जय श्री काशी विश्वनाथ ..

जय श्री काशी विश्वनाथ ..

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कामेंट्स

Sanjeev gupta Feb 19, 2019
har har Mahadev,shree kashi Vishwanath aapke manokam a purn kre bhana

Bindu singh Feb 19, 2019
Jai shree ganesh ji Har Har mhadev ji 🙏🙏🌹🌹

Bhimbhai Chavda Feb 19, 2019
जय काशी विश्वनाथ महादेव

Ramu Rai Feb 19, 2019
जय बाबा विक्षनाथ

jai shri krishna Mar 25, 2019

. "पार्वतीजी की परीक्षा" पार्वती ने भगवान शंकर की प्राप्ति हेतु तपस्या की। भगवान शंकर प्रकट हुए तथा दर्शन दिए। उन्होंने पार्वती से विवाह करना स्वीकार किया तथा वे अदृश्य हो गए। इतने में कुछ अंतर पर तालाब में मगरमच्छ ने एक लड़के को पकड लिया। लड़के के चिल्लाने का स्वर सुनाई दिया। पार्वती ने ध्यान से सुना, तो वह लड़का अत्यंत दयनीय स्थिति में चिल्ला रहा था, ‘‘बचाओ, बचाओ, मेरा कोई नहीं है !’’ लड़का चिल्ला रहा है, ऊँचे स्वर में रो रहा है। पार्वती का हृदय द्रवित हो गया। वह वहाँ पहुँच गईं। उन्होंने देखा, ‘एक सुंदर एवं सुकुमार लड़के का पाँव मगरमच्छ ने पकड़ा है तथा वह उसे घसीट कर ले जा रहा है।’ लड़का रोते हुए चिल्लाता है, ‘‘मेरा इस संसार में कोई नहीं। मेरी न तो माँ है, न बाप, न ही कोई मित्र है, मेरा कोई नहीं। मुझे बचाओ !’’ पार्वती ने कहा, ‘‘हे ग्राह ! हे मगरमच्छ देवता ! इस लड़के को छोड़ दो।’’ मगरमच्छ ने कहा “दिन के छठे पहर में जो मुझे मिलता है, उसे अपना आहार समझकर स्वीकार करना, मेरा नियम है। ब्रह्मदेव ने दिन के छठे पहर में इस लड़के को मेरे पास भेजा है। मैं इसे क्यों छोडूं ?” पार्वती ने कहा “हे मगर, तुम इसे छोड दो। इसके स्थान पर तुम्हें जो चाहिए वह माँग लो।” मगरमच्छ ने कहा, “तुमने जो तप करके भगवान शंकर को प्रसन्न किया है तथा जो वरदान माँगा है, यदि उस तप का फल मुझे दोगी, तो ही मैं इस लड़के को छोड़ सकता हूँ, अन्यथा नहीं।” पार्वती माता ने कहा, “मैं तुम्हें अपने सभी जन्मों के तप का फल देने को तैयार हूँ, तुम इसे छोड़ दो।" मगरमच्छ ने कहा, “सोच लो, उतावलेपन में आकर संकल्प मत करो।” पार्वती ने कहा, “मैंने सोच लिया।” मगरमच्छ ने पार्वती से तपदान करने का संकल्प करवाया। तपस्या का दान होते ही मगरमच्छ का देह तेज से चमकने लगा। उसने लडके को छोड़ दिया तथा बोला, ‘‘हे पार्वती, तुम्हारी तपस्या के प्रभाव से मेरी देह कितना सुंदर बन गई है, मैं तेजस्वी बन गया हूँ, अपने जीवन भर की पूँजी तुमने एक छोटे बच्चे को बचाने हेतु अर्पण की।’’ पार्वतीमाता ने उत्तर दिया, ‘‘ग्राह ! तप तो मैं पुन: कर सकती हूँ; किंतु यदि तुम इस लड़के को निगल जाते तो क्या ऐसा निर्दोष लड़का वापस मिल जाता ?’’ देखते ही देखते वह लड़का अदृश्य हो गया। मगर भी अदृश्य हो गया। पार्वती ने विचार किया, ‘मैंने मेरे तपका दान किया है। अब पुन: तप करती हूँ।’ पार्वती तप करने बैठीं तभी भगवान् शिव पुनः प्रकट होकर बोले, ‘‘पार्वती, मगरमच्छ के रूप में मैं ही था तथा लडके के रूप मे भी मैं ही था। केवल तुम्हारे तप की परीक्षा लेने के लिए यह लीला रचाई थी। प्राणिमात्र में तुम्हारा आत्मीयता का भाव धन्य है। ॐ नमः शिवाय ********************************************

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Shashikant Shriwas Mar 25, 2019

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