Vishal_Pandey
Vishal_Pandey Feb 26, 2021

इन्सान मकान बदलता है वस्त्र बदलता है, संबंध बदलता है फिर भी दुखी रहता है, क्यूंकि वह अपना स्वभाव नहीं बदलता !! 🌹🌹 गुड इवनिंग जी🌺🌺💐💐

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Ravi Kumar Taneja Feb 26, 2021
🕉श्री अम्बे देवी नमो नम:🕉 माता रानी की कृपा आप पर हमेशा बनी रहे🙏🌹🙏 माँ जगदम्बे का आशीर्वाद सपरिवार आपको मिले 🙏 🌹आपकी सब मनोकामना माता रानी पूरी करे 🌹 शुभ प्रभात वंदन🔯🙏🌺🙏🌺🙏🔯

dhruv wadhwani Feb 26, 2021
जय माता दी शुभ संध्या जी

pradeep Jaiswal Feb 26, 2021
Jai shree radhekrisna Jai maa laxminarayan ji Jai mata di Om namha shivaye Jai maa parwati Jai shree Ganesha Jai kartike ji Jai deva Jai shree ram Jai maa seeta Jai laxman ji Jai shatruhan ji Jai bharat ji Jai hanuman ji Jai shree bajrang

pradeep Jaiswal Feb 26, 2021
Jai shree radhekrisna Jai maa laxminarayan ji Jai mata di Om namha shivaye Jai maa parwati Jai shree Ganesha Jai kartike ji Jai deva Jai shree ram Jai maa seeta Jai laxman ji Jai shatruhan ji Jai bharat ji Jai hanuman ji Jai shree bajrang Bali

pradeep Jaiswal Feb 26, 2021
Jai shree radhekrisna Jai maa laxminarayan ji Jai mata di Om namha shivaye Jai maa parwati Jai shree Ganesha Jai kartike ji Jai deva Jai shree ram Jai maa seeta Jai laxman ji Jai shatruhan ji Jai bharat ji Jai hanuman ji Jai shree bajrang Bali

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जय श्री कृष्ण 🙏 हे सांवरे, ज्ञान और भक्ति प्रेम में हमेशा ‌से टकराव रहा है, और होता रहेगा कल भी ‌ज्ञानी उद्धव जी गोपियों को ज्ञान का पाठ पढ़ा रहे थे। लेकिन गोपियों को ज्ञान का पाठ कैसे ‌समझ आता जो पाठ गोपियों ने पड़ लिया था, फिर वहां ज्ञान कहा समझ आता है, लेकिन जो प्रेम गोपियों का था क्या आज है वो राधा कृष्ण का‌ प्रेम जो था वो आज है, शायद सफ़र पर चलोगें तो रास्ते में मोड़ भी आयेंगे, इस का मतलब ये तो नहीं की मोड़ पर जानें से आप गलत रास्ते पर ‌हो मोंड भी खत्म होगा और सही रास्ता भी आयेगा अब यें तय हमको करना है,की हम उस मोड़ पर भटक जाते हैं, या सहीं मंजिल तक पहुंचते हैं, चुनाव अपना है, जहां कीचड़ होता है, वहां ही कमल का पुष्प भी खिलता है, और हमें उस पुष्प तक पहुंचने के लिए कीचड़ से होकर गुजरना पड़ता है, हमारा जीवन भी कुछ ऐसा ही है, जिस में कीचड़ रुपी पढ़ाओ ना जानें कितने आयेंगे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 🙏🙏

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 179 स्कन्ध - 08 अध्याय - 20 इस अध्याय में:- भगवान वामन जी का विराट् रूप होकर दो ही पग से पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लेना श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन! जब कुलगुरु शुक्राचार्य ने इस प्रकार कहा, तब आदर्श गृहस्थ राजा बलि ने एक क्षण चुप रहकर बड़ी विनय और सावधानी से शुक्राचार्य जी के प्रति यों कहा। राजा बलि ने कहा- भगवन! आपका कहना सत्य है। गृहस्थाश्रम में रहने वालों के लिये वही धर्म है जिससे अर्थ, काम, यश और आजीविका में कभी किसी प्रकार बाधा न पड़े। परन्तु गुरुदेव! मैं प्रह्लाद जी का पौत्र हूँ और एक बार देने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। अतः अब मैं धन लोभ से ठग की भाँति इस ब्राह्मण से कैसे कहूँ कि ‘मैं तुम्हें नहीं दूँगा’। इस पृथ्वी ने कहा है कि ‘असत्य से बढ़कर कोई अधर्म नहीं है। मैं सब कुछ सहने में समर्थ हूँ, परन्तु झूठे मनुष्य का भार मुझसे नहीं सहा जाता’। मैं नरक से, दरिद्रता से, दुःख के समुद्र से, अपने राज्य के नाश से और मृत्यु से भी उतना नहीं डरता, जितना ब्राह्मण से प्रतिज्ञा करके उसे धोखा देने से डरता हूँ। इस संसार में मर जाने के बाद धन आदि जो-जो वस्तुएँ साथ छोड़ देती हैं, यदि उनके द्वारा दान आदि से ब्राह्मणों को भी संतुष्ट न किया जा सका, तो उनके त्याग का लाभ ही क्या रहा? दधीचि, शिबि आदि महापुरुषों ने अपने परम प्रिय दुस्त्यज प्राणों का दान करके भी प्राणियों की भलाई की है। फिर पृथ्वी आदि वस्तुओं को देने में सोच-विचार करने की क्या आवश्यकता है? ब्रह्मन! पहले युग में बड़े-बड़े दैत्यराजों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया है। पृथ्वी में उनका सामना करने वाला कोई नहीं था। उनके लोक और परलोक को तो काल खा गया, परन्तु उनका यश अभी पृथ्वी पर ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। गुरुदेव! ऐसे लोग संसार में बहुत हैं, जो युद्ध में पीठ न दिखाकर अपने प्राणों की बलि चढ़ा देते हैं; परन्तु ऐसे लोग बहुत दुर्लभ हैं, जो सत्पात्र के प्राप्त होने पर श्रद्धा के साथ धन का दान करें। गुरुदेव! यदि उदार और करुणाशील पुरुष अपात्र याचक की कामना पूर्ण करके दुर्गति भोगता है, तो वह दुर्गति भी उसके लिये शोभा की बात होती है। फिर आप-जैसे ब्रह्मवेत्ता पुरुषों को दान करने से दुःख प्राप्त हो तो उसके लिये क्या कहना है। इसलिये मैं इस ब्रह्मचारी की अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा। महर्षे! वेदविधि के जानने वाले आप लोग बड़े आदर से यज्ञ-यागादि के द्वारा जिनकी आराधना करते हैं-वे वरदानी विष्णु ही इस रूप में हों अथवा कोई दूसरा हो, मैं इनकी इच्छा के अनुसार इन्हें पृथ्वी का दान करूँगा। यदि मेरे अपराध न करने पर भी ये अधर्म से मुझे बाँध लेंगे, तब भी मैं इनका अनिष्ट नहीं चाहूँगा। क्योंकि मेरे शत्रु होने पर भी इन्होंने भयभीत होकर ब्राह्मण का शरीर धारण किया है। यदि ये पवित्रकीर्ति भगवान् विष्णु ही हैं तो अपना यश नहीं खोना चाहेंगे (अपनी माँगी हुई वस्तु लेकर ही रहेंगे)’। मुझे युद्ध में मारकर भी पृथ्वी छीन सकते हैं और यदि कदाचित ये कोई दूसरा ही हैं, तो मेरे बाणों की चोट से सदा के लिये रणभूमि में सो जायेंगे। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- जब शुक्राचार्य जी ने देखा कि मेरा यह शिष्य गुरु के प्रति अश्रद्धालु है तथा मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहा है, तब दैव की प्रेरणा से उन्होंने राजा बलि को शाप दे दिया-यद्यपि वे सत्यप्रतिज्ञ और उदार होने के कारण शाप के पात्र नहीं थे। शुक्राचार्य जी ने कहा- ‘मूर्ख! तू है तो अज्ञानी, परन्तु अपने को बहुत बड़ा पण्डित मानता है। तू मेरी उपेक्षा करके गर्व कर रहा है। तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है। इसलिये शीघ्र ही तू अपनी लक्ष्मी खो बैठेगा’। राजा बलि बड़े महात्मा थे। अपने गुरुदेव के शाप देने पर भी वे सत्य से नहीं डिगे। उन्होंने वामन भगवान् की विधिपूर्वक पूजा की और हाथ में जल लेकर तीन पग भूमि का संकल्प कर दिया। उसी समय राजा बलि की पत्नी विन्ध्यावली, जो मोतियों के गहनों से सुसज्जित थी, वहाँ आयी। उसने अपने हाथों वामन भगवान के चरण पखारने के लिये जल से भरा सोने का कलश लाकर दिया। बलि ने स्वयं बड़े आनन्द से उनके सुन्दर-सुन्दर युगल चरणों को धोया और उनके चरणों का वह विश्व पावन जल अपने सिर पर चढ़ाया। उस समय आकाश में स्थित देवता, गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध, चारण-सभी लोग राजा बलि के इस अलौकिक कार्य तथा सरलता की प्रशंसा करते हुए बड़े आनन्द से उनके ऊपर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। एक साथ ही हजारों दुन्दुभियाँ बार-बार बजने लगीं। गन्धर्व, किम्पुरुष और किन्नर गान करने लगे- ‘अहो धन्य है! इन उदारशिरोमणि बलि ने ऐसा काम कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। देखो तो सही, इन्होंने जान-बूझकर अपने शत्रु को तीनों लोकों का दान कर दिया’। इसी समय एक बड़ी अद्भुत घटना घट गयी। अनन्त भगवान् का वह त्रिगुणात्मक वामन रूप बढ़ने लगा। वह यहाँ तक बढ़ा कि पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ, स्वर्ग, पाताल, समुद्र, पशु-पक्षी, मनुष्य, देवता और ऋषि- सब-के-सब उसी में समा गये। ऋत्विज, आचार्य और सदस्यों के साथ बलि ने समस्त ऐश्वर्यों के एकमात्र स्वामी भगवान् के उस त्रिगुणात्मक शरीर में पंचभूत, इन्द्रिय, उनके विषय, अन्तःकरण और जीवों के साथ वह सम्पूर्ण त्रिगुणमय जगत् देखा। राजा बलि ने विश्वरूप भगवान के चरणतल में रसातल, चरणों में पृथ्वी, पिंडलियों में पर्वत, घुटनों में पक्षी और जाँघों में मरुद्गण को देखा। इसी प्रकार भगवान् के वस्त्रों में सन्ध्या, गुह्य-स्थानों में प्रजापतिगण, जघनस्थल में अपने सहित समस्त असुरगण, नाभि में आकाश, कोख में सातों समुद्र और वक्षःस्थल में नक्षत्र समूह देखे। उन लोगों को भगवान् के हृदय में धर्म, स्तनों में ऋत (मधुर) और सत्य वचन, मन में चन्द्रमा, वक्षःस्थल पर हाथों में कमल लिये लक्ष्मी जी, कण्ठ में सामवेद और सम्पूर्ण शब्दसमूह उन्हें दीखे। बाहुओं में इन्द्रादि समस्त देवगण, कानों में दिशाएँ, मस्तक में स्वर्ग, केशों में मेघमाला, नासिका में वायु, नेत्रों में सूर्य और मुख में अग्नि दिखायी पड़े। वाणी में वेद, रसना में वरुण, भौंहों में विधि और निषेध, पलकों में दिन और रात। विश्वरूप के ललाट में क्रोध और नीचे के ओठ में लोभ के दर्शन हुए। परीक्षित! उनके स्पर्श में काम, वीर्य में जल, पीठ में अधर्म, पदविन्यास में यज्ञ, छाया में मृत्यु, हँसी में माया और शरीर के रोमों में सब प्रकार की ओषधियाँ थीं। उनकी नाड़ियों में नदियाँ, नखों में शिलाएँ और बुद्धि में ब्रह्मा, देवता एवं ऋषिगण दीख पड़े। इस प्रकार वीरवर बलि ने भगवान् की इन्द्रियों और शरीर में सभी चराचर प्राणियों का दर्शन किया। परीक्षित! सर्वात्मा भगवान् में यह सम्पूर्ण जगत देखकर सब-के-सब दैत्य अत्यन्त भयभीत हो गये। इसी समय भगवान् के पास असह्य तेज वाला सुदर्शन चक्र, गरजते हुए मेघ के समान भयंकर टंकार करने वाला शारंग धनुष, बादल की तरह गम्भीर शब्द करने वाला पांचजन्य शंख, विष्णु भगवान् की अत्यन्त वेगवती कौमुदकी गदा, सौ चन्द्राकार चिह्नों वाली ढाल और विद्याधर नाम की तलवार, अक्षय बाणों से भरे दो तरकश तथा लोकपालों के सहित भगवान् के सुनन्द आदि पार्षदगण सेवा करने के लिये उपस्थित हो गये। उस समय भगवान की बड़ी शोभा हुई। मस्तक पर मुकुट, बाहुओं में बाजूबंद, कानों में मकराकृत कुण्डल, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न, गले में कौस्तुभ मणि, कमर में मेखला और कंधे पर पीताम्बर शोभायमान हो रहा था। वे पाँच प्रकार के पुष्पों की बनी वनमाला धारण किये हुए थे, जिस पर मधुलोभी भौंरे गुंजार कर रहे थे। उन्होंने अपने एक पग से बलि की सारी पृथ्वी नाप ली, शरीर से आकाश और भुजाओं से दिशाएँ घेर लीं; दूसरे पग से उन्होंने स्वर्ग को भी नाप लिया। तीसरा पैर रखने के लिये बलि की तनिक-सी भी कोई वस्तु न बची। भगवान का वह दूसरा पग ही ऊपर की ओर जाता हुआ महर्लोक, जनलोक और तपलोक से भी ऊपर सत्यलोक में पहुँच गया। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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savi Choudhary Apr 17, 2021

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Neha Sharma, Haryana Apr 16, 2021

💐🍂💐🍂💐🍂💐🍂💐🍂 *मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो न कोई। *जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥। *छाँड़ि दी कुल की कानि कहा करिहै कोई। *संतन ढिंग बैठि-बैठि लोक लाज खोई॥ *चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई। *मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥ *अँसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई। *अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥ *दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई। *माखन जब काढ़ि लियो छाछा पिये कोई॥ *भगत देख राजी हुई जगत देखि रोई। *दासी "मीरा" लाल गिरिधर तारो अब मोही॥ .......*मीराबाई *जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸 *शुभ रात्रि नमन*🙏🌸🌸 . "जीवन लक्ष्य" ये शरीर कृष्ण कृपा से मिला है और केवल कृष्ण की प्राप्ति के लिये ही मिला है। इसलिये हम को चाहे कुछ भी त्यागना पडें, सब छोड़कर कृष्ण भक्ति में तुरन्त लग जाना चाहिये। जैसे छोटा बालक कहता है कि माँ मेरी है। उससे कोई पूँछे कि माँ तेरी क्यों है तो इसका उत्तर उसके पास नहीं है। उसके मन में यह शंका ही पैदा नहीं होती कि माँ मेरी क्यों है ? माँ मेरी है बस इसमें उसको कोई सन्देह नहीं होता। इसी तरह आप भी सन्देह मत करो और यह बात दृढता से मान लो कि कृष्ण मेरे हैं। कृष्ण के सिवाय और कोई मेरा नहीं है क्योंकि वह सब छूटने वाला है। जिनके प्रति आप बहुत आसक्त रहते हैं, वे माँ-बाप, पति-पत्नी, बच्चे, रूपये, जमीन, मकान, रिश्ते-नाते आदि सब छूट जायेंगें। उनकी याद तक नहीं रहेगी। अगर याद रहने की रीत हो तो बतायें कि इस जन्म से पहले आप कहाँ थे। आपके माँ, बाप स्त्री, पुत्र कौन थे ? आपका घर कौन सा था। जैसे पहले जन्म की याद नहीं है, ऐसे ही इस जन्म की भी याद नहीं रहेगी। जिसकी याद तक नही रहेगी उसके लिये आप अकारण परेशान हो रहे हो। यह सबके अनुभव की बात है कि हमारा कोई नहीं है सब मिले हैं और विछुड जायेगें, आज नहीं तो कल इसलिये- "मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई", ऐसा मानकर मस्त हो जाओ। दुनियाँ सब की सब चली जाये तो परवाह नहीं है पर हम केवल कृष्ण के हैं, और केवल कृष्ण हमारे हैं। केवल एक मात्र यही सच है और बाकी सब झूठ। इसके सिवाय और किसी बात की ओर देखो ही मत, विचार ही मत करो। आज से कृष्ण के होकर रहो, कोई क्या कर रहा है कृष्ण जानें, हमें मतलब नहीं है। सब संसार नाराज हो जाये तो परवाह नहीं पर कृष्ण तो मेरे हैं - इस बात को पकड़ कर रखो। ----------:::×:::--------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *************************************************

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