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Sunita Pawar May 10, 2020

☆◆◉* *▪️▪️▪️ {10॥05॥2020}......* *╭─❀⊰╯* *╨────────────━❥* 🟪🟩🟪🟩🟪🟩🟪 *सकट चौथ आज, जानें पूजा की विधि* 🟪🟩🟪🟩🟪🟩🟪 *‼️आज यानी 10 मई को सकट चौथ यानी संकष्ट चतुर्थी है।‼️* हिन्दु कैलेण्डर में प्रत्येक चन्द्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। हालाँकि संकष्टी चतुर्थी का व्रत हर महीने में होता है लेकिन सबसे मुख्य संकष्टी चतुर्थी पूर्णिमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार माघ के महीने में पड़ती है और अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार पौष के महीने में पड़ती है। संकष्टी चतुर्थी अगर मंगलवार के दिन पड़ती है तो उसे अंगारकी चतुर्थी कहते हैं और इसे बहुत ही शुभ माना जाता है। पश्चिमी और दक्षिणी भारत में और विशेष रूप से महाराष्ट्र और तमिलनाडु में संकष्टी चतुर्थी का व्रत अधिक प्रचलित है। संकष्ट चतुर्थी की कथा- ============== एक समय की बात है कि विष्णु भगवान का विवाह लक्ष्‍मीजी के साथ निश्चित हो गया। विवाह की तैयारी होने लगी। सभी देवताओं को निमंत्रण भेजे गए, परंतु गणेशजी को निमंत्रण नहीं दिया, कारण जो भी रहा हो। अब भगवान विष्णु की बारात जाने का समय आ गया। सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह समारोह में आए। उन सबने देखा कि गणेशजी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। तब वे आपस में चर्चा करने लगे कि क्या गणेशजी को नहीं न्योता है? या स्वयं गणेशजी ही नहीं आए हैं? सभी को इस बात पर आश्चर्य होने लगा। तभी सबने विचार किया कि विष्णु भगवान से ही इसका कारण पूछा जाए। विष्णु भगवान से पूछने पर उन्होंने कहा कि हमने गणेशजी के पिता भोलेनाथ महादेव को न्योता भेजा है। यदि गणेशजी अपने पिता के साथ आना चाहते तो आ जाते, अलग से न्योता देने की कोई आवश्यकता भी नहीं थीं। दूसरी बात यह है कि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चावल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिनभर में चाहिए। यदि गणेशजी नहीं आएंगे तो कोई बात नहीं। दूसरे के घर जाकर इतना सारा खाना-पीना अच्छा भी नहीं लगता। इतनी वार्ता कर ही रहे थे कि किसी एक ने सुझाव दिया- यदि गणेशजी आ भी जाएं तो उनको द्वारपाल बनाकर बैठा देंगे कि आप घर की याद रखना। आप तो चूहे पर बैठकर धीरे-धीरे चलोगे तो बारात से बहुत पीछे रह जाओगे। यह सुझाव भी सबको पसंद आ गया, तो विष्णु भगवान ने भी अपनी सहमति दे दी। होना क्या था कि इतने में गणेशजी वहां आ पहुंचे और उन्हें समझा-बुझाकर घर की रखवाली करने बैठा दिया। बारात चल दी, तब नारदजी ने देखा कि गणेशजी तो दरवाजे पर ही बैठे हुए हैं, तो वे गणेशजी के पास गए और रुकने का कारण पूछा। गणेशजी कहने लगे कि विष्णु भगवान ने मेरा बहुत अपमान किया है। नारदजी ने कहा कि आप अपनी मूषक सेना को आगे भेज दें, तो वह रास्ता खोद देगी जिससे उनके वाहन धरती में धंस जाएंगे, तब आपको सम्मानपूर्वक बुलाना पड़ेगा। अब तो गणेशजी ने अपनी मूषक सेना जल्दी से आगे भेज दी और सेना ने जमीन पोली कर दी। जब बारात वहां से निकली तो रथों के पहिए धरती में धंस गए। लाख कोशिश करें, परंतु पहिए नहीं निकले। सभी ने अपने-अपने उपाय किए, परंतु पहिए तो नहीं निकले, बल्कि जगह-जगह से टूट गए। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। तब तो नारदजी ने कहा- आप लोगों ने गणेशजी का अपमान करके अच्छा नहीं किया। यदि उन्हें मनाकर लाया जाए तो आपका कार्य सिद्ध हो सकता है और यह संकट टल सकता है। शंकर भगवान ने अपने दूत नंदी को भेजा और वे गणेशजी को लेकर आए। गणेशजी का आदर-सम्मान के साथ पूजन किया, तब कहीं रथ के पहिए निकले। अब रथ के पहिए निकल को गए, परंतु वे टूट-फूट गए, तो उन्हें सुधारे कौन? पास के खेत में खाती काम कर रहा था, उसे बुलाया गया। खाती अपना कार्य करने के पहले 'श्री गणेशाय नम:' कहकर गणेशजी की वंदना मन ही मन करने लगा। देखते ही देखते खाती ने सभी पहियों को ठीक कर दिया। तब खाती कहने लगा कि हे देवताओं! आपने सर्वप्रथम गणेशजी को नहीं मनाया होगा और न ही उनकी पूजन की होगी इसीलिए तो आपके साथ यह संकट आया है। हम तो मूरख अज्ञानी हैं, फिर भी पहले गणेशजी को पूजते हैं, उनका ध्यान करते हैं। आप लोग तो देवतागण हैं, फिर भी आप गणेशजी को कैसे भूल गए? अब आप लोग भगवान श्री गणेशजी की जय बोलकर जाएं, तो आपके सब काम बन जाएंगे और कोई संकट भी नहीं आएगा। ऐसा कहते हुए बारात वहां से चल दी और विष्णु भगवान का लक्ष्मीजी के साथ विवाह संपन्न कराके सभी सकुशल घर लौट आए। हे गणेशजी महाराज! आपने विष्णु को जैसो कारज सारियो, ऐसो कारज सबको सिद्ध करजो। बोलो गजानन भगवान की जय। संकट चतुर्थी व्रत विधि : - =============== प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष 4 के दिन संकट चतुर्थी तथा चौथमाता का व्रत किया जाता है। दिनभर निराहार उपवास किया जाता है। चन्द्रोदय होने पर अर्घ्य देकर तथा गणेशजी एवं चौथ माता की पूजा करके लड्डू का भोग लगाकर भोजन करते हैं। वैशाख कृष्ण 4 से ही चौथमाता का व्रत प्रारंभ करते हैं।```

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Sunita Pawar May 10, 2020

*“कैसे किया माता-पिता ने अपने पुत्रो का मार्गदर्शन?”* 🙏🏻🚩🌹 👁❗👁 🌹🚩🙏🏻 एक राजा और रानी थे, जिनकी प्रजा बहुत खुश थी, राजा-रानी ने सदैव प्रजा के हीत में कार्य किये | उनके दो पुत्र थे लव एवम कुश | दोनों के विचारों में बहुत मतभेद था जिस कारण वे दोनों सदा ही लड़ते रहते थे, दोनों बहुत बलवान एवम गुणी थे, लेकिन उनकी आपसी लड़ाई, राजा रानी के लिए चिंता का विषय था | दोनों पुत्रो को राज काज सम्भालना था ऐसे में उनके बीच मतभेद उनका ही शत्रु था | एक दिन, राजा-रानी ने दोनों को एक दुसरे के दृष्टिकोण को समझाने की योजना बनाई| लव और कुश को एक बाग़ में बुलवाया गया और उनकी आँख में पट्टी बाँधकर उन्हें बाग़ में बनी एक दीवार के पास ले जाया गया | उस दीवार की एक तरफ सूर्य की किरणे पढ़ने से वह गरम थी और दूसरी तरफ छाया होने से उस ओर ठंडक थी | लव और कुश को दीवार के विपरीत और खड़ा किया गया और पूछा गया कि उन्हें क्या अहसास हैं ठंडक या गरम | दोनों ने विपरीत जवाब दिए| अब उनकी जगह बदल कर उनसे वही सवाल किया गया फिर दोनों ने एक दुसरे के पूर्व दिए जवाब को दौहराया | अब उनकी पट्टी खोल कर उन्हें राजा ने समझाया हर परिस्थिती में हमारी व्यक्तिगत सोच भिन्न होती हैं पर एक दुसरे की स्थति को समझकर और अपने आप को उनकी जगह पर रख कर सोचे तब पता चलता हैं कि सामने वाले का कथन भी अनुचित नहीं था | उस दिन से लव और कुश ने एक दुसरे कि सोच को सम्मान दिया और राज्य के उत्तरदायित्व का सहकुशल वहन किया | मित्रों, कभी-कभी जीवन में सही निर्णय लेने के लिए अपने आपको को दुसरे कि जगह पर रखकर सोचना चाहिये | हमेशा खुद को सच मानना गलत हैं |जीवन एक दृष्टिकोण पर नहीं चलता भिन्न भिन्न परिवेश में भिन्न भिन्न लोगो का समावेश हैं अत: सबके विचारों का सम्मान करना ही सही जीवन हैं | विचार भिन्न होने के कारण शत्रुता बढ़ाना गलत हैं | 🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹 🚩🙏🏻 *जय श्री महाकाल* 🙏🏻🚩 🌹🙏🏻 *जय श्री पेड़ा हनुमान* 🙏🏻🌹 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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meerashukla May 10, 2020

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Satyam May 10, 2020

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Ravi May 10, 2020

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Bindi Pandey May 9, 2020

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Ramesh Soni.33 May 10, 2020

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