रहा था , सफलता के बाद उसमें 🧐अहं आ गया वो कहने लगा कि मेरी कड़ी मेहनत और बुद्धिमानी के कारण मैं इतना सफल हो रहा हूँ यह बात उसमें अपने गुरु के सामने भी कह दी . गुरु ने कहा - अच्छा है लगता है तुम ख़ुद को ख़ुद सम्भाल सकते हो , उस दिन के बाद से उस व्यक्ति का पतन आरम्भ हो गया क्यूँकि वो गुरु के आशीर्वाद 🙌🏻के कारण ही विकास कर रहा था लेकिन जैसे ही उसने खुद को strong बताया गुरु ने उस पर से ध्यान हटा दिया और वो एकदम लाचारी 😫में आ गया इसलिए हमेशा अपने गुरु और माता पिता के सामने थोड़ा कमज़ोर रहना अच्छा है .....! 🤷🏻🤷🏻मित्रो .. आपके आस पास वाले लोग 💗आपसे प्रेम करते है लेकिन इस सृष्टि का नियम है कि सब आपको साथ रखना चाहते है और जैसे ही किसी मित्र या रिश्तेदार को लगेगा कि आप बहुत ऊपर जा रहे हो या उनसे अलग हो रहे हो तो उनकी भावशक्ति आपको नुक़सान करेगी इसलिए हमेशा जो लोग आपके अभिन्न है , आपके 🛐गुरु आपके 👵🏻🧓🏻माता पिता , आपके 👥👥करीबी दोस्त और रिश्तेदार उनके सामने छोटा और कमज़ोर बन कर रहने से हमेशा आपको उनकी दुआयें और 🙌🏻सहयोग मिलेगा ... इसलिए इस सूत्र को समझे कि कहाँ आपको ख़ुद की शक्तिशाली छवि 👤रखनी है और कहाँ कमज़ोर ....! 👬दो दोस्त थे शुरू से साथ पढ़े , एक दोस्त😔 मुश्किल में आ गया तो दूसरे दोस्त ने उसकी बहुत सहायता की और उसका पूरा व्यापार📊 settle किया फिर किसी कारण से दोनो में आपसी लेन देन के कारण झगड़ा 🤬हो गया , जिस दोस्त ने हमेशा उसकी सहायता की थी उसने अपना माइंड वहाँ से हटा दिया वो अपनी लाइफ़ में व्यस्त हो गया लेकिन पीछे वाला दोस्त बहुत सारी मुश्किलों में फँस गया और एक दिन उसने उसको 📞फ़ोन किया कि मैं तकलीफ़ में हूँ अब देखिए अब यहाँ पर कमज़ोर छवि के कारण उस दोस्त का मन पिघल गया उसने सब झगड़े भुला कर उसको वापस सहयोग करना शुरू किया अगर वो दोस्त कहता कि मैं मज़े में हूँ , मैं बहुत खुश हूँ तो शायद उसे अपने दोस्त का सहयोग नही मिलता लेकिन कमज़ोर image के कारण उसे सहयोग मिल गया .... 🌅🌅 इसलिए कहा कौन सी छवि में प्रस्तुत होना है यह सीखे तो जीवन सुखद और सफल होगा ..... धन्यवाद 🙏🏻💐 ********************************************** 👉🏻 U can mail your questions & queries to 📩 [email protected] https://youtu.be/Ga_owFqvg08

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Jay Lalwani May 9, 2020

🌅CHARAMMANGAL VIRAAT VICHAR ✍jyotishacharya *VInay virat ji 🗓 8 मई 2020 💁🏻‍♂ कहाँ छोटा रहना कहाँ बड़ा होना .... 🗣अक्सर एक कहावत कही जाती है कि “ बनिया हमेशा रोता भला “ मतलब बिज़्नेस 📊करने वाला हमेशा रोता रहे तो बढ़िया है ..! 🙋🏻‍♂जब मैं law of attraction पढ़ रहा था जो कहती है कि व्यक्ति को हमेशा सकारात्मक और आत्मविश्वासी होना चाहिए जैसे अभी लॉकडाउन है और आपको कोई पूछे कि आप कैसे हो तो जवाब होना चाहिए “ “एकदम मस्त “ ... इसी law of attraction के कारण पूरे social media में लोग ऐसे बता रहे हैं जैसे घर बैठे वो बहुत enjoy कर रहे है और हम सब यह अच्छी तरह जानते है कि इतने दिनो बिना काम के बैठना वाक़ई बहुत 🙇उबाऊ काम है लेकिन आकर्षण के सिद्धांत की अपनी महत्त्वता है और चाणक्य भी नीति शास्त्र में कहते है कि व्यक्ति को हमेशा दूसरों के सामने अपनी एक मज़बूत छवि 👤रखनी चाहिए ... जैसे अगर आपके दोस्तों को पता है कि आपकी आर्थिक हालत कमज़ोर है तो बिज़्नेस में या ज़रूरत पड़ने पर वो आपको पैसे उधार 🙅🏻‍♂नही देंगे ... तो चाणक्य नीति और law of attraction दोनो यह कहती है कि हमेशा अपनी powerful और आत्मविश्वास से भरपूर छवि दूसरों के सामने रखिए ....! 🤔🤔फिर मैं सोच रहा था कि यह क्यूँ कहा गया कि बनिया रोता हुआ भला .. फिर एक दो घटनाओं से मुझे समझ आया कि यह कितनी गहरी बात है ... जब आप अपने दोस्तों और रिश्तेदार जो आपको अच्छे से जानते है उनके सामने अपनी extra image रखते है तब यह आपको नुक़सान देगा .. ऐसा क्यूँ ..? समझिए जब चार मित्र होते हैं और कोई एक बहुत ज़्यादा विकास 📶करता होता है तो बाक़ी तीन लोगों को लगता है कि यह उनके zone से बाहर जा रहा है इसलिए उनके अंदर 🤨ईर्ष्या का भाव आने लगता है और ये भाव आपको नुक़सान करते हैं जिसे आप नज़र भी कह सकते है शायद यह बात आप 3 idiot मूवी से समझ सकते है जहाँ कहते है ..” दोस्त पीछे रहे तो उसके लिए बुरा फ़ील होता है लेकिन अगर वो हमसे आगे निकल जाए तो और ज़्यादा बुरा फ़ील होता है “ ... 🤷🏻‍♂🤷🏻‍♂इसलिए अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के सामने थोड़ा कमज़ोर होना अच्छा है .. दूसरा जिस व्यक्ति पर आप निर्भर हो मतलब जिससे आपको बहुत काम पड़ता है और जिससे आपने उधार लिया हो ऐसे व्यक्ति के सामने थोड़ा कमज़ोर रहना अच्छा है अगर आप वहाँ ख़ुद की होशियारी बघारेंगे तो यह आपको नुक़सान करेगी ... 🛐तीसरा अपने गुरु और 👥माता पिता के सामने थोड़ा कमज़ोर छवि अच्छी है .. एक बार एक व्यक्ति 🙌🏻गुरु कृपा के कारण सामान्य जीवन से बहुत ज़्यादा grow कर रहा था , सफलता के बाद उसमें 🧐अहं आ गया वो कहने लगा कि मेरी कड़ी मेहनत और बुद्धिमानी के कारण मैं इतना सफल हो रहा हूँ यह बात उसमें अपने गुरु के सामने भी कह दी . गुरु ने कहा - अच्छा है लगता है तुम ख़ुद को ख़ुद सम्भाल सकते हो , उस दिन के बाद से उस व्यक्ति का पतन आरम्भ हो गया क्यूँकि वो गुरु के आशीर्वाद 🙌🏻के कारण ही विकास कर रहा था लेकिन जैसे ही उसने खुद को strong बताया गुरु ने उस पर से ध्यान हटा दिया और वो एकदम लाचारी 😫में आ गया इसलिए हमेशा अपने गुरु और माता पिता के सामने थोड़ा कमज़ोर रहना अच्छा है .....! 🤷🏻🤷🏻मित्रो .. आपके आस पास वाले लोग 💗आपसे प्रेम करते है लेकिन इस सृष्टि का नियम है कि सब आपको साथ रखना चाहते है और जैसे ही किसी मित्र या रिश्तेदार को लगेगा कि आप बहुत ऊपर जा रहे हो या उनसे अलग हो रहे हो तो उनकी भावशक्ति आपको नुक़सान करेगी इसलिए हमेशा जो लोग आपके अभिन्न है , आपके 🛐गुरु आपके 👵🏻🧓🏻माता पिता , आपके 👥👥करीबी दोस्त और रिश्तेदार उनके सामने छोटा और कमज़ोर बन कर रहने से हमेशा आपको उनकी दुआयें और 🙌🏻सहयोग मिलेगा ... इसलिए इस सूत्र को समझे कि कहाँ आपको ख़ुद की शक्तिशाली छवि 👤रखनी है और कहाँ कमज़ोर ....! 👬दो दोस्त थे शुरू से साथ पढ़े , एक दोस्त😔 मुश्किल में आ गया तो दूसरे दोस्त ने उसकी बहुत सहायता की और उसका पूरा व्यापार📊 settle किया फिर किसी कारण से दोनो में आपसी लेन देन के कारण झगड़ा 🤬हो गया , जिस दोस्त ने हमेशा उसकी सहायता की थी उसने अपना माइंड वहाँ से हटा दिया वो अपनी लाइफ़ में व्यस्त हो गया लेकिन पीछे वाला दोस्त बहुत सारी मुश्किलों में फँस गया और एक दिन उसने उसको 📞फ़ोन किया कि मैं तकलीफ़ में हूँ अब देखिए अब यहाँ पर कमज़ोर छवि के कारण उस दोस्त का मन पिघल गया उसने सब झगड़े भुला कर उसको वापस सहयोग करना शुरू किया अगर वो दोस्त कहता कि मैं मज़े में हूँ , मैं बहुत खुश हूँ तो शायद उसे अपने दोस्त का सहयोग नही मिलता लेकिन कमज़ोर image के कारण उसे सहयोग मिल गया .... 🌅🌅 इसलिए कहा कौन सी छवि में प्रस्तुत होना है यह सीखे तो जीवन सुखद और सफल होगा ..... धन्यवाद 🙏🏻💐 ********************************************** 👉🏻 U can mail your questions & queries to 📩 [email protected] https://youtu.be/Ga_owFqvg08

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Jay Lalwani May 8, 2020

🌅CHARAMMANGAL VIRAAT VICHAR ✍jyotishacharya *VInay virat ji 🗓 7 मई 2020 ☸️ बोधी धर्म - showlin से लेकर 🧘🏼ध्यान तक .... ☸️ बोधी धर्म में एक ऐसे साधक हुए जिन्होंने 🌱आयुर्वेद की जानकारी से समय में एक प्लेग जैसी बीमारी का इलाज करके कई लोगों को बचाया था लेकिन मुझे जो चीज़ 🙅🏻‍♂️समझ नही आयी वो यह थी कि बोधी धर्म ने showlin kufu को ईजाद किया और उन्होंने कई तरह की ध्यान पद्धति को भी ईजाद किया अब मेरे लिए यह थोड़ा संदिग्ध था क्यूँकि एक ही व्यक्ति दो विपरीत साधनो को जैसे ईजाद कर सकता है .. ku -fu से आपका मंगल 🔺मज़बूत और सक्रिय होता है .. दूसरी तरफ़ 🧘🏻‍♂️ध्यान से आपका मंगल शांत होता है ... लड़ना और शांत बैठना दोनो विपरीत चीज़ें है तो फिर☸️ बोधी धर्म ने दोनो साधनो को जैसे बनाया और दूसरा प्रश्न एक साधक को कुंग फ़ू 🥋को ईजाद करने की ज़रूरत क्यूँ पड़ी क्यूँकि आमतौर से हर साधू या सन्यासी शांति और अहिंसा की बात करता है .... जब मैने इस विषय में कई लोगों से पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्होंने लड़ने के लिए नही बल्कि स्वरक्षा के लिए कुंग फ़ू 🥋ईजाद किया था लेकिन मुझे यह जवाब संतुष्ट नही कर सका तब मैने कुछ कुंग फ़ू वाली 🎞मूवी देखी ....! 💁🏻‍♂️हम जिसे शक्ति और प्रतिरोध ट्रेनिंग कहते है जैसे plank जिसमें हम शरीर को पूरा तरह से कड़ा कर देते है और दूसरा फुर्ती से move करना ज़्यादातर ये दोनो का मिश्रण ही 🥋kung fu है तब मैने एक प्लैंक करने की कोशिश की इसमें आपका शरीर 1 -2 मिनट में एक आसन में ही थक जाता है लेकिन फिर भी आप हठयोग की तरह उस आसन में ही रहते है ... अब यहाँ किया हुआ सोचिए ... आपका शरीर थक गया लेकिन आप नही थके और आपने उसे पूरा किया इस तरीक़े से शरीर वाले दिमाग़ ने आपको समर्पण का दिया .. हठयोग में यही होता है आप अपने शरीर का पूरा नियंत्रण ले लेते है ऐसा करने से अब आपका शरीर और उसकी आदतें आप ख़ुद निर्धारित करते है तब मुझे समझ 🥋आया कुंग फ़ू हठयोग का ही एक रूप है जिसमें आप अपने शरीर को साध लेते है फिर जैसा आप चाहे शरीर उस हिसाब से चलता है .....! 🤷🏻‍♂️🤷🏻‍♂️ कई बार जब मैं सुनता हूँ कि 🧘🏻‍♂️ध्यान के एक माध्यम 🥃से शराब और 🚬सिगरट का नशा छुड़वाया जा सकता है तब मैं सोचता हूँ ध्यान में आप अपने शरीर को नही सिर्फ़ दिमाग़ को अपने नियंत्रण में लेते है और नशा हमेशा आपका शरीर करता है इसलिए जब भी हमें कोई चीज़ ↩️बदलनी है तो सिर्फ़ वो शरीर के बदलाव से सम्भव है , ध्यान में आप अपने मन को साधते है लेकिन शरीर को आप 🧘🏼योग , हठयोग या 🥋कुंग फ़ू से साधते हो अब मुझे समझ आया बोधी धर्म ☸️एक ऐसे साधक थे जिन्होंने बाहर शरीर को साधने की कला दी कुंग फ़ू से और अंदर मन को साधने की कला दी ध्यान से ... 💁🏻‍♂️जो लोग यह समझते है कि हम मन की सोच बदल कर बाहर काफ़ी कुछ बदल सकते है तो वो बैठ कर सोचे क्या वाक़ई वैसा हो रहा है ........ 🗣लोग कहते है कि law of visualisation से मैं सिर्फ़ बैठकर सब कुछ बदल सकता हूँ , सिर्फ़ 🤔अच्छा सोचो और अच्छा पाओ तो आप सोचिए आपके साथ यह कितनी बार हुआ .. आपको एक brain स्ट्रोक लगा और आपके हाथ में paralise हो गया मतलब आपके दिमाग़ हाथ को move करने के लिए निर्देश नही दे रहा अब 👨🏻‍💼डॉक्टर कहता है कि psychotherapy करवाओ , बार बार जब उस हाथ को आप move करते है तो शरीर दिमाग़ को निर्देश देता है कि यह काम करो ....सिर्फ़ बैठ कर दिमाग़ से आप सोचे कि मेरा हाथ ठीक हो गया उससे वो ठीक नही होने वाला ..... 🌅 इसलिए आप कहते है मुझे अपना जीवन बदलना है तो सबसे पहले आपको शरीर की नियमावली को बदलना होगा इसलिए ☸️📿 बोधी धर्म ने पहले शरीर की साधना दी और फिर मन की ..... धन्यवाद 🙏🏻💐 ********************************************** 👉🏻 U can mail your questions & queries to 📩 [email protected] https://youtu.be/Ga_owFqvg08

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N K Lall May 8, 2020

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.67 : जीवनकाल में विदेहमुक्ति* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 67)* बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।। धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! हमलोग जितने हैं, सब-के-सब बन्धन में पड़े हैं। *हमारे ऊपर शरीर और संसार का बंधन है* जैसे कोई कारागार में हो, उसका आहाता बहुत बड़ा होता है। उसमें बहुत कोठरियाँ होती हैं। उसमें कारावास भोगनेवाले होते हैं। ब्रह्माण्डरूप कारागार का यह एक-एक पिण्ड एक-एक कोठरी के समान है। इसमें जीव कारावास भोगता है। इस शरीर में हमारा रहना कैदी की तरह है। यही कारण है कि संसार की परिस्थिति के कारण बड़े हों या छोटे, सब-के-सब दुःख का अनुभव करते हैं। *संतों ने इन दुःखों से छुटने के लिए कहा; और कहा कि इनसे छूटना ही कल्याणकारी है। इसके लिए संतलोग जो रास्ता बतलाते हैं, उसपर चलिए।* गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा - *संत पंथ अपवर्ग कर, कामी भव कर पंथ। कहहिं संत कवि कोविद, श्रुति पुरान सद्ग्रंथ।।* मोक्ष के लिए चेष्टा करो, प्रयास करो। सारे बंधनों से छूट जाओ। यही उनकी पुकार है। बंधन में रहने के वास्ते उसका बीज या अंकुर तुम्हारे अंदर है। ऐसा संतों ने कहा है। *अपना अंदर शुद्ध करो, बीज को नष्ट करो, तो तुम बंधन से छूट जाओगे। यह बीज क्या है? चित्त का धर्म है।* मैं सुखी हूँ, मैं दु:खी हूँ, मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ - ये चारों बातें उठती रहती हैं। जिस प्रकार शरीर को कितनाहू धोओ, उसमें मैल आती ही रहती है, उसी प्रकार चित्त में इसका धर्म होता ही रहता है। इसको क्षय करने के लिए भगवान श्रीराम ने उपदेश दिया और कहा कि *शरीर रहते मुक्ति प्राप्त करो।* इसी को जीवनमुक्त कहते हैं। जीवनकाल में भी विदेहमुक्त कहलाता है, इसलिए कि शरीर में जो सुख-दुःख होते हैं, उनको वह कुछ नहीं जानता। कर्ममण्डल से जबतक कोई ऊपर नहीं उठता, तबतक चित्तधर्म होता ही रहता है। इसके लिए *भगवान श्रीराम ने श्रवण, मनन, निदिध्यासन और अनुभव-ज्ञान प्राप्त करने के लिए कहा।* सुनो, समझो, और सुन समझकर जो निर्णय हो, उस कर्म को करो। कर्म करते-करते कर्म का अंत होगा, तब अनुभव होता है, तभी चित्त का धर्म छूटता है। यह उसी तरह साधा जाता है, जिस तरह कोई किसी विद्या का सीखने का अभ्यास करता है। थोड़ा थोड़ा सीखते-सीखते उस विद्या में वह निपुण होता है। तुम संसार में जबतक रहते हो, विषयभोग में लगे रहते हो। किंतु संतुष्टि होती नहीं। संतुष्टि नहीं तो सुख कहाँ? विषयानंद में तुम कभी सुखी नहीं हो सकते। चित्त-धर्म से ऊपर उठो। *विषयानंद में खींचो मत। विषयों से ऊपर आत्म अनुभवानंद है।* उसको प्राप्त करो तब नित्यानंद मिलता है, जिस आनंद को पाकर किसी प्रकार की कल्पना नहीं होती। आगे बढ़कर वे कहते हैं - जबतक तुम्हारे अंदर इच्छा रहेगी और प्राणस्पंदन रहेगा, तुम्हारा चित्त-धर्म नाश नहीं हो सकता। इसके लिए तुम दोनों में से किसी एक का दमन करो, तो वासना और प्राणस्पंदन - दोनों दमित हो जाएँगे। ‘प्राण' का अर्थ प्राणवायु नहीं जानना चाहिए। *फेफड़े में जो वायु खींचने और फेंकने का काम जिस जीवनीशक्ति से होता है, वह प्राण है। जो वायु उससे संबंधित होती है, वह प्राणवायु है।* उसके स्पन्दन को रोको या इच्छा को दबाओ। दोनों में से किसी को रोको, तो दोनों रुक जाएँगे। प्राण में स्पन्दन होने से मन में कुछ-न-कुछ भाव उत्पन्न होता है। *इच्छा को रोको, यह सरल तरीका है। इच्छाओं को रोकने के लिए ध्यान सरल उपाय है।* एक ओर मन को लगाने से, जहाँ मन लगाते हैं, वहाँ से मन भागता है। फिर लौटा-लौटाकर उसी स्थान पर लाते हैं, यह प्रत्याहार है। बारंबार प्रत्याहार होते-होते धारणा होती है और फिर ध्यान होता है। पूर्ण सिमटाव होने से ऊर्ध्वगति होती है। ऊर्ध्वगति होने से आवरणों का छेदन होता है, तब चेतन आत्मा सब आवरणों को पार कर ऊपर उठ जाती है। यही मोक्ष है। इससे क्या होता है? परमात्मा को पाता है। आवरणहीन हो जाने से जैसे मठाकाश, घटाकाश और महदाकाश एक ही होता है, उसी तरह उपाधिहीन या आवरणहीन होने पर चेतन आत्मा अपने को पाती है और परमात्मा को भी पाती है। इस अवस्था को जिसने प्राप्त किया, वह फिर मरता नहीं। *इस अवस्था का मरना जो नहीं मरता, वह संसार में फिर फिर जनमता-मरता है।* कबीर साहब ने कहा है – *मरिये तो मरि जाइये, छूटि पड़े जंजार। ऐसी मरनी को मरै, दिन में सौ सौ बार।।* जैसे-जैसे इच्छाओं से छूटता जाता है, वैसे-वैसे प्राणस्पंदन रुकता है। भीतर-भीतर चलने से इच्छाओं की निवृत्ति होती है, प्राणस्पंदन रुद्ध हो जाता है और एकविन्दुता प्राप्त हो जाने पर प्राणस्पंदन बिल्कुल बन्द हो जाता है। इसी के लिए *कबीर साहब ने मृतक होने के लिए कहा।* ध्यानाभ्यासी स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करता है। फिर सूक्ष्म से कारण में और कारण से महाकारण में प्रवेश करता है। इस प्रकार जड़ के चारों शरीरों को त्यागकर अपने स्वरूप में आता है। फिर चेतन शरीर को भी छोड़कर परमात्मा में विलीन होता है। *यही पूरा-पूरा मरना है। इस प्रकार जो मरता है, वह फिर कभी मरता नहीं।* अपने अन्दर जो मानस जप और मानस ध्यान करता है और पूर्ण सिमटाव के लिए यत्न करता है, यह यत्न एकविन्दुता प्राप्त करने के लिए है। *स्वामी विवेकानन्द ने कहा - 'तुम अपनी दृष्टि को अंतर्मुखी बनाओ।* साधु का संग करो, अध्यात्मविद्या की शिक्षा ग्रहण करो। *अध्यात्म-विद्या की शिक्षा बिना साधु-संग के नहीं होगा। इसलिए साधुसंग करो।* उनसे अध्यात्म-विद्या सीखो। प्राणस्पंदन निरोध और वासना परित्याग करो। गुरु महाराज ने जो क्रिया बतायी है, उससे प्राणस्पंदन का निरोध और वासना का परित्याग होता है। *जिसको यह युक्ति मालूम है, उसे नित्य करना चाहिए। कभी गाफिल नहीं होना चाहिए।* साधुसंग, वासना-परित्याग, प्राणस्पन्दन-निरोध और अध्यात्म-विद्या की शिक्षा - ये ही चारो आत्मज्ञान को प्राप्त करा सकते हैं। *भगवान श्रीराम ने हनुमानजी को उपदेश दिया कि तुम मेरे अशब्द, अरूप, अस्पर्श, अगंध और गोत्रहीन दुःखहरण करनेवाले रूप का नित्य भजन करो।* लोग स्थूल सौन्दर्य में आसक्ति रखते हैं; किंतु यदि सूक्ष्म के विन्दु रूप सौन्दर्य को प्राप्त करें तो स्थूल सौन्दर्य स्वतः छूट जाएगा। और वह जब कारण के दिव्य सौन्दर्य को प्राप्त करेगा, तो सूक्ष्म का सौन्दर्य भी छूट जाएगा। इस प्रकार क्रमक्रम से वह रूप से अरूप में चला जाएगा, फिर परमात्मा को प्राप्त करेगा। यम ने नचिकेता को समझाया कि मनुष्य को बहुत शुद्ध होना चाहिए। ब्रह्मवत् परिशुद्ध नहीं होकर कोई परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए *झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार मत करो। खानपान सात्त्विक होना चाहिए।* जो सात्त्विकता के लिए यत्न नहीं करता, रजोगुण और तमोगुण में फँसा रहता है और परमार्थ की ओर चलना चाहता है, तो वह वैसा ही होगा, जैसे ‘भूमि पड़ा चह छुअन आकाशा' कहा गया है। इसलिए खानपान को पवित्र रखो। खान-पान का असर मन पर पड़ता है। यदि खान-पान का असर मन पर नहीं पड़ता, तो भाँग खाने और शराब पीने से मस्तिष्क क्यों गड़बड़ा जाता है। *खान-पान को पवित्र रखो। संतों के कहे अनुकूल चलो। कल्याण होगा।* यह प्रवचन कटिहार जिलान्तर्गत श्रीसंतमत सत्संग मंदिर मनिहारी में दिनांक 16.3.1954 ईo को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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Manju Gupta May 10, 2020

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मृत के शरीर को मुखाग्नि देने के कुछ समय बाद बांस में लोटा बांधकर शव के सिर वाले हिस्से में घी डाला जाता है ताकि मृत का सिर पूरी तरह से जल जाए, उसका कोई हिस्सा शेष न बचे। इस क्रिया को कपाल क्रिया कहते हैं। कुछ लोग इस क्रम में मृतक के सिर पर घी की आहुति दे कर तीन बार डंडे से प्रहार कर उसकी खोपड़ी फोड़ी जाती है। इसे भी कपाल क्रिया ही कहा जाता हैं। कपाल क्रिया से जुडी एक मान्यता यह भी है कि कपाल क्रिया के बाद ही प्राण पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं और मृत की आत्मा नए जन्म की प्रक्रिया में आगे बढ़ता है। इस संबंध में दूसरी मान्यता है कि खोपड़ी को फोड़कर मस्तिष्क को इसलिए जलाया जाता है ताकि वह अधजला न रह जाए अन्यथा अगले जन्म में उसका शरीर अविकसित रह जाता है। खोपड़ी की हड्डी काफी मजबूत होती है कि उसे अग्नि में भस्म होने में समय लगता है। इस कारण से उसे फोड़ा जाता है जिससे मस्तिष्क में स्थित ब्रह्मरंध्र पंचतत्व में पूर्ण रूप से विलीन हो जाए। इसीलिए अंतिन संस्कार मे कपाल क्रिया की जाती है। कपाल क्रिया करना इस लिये भी जरुरी होता है क्योकि कुछ तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त करने के लिए मृत शरीर की खोपड़ी का उपयोग करते हैं 🙏कपाल क्रिया🙏

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.66 : चित्तवृत्ति का निरोध करना योग है* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 66)* बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।। धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! *ज्ञान का पूरक योग है और योग का पूरक ज्ञान। योग का अर्थ है मिलना और ज्ञान का अर्थ है जानना।* बिना कुछ जाने, मिले तो किससे? ज्ञान भी दो तरह के होते हैं? एक वह ज्ञान है, जिससे जानते हैं, लेकिन पहचानते नहीं हैं। दूसरा ज्ञान वह है, जिससे हम जानते हैं और पहचानते दोनों हैं। *जाना किन्तु पहचाना नहीं, यह अधूरा ज्ञान है। और जानकर पहचानने पर पूरा ज्ञान होता है।* बिना मिलन के भी पूरा ज्ञान नहीं होता, पूरी पहचान भी नहीं होती। इसलिए *ज्ञान और योग; दोनों की आवश्यकता है।* योग जैसे-जैसे बढ़ेगा, वैसे-वैसे ज्ञान भी बढ़ेगा। बढ़ते-बढ़ते योग भी बढ़ेगा और ज्ञान भी बढ़ेगा। चित्तवृत्ति का निरोध करना योग है। यदि कोई कहे तो कहना चाहिए कि चित्त की धारें एक नहीं होने से निरोध कैसे हो सकता है? चित्तवृत्ति के एकत्र होने से ही निरोध होगा। तब प्रश्न होगा कि ज्ञान और योग तो हुआ, लेकिन भक्ति तो नहीं हुई। तो कहो कि *भक्ति का अर्थ है सेवा।* प्रणाम करना भी सेवा है। प्रणाम करने से आदर होता है। आदर होने से उसके दिल में प्रसन्नता होती है। यह जीवित प्राणी के लिए है। जो जीवित प्राणी नहीं है, उसके लिए क्या सेवा है? जैसे औषधि सेवन है। औषधि को खा जाते हैं, शरीर में लगाते हैं अथवा सूँघते हैं, यह भी सेवा है। जिससे जैसा काम लेना चाहिए वैसा लेना सेवा है। जैसे गंगा-सेवन। गंगा में स्नान करते हैं, वायु में टहलते हैं, गंगा का जल पीते हैं। गंगा-जल जड़ पदार्थ है। *जड़ ज्ञानहीन पदार्थ को कहते हैं।* जैसे यह कागज का फूल है। इसको ज्ञान नहीं है। यह जड़ है, यह शरीर भी जड़ है, किन्तु इसमें चेतन है। जैसे लोहे को अग्नि में तपा देने से वह लाल हो जाता है, अग्नि का रूप हो जाता है और अग्नि का काम करता है; किन्तु उसको आग से थोड़ी देर अलग रख दो, तो उससे लाली निकल जाती है और वह ठण्ढा पड़ जाता है, फिर उससे अग्नि का काम नहीं होता। उसी तरह इस शरीर में जबतक चेतन है, तबतक यह चेतन सा काम करता है। मुर्दा शरीर में से चेतन निकल जाता है, तब वह जड़ का जड़ हो जाता है। तो यह जड़ और चेतन पर कहा। अब सेवा पर आते हैं। जैसे गंगा की सेवा। गंगा-जल जड़ है। उसको ज्ञान नहीं है। उसको पीते हैं, उसमें स्नान करते हैं। यह भी सेवा है। सेवा किसकी करोगे, यदि ज्ञान नहीं हो? ज्ञान नहीं हो तो मिलोगे किससे? ईश्वर की सेवा करोगे - भक्ति करोगे, यदि ईश्वर के सम्बन्ध में जानो नहीं, तो उससे कैसे मिलोगे? इसलिए *ज्ञान और योग करने से भक्ति भी हो जाती है।* भक्ति या सेवा को लोग इस तरह समझते हैं - शिव, राम, कृष्ण, देवी आदि किसी की मूर्ति को बनाकर पूजना भक्ति या सेवा है। शिवलिंग में हाथ, पैर, नाक कुछ भी नहीं है। किन्तु इस रूप को शिव मानकर पूजते हैं; किन्तु पूजन इतना ही है कि और भी है? यदि इतना ही रहता तो श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद, शास्त्र आदि क्यों होते? यह मोटा ज्ञान उसके लिए है जो पहले से कुछ नहीं जानता। यह ईश्वरकृत शरीर भी जड़ है। एक पत्थर लो और अपनी देह देखो। दोनों में मोल किसका विशेष है? दोनों ईश्वरकृत हैं। शरीर की इज्जत पत्थर से विशेष है। हीरा, लाल, मोती आदि भी मनुष्य से कम नहीं हैं। फिर भी मनुष्य देह जड़ है। तब और जो पत्थर है, उसका क्या मूल्य है? *गुरु यदि गोरू हो तो उसकी सेवा से क्या लाभ होगा?* ईश्वर को जानना है, तो यदि इतना ही जाने कि शालिग्राम ही ईश्वर है, तो इतने से काम नहीं चलेगा। यदि गुरु को ही ईश्वर मानो, जैसा तुलसीकृत रामायण में है - *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* वाल्मीकि जी ने भी श्रीराम से कहा था – *तुम्ह तें अधिक गुरुहिं जिय जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।* *ईश्वर सबमें है। इसलिए कि ईश्वर सबसे पहले का है।* उसके पहले कुछ नहीं था। खुदा - खुद+आ = स्वयं आया। इसी का जोड़ा हमलोगों के यहाँ ‘स्वयंभू' शब्द है। किंतु यह शब्द भी कमजोर है। जो पहले से है, वह छोटा नहीं हो सकता या बड़ा भी हो तो परिमाण-सहित, आदि-अंतसहित चाहे करोड़ों योजन लम्बा-चौड़ा हो, अनादि-अनंत से छोटा ही है। यदि कहा जाय कि सबसे पहले का सीमावाला पदार्थ था, तो प्रश्न होगा कि उसकी सीमा के पार में क्या था? सीमावाला मान लेने पर ईश्वर सबसे पहले का सिद्ध नहीं होता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है – *व्यापक व्याप्य अखण्ड अनन्ता। अखिल अमोघ सक्ति भगवन्ता।।* जो पहले का होगा, उसकी सीमा नहीं होगी और वह सबमें होगा। इसीलिए कबीर साहब ने कहा – *है सब में सबही तें न्यारा। जीव जन्तु जल थल सबही में, सबद वियापत बोलनहारा।* शालिग्राम, श्रीराम या गुरु की मूर्ति को जो बताया गया है, वह तो इसलिए कि तुम कुछ नहीं जानते हो, तो उनमें मन लगाने के लिए बताया। यदि कहो कि ईश्वर से मिलकर क्या होगा? तो देखो, *यहाँ पर आराम नहीं है, बेचैनी लगी रहती है। चाहे राजा हो या कुछ बने रहो।* अंग्रेज हमलोगों के यहाँ से भाग गया। वह यहाँ था, तब उसको बेचैनी थी। इसको छोड़कर भाग गया, तब भी बेचैनी है। सोचकर देखिए, आपकी एक कट्ठा जमीन कोई ले लेता है, तो आपको कैसा मन होता है? जिसके हाथ से सारा भारतवर्ष छूट गया, उसका मन कैसा होता होगा? इसलिए संसार में शान्ति चैन कहीं नहीं है, चाहे कुछ बन जाओ। सूर्य, चन्द्र, तारे आदि सभी देश काल से घिरे हैं। *देश-काल के अंदर रहोगे, तो बेचैनी में और दुःख में रहोगे।* इन्द्र, ब्रह्मा, शिव आदि सब-के-सब बेचैन रहते हैं। इसलिए देश-काल से जो परे है, उससे मिलो। यही योग है। इसी योग का अर्थ ‘भक्ति' है। *परमात्मा से मिलने के लिए कोशिश करो। यही भक्ति है।* *मोटी बातों से भक्ति का आरंभ है। भक्ति का जहाँ अंत है, वहाँ परमात्म-दर्शन है।* इस भक्ति में ईश्वर के पास जाना है, ईश्वर को बुलाना नहीं है। यदि कोई कहे कि ईश्वर को सर्वव्यापी मानते हो, तो उसको यहाँ क्यों नहीं पकड़ते? तो उत्तर में कहेंगे कि जानने-पहचानने के लिए हमारे पास पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ये मोटी मोटी हैं; किंतु ईश्वर झीने से झीना है। उसको इन मोटी इन्द्रियों से कैसे पकड़ सकेंगे? इसलिए *वहाँ जाना है, जहाँ सब शरीरों और सब इन्द्रियों से छूट जायँ, तब ईश्वर दर्शन होगा।* यह प्रवचन नेपाल राज्यान्तर्गत मोरंग जिला के ग्राम राजावासा में स्वo तेजुदासजी के निवासस्थान पर दिनांक 12.3.1954 ई० को हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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