तिरूओरगम - श्री वामन भगवान मन्दिर, कांचीपूरम, तमिलनाडु Thiru Ooragam - Sri Ulagalantha Swamy Temple, Kanchipuram

तिरूओरगम - श्री वामन भगवान मन्दिर, कांचीपूरम, तमिलनाडु
Thiru Ooragam - Sri Ulagalantha Swamy Temple, Kanchipuram
तिरूओरगम - श्री वामन भगवान मन्दिर, कांचीपूरम, तमिलनाडु
Thiru Ooragam - Sri Ulagalantha Swamy Temple, Kanchipuram

#ज्ञानवर्षा #मंदिर #विष्णु
Temple Location : This Divyadesam is found in Big Kanchipuram and is closely situated near to Sri Kamakshi Amman Temple.

वामन अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से पाँचवें अवतार हैं जो भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को अवतरित हुए।

वामन अवतार की कथा

श्री हरि जिस पर कृपा करें, वही सबल है। उन्हीं की कृपा से देवताओं ने अमृत-पान किया। उन्हीं की कृपा से असुरों पर युद्ध में वे विजयी हुए। पराजित असुर मृत एवं आहतों को लेकर अस्ताचल चले गये। असुरेश बलि इन्द्र के वज्र से मृत हो चुके थे। आचार्य शुक्र ने अपनी संजीवनी विद्या से बलि तथा दूसरे असुरों को भी जीवित एवं स्वस्थ कर दिया। राजा बलि ने आचार्य की कृपा से जीवन प्राप्त किया था। वे सच्चे हृदय से आचार्य की सेवा में लग गये। शुक्राचार्य प्रसन्न हुए। उन्होंने यज्ञ कराया। अग्नि से दिव्य रथ, अक्षय त्रोण, अभेद्य कवच प्रकट हुए। आसुरी सेना अमरावती पर चढ़ दौड़ी। इन्द्र ने देखते ही समझ लिया कि इस बार देवता इस सेना का सामना नहीं कर सकेंगे। बलि ब्रह्मतेज से पोषित थे। देवगुरु के आदेश से देवता स्वर्ग छोड़कर भाग गये। अमर-धाम असुर-राजधानी बना। शुक्राचार्य ने बलि का इन्द्रत्व स्थिर करने के लिये अश्वमेध यज्ञ कराना प्रारम्भ किया। सौ अश्वमेध करके बलि नियम सम्मत इन्द्र बन जायँगे। फिर उन्हें कौन हटा सकता है।
जन्म

'स्वामी, मेरे पुत्र मारे-मारे फिरते हैं।' देवमाता अदिति अत्यन्त दुखी थीं। अपने पति महर्षि कश्यप से उन्होंने प्रार्थना की। महर्षि तो एक ही उपाय जानते हैं- भगवान की शरण, उन सर्वात्मा की आराधना। अदिति ने फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में बारह दिन पयोव्रत करके भगवान की आराधना की। प्रभु प्रकट हुए। अदिति को वरदान मिला। उन्हीं के गर्भ से भगवान प्रकट हुए। शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी चतुर्भुज पुरुष अदिति के गर्भ से जब प्रकट हुए, तत्काल वामन ब्रह्मचारी बन गये। महर्षि कश्यप ने ऋषियों के साथ उनका उपनयन संस्कार सम्पन्न किया। भगवान वामन पिता से आज्ञा लेकर बलि के यहाँ चले। नर्मदा के उत्तर-तट पर असुरेन्द्र बलि अश्वमेध-यज्ञ में दीक्षित थे। यह उनका अन्तिम अश्वमेध था।

भगवान विष्णु का वामन अवतार - तीन पद भूमि

छत्र, पलाश, दण्ड तथा कमण्डलु लिये, जटाधारी, अग्नि के समान तेजस्वी वामन ब्रह्मचारी वहाँ पधारे। बलि, शुक्राचार्य, ऋषिगण, सभी उस तेज से अभिभूत अपनी अग्नियों के साथ उठ खड़े हुए। बलि ने उनके चरण धोये, पूजन किया और प्रार्थना की कि जो भी इच्छा हो, वे माँग लें।
'मुझे अपने पैरों से तीन पद भूमि चाहिये!' बलि के कुल की शूरता, उदारता आदि की प्रशंसा करके वामन ने माँगा। बलि ने बहुत आग्रह किया कि और कुछ माँगा जाय; पर वामन ने जो माँगना था, वही माँगा था।

'ये साक्षात विष्णु हैं!' आचार्य शुक्र ने सावधान किया। समझाया कि इनके छल में आने से सर्वस्व चला जायगा।

'ये कोई हों, प्रह्लाद का पौत्र देने को कहकर अस्वीकार नहीं करेगा!' बलि स्थिर रहे। आचार्य ने ऐश्वर्य-नाश का शाप दे दिया। बलि ने भूमिदान का संकल्प किया और वामन विराट हो गये। एक पद में पृथ्वी, एक में स्वर्गादि लोक तथा शरीर से समस्त नभ व्याप्त कर लिया उन्होंने। उनका वाम पद ब्रह्मलोक से ऊपर तक गया। उसके अंगुष्ठ-नख से ब्रह्माण्ड का आवरण तनिक टूट गया। ब्रह्मद्रव वहाँ से ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट हुआ। ब्रह्मा जी ने भगवान का चरण धोया और चरणोदक के साथ उस ब्रह्मद्रव को अपने कमण्डलु में ले लिया। वही ब्रह्मद्रव गंगा जी बना।

'तीसरा पद रखने को स्थान कहाँ है?' भगवान ने बलि को नरक का भय दिखाया। संकल्प करके दान न करने पर तो नरक होगा।

'इसे मेरे मस्तक पर रख ले!' बलि ने मस्तक झुकाया। प्रभु ने वहाँ चरण रखा। बलि गरुड़ द्वारा बाँध लिये गये।

'तुम अगले मन्वन्तर में इन्द्र बनोगे! तब तक सुतल में निवास करो। मैं नित्य तुम्हारे द्वार पर गदापाणि उपस्थित रहूँगा।' दयामय द्रवित हुए। प्रह्लाद के साथ बलि सब असुरों को लेकर स्वर्गाधिक ऐश्वर्यसम्पन्न सुतल लोक में पधारे। शुक्राचार्य ने भगवान के आदेश से यज्ञ पूरा किया।
महेन्द्र को स्वर्ग प्राप्त हुआ। ब्रह्मा जी ने भगवान वामन को 'उपेन्द्र' पद प्रदान किया। वे इन्द्र के रक्षक होकर अमरावती में अधिष्ठित हुए। बलि के द्वार पर गदापाणि द्वारपाल तो बन ही चुके थे। त्रेता युग में दिग्विजय के लिये रावण ने सुतल-प्रवेश की धृष्टता की। बेचारा असुरेश्वर के दर्शन तक न कर सका। बलि के द्वारपाल ने पैर के अँगूठे से उसे फेंक दिया। वह पृथ्वी पर सौ योजन दूर लंका में आकर गिरा था।

Sthalapuranam :

Mahabali Chakravarthy, the grandson of Prahaladhan, did a very big yagna (or) hawan to get the Devendra log, which is referred to as "Swarg". But, the lokam belongs to Indiran, who is the King of that loka. Being a great devotee of Sriman Narayan, he was capitulated by temptation and decided to acquire the Devendra Loka. To make him understand and to punish him, Sriman Narayan took the Vamana avathar (dwarf) and asked for 3 feets of his land. On hearing this, Mahabali said that he can take 3 feets of his land. But as a surprise to Mahabali, Sriman Narayan who came there as Vaaman (dwarf) grew up in height, and his head touched the sky. Using the first step, he measured the sky and earth and with the second feet or step, he covered the heaven and more than it. Finally, he asked for the third feet of land. For this, Mahabali surrenders his own head as the third feet and was finally blessed by Sriman Narayan.

Ooragathaan When his head was stamped by bhagvan's feet, he could not get the dharshan of Thirivikrama. So, he prayed for his great Ulagalandha dharshan. Since, he could not be given the Thirivikrama darshan, the Bhagwan gave his seva as Adhisesha (Ooragathaan) which can be seen next to Ulagalandha (Vaaman) bhagvan.

The moral that is explained by bhagavan is that all the things that are exisiting in this world belongs to him. Which means - All the living things (Jeeva rasis) and its Aathmas belong to the bhagvan’s feet and which was explained through "Thiru Ooragathaan".

Mahabali Chakravarthy comes along the family of Bhaktha Prahaladha, a great devotee of Sri Vishnu. In Spite of coming through that kind of family, he wanted to rule the Deva lokam, which belongs to Indiran. And at the same time, Devendra - Indira wanted to rule all over the world. So to teach both of them a lesson, he took the Thiruvikrama guide, thereby reducing the leadership and overhead of Mahabali and on the other hand, by raising his feet and measuring over the sky, he states to Devendra that Deva Loka also belongs to him.

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कामेंट्स

Kailash Chandra vyas Aug 6, 2017
वस्तु कला का महान नमूना। अति सुंदर।

TR. Madhavan Aug 8, 2017
@kailchandra.vyas जय श्री गणेश । अन्नदान कार्यक्रम - प्रार्थना मैं हेप्पी होम्स गेटड् खंयुनिटी का निवासी हुँ, पिछले 17 साल से श्री गणेश चतुर्थी नवरात्रि उत्सव सभी समुदाय के रहने वाले मिल कर मनाते हैं। हर साल उत्सव के दिनों में दो बार करीब 1500 से 2000 भक्तों केलिए अन्नदान का कारिक्रम करते हैं, अपनी सोसाइटी और सोशियल मीडिया के बंधु कि सहायता से। मैं और हैप्पी होम्स श्री गणेश उत्सव समिति के सभी सदस्य आप से निवेदन करते है । “उत्सव समिति कि अलग बैंक काथा नहीं है” आप से निवेदन है कि, नीचे दिये गए बैंक खाते में जामा करने कि कृपा कर सकते हैं । आप से जो भी दान राशि कि सहयोग हो सके कीजियेगा। वाट्सएप न: 8712341974 मे हमें मैसेज कीजिए। Bank account details - TR. Madhavan Ac No. 52642043000057 Oriental Bank of Commerce, Banjara Hills, Hyderabad.IFSC - ORBC0105264. Please Note: Donation receipt will be prepared and sent. धन्यवाद । हेप्पी होम्स श्री गणेश उत्सव समिति, हेप्पी होम्स, हैदराबाद-500048.फोन: 8712341974 / 9246113116

TR. Madhavan Aug 8, 2017
@vicky.rawat.rawat जय श्री गणेश । अन्नदान कार्यक्रम - प्रार्थना मैं हेप्पी होम्स गेटड् खंयुनिटी का निवासी हुँ, पिछले 17 साल से श्री गणेश चतुर्थी नवरात्रि उत्सव सभी समुदाय के रहने वाले मिल कर मनाते हैं। हर साल उत्सव के दिनों में दो बार करीब 1500 से 2000 भक्तों केलिए अन्नदान का कारिक्रम करते हैं, अपनी सोसाइटी और सोशियल मीडिया के बंधु कि सहायता से। मैं और हैप्पी होम्स श्री गणेश उत्सव समिति के सभी सदस्य आप से निवेदन करते है । “उत्सव समिति कि अलग बैंक काथा नहीं है” आप से निवेदन है कि, नीचे दिये गए बैंक खाते में जामा करने कि कृपा कर सकते हैं । आप से जो भी दान राशि कि सहयोग हो सके कीजियेगा। वाट्सएप न: 8712341974 मे हमें मैसेज कीजिए। Bank account details - TR. Madhavan Ac No. 52642043000057 Oriental Bank of Commerce, Banjara Hills, Hyderabad.IFSC - ORBC0105264. Please Note: Donation receipt will be prepared and sent. धन्यवाद । हेप्पी होम्स श्री गणेश उत्सव समिति, हेप्पी होम्स, हैदराबाद-500048.फोन: 8712341974 / 9246113116

Sanjay Singh Oct 21, 2020

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Please share or comments this post 🙏 जय हो श्री सालासर बालाजी महाराज की जय हो श्री श्याम बाबा की जय श्री महाकाल जय माता दी जय श्री राम आप सभी को मेरा प्रणाम आप सदा सुखी रहो भगवान् आपको सदा खुशी रखें आपकी हर मनोकामना पूरी हो आपका दिन मंगलमय हो 🙏🙏🙏🙏❤️🤩🤩🥰 *श्री श्याम प्रभु के आज " खाटु धाम जी "से भव्य अलौकिक अद्धभुत एवं मनभावन "संध्या श्रृंगार दर्शन"...😊🍫🍫* *💞✨...हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा...✨💞* *😊🍃...जय श्री श्याम...🍃😊* *💞😊...खाटूश्याम जी दर्शन...💞®️😊**‼️मेरे मारुति‼️,,* *मुस्करानें😊 के अब बहाने😇 नहीं ढूँढने पड़ते,❤❤* *तुझें🙇‍♂️ याद🥰 करते है तो इच्छा😍 पूरी हो जाती हैं!!!❤❤* *❣️‼️जय जय सियाराम‼️❣️* *❣️‼️जय जय श्री बालाजी महाराज‼️❣️* 💓💓💓💓💓💓💓 💓🙏🙏⛳⛳जय श्री सीताराम जी की⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳जय श्री बालाजी महाराज जी की⛳⛳🙏🙏 🙏 🙏 ⛳⛳जय माँ वैष्णो देवी ⛳⛳🙏 🙏 🙏 🙏 ⛳ ⛳ जय श्री खाटू श्याम जी ⛳ ⛳ 🙏 🙏 🙏🙏⛳⛳जय श्री प्रेतराज जी सरकार की ⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳जय श्री भैरव बाबा की ⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳जय श्री कोतवाल कप्तान की ⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳जय श्री दीवान सरकार जी की⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳जय श्री महंत जी महाराज की ⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳जय श्री मोहनदास बाबा जी की⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳बोल अंजनी माता की ⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳घाटे वाले बाबा की जय⛳⛳ 🙏🙏 🙏🙏⛳⛳पहाड़ वाले बाबा की जय ⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳जय हो घाटा मेंहदीपुर धाम की ⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳जय हो सालासर धाम की⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳बोल सच्चे दरबार की जय ⛳⛳🙏🙏 🙏🙏⛳⛳अपने तो बस बालाजी सरकार⛳⛳🙏🙏

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मंदिर में लग जाती खुद आग, माता करती हैं अग्नि स्नान महीने में कम से कम 2-3 बार स्‍वत: ही अग्नि प्रज्‍जवलित हो जाती है और इस अग्नि में माता की मूर्ति को छोड़कर उनका पूरा श्रृंगार और चुनरी सब कुछ स्‍वाहा हो जाता है। इस अग्नि स्‍नान को देखने के लिए भक्‍तों का मेला लगा रहता है। अगर बात करें इस अग्नि की तो आज तक कोई भी इस बात का पता नहीं लगा पाया कि ये अग्नि कैसे जलती है। यह स्‍थान उदयपुर शहर से 60 किमी दूर अरावली की पहाड़ियों में स्थित है। इस मंदिर के ऊपर कोई छत नहीं है और एकदम खुले चौक में स्थित है इस मंदिर में भक्तों की खास आस्था है, क्योंकि यहां मान्यता है कि लकवे से ग्रसित रोगी यहां मां के दरबार में आकर ठीक हो जाते हैं। ईडाणा माता मंदिर में अग्नि स्नान का पता लगते ही आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ लग जाती है। मंदिर के पुजारी के अनुसार ईडाणा माता पर अधिक भार होने पर माता स्वयं ज्वालादेवी का रूप धारण कर लेती हैं। ये अग्नि धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करती है और इसकी लपटें 10 से 20 फीट तक पहुंच जाती है।

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VISHAL ANAND Oct 21, 2020

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sunita yadav Oct 21, 2020

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Umesh Sharma Oct 21, 2020

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Ramesh Agrawal Oct 21, 2020

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