मायमंदिर फ़्री कुंडली
डाउनलोड करें

3.31 Those men who ever follow this teaching of Mine with faith and without cavil, they also become freed from actions. साधक संजीवनी से- पूर्वश्लोकमें अपना मत (सिद्धान्त) बताकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अपने मतकी पुष्टि करते हैं। ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा:। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:॥ ३१॥ जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। ये = जो मानवा: = मनुष्य अनसूयन्त: = दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धावन्त: = श्रद्धापूर्वक मे = मेरे इदम् = इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतम् = मतका नित्यम् = सदा अनुतिष्ठन्ति = अनुसरण करते हैं, ते = वे अपि = भी कर्मभि: = कर्मोंके बन्धनसे मुच्यन्ते = मुक्त हो जाते हैं। ‘ये मे मतमिदं...........श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो’—किसी भी वर्ण, आश्रम, धर्म, सम्प्रदाय आदिका कोई भी मनुष्य यदि कर्म-बन्धनसे मुक्त होना चाहता है, तो उसे इस सिद्धान्तको मानकर इसका अनुसरण करना चाहिये। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, कर्म आदि कुछ भी अपना नहीं है—इस वास्तविकता को जान लेनेवाले सभी मनुष्य कर्म-बन्धनसे छूट जाते हैं। भगवान् और उनके मतमें प्रत्यक्षकी तरह नि:सन्देह दृढ़ विश्वास और पूज्यभावसे युक्त मनुष्यको ‘श्रद्धावन्त:’ पदसे कहा गया है। शरीरादि जड पदार्थोंको अपने और अपने लिये न माननेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है—इस वास्तविकतापर श्रद्धा होनेसे जडताके माने हुए सम्बन्धका त्याग करना सुगम हो जाता है। श्रद्धावान् साधक ही सत् -शास्त्र, सत् -चर्चा और सत्संगकी बातें सुनता है और उनको आचरणमें लाता है। मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अत: परमात्माको ही प्राप्त करनेकी एकमात्र उत्कट अभिलाषा होनेपर साधकमें श्रद्धा, तत्परता, संयतेन्द्रियता आदि स्वत: आ जाते हैं। अत: साधकको मुख्यरूपसे परमात्मप्राप्तिकी अभिलाषाको ही तीव्र बनाना चाहिये। पीछेके (तीसवें) श्लोकमें भगवान्ने अपना जो मत बताया है, उसमें दोष-दृष्टि न करनेके लिये यहाँ ‘अन- सूयन्त:’ पद दिया गया है। गुणोंमें दोष देखनेको ‘असूया’ कहते हैं। असूया-(दोषदृष्टि-)से रहित मनुष्योंको यहाँ ‘अनसूयन्त:’ कहा गया है। जहाँ श्रद्धा रहती है, वहाँ भी किसी अंशमें दोषदृष्टि रह सकती है। इसलिये भगवान्ने ‘श्रद्धावन्त:’ पदके साथ ‘अनसूयन्त:’ पद भी देकर मनुष्यको दोषदृष्टिसे सर्वथा रहित (पूर्ण श्रद्धावान्) होनेके लिये कहा है। इसी प्रकार गीता-श्रवणका माहात्म्य बताते हुए भी भगवान्ने ‘श्रद्धावाननसूयश्च’ (गीता १८। ७१) पद देकर श्रोताके लिये श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित होनेकी बात कही है। ‘भगवान्का मत तो उत्तम है, पर भगवान् कितनी आत्मश्लाघा, अभिमानकी बात कहते हैं कि सब कुछ मेरे ही अर्पण कर दो’ अथवा ‘यह मत तो अच्छा है, पर कर्मोंके द्वारा भगवत्प्राप्ति कैसे हो सकती है? कर्म तो जड और बाँधनेवाले होते हैं’ आदि-आदि भाव आना ही भगवान्के मतमें दोष-दृष्टि करना है। साधकको भगवान् और उनके मत दोनोंमें ही दोष-दृष्टि नहीं करनी चाहिये। वास्तवमें सब कुछ भगवान् का ही है; परन्तु मनुष्य भूलसे भगवान् की वस्तुओंको अपनी मानकर बँध जाता है और ममता-कामनाके वशमें होकर दु:ख पाता रहता है। अत: इस अपनेपनका त्याग करवाकर मनुष्यका उद्धार करनेके लिये (कि वह सदाके लिये सुखी हो जाय) भगवान् अपनी सहज करुणासे सब कुछ अपने अर्पण करनेकी बात कहते हैं। अत: इस विषयमें दोष-दृष्टि करना अनुचित है। यह तो भगवान्का परम सौहार्द, कारुण्य, वात्सल्य ही है कि अपनेमें कोई अपूर्णता (कमी) और आवश्यकता न होनेपर भी केवल मनुष्यके कल्याणार्थ वे समस्त कर्मोंको अपने अर्पण करनेके लिये कहते हैं। भगवान्का मत ही लोकमें ‘सिद्धान्त’ कहलाता है। सर्वोपरि सिद्धान्तको ही यहाँ ‘मतम् ’ पदसे कहा गया है। भगवान्ने अपनी सहज सरलता एवं निरभिमानताके कारण सर्वोपरि सिद्धान्तको ‘मत’ नामसे कहा है। यह मत या सिद्धान्त त्रिकालमें एक-जैसा रहता है अर्थात् इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता, चाहे कोई श्रद्धा करे या न करे। यहाँ ‘नित्यम् ’ पद ‘मतम् ’ का विशेषण नहीं, प्रत्युत ‘अनुतिष्ठन्ति’ पदका ही विशेषण है। कारण कि भगवान् नित्य हैं; अत: उनसे सम्बन्धित समस्त वस्तुएँ भी नित्य ही हैं। भगवान्का मत भी नित्य है। भगवान्का मत सर्वोपरि सिद्धान्त है और सिद्धान्त वही होता है, जो कभी मिटता नहीं। अत: भगवान्का मत तो नित्य है ही, उसका अनुष्ठान नित्य होना चाहिये। इसलिये यहाँ क्रियाविशेषण ‘नित्यम् ’ पद देनेका तात्पर्य है—भगवान्के मतपर नित्य-निरन्तर (सदा) स्थित रहना तथा इसके अनुसार अनुष्ठान करना। प्रश्न—भगवान्का मत क्या है? और उसका सदा अनुष्ठान कैसे किया जाय? उत्तर—मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी नहीं है—यह भगवान्का मत है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, धन, सम्पत्ति, पदार्थ आदि सब प्रकृतिके कार्य हैं और संसार भी प्रकृतिका कार्य है। इसलिये इन वस्तुओंकी संसारसे एकता है तथा परमात्माका अंश होनेसे ‘स्वयं’ की परमात्मासे एकता है। अत: ये वस्तुएँ व्यक्तिगत (अपनी) नहीं हैं, प्रत्युत इनके उपयोगका अधिकार व्यक्तिगत है। इसके सिवाय सद् गुण, सदाचार, त्याग, वैराग्य, दया, क्षमा आदि भी व्यक्तिगत नहीं हैं, प्रत्युत भगवान्के हैं। ये दैवी सम्पत्ति अर्थात् भगवत्प्राप्तिकी सम्पत्ति (पूँजी) होनेसे भगवान्के ही हैं। यदि ये सद्गुण, सदाचार आदि अपने होते तो इनपर हमारा पूरा अधिकार होता और हमारी सम्मतिके बिना किसी दूसरेको इनकी प्राप्ति न होती। इनको अपना माननेसे तो अभिमान ही होता है, जो आसुरी सम्पत्तिका मूल है। जो वस्तु अपनी नहीं है, उसे अपनी माननेसे और उसकी प्राप्तिके लिये कर्म करनेसे ही बन्धन होता है। शरीरादि वस्तुएँ ‘अपनी’ तो हैं ही नहीं, ‘अपने लिये’ भी नहीं हैं। यदि ये अपने लिये होतीं, तो इनकी प्राप्तिसे हमें पूर्ण तृप्ति या सन्तोष हो जाता, पूर्णताका अनुभव हो जाता। परन्तु सांसारिक वस्तुएँ कितनी ही क्यों न मिल जायँ, कभी तृप्ति नहीं होती। तृप्ति या पूर्णताका अनुभव उस वस्तु-(भगवान्-) के मिलनेपर होता है, जो वास्तवमें अपनी है। अपनी वास्तविक वस्तुके मिलनेपर फिर स्वप्नमें भी कुछ पानेकी इच्छा नहीं रहती। जैसे, संसारमें सभी पुत्रवती स्त्रियाँ माताएँ ही हैं, पर बालकको उन सभी माताओंके मिलनेसे संतोष नहीं होता, प्रत्युत अपनी माताके मिलनेसे ही संतोष होता है। इसी तरह जबतक और पानेकी इच्छा रहती है, तबतक यही समझना चाहिये कि अपनी वस्तु मिली ही नहीं। मिली हुई वस्तुओंको भूलसे भले ही अपनी मान लें, पर वास्तवमें वे अपनी हैं नहीं और इसलिये उनसे अपनी तृप्ति भी नहीं होती। अत: मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी और अपने लिये नहीं है। शरीरादि प्राप्त वस्तुओंको न तो हम अपने साथ लाये थे और न अपने साथ ले ही जा सकते हैं तथा वर्तमानमें भी ये हमारेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रही हैं। वर्तमानमें जो ये अपनी प्रतीत होती हैं, वह भी सदुपयोग करने अर्थात् दूसरोंके हितमें लगानेके लिये, न कि अपना अधिकार जमानेके लिये। अत: हमें प्राप्त वस्तुओंका सदुपयोग करनेका ही अधिकार है, अपनी माननेका नहीं। भगवान्ने मनुष्यको ये वस्तुएँ इतनी उदारतापूर्वक और इस ढंगसे दी हैं कि मनुष्यको ये वस्तुएँ अपनी ही दीखने लगती हैं। इन वस्तुओंको अपनी मान लेना भगवान्की उदारताका दुरुपयोग करना है। जो वस्तुएँ अपनी नहीं हैं, पर जिन्हें भूलसे अपनी मान लिया है, उस भूलको मिटानेके लिये साधक अध्यात्मचित्तसे गहरा विचार करके उन्हें भगवान्के अर्पण कर दे अर्थात् भूलसे माना हुआ अपनापन हटा ले। जिसका एकमात्र उद्देश्य अध्यात्मतत्त्व-(परमात्मा-) की प्राप्तिका है, ऐसा साधक यदि गम्भीरतापूर्वक विचार करे तो उसे स्पष्टरूपसे समझमें आ जायगा कि मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी नहीं होती, प्रत्युत बिछुडऩेवाली होती है। शरीर, पद, अधिकार, शिक्षा, योग्यता, धन, सम्पत्ति, जमीन आदि जो कुछ मिला है, संसारसे ही मिला है और संसारके लिये ही है। मिली हुई वस्तुओंको चाहे संसार-(कार्य-) का माने, चाहे प्रकृति-(कारण-) का माने और चाहे भगवान्- (स्वामी-) का माने, पर सार (मुख्य) बात यही है कि वे अपनी नहीं हैं। जो वस्तुएँ अपनी नहीं हैं, वे अपने लिये कैसे हो सकती हैं? साधकको न तो कोई ‘वस्तु’ अपनी माननी है और न कोई ‘कर्म’ ही अपने लिये करना है। अपने लिये किये गये कर्म बाँधनेवाले होते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका नवाँ श्लोक) अर्थात् यज्ञ-(निष्कामभावपूर्वक परहितके लिये किये जानेवाले कर्तव्य-कर्म) के अतिरिक्त अन्य (अपने लिये किये गये) कर्म मनुष्यको बाँधनेवाले होते हैं। यज्ञके लिये कर्म करनेवाले साधकके सम्पूर्ण कर्म, संचित-कर्म भी विलीन हो जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। भगवान् समस्त लोकोंके महान् ईश्वर (स्वामी) हैं— ‘सर्वलोकमहेश्वरम् ’ (गीता ५। २९)। जब मनुष्य अपनेको वस्तुओंका स्वामी मान लेता है, तब वह अपने वास्तविक स्वामीको भूल जाता है; क्योंकि वह अपनेको जिन वस्तुओंका स्वामी मानता है, उसे उन्हीं वस्तुओंका चिन्तन होता है। अत: भगवान्को ही विश्वका एकमात्र स्वामी मानते हुए साधकको संसारमें सेवककी तरह रहना चाहिये। सेवक अपने स्वामीके समस्त कार्य करते हुए भी अपनेको कभी स्वामी नहीं मानता। अत: साधकको शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदिको अपना न मानकर केवल भगवान्का मानते हुए अपने कर्तव्यका पालन कर देना चाहिये; कर्म करनेमें निमित्तमात्र बन जाना चाहिये। अपनेमें स्वामीपनेका अभिमान नहीं करना चाहिये। सर्वस्व भगवदर्पण करनेके बाद लाभ-हानि, मान- अपमान, सुख-दु:ख आदि जो कुछ आये, उनको भी साधक भगवान्का ही माने और उनसे अपना कोई प्रयोजन न रखे। कर्तव्यमात्र प्राप्त परिस्थितिके अनुरूप होता है। परिस्थितिके अनुरूप प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करता रहे। यही भगवान्के मतका सदा अनुसरण करना है। ‘मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:’—भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें तो सर्वस्व मेरे अर्पण करके कर्तव्य-कर्म करनेकी स्पष्ट आज्ञा दे रहा हूँ, अत: मेरी आज्ञाका पालन करनेसे तुम्हारे मुक्त होनेमें कोई सन्देह नहीं है; परन्तु जिनको मैं इस प्रकार स्पष्ट आज्ञा नहीं देता हूँ, वे भी अगर इस मत-(मिले हुएको अपना न मानकर कर्तव्य-कर्मका पालन करना) के अनुसार चलेंगे, तो वे भी मुक्त हो जायँगे। कारण कि यह मत ही ऐसा है कि चाहे मुझे माने या न माने, केवल इस मतका पालन करनेसे ही मनुष्य मुक्त हो जाता है। परिशिष्ट भाव—भगवान्का मत ही वास्तविक और सर्वोपरि ‘सिद्धान्त’ है, जिसके अन्तर्गत सभी मत-मतान्तर आ जाते हैं। परन्तु भगवान् अभिमान न करके बड़ी सरलतासे, नम्रतासे अपने सिद्धान्तको ‘मत’ नामसे कहते हैं। तात्पर्य है कि भगवान्ने अपने अथवा दूसरे किसीके भी मतका आग्रह नहीं रखा है, प्रत्युत निष्पक्ष होकर अपनी बात सामने रखी है। मत सर्वोपरि नहीं होता, प्रत्युत व्यक्तिगत होता है। हरेक व्यक्ति अपना-अपना मत प्रकट कर सकता है; परन्तु सिद्धान्त सर्वोपरि होता है, जो सबको मानना पड़ता है। इसलिये गुरु-शिष्यमें भी मतभेद तो हो सकता है, पर सिद्धान्तभेद नहीं हो सकता। ऋषि-मुनि, दार्शनिक अपने-अपने मतको भी ‘सिद्धान्त’ नामसे कहते हैं; परन्तु गीतामें भगवान् अपने सिद्धान्तको भी ‘मत’ नामसे कहते हैं। ऋषि-मुनि, दार्शनिक, आचार्य आदिके मतोंमें तो भेद (मतभेद) रहता है, पर भगवान्के मत अर्थात् सिद्धान्तमें कोई मतभेद नहीं है।

3.31  Those  men  who  ever  follow  this  teaching  of Mine  with  faith  and  without  cavil,  they  also become  freed  from  actions.

साधक संजीवनी से-
पूर्वश्लोकमें अपना मत (सिद्धान्त) बताकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अपने मतकी पुष्टि करते हैं।

ये   मे   मतमिदं   नित्यमनुतिष्ठन्ति  मानवा:।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:॥ ३१॥

जो मनुष्य दोष-दृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।

ये = जो 
मानवा: = मनुष्य 
अनसूयन्त: = दोष-दृष्टिसे रहित होकर 
श्रद्धावन्त: = श्रद्धापूर्वक 
मे = मेरे 
इदम् = इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) 
मतम् = मतका 
नित्यम् = सदा 
अनुतिष्ठन्ति = अनुसरण करते हैं, 
ते = वे 
अपि = भी 
कर्मभि: = कर्मोंके बन्धनसे 
मुच्यन्ते = मुक्त हो जाते हैं।

‘ये मे मतमिदं...........श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो’—किसी भी वर्ण, आश्रम, धर्म, सम्प्रदाय आदिका कोई भी मनुष्य यदि कर्म-बन्धनसे मुक्त होना चाहता है, तो उसे इस सिद्धान्तको मानकर इसका अनुसरण करना चाहिये। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ, कर्म आदि कुछ भी अपना नहीं है—इस वास्तविकता को जान लेनेवाले सभी मनुष्य कर्म-बन्धनसे छूट जाते हैं।
भगवान् और उनके मतमें प्रत्यक्षकी तरह नि:सन्देह दृढ़ विश्वास और पूज्यभावसे युक्त मनुष्यको ‘श्रद्धावन्त:’ पदसे कहा गया है।

शरीरादि जड पदार्थोंको अपने और अपने लिये न माननेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है—इस वास्तविकतापर श्रद्धा होनेसे जडताके माने हुए सम्बन्धका त्याग करना सुगम हो जाता है।

 श्रद्धावान् साधक ही सत् -शास्त्र, सत् -चर्चा और सत्संगकी बातें सुनता है और उनको आचरणमें लाता है।

 मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अत: परमात्माको ही प्राप्त करनेकी एकमात्र उत्कट अभिलाषा होनेपर साधकमें श्रद्धा, तत्परता, संयतेन्द्रियता आदि स्वत: आ जाते हैं। अत: साधकको मुख्यरूपसे परमात्मप्राप्तिकी अभिलाषाको ही तीव्र बनाना चाहिये।

 पीछेके (तीसवें) श्लोकमें भगवान्ने अपना जो मत बताया है, उसमें दोष-दृष्टि न करनेके लिये यहाँ ‘अन- सूयन्त:’ पद दिया गया है। गुणोंमें दोष देखनेको ‘असूया’ कहते हैं। असूया-(दोषदृष्टि-)से रहित मनुष्योंको यहाँ ‘अनसूयन्त:’ कहा गया है।

 जहाँ श्रद्धा रहती है, वहाँ भी किसी अंशमें दोषदृष्टि रह सकती है। इसलिये भगवान्ने ‘श्रद्धावन्त:’ पदके साथ ‘अनसूयन्त:’ पद भी देकर मनुष्यको दोषदृष्टिसे सर्वथा रहित (पूर्ण श्रद्धावान्) होनेके लिये कहा है। इसी प्रकार गीता-श्रवणका माहात्म्य बताते हुए भी भगवान्ने ‘श्रद्धावाननसूयश्च’ (गीता १८। ७१) पद देकर श्रोताके लिये श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित होनेकी बात कही है।

 ‘भगवान्का मत तो उत्तम है, पर भगवान् कितनी आत्मश्लाघा, अभिमानकी बात कहते हैं कि सब कुछ मेरे ही अर्पण कर दो’ अथवा ‘यह मत तो अच्छा है, पर कर्मोंके द्वारा भगवत्प्राप्ति कैसे हो सकती है? कर्म तो जड और बाँधनेवाले होते हैं’ आदि-आदि भाव आना ही भगवान्के मतमें दोष-दृष्टि करना है। साधकको भगवान् और उनके मत दोनोंमें ही दोष-दृष्टि नहीं करनी चाहिये।

 वास्तवमें सब कुछ भगवान् का ही है; परन्तु मनुष्य भूलसे भगवान् की वस्तुओंको अपनी मानकर बँध जाता है और ममता-कामनाके वशमें होकर दु:ख पाता रहता है। अत: इस अपनेपनका त्याग करवाकर मनुष्यका उद्धार करनेके लिये (कि वह सदाके लिये सुखी हो जाय) भगवान् अपनी सहज करुणासे सब कुछ अपने अर्पण करनेकी बात कहते हैं। अत: इस विषयमें दोष-दृष्टि करना अनुचित है। यह तो भगवान्का परम सौहार्द, कारुण्य, वात्सल्य ही है कि अपनेमें कोई अपूर्णता (कमी) और आवश्यकता न होनेपर भी केवल मनुष्यके कल्याणार्थ वे समस्त कर्मोंको अपने अर्पण करनेके लिये कहते हैं।

 भगवान्का मत ही लोकमें ‘सिद्धान्त’ कहलाता है। सर्वोपरि सिद्धान्तको ही यहाँ ‘मतम् ’ पदसे कहा गया है। भगवान्ने अपनी सहज सरलता एवं निरभिमानताके कारण सर्वोपरि सिद्धान्तको ‘मत’ नामसे कहा है। यह मत या सिद्धान्त त्रिकालमें एक-जैसा रहता है अर्थात् इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता, चाहे कोई श्रद्धा करे या न करे।

 यहाँ ‘नित्यम् ’ पद ‘मतम् ’ का विशेषण नहीं, प्रत्युत ‘अनुतिष्ठन्ति’ पदका ही विशेषण है। कारण कि भगवान् नित्य हैं; अत: उनसे सम्बन्धित समस्त वस्तुएँ भी नित्य ही हैं। भगवान्का मत भी नित्य है। भगवान्का मत सर्वोपरि सिद्धान्त है और सिद्धान्त वही होता है, जो कभी मिटता नहीं। अत: भगवान्का मत तो नित्य है ही, उसका अनुष्ठान नित्य होना चाहिये। इसलिये यहाँ क्रियाविशेषण ‘नित्यम् ’ पद देनेका तात्पर्य है—भगवान्के मतपर नित्य-निरन्तर (सदा) स्थित रहना तथा इसके अनुसार अनुष्ठान करना।

 प्रश्न—भगवान्का मत क्या है? और उसका सदा अनुष्ठान कैसे किया जाय?

 उत्तर—मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी नहीं है—यह भगवान्का मत है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, धन, सम्पत्ति, पदार्थ आदि सब प्रकृतिके कार्य हैं और संसार भी प्रकृतिका कार्य है। इसलिये इन वस्तुओंकी संसारसे एकता है तथा परमात्माका अंश होनेसे ‘स्वयं’ की परमात्मासे एकता है। अत: ये वस्तुएँ व्यक्तिगत (अपनी) नहीं हैं, प्रत्युत इनके उपयोगका अधिकार व्यक्तिगत है। इसके सिवाय सद् गुण, सदाचार, त्याग, वैराग्य, दया, क्षमा आदि भी व्यक्तिगत नहीं हैं, प्रत्युत भगवान्के हैं। ये दैवी सम्पत्ति अर्थात् भगवत्प्राप्तिकी सम्पत्ति (पूँजी) होनेसे भगवान्के ही हैं। यदि ये सद्गुण, सदाचार आदि अपने होते तो इनपर हमारा पूरा अधिकार होता और हमारी सम्मतिके बिना किसी दूसरेको इनकी प्राप्ति न होती। इनको अपना माननेसे तो अभिमान ही होता है, जो आसुरी सम्पत्तिका मूल है।

 जो वस्तु अपनी नहीं है, उसे अपनी माननेसे और उसकी प्राप्तिके लिये कर्म करनेसे ही बन्धन होता है। शरीरादि वस्तुएँ ‘अपनी’ तो हैं ही नहीं, ‘अपने लिये’ भी नहीं हैं। यदि ये अपने लिये होतीं, तो इनकी प्राप्तिसे हमें पूर्ण तृप्ति या सन्तोष हो जाता, पूर्णताका अनुभव हो जाता। परन्तु सांसारिक वस्तुएँ कितनी ही क्यों न मिल जायँ, कभी तृप्ति नहीं होती। तृप्ति या पूर्णताका अनुभव उस वस्तु-(भगवान्-) के मिलनेपर होता है, जो वास्तवमें अपनी है। अपनी वास्तविक वस्तुके मिलनेपर फिर स्वप्नमें भी कुछ पानेकी इच्छा नहीं रहती। जैसे, संसारमें सभी पुत्रवती स्त्रियाँ माताएँ ही हैं, पर बालकको उन सभी माताओंके मिलनेसे संतोष नहीं होता, प्रत्युत अपनी माताके मिलनेसे ही संतोष होता है। इसी तरह जबतक और पानेकी इच्छा रहती है, तबतक यही समझना चाहिये कि अपनी वस्तु मिली ही नहीं। मिली हुई वस्तुओंको भूलसे भले ही अपनी मान लें, पर वास्तवमें वे अपनी हैं नहीं और इसलिये उनसे अपनी तृप्ति भी नहीं होती। अत: मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी और अपने लिये नहीं है।

 शरीरादि प्राप्त वस्तुओंको न तो हम अपने साथ लाये थे और न अपने साथ ले ही जा सकते हैं तथा वर्तमानमें भी ये हमारेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रही हैं। वर्तमानमें जो ये अपनी प्रतीत होती हैं, वह भी सदुपयोग करने अर्थात् दूसरोंके हितमें लगानेके लिये, न कि अपना अधिकार जमानेके लिये। अत: हमें प्राप्त वस्तुओंका सदुपयोग करनेका ही अधिकार है, अपनी माननेका नहीं। भगवान्ने मनुष्यको ये वस्तुएँ इतनी उदारतापूर्वक और इस ढंगसे दी हैं कि मनुष्यको ये वस्तुएँ अपनी ही दीखने लगती हैं। इन वस्तुओंको अपनी मान लेना भगवान्की उदारताका दुरुपयोग करना है। जो वस्तुएँ अपनी नहीं हैं, पर जिन्हें भूलसे अपनी मान लिया है, उस भूलको मिटानेके लिये साधक अध्यात्मचित्तसे गहरा विचार करके उन्हें भगवान्के अर्पण कर दे अर्थात् भूलसे माना हुआ अपनापन हटा ले।

 जिसका एकमात्र उद्देश्य अध्यात्मतत्त्व-(परमात्मा-) की प्राप्तिका है, ऐसा साधक यदि गम्भीरतापूर्वक विचार करे तो उसे स्पष्टरूपसे समझमें आ जायगा कि मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी नहीं होती, प्रत्युत बिछुडऩेवाली होती है। शरीर, पद, अधिकार, शिक्षा, योग्यता, धन, सम्पत्ति, जमीन आदि जो कुछ मिला है, संसारसे ही मिला है और संसारके लिये ही है। मिली हुई वस्तुओंको चाहे संसार-(कार्य-) का माने, चाहे प्रकृति-(कारण-) का माने और चाहे भगवान्- (स्वामी-) का माने, पर सार (मुख्य) बात यही है कि वे अपनी नहीं हैं। जो वस्तुएँ अपनी नहीं हैं, वे अपने लिये कैसे हो सकती हैं?

 साधकको न तो कोई ‘वस्तु’ अपनी माननी है और न कोई ‘कर्म’ ही अपने लिये करना है। अपने लिये किये गये कर्म बाँधनेवाले होते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका नवाँ श्लोक) अर्थात् यज्ञ-(निष्कामभावपूर्वक परहितके लिये किये जानेवाले कर्तव्य-कर्म) के अतिरिक्त अन्य (अपने लिये किये गये) कर्म मनुष्यको बाँधनेवाले होते हैं। यज्ञके लिये कर्म करनेवाले साधकके सम्पूर्ण कर्म, संचित-कर्म भी विलीन हो जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। भगवान् समस्त लोकोंके महान् ईश्वर (स्वामी) हैं— ‘सर्वलोकमहेश्वरम् ’ (गीता ५। २९)। जब मनुष्य अपनेको वस्तुओंका स्वामी मान लेता है, तब वह अपने वास्तविक स्वामीको भूल जाता है; क्योंकि वह अपनेको जिन वस्तुओंका स्वामी मानता है, उसे उन्हीं वस्तुओंका चिन्तन होता है। अत: भगवान्को ही विश्वका एकमात्र

स्वामी मानते हुए साधकको संसारमें सेवककी तरह रहना चाहिये। सेवक अपने स्वामीके समस्त कार्य करते हुए भी अपनेको कभी स्वामी नहीं मानता। अत: साधकको शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदिको अपना न मानकर केवल भगवान्का मानते हुए अपने कर्तव्यका पालन कर देना चाहिये; कर्म करनेमें निमित्तमात्र बन जाना चाहिये। अपनेमें स्वामीपनेका अभिमान नहीं करना चाहिये।

 सर्वस्व भगवदर्पण करनेके बाद लाभ-हानि, मान- अपमान, सुख-दु:ख आदि जो कुछ आये, उनको भी साधक भगवान्का ही माने और उनसे अपना कोई

प्रयोजन न रखे। कर्तव्यमात्र प्राप्त परिस्थितिके अनुरूप होता है। परिस्थितिके अनुरूप प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करता रहे। यही भगवान्के मतका सदा अनुसरण करना है।

 ‘मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि:’—भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें तो सर्वस्व मेरे अर्पण करके कर्तव्य-कर्म करनेकी स्पष्ट आज्ञा दे रहा हूँ, अत: मेरी आज्ञाका पालन करनेसे तुम्हारे मुक्त होनेमें कोई सन्देह नहीं है; परन्तु जिनको मैं इस प्रकार स्पष्ट आज्ञा नहीं देता हूँ, वे भी अगर इस मत-(मिले हुएको अपना न मानकर कर्तव्य-कर्मका पालन करना) के अनुसार चलेंगे, तो वे भी मुक्त हो जायँगे। कारण कि यह मत ही ऐसा है कि चाहे मुझे माने या न माने, केवल इस मतका पालन करनेसे ही मनुष्य मुक्त हो जाता है।

 परिशिष्ट भाव—भगवान्का मत ही वास्तविक और सर्वोपरि ‘सिद्धान्त’ है, जिसके अन्तर्गत सभी मत-मतान्तर आ जाते हैं। परन्तु भगवान् अभिमान न करके बड़ी सरलतासे, नम्रतासे अपने सिद्धान्तको ‘मत’ नामसे कहते हैं। तात्पर्य है कि भगवान्ने अपने अथवा दूसरे किसीके भी मतका आग्रह नहीं रखा है, प्रत्युत निष्पक्ष होकर अपनी बात सामने रखी है।

 मत सर्वोपरि नहीं होता, प्रत्युत व्यक्तिगत होता है। हरेक व्यक्ति अपना-अपना मत प्रकट कर सकता है; परन्तु सिद्धान्त सर्वोपरि होता है, जो सबको मानना पड़ता है। इसलिये गुरु-शिष्यमें भी मतभेद तो हो सकता है, पर सिद्धान्तभेद नहीं हो सकता। ऋषि-मुनि, दार्शनिक अपने-अपने मतको भी ‘सिद्धान्त’ नामसे कहते हैं; परन्तु गीतामें भगवान् अपने सिद्धान्तको भी ‘मत’ नामसे कहते हैं। ऋषि-मुनि, दार्शनिक, आचार्य आदिके मतोंमें तो भेद (मतभेद) रहता है, पर भगवान्के मत अर्थात् सिद्धान्तमें कोई मतभेद नहीं है।

+25 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 137 शेयर

कामेंट्स

Hemant Mavji Kasta Jul 12, 2019
Jai Shri Krishna ji Radhe Radhe ji Beautiful Post Massage Dhanyavad Friends Aapka Din Mangalmay Ho Shubh Dopahar

B R Jat Jul 12, 2019
शुभ दोहपर वंदनाजी 🌹 🙏🏽🙏🏽 जय श्री राधे राधे जी 🌹🌹 🙏🏽🙏🏽श्री राधे कृष्णा आप और आपके परिवार पर कृपा बनाये रखे

gaurisankar Khandelwal Jul 12, 2019
agar patni Apne pati Ko apsabd bole aur uske upar sak( waham) kare galiya nikale to uska kya kare.

🕉️🕉️जय श्री सच्चिदानंद स्वरूपाय नमः 🕉️🕉️ 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 सतसंग वाणी 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 एक समय ऋषभदेव के पुत्र नौ योगी ऋषियों के साथ चौमासा व्यतीत करने के लिए महाराज जनक जी के यहाँ ठहरने के लिए आये हुए थे। तब वही पर महाराज जनक जी ने योगीश्वर से हाथ जोड़कर पूछा हे-- महात्मन ! भक्ति किस प्रकार हो सकती है। ***** योगी सुखद और सुहावने वचन के साथ बोला ---हे विदेहराज जनक मै उसके सुन्दर लक्षण बतलाता हू सुनो- कभी हँसते हुए जब चित प्रसन्न हो जाता है, तो उसी को कभी क्रोध के लक्षण भी हो जाते हैं। इसलिए तुम भगवान् से स्नेह कर सकने के लिए भक्ति धारण करो।सगुण ज्ञान से ही सब भवसागर से तर जाते हैं। **** हमारी आयु बड़ी बीत गई , हम ममता में फसे रहे आयु रोती है कि बिना हरि भक्ति के इतनी आयु बीत गई। **** भक्ति के तीन लक्षण बताये गए हैं--उत्तम, मध्यम और निष्कृत । जो सारे चराचर जगत में उस एक ही परब्रम्ह को देखता है वही भक्ति का सर्वोत्तम लक्षण है। *** संतजनों की संगति से सत्यमार्ग पर चलना मध्यम भक्ति के लक्षण है। ***** जो रज के बराबर भी एक को नही समझते हैं उस निष्कृत लक्षण में तो सारी दुनिया मोह माया में फँसी हुयी है। जब तक तृष्णा नही मिटती तब तक विरक्त नही होता है। ******************************************* सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। अर्थात :- सर्वदा सत्य की विजय और असत्य की पराजय और सत्य से ही विद्वानों व् महर्षियो का मार्ग विस्तृत होता है। ।।। 🌷🌷🕉️ जय श्री गुरुदेवाय नमः 🕉️🌷🌷 🔲✔️ सत्य सनातन धर्म की सदा जय हो।👏 🔲✔️ धर्म की जय हो। 🔲✔️अधर्म का नाश हो। 🔲✔️मानव समाज का कल्याण हो। 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🕉️जय श्री राम🕉️

+162 प्रतिक्रिया 15 कॉमेंट्स • 215 शेयर

दो लिंग : नर और नारी । दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)। दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन। तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी। तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल। तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण। तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु। तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत। तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा। तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव। तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी। तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान। तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना। तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं। तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति। चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका। चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार। चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। चार निति : साम, दाम, दंड, भेद। चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद। चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री। चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग। चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात। चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा। चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु। चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर। चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज। चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्। चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास। चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य। चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन। पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु। पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा। पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि। पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा। पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य। पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर। पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस। पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा। पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान। पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन। पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)। पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक। पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी। छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर। छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष। छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान। छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य। सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती। सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि। सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद। सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार। सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि। सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब। सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप। सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक। सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज। सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य। सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल। सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल। सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची। सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा। आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा। आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी। आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास। आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व। आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा। नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु। नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया। नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि। दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला। दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे। दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत। दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि। दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती। उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर... हैं । *हर हर महादेव...* 🏹 🙏 सब सनातनी हिन्दू के पास जानकारी होनी चाहिए

+21 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 93 शेयर

भोजन सम्बन्धी कुछ नियम ... १ - पांच अंगो ( दो हाथ , २ पैर , मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे ! २. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है ! ३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है ! ४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए ! ५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है ! ६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है ! ७. शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए ! ८. मल मूत्र का वेग होने पर , कलह के माहौल में , अधिक शोर में , पीपल ,वट वृक्ष के नीचे , भोजन नहीं करना चाहिए ! ९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए ! १०. खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के ,उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए ! ११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से , मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये ! १२. इर्षा , भय , क्रोध , लोभ , रोग , दीन भाव , द्वेष भाव , के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है ! १३. आधा खाया हुआ फल , मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए ! १४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए ! १५. भोजन के समय मौन रहे ! १६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए ! १७. रात्री में भरपेट न खाए ! १८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए ! १९. सबसे पहले मीठा , फिर नमकीन ,अंत में कडुवा खाना चाहिए ! २०. सबसे पहले रस दार , बीच में गरिस्थ , अंत में द्राव्य पदार्थ ग्रहण करे ! २१. थोडा खाने वाले को --आरोग्य ,आयु , बल , सुख, सुन्दर संतान , और सौंदर्य प्राप्त होता है ! २२. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए ! २३. कुत्ते का छुवा ,रजस्वला स्त्री का परोसा , श्राध का निकाला , बासी , मुह से फूक मरकर ठंडा किया , बाल गिरा हुवा भोजन ,अनादर युक्त , अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे ! २४. कंजूस का , राजा का , वेश्या के हाथ का , शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए !...

+23 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 81 शेयर
SUNIL KUMAR SHARMA Jul 17, 2019

एक बार महर्षि नारद को यह अहंकार हो गया था,कि वही भगवान श्री हरि विष्णु के सबसे बड़े भक्त हैं। भगवान विष्णु का उनसे बड़ा भक्त तीनों लोकों में कोई नहीं है। महर्षि नारद अपनी इसी अहंकार की मस्ती में एक दिन पृथ्वी पर पहुंचे। पर जब वह पृथ्वी लोक पर पहुंचे, तो उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ… क्योंकि पृथ्वी लोक पर हर एक व्यक्ति भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के साथ राधा का ही नाम ले रहा था। महर्षि नारद पृथ्वी लोक पर राधा रानी की स्तुति भगवान श्रीकृष्ण के नाम के साथ सुनकर बड़े ही खींच गए। तथा वह सोचने लगे कि भगवान श्री विष्णु से सबसे ज्यादा प्रेम तो मैं करता हूं, भगवान विष्णु का तो सबसे बड़ा भक्त मैं हूं… दिन-रात उन्हीं के नाम का गुणगान करते रहता हूं। इसके बावजूद भी उनके नाम के साथ मेरा नाम जोड़ने के बजाय आखिर क्यों पृथ्वी लोक के इंसान राधा नाम को जोड़ रहे हैं। अपने इस समस्या को लेकर महर्षि नारद मुनि भगवान श्रीकृष्ण के पास गए। परंतु जब वह भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण तो अस्वस्थ हैं। तथा वह सर की पीड़ा से कराह रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण को इस हालत में देख कर महर्षि नारद का दिल द्रवित हो उठा। तथा उन्होंने भगवान् श्री कृष्ण से कहा… कि भगवन आप मुझे तुरंत बताइए, कि मैं किस प्रकार आपकी इस पीड़ा को दूर कर सकता हूं। यदि इसके लिए मुझे अपने प्राणों का त्याग भी करना पड़े, तो भी मैं इसमें जरा सी भी देरी नहीं करुंगा। तब भगवान श्रीकृष्ण महर्षि नारद जी से बोले… आपको मेरे इस पीड़ा के लिए अपने प्राण त्यागने की जरूरत नहीं है। मुझे तो यदि कोई मेरा भक्त अपने चरणों का धुला हुआ पानी (चरणामृत) पिला दे, तो मैं इस पीड़ा से मुक्त हो जाऊं। श्रीकृष्ण की बात सुनकर महर्षि नारद जी सोचने लगे कि स्वयं पूरे जगत के पालक, परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण को यदि मैं अपने पैरों का धुला हुआ जल (चरणामृत) पिने दूंगा, तो मुझे घोर नरक की प्राप्ति होगी। मैं इतने बड़े पापा को अपने ऊपर नहीं ले सकता। महर्षि नारद यह सब सोचकर भगवान श्री कृष्ण को अपनी असमर्थता जताते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण महर्षि नारद जी से बोले, यदि आप यह कार्य नहीं कर सकते तो कृपया आप मेरी तीनों पत्नियों के पास जाकर यह सारी बात बताएं। संभवता मेरी पत्नियां मेरी इस पीड़ा को दूर करने में मेरी कुछ मदद कर दे।श्री कृष्ण की आज्ञा से महर्षि नारद सबसे पहले श्री कृष्ण की सबसे प्रिय पत्नी रुकमणी के पास गए। और उन्हें जाकर सारा वृत्तांत बताया, परंतु रुकमणी ने भी अपना चरनाअमृत देने से मना कर दिया। इसके बाद नारदजी एक-एक करके कृष्ण के और भी दो पत्नियां सत्यभामा  और जमाबंदी के पास गए। पर उन दोनों ने भी यह पाप करने से मना कर दिया। तब हारकर नारद मुनि भगवान श्रीकृष्ण के पास आ गए। और उन्हें पूरी बात बताई। तब भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि नारद से राधा के पास जाकर उनसे मदद मांगने को कहा। भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर नारद जी कृष्ण की प्रेयसी राधा के पास पहुंचे। और राधा के पास जाकर जैसे ही नारद जी ने उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का हाल सुनाया। राधा ने बगैर कुछ सोचे-समझे और बिना विचार किये  एक जल से भरा पात्र लिया, तथा उसने अपने दोनों चरणों को धो दिया। राधा रानी ने अपने पैरों से धुले हुए उस जल के पात्र को महर्षि नारद को पकड़ाते हुए,राधा जी नारद से बोली कि मैं जानती हूं… कि मेरे इस कार्य के लिए मुझे रौरव नामक नरक, तथा उसी के समान अनेकों नरकों की प्राप्ति होगी। परंतु मैं अपने प्रियतम श्रीकृष्ण को होने वाली पीड़ा को बिल्कुल भी सहन नहीं कर सकती। उन्हें पीड़ा से मुक्त करने के लिए मैं अनेकों नरक की यातना सहने और झेलने को तैयार हूं। नारदजी तुरंत राधा के पैरों से धुले हुए जल के पात्र को लेकर भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।  पर जब नारद जी श्री कृष्णा के पास पहुंचे तो वे देखते है की, श्रीकृष्ण मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं। तब नारद को ज्ञात हो गया कि क्यों पृथ्वी लोक के सभी वासी राधे-कृष्ण के प्रेम का स्तुति गान कर रहे हैं। महर्षि नारद ने भी अपनी वीणा पकड़ी,और नारद जी भी श्री राधे-कृष्ण नाम का गुणगान करने लगे । जय श्री राधे कृष्णा 🙏🙏🙏🙏

+574 प्रतिक्रिया 90 कॉमेंट्स • 209 शेयर
gopal Krishna Jul 17, 2019

+7 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 31 शेयर
gopal Krishna Jul 17, 2019

+10 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 26 शेयर
gopal Krishna Jul 17, 2019

+13 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 43 शेयर
gopal Krishna Jul 17, 2019

+8 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 32 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB