Vandana Singh
Vandana Singh Feb 27, 2021

💛💚💛Om Namo Bhagwate Vasudevaya Namah 💛💚💛🙏🙏

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कामेंट्स

neeraj Feb 27, 2021
om namo bhagwate vasudeaay namah🌹

BIJAY PANDAY Feb 27, 2021
🙏शुभ सन्ध्या वंदन सादर प्रणाम जी 🚩जय श्री राधे कृष्णा राधे राधे जी 🚩प्रभु श्री राम भक्तों हनुमानजी व सूर्य पुत्र शनि देव की कृपा आप पर व परिवार पर सदैव बनी रहे तथा हमेशा स्वस्थ व खुश रहे तथा माघ पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें और बधाई 🚩🕉नमो नारायण नम:🚩🚩🙏🙏

HAZARI LAL JAISWAL Feb 27, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जय श्री राधे कृष्णा 🙏🙏 शुभ वंदन जी ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नमः ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः

kalindi Feb 27, 2021
om namah bhagwade vasudevaye namah

:shivoham :🌱 Feb 27, 2021
@yadavcmoboda 🔥🔥🔥कुछ नपुंसक सोच वालों ने गाय को काट कर खाया है और बेचा भी है और यह कार्य कर रहे हैं और समाज सेवा और देशभक्ति के नाम पर छुपा भी रहे हैं,,,,,,💯🔥🔥🔥 रंगमंच पर सिर्फ नाम बड़े दर्शन के,,,खोटे,,है,,,,,💯

:shivoham :🌱 Feb 27, 2021
@neerajgangwar 🔥🔥🔥कुछ नपुंसक सोच वालों ने गाय को काट कर खाया है और बेचा भी है और यह कार्य कर रहे हैं और समाज सेवा और देशभक्ति के नाम पर छुपा भी रहे हैं,,,,,,💯🔥🔥🔥 रंगमंच पर सिर्फ नाम बड़े दर्शन के,,,खोटे,,है,,,,,💯

:shivoham :🌱 Feb 27, 2021
@p14654 🔥🔥🔥कुछ नपुंसक सोच वालों ने गाय को काट कर खाया है और बेचा भी है और यह कार्य कर रहे हैं और समाज सेवा और देशभक्ति के नाम पर छुपा भी रहे हैं,,,,,,💯🔥🔥🔥 रंगमंच पर सिर्फ नाम बड़े दर्शन के,,,खोटे,,है,,,,,💯

:shivoham :🌱 Feb 27, 2021
@noratmalmalimali 🔥🔥🔥कुछ नपुंसक सोच वालों ने गाय को काट कर खाया है और बेचा भी है और यह कार्य कर रहे हैं और समाज सेवा और देशभक्ति के नाम पर छुपा भी रहे हैं,,,,,,💯🔥🔥🔥 रंगमंच पर सिर्फ नाम बड़े दर्शन के,,,खोटे,,है,,,,,💯

GOVIND CHOUHAN Feb 27, 2021
HARI OM NAMO NARAYANAYAH NAMAH 🌹 JAI SHREE HARI VISHNU BHAGVAN 🌹 GOOD EVENING JII 🙏 PRABHU SHREE HARI VISHNU BHAGVAN KI KRIPA SE AAP V AAPKE SAMPURN PARIVAAR KI HR MANOKAMNA PURN KARE JII 🙏🙏 VERY NICE POST JII 👌👌👌

Neha Sharma, Haryana Apr 18, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 186*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 09*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 03*🙏🌸 *इस अध्याय में महर्षि च्यवन और सुकन्या का चरित्र, राजा शर्याति का वंश....... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! मनुपुत्र राजा शर्याति वेदों का निष्ठावान् विद्वान् था। उसने अंगिरा गोत्र के ऋषियों के यज्ञ में दूसरे दिन का कर्म बतलाया था। उसकी एक कमललोचना कन्या थी। उसका नाम था सुकन्या। *एक दिन राजा शर्याति अपनी कन्या के साथ वन में घूमते-घूमते च्यवन ऋषि के आश्रम पर जा पहुँचे। सुकन्या अपनी सखियों के साथ वन में घूम-घूमकर वृक्षों का सौन्दर्य देख रही थी। उसने एक स्थान पर देखा कि बाँबी (दीमकों की एकत्रित की हुई मिट्टी) के छेद में से जुगनू की तरह दो ज्योतियाँ दीख रहीं हैं। दैव की कुछ ऐसी ही प्रेरणा थी, सुकन्या ने बाल सुलभ चपलता से एक काँटे के द्वारा उन ज्योतियों को बेध दिया। इससे उनमें से बहुत-सा खून बह चला। उसी समय राजा शर्याति के सैनिकों का मल-मूत्र रुक गया। राजर्षि शर्याति को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ, उन्होंने अपने सैनिकों से कहा- ‘अरे, तुम लोगों ने कहीं महर्षि च्यवन जी के प्रति कोई अनुचित व्यवहार तो नहीं कर दिया? मुझे तो यह स्पष्ट जान पड़ता है कि हम लोगों में से किसी-न-किसी ने उनके आश्रम में कोई अनर्थ किया है।' *तब सुकन्या ने अपने पिता से डरते-डरते कहा कि ‘पिता जी! मैंने कुछ अपराध अवश्य किया है। मैंने अनजान में दो ज्योतियों को काँटे से छेद दिया है’। अपनी कन्या की यह बात सुनकर शर्याति घबरा गये। उन्होंने धीरे-धीरे स्तुति करके बाँबी में छिपे हुए च्यवन मुनि को प्रसन्न किया। तदनन्तर च्यवन मुनि का अभिप्राय जानकर उन्होंने अपनी कन्या उन्हें समर्पित कर दी और इस संकट से छूटकर बड़ी सावधानी से उनकी अनुमति लेकर वे अपनी राजधानी में चले आये। इधर सुकन्या परमक्रोधी च्यवन मुनि को अपने पति के रूप में प्राप्त करके बड़ी सावधानी से उनकी सेवा करती हुई उन्हें प्रसन्न करने लगी। वह उनकी मनोवृत्ति को जानकर उसके अनुसार ही बर्ताव करती थी। *कुछ समय बीत जाने पर उनके आश्रम पर दोनों अश्विनीकुमार आये। च्यवन मुनि ने उनका यथोचित सत्कार किया और कहा कि ‘आप दोनों समर्थ हैं, इसलिये मुझे युवा-अवस्था प्रदान कीजिये। मेरा रूप एवं अवस्था ऐसी कर दीजिये, जिसे युवती स्त्रियाँ चाहती हैं। मैं जानता हूँ कि आप लोग सोमपान के अधिकारी नहीं हैं, फिर भी मैं आपको यज्ञ में सोमरस का भाग दूँगा’। *वैद्यशिरोमणि अश्विनीकुमारों ने महर्षि च्यवन का अभिनन्दन करके कहा, ‘ठीक है।’ और इसके बाद उनसे कहा कि ‘यह सिद्धों के द्वारा बनाया हुआ कुण्ड है, आप इसमें स्नान कीजिये’। च्यवन मुनि के शरीर को बुढ़ापे ने घेर रखा था। सब ओर नसें दीख रही थीं, झुर्रियाँ पड़ जाने एवं बाल पक जाने के कारण वे देखने में बहुत भद्दे लगते थे। अश्विनीकुमारों ने उन्हें अपने साथ लेकर कुण्ड में प्रवेश किया। उसी समय कुण्ड से तीन पुरुष बाहर निकले। वे तीनों ही कमलों की माला, कुण्डल और सुन्दर वस्त्र पहने एक-से मालूम होते थे। वे बड़े ही सुन्दर एवं स्त्रियों को प्रिय लगने वाले थे। परमसाध्वी सुन्दरी सुकन्या ने जब देखा कि ये तीनों ही एक आकृति के तथा सूर्य के समान तेजस्वी हैं, तब अपने पति को न पहचानकर उसने अश्विनीकुमारों की शरण ली। *उसके पातिव्रत्य से अश्विनीकुमार बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने उसके पति को बतला दिया और फिर च्यवन मुनि से आज्ञा लेकर विमान के द्वारा वे स्वर्ग को चले गये। *कुछ समय के बाद यज्ञ करने की इच्छा से राजा शर्याति च्यवन मुनि के आश्रम पर आये। वहाँ उन्होंने देखा कि उनकी कन्या सुकन्या के पास एक सूर्य के समान तेजस्वी पुरुष बैठा हुआ है। सुकन्या ने उनके चरणों की वन्दना की। शर्याति ने उसे आशीर्वाद नहीं दिया और कुछ अप्रसन्न-से होकर बोले- ‘दुष्टे! यह तूने क्या किया? क्या तूने सबके वन्दनीय च्यवन मुनि को धोखा दे दिया? अवश्य ही तूने उनको बूढ़ा और अपने काम का न समझकर छोड़ दिया और अब तू इस राह चलते जार पुरुष की सेवा कर रही है। तेरा जन्म तो बड़े ऊँचे कुल में हुआ था। यह उलटी बुद्धि तुझे कैसे प्राप्त हुई? तेरा यह व्यवहार तो कुल में कलंक लगाने वाला है। अरे राम-राम! तू निर्लज्ज होकर जार पुरुष की सेवा कर रही है और इस प्रकार अपने पिता और पति दोनों के वंश को घोर नरक में ले जा रही है’। *राजा शर्याति के इस प्रकार कहने पर पवित्र मुस्कान वाली सुकन्या ने मुसकराकर कहा- ‘पिताजी! ये आपके जमाता स्वयं भृगुनन्दन महर्षि च्यवन ही हैं’। इसके बाद उसने अपने पिता से महर्षि च्यवन के यौवन और सौन्दर्य की प्राप्ति का सारा वृत्तान्त कह सुनाया। वह सब सुनकर राजा शर्याति अत्यन्त विस्मित हुए। उन्होंने बड़े प्रेम से अपनी पुत्री को गले से लगा लिया। *महर्षि च्यवन ने वीर शर्याति से सोमयज्ञ का अनुष्ठान करवाया और सोमपान के अधिकारी न होने पर भी अपने प्रभाव से अश्विनीकुमारों को सोमपान कराया। इन्द्र बहुत जल्दी क्रोध कर बैठते हैं। इसलिये उनसे यह सहा न गया। उन्होंने चिढ़कर शर्याति को मारने के लिये वज्र उठाया। महर्षि च्यवन ने वज्र के साथ उनके हाथ को वहीं स्तम्भित कर दिया। तब सब देवताओं ने अश्विनीकुमारों को सोम का भाग देना स्वीकार कर लिया। उन लोगों ने वैद्य होने के कारण पहले अश्विनीकुमारों का सोमपान से बहिष्कार कर रखा था। *परीक्षित! शर्याति के तीन पुत्र थे- उत्तानबर्हि, आनर्त और भूरिषेण। आनर्त से रेवत हुए। महाराज! रेवत ने समुद्र के भीतर कुशस्थली नाम की एक नगरी बसायी थी। उसी में रहकर वे आनर्त आदि देशों का राज्य करते थे। उनके सौ श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े थे कुकुद्मी। कुकुद्मी अपनी कन्या रेवती को लेकर उसके लिये वर पूछने के उद्देश्य से ब्रह्मा जी के पास गये। उस समय ब्रह्मलोक का रास्ता ऐसे लोगों के लिये बेरोक-टोक था। ब्रह्मलोक में गाने-बजाने की धूम मची हुई थी। बातचीत के लिये अवसर न मिलने के कारण वे कुछ क्षण वहीं ठहर गये। उत्सव के अन्त में ब्रह्मा जी को नमस्कार करके उन्होंने अपना अभिप्राय निवेदन किया। उनकी बात सुनकर भगवान् ब्रह्मा जी ने हँसकर उनसे कहा- ‘महाराज! तुमने अपने मन में जिन लोगों के विषय में सोच रखा था, वे सब तो काल के गाल में चले गये। अब उनके पुत्र, पौत्र अथवा नातियों की तो बात ही क्या है, गोत्रों के नाम भी नहीं सुनायी पड़ते। इस बीच में सत्ताईस चतुर्युगी का समय बीत चुका है। इसलिये तुम जाओ। इस समय भगवान् नारायण के अंशावतार महाबली बलदेव जी पृथ्वी पर विद्यमान हैं। राजन्! उन्हीं नररत्न को यह कन्यारत्न तुम समर्पित कर दो। जिनके नाम, लीला आदि का श्रवण-कीर्तन बड़ा ही पवित्र है-वे ही प्राणियों के जीवन सर्वस्व भगवान् पृथ्वी का भार उतारने के लिये अपने अंश से अवतीर्ण हुए हैं।’ *राजा कुकुद्मी ने ब्रह्मा जी का यह आदेश प्राप्त करके उनके चरणों की वन्दना की और अपने नगर में चले आये। उनके वंशजों ने यक्षों के भय से वह नगरी छोड़ दी थी और जहाँ-तहाँ यों ही निवास कर रहे थे। राजा कुकुद्मी ने अपनी सर्वांगसुन्दरी पुत्री परमबलशाली बलराम जी को सौंप दी और स्वयं तपस्या करने के लिये भगवान् नर-नारायण के आश्रम बदरीवन की ओर चल दिये। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Neha Sharma, Haryana Apr 17, 2021

. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 185 स्कन्ध - 09 अध्याय - 02 इस अध्याय में:- पृषध्र आदि मनु के पाँच पुत्रों का वंश श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इस प्रकार जब सुद्युम्न तपस्या करने के लिये वन में चले गये, तब वैवस्वत मनु ने पुत्र की कामना से यमुना के तट पर सौ वर्ष तक तपस्या की। इसके बाद उन्होंने सन्तान के लिये सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि की आराधना की और अपने ही समान दस पुत्र प्राप्त किये, जिसमें सबसे बड़े इक्ष्वाकु थे। उन मनुपुत्रों में से एक का नाम था पृषध्र। गुरु वसिष्ठ जी ने उसे गायों की रक्षा में नियुक्त कर रखा था, अतः वह रात्रि के समय बड़ी सावधानी से वीरासन से बैठा रहता और गायों की रक्षा करता। एक दिन रात में वर्षा हो रही थी। उस समय गायों के झुंड में एक बाघ घुस आया। उससे डरकर सोयी हुई गौएँ उठ खड़ी हुईं। वे गोशाला में ही इधर-उधर भागने लगीं। बलवान् बाघ ने एक गाय को पकड़ लिया। वह अत्यन्त भयभीत होकर चिल्लाने लगी। उसका वह क्रन्दन सुनकर पृषध्र गाय के पास दौड़ आया। एक तो रात का समय और दूसरे घनघोर घटाओं से आच्छादित होने के कारण तारे भी नहीं दीखते थे। उसने हाथ में तलवार उठाकर अनजान में ही बड़े वेग से गाय का सिर काट दिया। वह समझ रहा था कि यही बाघ है। तलवार की नोक से बाघ का भी कान कट गया, वह अत्यन्त भयभीत होकर रास्ते में खून गिराता हुआ वहाँ से निकल भागा। शत्रुदमन पृषध्र ने यह समझा कि बाघ मर गया। परंतु रात बीतने पर उसने देखा कि मैंने तो गाय को ही मार डाला है, इससे उसे बड़ा दुःख हुआ। यद्यपि पृषध्र ने जान-बूझकर अपराध नहीं किया था, फिर भी कुलपुरोहित वसिष्ठ जी ने उसे शाप दिया कि ‘तुम इस कर्म से क्षत्रिय नहीं रहोगे; जाओ, शूद्र हो जाओ’। पृषध्र ने अपने गुरुदेव का यह शाप अंजलि बाँधकर स्वीकार किया और इसके बाद सदा के लिये मुनियों को प्रिय लगने वाले नैष्ठिक ब्रह्मचर्य-व्रत को धारण किया। वह समस्त प्राणियों का अहैतुक हितैषी एवं सबके प्रति समान भाव से युक्त होकर भक्ति के द्वारा परमविशुद्ध सर्वात्मा भगवान् वासुदेव का अनन्य प्रेमी हो गया। उसकी सारी आसक्तियाँ मिट गयीं। वृत्तियाँ शान्त हो गयीं। इन्द्रियाँ वश में हो गयीं। वह कभी किसी प्रकार का संग्रह-परिग्रह नहीं रखता था। जो कुछ दैववश प्राप्त हो जाता, उसी से अपना जीवन-निर्वाह कर लेता। वह आत्मज्ञान से सन्तुष्ट एवं अपने चित्त को परमात्मा में स्थित करके प्रायः समाधिस्थ रहता। कभी-कभी जड़, अंधे और बहरे के समान पृथ्वी पर विचरण करता। इस प्रकार का जीवन व्यतीत करता हुआ वह एक दिन वन में गया। वहाँ उसने देखा की दावानल धधक रहा है। मननशील पृषध्र अपनी इन्द्रियों को उसी अग्नि में भस्म करके परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो गया। मनु का सबसे छोटा पुत्र था कवि। विषयों से वह अत्यन्त निःस्पृह था। वह राज्य छोड़कर अपने बन्धुओं के साथ वन में चला गया और अपने हृदय में स्वयंप्रकाश परमात्मा को विराजमान पर किशोर अवस्था में ही परमपद को प्राप्त हो गया। मनुपुत्र करूष से कारूष नामक क्षत्रिय उत्पन्न हुए। वे बड़े ही ब्राह्मण भक्त, धर्मप्रेमी एवं उत्तरापथ के रक्षक थे। धृष्ट के धार्ष्ट नामक क्षत्रिय हुए। अन्त में वे इस शरीर से ही ब्राह्मण बन गये। नृग का पुत्र हुआ सुमति, उसका पुत्र भूतज्योति और भूतज्योति का पुत्र वसु था। वसु का पुत्र प्रतीक और प्रतीक का पुत्र ओघवान। ओघवान के पुत्र का नाम भी ओघवान ही था। उनके एक ओघवती नाम की कन्या भी थी, जिसका विवाह सुदर्शन से हुआ। मनुपुत्र नरिष्यन्त से चित्रसेन, उससे ऋक्ष, ऋक्ष से मीढ्वान्, मीढ्वान् से कूर्च और उससे इन्द्रसेन की उत्पत्ति हुई। इन्द्रसेन से वीतिहोत्र, उससे सत्यश्रवा, सत्यश्रवा से ऊरूश्रवा और उससे देवदत्त की उत्पत्ति हुई। देवदत्त के अग्निवेश्य नामक पुत्र हुए, जो स्वयं अग्नि देव ही थे। आगे चलकर वे ही कानीन एवं महर्षि जातूकर्ण्य के नाम से विख्यात हुए। परीक्षित! ब्राह्मणों का ‘आग्निवेश्यायन’ गोत्र उन्हीं से चला है। इस प्रकार नरिष्यन्त के वंश का मैंने वर्णन किया, अब दिष्टि का वंश सुनो। दिष्ट के पुत्र का नाम था नाभाग। यह उस नाभाग से अलग है, जिसका मैं आगे वर्णन करूँगा। वह अपने कर्म के कारण वैश्य हो गया। उसका पुत्र हुआ भलन्दन और उसका वत्सप्रीति। वत्सप्रीति का प्रांशु और प्रांशु का पुत्र हुआ प्रमति। प्रमति के खनित्र, खनित्र के चाक्षुष और उनके विविंशति हुए। विविंशति के पुत्र रम्भ और रम्भ के पुत्र खनिनेत्र-दोनों ही परम धार्मिक हुए। उनके पुत्र करन्धम और करन्धम के अवीक्षित्। महाराज परीक्षित! अवीक्षित् के पुत्र मरुत्त चक्रवर्ती राजा हुए। उनसे अंगिरा के पुत्र महायोगी संवर्त्त ऋषि ने यज्ञ कराया था। मरुत्त का यज्ञ जैसा हुआ वैसा और किसी का नहीं हुआ। उस यज्ञ के समस्त छोटे-बड़े पात्र अत्यन्त सुन्दर एवं सोने के बने हुए थे। उस यज्ञ में इन्द्र सोमपान करके मतवाले हो गये थे और दक्षिणाओं से ब्राह्मण तृप्त हो गये थे। उसमें परसने वाले थे मरुद्गण और विश्वेदेव सभासद् थे। मरुत्त के पुत्र का नाम था दम। दम से राज्यवर्धन, उससे सुधृति और सुधृति से नर नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई। नर से केवल, केवल से बन्धुमान्, बन्धुमान् से वेगवान, वेगवान से बन्धु और बन्धु से राजा तृणबिन्दु का जन्म हुआ। तृणबिन्दु आदर्श गुणों के भण्डार थे। अप्सराओं में श्रेष्ठ अलम्बुषा देवी ने उसको वरण किया, जिससे उनके कई पुत्र और इडविडा नाम की कन्या उत्पन्न हुई। मुनिवर विश्रवा ने अपने योगेश्वर पिता पुलस्त्य जी से उत्तम विद्या प्राप्त करके इडविडा के गर्भ से लोकपाल कुबेर को पुत्ररूप में उत्पन्न किया। महाराज तृणबिन्दु के अपनी धर्मपत्नी से तीन पुत्र हुए- विशाल, शून्यबिन्दु और धूम्रकेतु। उनसे राजा विशाल वंशधर हुए और उन्होंने वैशाली नाम की नगरी बसायी। विशाल से हेमचन्द्र, हेमचन्द्र से धूम्राक्ष, धूम्राक्ष से संयम और सयंम से दो पुत्र हुए-कृशाश्व और देवज। कृशाश्व के पुत्र का नाम था सोमदत्त। उसने अश्वमेध यज्ञों के द्वारा यज्ञपति भगवान् की आराधना की और योगेश्वर संतों का आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त की। सोमदत्त का पुत्र हुआ सुमति और सुमति से जनमेजय। ये सब तृणबिन्दु की कीर्ति को बढ़ाने वाले विशालवंशी राजा हुए। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 *************************************************

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Virag Vajpeyi Apr 18, 2021

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सुनील Apr 19, 2021

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Neha Sharma, Haryana Apr 17, 2021

. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 184 स्कन्ध - 09 अध्याय - 01 इस अध्याय में:- वैवस्वत मनु के पुत्र राजा सुद्युम्न की कथा राजा परीक्षित ने पूछा- 'भगवन्! आपने सब मन्वन्तरों और उनमें अनन्त शक्तिशाली भगवान् के द्वारा किये हुए ऐश्वर्यपूर्ण चरित्रों का वर्णन किया और मैंने उनका श्रवण भी किया। आपने कहा कि पिछले कल्प के अन्त में द्रविड़ देश के स्वामी राजर्षि सत्यव्रत ने भगवान् की सेवा से ज्ञान प्राप्त किया और वही इस कल्प में वैवस्वत मनु हुए। आपने उनके इक्ष्वाकु आदि नरपति पुत्रों का भी वर्णन किया। ब्रह्मन्! अब आप कृपा करके उनके वंश और वंश में होने वालों का अलग-अलग चरित्र वर्णन कीजिये। महाभाग! हमारे हृदय में सर्वदा ही कथा सुनने की उत्सुकता बनी रहती है। वैवस्वत मनु के वंश में जो हो चुके हों, इस समय विद्यमान हों और आगे होने वाले हों-उन सब पवित्रकीर्ति पुरुषों के पराक्रम का वर्णन कीजिये।' सूतजी कहते हैं- शौनकादि ऋषियों! ब्रह्मवादी ऋषियों की सभा में राजा परीक्षित ने जब यह प्रश्न किया, तब धर्म के परम मर्मज्ञ भगवान् श्रीशुकदेव जी ने कहा। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! तुम मनु वंश का वर्णन संक्षेप से सुनो। विस्तार से तो सैकड़ों वर्ष में भी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जो परमपुरुष परमात्मा छोटे-बड़े सभी प्राणियों के आत्मा हैं, प्रलय के समय केवल वही थे; यह विश्व तथा और कुछ भी नहीं था। महाराज! उनकी नाभि से एक सुवर्णमय कमलकोष प्रकट हुआ। उसी में चतुर्मुख ब्रह्मा जी का आविर्भाव हुआ। ब्रह्मा जी के मन से मरीचि और मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। उनकी धर्मपत्नी दक्षनन्दिनी अदिति से विवस्वान् (सूर्य) का जन्म हुआ। विवस्वान् की संज्ञा नामक पत्नी से श्राद्धदेव मनु का जन्म हुआ। परीक्षित! परममनस्वी राजा श्राद्धदेव ने अपनी पत्नी श्रद्धा के गर्भ से दस पुत्र उत्पन्न किये। उनके नाम थे- इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करुष, नरिष्यन्त, पृषध्र, नभग और कवि। वैवस्वत मनु पहले सन्तानहीन थे। उस समय सर्वसमर्थ भगवान् वसिष्ठ ने उन्हें सन्तान प्राप्ति कराने के लिये मित्रावरुण का यज्ञ कराया था। यज्ञ के आरम्भ में केवल दूध पीकर रहने वाली वैवस्वत मनु की धर्मपत्नी श्रद्धा ने अपने होता के पास जाकर प्रणामपूर्वक याचना की कि मुझे कन्या ही प्राप्त हो। तब अध्वर्यु की प्रेरणा से होता बने हुए ब्राह्मण ने श्रद्धा के कथन का स्मरण करके एकाग्रचित्त से वषट्कार का उच्चारण करते हुए यज्ञकुण्ड में आहुति दी। जब होता ने इस प्रकार विपरीत कर्म किया, तब यज्ञ के फलस्वरूप पुत्र के स्थान पर इला नाम की कन्या हुई। उसे देखकर श्राद्धदेव मनु का मन कुछ विशेष प्रसन्न नहीं हुआ। उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठ जी से कहा- ‘भगवन्! आप लोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देने वाला कैसे हो गया? अरे, ये तो बड़े दुःख की बात है। वैदिक कर्म का ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये। आप लोगों का मन्त्रज्ञान तो पूर्ण है ही; इसके अतिरिक्त आप लोग जितेन्द्रिय भी हैं तथा तपस्या के कारण निष्पाप हो चुके हैं। देवताओं में असत्य की प्राप्ति के समान आपके संकल्प का यह उलटा फल कैसे हुआ?’ परीक्षित! हमारे वृद्ध पितामह भगवान् वसिष्ठ ने उनकी यह बात सुनकर जान लिया कि होता ने विपरीत संकल्प किया है। इसलिये उन्होंने वैवस्वत मनु से कहा- ‘राजन्! तुम्हारे होता के विपरीत संकल्प से ही हमारा संकल्प ठीक-ठीक पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तप के प्रभाव से मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा’। परीक्षित! परमयशस्वी भगवान वसिष्ठ ने ऐसा निश्चय करके उस इला नाम की कन्या को ही पुरुष बना देने के लिये पुरुषोत्तम नारायण की स्तुति की। सर्वशक्तिमान् भगवान श्रीहरि ने सन्तुष्ट होकर उन्हें मुँहमाँगा वर दिया, जिसके प्रभाव से वह कन्या ही सुद्युम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गयी। महाराज! एक बार राजा सुद्युम्न शिकार खेलने के लिये सिन्धु देश के घोड़े पर सवार होकर कुछ मन्त्रियों के साथ वन में गये। वीर सुद्युम्न कवच पहकर और हाथ में सुन्दर धनुष एवं अत्यन्त अद्भुत बाण लेकर हरिनों का पीछा करते हुए उत्तर दिशा में बहुत आगे बढ़ गये। अन्त में सुद्युम्न मेरु पर्वत की तलहटी के एक वन में चले गये। उस वन में भगवान शंकर पार्वती के साथ विहार करते रहते हैं। उसमें प्रवेश करते ही वीरवर सुद्युम्न ने देखा कि मैं स्त्री हो गया हूँ और घोड़ा घोड़ी हो गया है। परीक्षित! साथ ही उनके सब अनुचरों ने भी अपने को स्त्रीरूप में देखा। वे सब एक-दूसरे के मुँह देखने लगे, उनका चित्त बहुत उदास हो गया। राजा परीक्षित ने पूछा- भगवन! उस भूखण्ड में ऐसा विचित्र गुण कैसे आ गया? किसने उसे ऐसा बना दिया था? आप कृपा कर हमारे इस प्रश्न का उत्तर दीजिये; क्योंकि हमें बड़ा कौतूहल हो रहा है। श्रीशुकदेव जी ने कहा- परीक्षित! एक दिन भगवान शंकर का दर्शन करने के लिये बड़े-बड़े व्रतधारी ऋषि अपने तेज से दिशाओं का अन्धकार मिटाते हुए उस वन में गये। उस समय अम्बिका देवी वस्त्रहीन थीं। ऋषियों को सहसा देख वे अत्यन्त लज्जित हो गयीं। झटपट उन्होंने भगवान शंकर की गोद से उठकर वस्त्र धारण कर लिया। ऋषियों ने भी देखा कि भगवान गौरी-शंकर इस समय विहार कर रहे हैं, इसलिये वहाँ से लौटकर वे भगवान नर-नारायण के आश्रम पर चले गये। उसी समय भगवान शंकर ने अपनी प्रिया भगवती अम्बिका को प्रसन्न करने के लिये कहा कि ‘मेरे सिवा जो भी पुरुष इस स्थान में प्रवेश करेगा, वही स्त्री हो जायेगा’। परीक्षित! तभी से पुरुष उस स्थान में प्रवेश नहीं करते। अब सुद्युम्न स्त्री हो गये थे। इसलिये वे अपने स्त्री बने हुए अनुचरों के साथ एक वन से दूसरे वन में विचरने लगे। उसी समय शक्तिशाली बुध ने देखा कि मेरे आश्रम के पास ही बहुत-सी स्त्रियों से घिरी हुई एक सुन्दरी स्त्री विचर रही है। उन्होंने इच्छा की कि यह मुझे प्राप्त हो जाये। उस सुन्दरी स्त्री ने भी चन्द्रकुमार बुध को पति बनाना चाहा। इस पर बुध ने उसके गर्भ से पुरुरवा नाम का पुत्र उत्पन्न किया। इस प्रकार मनुपुत्र राजा सुद्युम्न स्त्री हो गये। ऐसा सुनते हैं कि उन्होंने उस अवस्था में अपने कुलपुरोहित वसिष्ठ जी का स्मरण किया। सुद्युम्न कि यह दशा देखकर वसिष्ठ जी के हृदय में कृपावश अत्यन्त पीड़ा हुई। उन्होंने सुद्युम्न को पुनः पुरुष बना देने के लिये भगवान शंकर कि आराधना की। भगवान शंकर वसिष्ठ जी पर प्रसन्न हुए। परीक्षित! उन्होंने उनकी अभिलाषा पूर्ण करने के लिये अपनी वाणी को सत्य रखते हुए ही यह बात कही- ‘वसिष्ठ! तुम्हारा यह यजमान एक महीने तक पुरुष रहेगा और एक महीने तक स्त्री। इस व्यवस्था से सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वी का पालन करे’। इस प्रकार वसिष्ठ जी के अनुग्रह से व्यवस्थापूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्न पृथ्वी का पालन करने लगे। परंतु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी। उनके तीन पुत्र हुए- उत्कल, गय और विमल। परीक्षित! वे सब दक्षिणापथ के राजा हुए। बहुत दिनों के बाद वृद्धावस्था आने पर प्रतिष्ठान नगरी के अधिपति सुद्युम्न ने अपने पुत्र पुरुरवा को राज्य दे दिया और स्वयं तपस्या करने के लिये वन की यात्रा की। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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narinder bansal Apr 18, 2021

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Kuldeep Singh rathi Apr 18, 2021

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