Devendra
Devendra Aug 23, 2017

*गणपती क्यों बिठाते हैं ?*

#गणेशजी #ज्ञानवर्षा
*गणपती क्यों बिठाते हैं ?*

हम सभी हर साल गणपती की स्थापना करते हैं, साधारण भाषा में गणपती को बैठाते हैं।
लेकिन क्यों ???
किसी को मालूम है क्या ??
हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार, महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की है।
लेकिन लिखना उनके वश का नहीं था।
अतः उन्होंने श्री गणेश जी की आराधना की और गणपती जी से महाभारत लिखने की प्रार्थना की।
गणपती जी ने सहमति दी और दिन-रात लेखन कार्य प्रारम्भ हुआ और इस कारण गणेश जी को थकान तो होनी ही थी, लेकिन उन्हें पानी पीना भी वर्जित था।
अतः गणपती जी के शरीर का तापमान बढ़े नहीं, इसलिए वेदव्यास ने उनके शरीर पर मिट्टी का लेप किया और भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश जी की पूजा की।
मिट्टी का लेप सूखने पर गणेश जी के शरीर में अकड़न आ गई, इसी कारण गणेश जी का एक नाम पर्थिव गणेश भी पड़ा।
महाभारत का लेखन कार्य 10 दिनों तक चला।
अनंत चतुर्दशी को लेखन कार्य संपन्न हुआ।
वेदव्यास ने देखा कि, गणपती का शारीरिक तापमान फिर भी बहुत बढ़ा हुआ है और उनके शरीर पर लेप की गई मिट्टी सूखकर झड़ रही है, तो वेदव्यास ने उन्हें पानी में डाल दिया।
इन दस दिनों में वेदव्यास ने गणेश जी को खाने के लिए विभिन्न पदार्थ दिए।
तभी से गणपती बैठाने की प्रथा चल पड़ी।
इन दस दिनों में इसीलिए गणेश जी को पसंद विभिन्न भोजन अर्पित किए जाते हैं।।

*🌺गणपती बाप्पा मोरया🌸*

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*🕉️हिन्दू संस्कार🕉️* 💐 *शयन विधान*💐 *सूर्यास्त के एक प्रहर (लगभग 3 घंटे) के बाद ही शयन करना।* *🌻सोने की मुद्राऐं:* *उल्टा सोये भोगी,* *सीधा सोये योगी,* *दांऐं सोये रोगी,* *बाऐं सोये निरोगी।* *🌻शास्त्रीय विधान भी है।* *आयुर्वेद में ‘वामकुक्षि’ की बात आती हैं,* *बायीं करवट सोना स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं।* *शरीर विज्ञान के अनुसार चित सोने से रीढ़ की हड्डी को नुकसान और औधा या ऊल्टा सोने से आँखे बिगडती है।* *सोते समय कितने गायत्री मंन्त्र गिने जाए :-* *"सूतां सात, उठता आठ”सोते वक्त सात भय को दूर करने के लिए सात मंन्त्र गिनें और उठते वक्त आठ कर्मो को दूर करने के लिए आठ मंन्त्र गिनें।* *"सात भय:-"* *इहलोक,परलोक,आदान,* *अकस्मात ,वेदना,मरण ,* *अश्लोक (भय)* *🌻दिशा घ्यान:-* *दक्षिणदिशा (South) में पाँव रखकर कभी सोना नहीं चाहिए । यम और दुष्टदेवों का निवास है ।कान में हवा भरती है । मस्तिष्क में रक्त का संचार कम को जाता है स्मृति- भ्रंश,व असंख्य बीमारियाँ होती है।* *✌यह बात वैज्ञानिकों ने एवं वास्तुविदों ने भी जाहिर की है।* *1:- पूर्व ( E ) दिशा में मस्तक रखकर सोने से विद्या की प्राप्ति होती है।* *2:-दक्षिण ( S ) में मस्तक रखकर सोने से धनलाभ व आरोग्य लाभ होता है ।* *3:-पश्चिम( W ) में मस्तक रखकर सोने से प्रबल चिंता होती है ।* *4:-उत्तर ( N ) में मस्तक रखकर सोने से हानि मृत्यु कारक ksh होती है ।* *अन्य धर्गग्रंथों में शयनविधि में और भी बातें सावधानी के तौर पर बताई गई है ।* *विशेष शयन की सावधानियाँ:-* *1:-मस्तक और पाँव की तरफ दीपक रखना नहीं। दीपक बायीं या दायीं और कम से कम 5 हाथ दूर होना चाहिये।* *2:-संध्याकाल में निद्रा नहीं लेनी चाहिए।* *3:-शय्या पर बैठे-बैठे निद्रा नहीं लेनी चाहिए।* *4:-द्वार के उंबरे/ देहरी/थलेटी/चौकट पर मस्तक रखकर नींद न लें।* *5:-ह्रदय पर हाथ रखकर,छत के पाट या बीम के नीचें और पाँव पर पाँव चढ़ाकर निद्रा न लें।* *6:-सूर्यास्त के पहले सोना नहीं चाहिए।* *7:-पाँव की और शय्या ऊँची हो तो अशुभ है। केवल चिकित्स उपचार हेतु छूट हैं ।* *8:- शय्या पर बैठकर खाना-पीना अशुभ है।* *9:- सोते सोते पढना नहीं चाहिए।* *10,:-ललाट पर तिलक रखकर सोना अशुभ है।* (इसलिये सोते वक्त तिलक मिटाने का कहा जाता है। ) 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 *🙏🏼 प्रत्येक व्यक्ति यह ज्ञान को प्राप्त कर सके इसलिए शेयर अवश्य करे |* *🙏🏻हिन्दू संस्कार🙏🏻*

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सुबह जागने से पहले दोनो हात देखने चाहिए  अक्सर लोगों से कहते हुए सुना होगा कि दिन की शुरुआत बेहतर हो जाए तो पूरा दिन बन जाता है, लेकिन दिन की अच्छी शुरुआत के लिए कुछ अच्छे काम भी करने होते हैं। बहुत से लोग अपने दिन को बेहतर बनाने के लिए अपने कमरे में तरह-तरह के पोस्टर…या अपनी मेज पर किसी खास धार्मिक देवता की तस्वीर लगाते हैं जिन्हें वो सबसे पहले देखना चाहते हैं, ताकि उनका दिन बन जाए। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो दिन में उठते ही सबसे पहले धरती मां के पैर छूते हैं और फिर बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से लोगों पर ईश्वर की कृपा बनी रहती है। आज सन्मार्ग आपको बतायेगा कि आपको सबह उठते ही सबसे पहले क्या देखना चाहिए। सुबह उठकर सबसे पहले क्या देखें- बिस्तर से उठने के बाद सबसे पहले अपने हाथों को देखना चाहिए। ऐसा करना बहुत ही अच्छा माना जता है और यह काम कुछ लोगों की नियमित दिनचर्या का हिस्सा भी होता है। हमें सबसे पहले अपना हाथ देखकर प्रात: स्मरण मंत्र बोलना चाहिए। कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्द:, प्रभाते करदर्शनम्।। क्या है श्लोक का अर्थ- इस श्लोक का अर्थ है कि हमारे हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी और हाल के मूल में सरस्वती का वास है। यानी भगवान ने हमारे हाथों में इतनी ताकत दे रखी है कि हम लक्ष्मी अर्जित कर सकते हैं। इतना ही नहीं सरस्वती और लक्ष्मी जिसे हम अर्जित करते हैं उनमें समन्वय बनाने के लिए प्रभु स्वयं हाथ के मध्य में बैठे हैं। इसलिए हमें दिन की बेहतर शुरुआत के लिए सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों को जोड़कर देखना चाहिए। जय श्री राम जय श्री कृष्ण जय श्री हरी ॐ 🙏 शुभ 🌅 शुभ शुक्रवार जय श्री लक्ष्मी नारायण 🙏 जय श्री गुरुदेव जय श्री गजानन 💐 जय श्री भोलेनाथ ॐ ऐं र्‍हिं ल्किं चामुण्डायै विच्चे जय माता की जय हो 🌹👏🚩🐚🎪🌷👪👬🚩

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Garima Gahlot Rajput Feb 25, 2021

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Garima Gahlot Rajput Feb 25, 2021

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S.K.Verma Feb 25, 2021

ठगे गए गणेश जी एक वृद्ध अंधी महिला थी, वो गणेश भगवान की बहुत मन से उपासना पूजा करती थी। एक दिन भगवान प्रसन्न होकर प्रकट हो गये और बोले हम तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न है कि कैसे तुमने नेत्रहीन होकर भी मेरी इतनी पूजा की तुम कोई एक वरदान मांगो हम उसे अभी पूरा करेंगे। बुढ़िया ये सुनकर संकोच में पड़ गयी की आखिर क्या मांगे। तो वो बोली प्रभु आप आ गये मुझे और क्या चाहिए मुझे तो सबकुछ मिल गया फिर भी गणेश जी ने उसे कुछ मांगने को कहा तो वो बोली प्रभु अभी तो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा अगर आप कल तक सोचने का समय दें तो बहुत कृपा होगी। भगवान ने उसे एक दिन का समय दे दिया। फिर वो सोचने लगी आखिर क्या मांगे, तो वो अपने बेटे के पास गयी और सारी बात बताई तो उसका बेटा बोला माँ हमारे पास धन की बहुत कमी है तुम धन मांग लो, इतनी देर में उसकी बहु भी वहां पहुंच गयी तो उसे जब ये बात पता चली तो बोली नहीं हम अपने लिए एक वारिस मांग लेते हैं। बुढ़िया फिर सोच में पड़ गयी उसे लगा ये तो अपने मतलब की चीज मांगने में लगे हैं मैं क्या करूँ। फिर वो अपने एक पड़ोसी के पास गयी और सारी बात बताई। तब वो बोली बहन तुम अपने लिए आँखें क्यों नहीं मांग लेती। बुढ़िया सोच में पड़ गयी आखिर क्या करूँ रात भर सोचती रही। ऐसे ही दिन खत्म होकर दूसरा दिन आ गया गणेश भगवान प्रकट हुए और उन्होंने ने उस महिला से पूछा बताओ तुम्हें क्या चाहिए। तो बुढ़िया ने कहा प्रभु मैं अपने पोते को सोने के ग्लास में दूध पीते हुए देखना चाहती हूँ। गणेश भगवान उसकी ये इच्छा सुन कर हसने लगे भगवान बोले तुमने तो मुझे ठग लिया एक ही वरदान में सभी चीजें मांग ली। बेटे के लिए धन, बहु के लिए पुत्र और अपने लिए अपनी आँखें और लम्बी उम्र, फिर प्रभु उसे वरदान दे कर अंतर्ध्यान हो गये। फिर भगवान के वरदान स्वरुप उसके बेटे का रोजगार चलने लगा जिससे उसके घर धन आया उसकी बहु ने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया और उसकी आँखें भी वापस आ गयी।

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पाणी से जलता यहां दिपक हमारा भारत देश, आस्थाओं और विभिन्न रहस्यों से भरा हुआ देश है। यहां हर आधे किलोमीटर पर आपको धर्मस्थल मिल जाएंगे और हर धर्मस्थल के साथ ही एक कहानी भी। वहीं, हमारे देश में कुछ मंदिर से इतने रहस्यमयी है कि उनके रहस्यों के बारे मे आज तक कोई जान भी नहीं पाया है. आज हम आपको ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो मध्य प्रदेश में स्थित है. ये मंदिर देशभर में अद्भुत चमत्कार के मशहूर है. इस मंदिर में एक दिया वर्षों से जलता आ रहा है, लेकिन ये दिव्य ज्योत, तेल या घी से नहीं बल्कि पानी से जलती है. आज तक कई वैज्ञानिकों ने इस मंदिर का रहस्य समझने की कोशिश की, लेकिन किसी को कामयाबी नहीं मिली.   यह मंदिर, मध्य प्रदेश के काली सिंध नदी के किनारे बसे आगर-मालवा जिले के अंतर्गत आने वाले नलखेड़ा गांव से लगभग 15 किमी दूर गाड़िया गांव के पास मौजूद है. इस मंदिर को गड़ियाघाट वाली माताजी के नाम से जाना जाता है. मंदिर के पुजारी के अनुसार, पहले इस मंदिर में हमेशा तेल का दीपक जलता था, लेकिन लगभग पांच साल पहले उन्हें मातारानी ने सपने में दर्शन देकर पानी से दीपक जलाने के लिए कहा. इसे मातारानी का आदेश मानते हुए पुजारी ने सुबह उठकर जब उन्होंने पास बह रही काली सिंध नदी से पानी भरा और उसे दीए में डाल दिया. दीपक में पानी डालने के बाद जैसे ही उसमे रखी हुई ज्योत के पास जलती हुई माचिस ले जाई गई, वैसे ही ज्योत जल उठी. यह देखकर पुजारी खुद भी अचंभित रह गए और लगभग दो महीने तक उन्होंने इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया. बाद में उन्होंने इस बारे में कुछ ग्रामीणों को बताया तो उन्होंने भी पहले विश्वास नहीं किया, मगर जब उन्होंने भी दीए में पानी डालकर ज्योति जलाने की कोशिश की, तो ज्योति जल उठी. बताया जाता है कि उसके बाद इस चमत्कार की बात आग की तरह पूरे गांव में फैल गई. तब से लेकर आज तक इस मंदिर में काली सिंध नदी के पानी से ही ज्योत प्रजलवित की जाती है . बताया जाता है कि जब दीपक में पानी डाला जाता है, तो वह चिपचिपे तरल पदार्थ में तब्दील हो जाता है और ज्योत जल उठती है. स्‍थानीय न‍िवास‍ियों के अनुसार, हालांकि पानी से जलने वाली यह ज्‍योत वर्षा ऋतू में नहीं जलती है. क्योंकि बरसात के मौसम में काली सिंध नदी का जल स्तर बढ़ने के चलते यह मंदिर पानी में डूब जाता है, जिससे यहां पूजा करना संभव नहीं होता।  लेकिन शारदीय नवरात्रि के पहले दिन यानी घटस्थापना के साथ ज्योत दोबारा प्रज्जवलित कर दी जाती है, जो अगले साल बार‍िश के मौसम तक निरंतर जलती रहती है. जय श्री जगदंबे माता की जय हो भोलेनाथ ॐ ऐं र्‍हिं ल्किं चामुण्डायै विच्चे जय माता की 🌅 नमस्कार शुभप्रभात 🌅 शुभ शुक्रवार जय श्री लक्ष्मी नारायण जय श्री भोलेनाथ जय श्री पार्वती माता की जय हो आप सभी भारतवासी मित्रों को मेरा सुबह नमस्कार शुभप्रभात वंदन जय हो 🌹👏🚩🐚🎪👪👬🙏🚩 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷

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Anita Sharma Feb 25, 2021

भोग का फल..... एक सेठजी बड़े कंजूस थे। . एक दिन दुकान पर बेटे को बैठा दिया और बोले कि बिना पैसा लिए किसी को कुछ मत देना, मैं अभी आया। . अकस्मात एक संत आये जो अलग अलग जगह से एक समय की भोजन सामग्री लेते थे, . लड़के से कहा, बेटा जरा नमक दे दो। . लड़के ने सन्त को डिब्बा खोल कर एक चम्मच नमक दिया। . सेठजी आये तो देखा कि एक डिब्बा खुला पड़ा था। सेठजी ने कहा, क्या बेचा बेटा ? . बेटा बोला, एक सन्त, जो तालाब के किनारे रहते हैं, उनको एक चम्मच नमक दिया था। . सेठ का माथा ठनका और बोला, अरे मूर्ख ! इसमें तो जहरीला पदार्थ है। . अब सेठजी भाग कर संतजी के पास गए, सन्तजी भगवान् के भोग लगाकर थाली लिए भोजन करने बैठे ही थे कि.. . सेठजी दूर से ही बोले, महाराज जी रुकिए, आप जो नमक लाये थे वो जहरीला पदार्थ था, आप भोजन नहीं करें। . संतजी बोले, भाई हम तो प्रसाद लेंगे ही, क्योंकि भोग लगा दिया है और भोग लगा भोजन छोड़ नहीं सकते। . हाँ, अगर भोग नहीं लगता तो भोजन नही करते और कहते-कहते भोजन शुरू कर दिया। . सेठजी के होश उड़ गए, वो तो बैठ गए वहीं पर। . रात हो गई, सेठजी वहीं सो गए कि कहीं संतजी की तबियत बिगड़ गई तो कम से कम बैद्यजी को दिखा देंगे तो बदनामी से बचेंगे। . सोचते सोचते उन्हें नींद आ गई। सुबह जल्दी ही सन्त उठ गए और नदी में स्नान करके स्वस्थ दशा में आ रहे हैं। . सेठजी ने कहा, महाराज तबियत तो ठीक है। . सन्त बोले, भगवान की कृपा है..!! . इतना कह कर मन्दिर खोला तो देखते हैं कि भगवान् के श्री विग्रह के दो भाग हो गए हैं और शरीर काला पड़ गया है। . अब तो सेठजी सारा मामला समझ गए कि अटल विश्वास से भगवान ने भोजन का ज़हर भोग के रूप में स्वयं ने ग्रहण कर लिया और भक्त को प्रसाद का ग्रहण कराया। . सेठजी ने घर आकर बेटे को घर दुकान सम्भला दी और स्वयं भक्ति करने सन्त शरण चले गए। ** भगवान् को निवेदन करके भोग लगा करके ही भोजन करें, भोजन अमृत बन जाता है। .

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