Manishi sharma
Manishi sharma Apr 11, 2021

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sn.vyas May 6, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *ईश्वर के होते हुए भी प्रेम जब तक नहीं आएगा,* *तब तक हमारे जीवन में परिवर्तन नहीं होगा।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° यमुना किनारे इस पार से ही जब प्रभु श्री राम महर्षि भारद्वाज द्वारा मार्गदर्शक के रुप में भेजे गये चारों विद्यार्थियों ( वेद-रुपी ) को भगवान राम ने यमुना के किनारे से ही लौटा दिया। क्यों लौटा दिया ? आइये जरा इस पर विचार करें। विद्यार्थियों को विदा कर यमुना पार होकर जब प्रभु चले तो वहाँ पर एक बड़ा सुन्दर प्रसंग आता है, जिसे रामायण पढ़ने वाले सभी पाठकों ने पढ़ा होगा। प्रसंग का प्रारम्भ करते हुए बड़ी सांकेतिक भाषा में गोस्वामीजी ने कहा कि जैसे ही प्रभु ने यमुना पार की, लोगों को दिखाई पडा कि -- *तेहि अवसर एक तापसु आवा।* *तेजपुंज लघु बयस सुहावा।।* २/१०९/७ -- उसी समय एक बड़ा ही तेजस्वी, तपस्वी, भगवान् राम के सामने आया। और उसने भगवान् राम के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और तब -- *राम सप्रेम पुलकि उर लावा।* २/११०/१ -- भगवान् श्री राघवेन्द्र ने गद्गद होकर, तापस को कसकर हृदय से लगा लिया। पर उससे भी बड़ी बात जो गोस्वामीजी ने कही, वह तो आश्चर्य की पराकाष्ठा है। जब भगवान् राम ने तापस को हृदय से लगाया, तो गोस्वामीजी से पूछा गया कि कैसा लग रहा है आपको ? आप कोई उपमा देकर अपने कवित्व की सार्थकता तो सिद्ध कीजिए। और तब गोस्वामीजी ने जो उपमा दी वह पढ़कर अटपटी लगती है। गोस्वामीजी कहते हैं कि श्रीराम ने उसे हृदय से ऐसे लगाया जैसे -- *परम रंक जनु पारसु पावा।।* २/११०/२ -- जैसे किसी परम दरिद्र ने पारस को पा लिया हो, भगवान् राम को ऐसा लगा जब उन्होंने तापस को हृदय से लगाया। इसमें अटपटापन यह है कि ईश्वर हो गया दरिद्र और तापस जी हो गए पारस। हाँ ! यदि तापस को ऐसा लगा होता तो कोई आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि रामायण में बहुत सी ऐसी उपमाएँ दी गई हैं जिनमें भगवान् राम को सम्पत्ति की उपमा दी गई है और जीव को दरिद्र की। जब जनकपुर में भगवान् राम गये तो जनकपुर-वासियों को ऐसा लगा कि जैसे -- *धाए धाम काम सब त्यागी।* *मनहुँ रंक निधि लूटन लागी।।* १/११९/२ -- दर्शन करने वाले दरिद्र हैं और भगवान् राम उनकी सम्पत्ति हैं। और जब वन में आए तो वही बात कही गई कि -- *कंद मूल फल भरि भरि दोना।* *चले रंक जनु लूटन सोना।।* २/१३४/२ -- लेकिन यहाँ पर तो सर्वथा उपमा उल्टी दे दी गई है। कई लोग आज भी प्रश्न करते हैं कि ये तापस जो कौन थे। वैसे इस प्रश्न के उत्तर में बहुत सी बातें कही तथा लिखी भी गई हैं। कोई कहता है कि ये तुलसीदास जी थे, कोई कहता है कि अग्निदेव थे, किसी की दृष्टि में ये अंगिरा ऋषि थे, इस प्रकार न जाने कितने रूपों में उनका वर्णन किया गया है। और यही प्रश्न करते हुए तुलसीदास जी से भी लोगों ने पूछा कि महाराज! बताइए ये कौन हैं ? तो गोस्वामीजी ने स्पष्ट दावा करते हुए कहा कि -- *कवि अलखित गति* -- भई ! ये तो कवि की सीमा से परे हैं। लेकिन इनको पहिचानने के लिए गोस्वामीजी ने एक सूत्र दे दिया और गोस्वामीजी ने जो सूत्र दिया, वही परम प्रमाण है। तुलसीदास जी ने कहा -- भाई ! ये पहिचान में तो आते नहीं, कि किसके बेटे हैं, कहाँ से आए हैं, तथा किस जाति के हैं और संसार में परिचय के यही माध्यम होते हैं। इसलिए मैं तो समझ रहा हूँ कि ये संसार के कोई व्यक्ति नहीं हैं। इनका किसी देश अथवा काल में जन्म नहीं हुआ है। महाराज ! फिर ये कौन हैं ? इसका उत्तर देते हुए गोस्वामीजी कहते हैं कि -- *मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ।* *मिलत धरें तन कह सबु कोऊ।।* २/११०/२ . -- वस्तुतः यह तापस जी और श्रीराम का मिलन नहीं है बल्कि यह तो *प्रेम और परमार्थ का मिलन* है । *तापस जी मूर्तिमान प्रेम हैं और भगवान मूर्तिमान परमार्थ।* भगवान ने जब तापस जी को हृदय से लगाया, तो तापस जी से कहा कि मैं तो दरिद्र हूँ और तुम पारस हो। तापस जी ने कहा -- महाराज ! आप कैसी बातें करते हैं ? भगवान् श्री राम ने मुस्कुराकर कहा -- ब्रह्म दरिद्र है और प्रेम पारस है। और यह बिल्कुल ठीक बात है। क्योंकि दरिद्र वह है जो दूसरे की कोई सहायता न कर सके। और मैं तो सारे संसार के हृदय में बैठा हुआ हूँ, पर आज तक किसी को बदल नहीं पाया। इसलिए मैं तो दरिद्र ही हूँ ! परन्तु *प्रेम का पारस जब जीवन में आ जाता है, तो वह व्यक्ति को बदल देता है*, इसलिए पारस तो आप हैं। इसका अभिप्राय है कि *ईश्वर के होते हुए भी प्रेम जब तक नहीं आएगा, तब तक हमारे जीवन में परिवर्तन नहीं होगा।* परम प्रेम की प्राप्ति के बाद यहाँ से चित्रकूट की यात्रा होती है और चित्रकूट का मार्ग विशुद्ध प्रेम का मार्ग है। इसका अर्थ है कि *जब तक हम जागृत हैं, हमारी बुद्धि चैतन्य है, तब तक हमें वेदों का अनुगमन करना चाहिए, पर जब अन्तःकरण में परम प्रेम का उदय हो जाय, तापस का मिलन हो जाय, तब फिर किसी से यह पूछने की आवश्यकता नहीं है कि यह मार्ग ठीक है या नहीं !* 💎 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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राधे - राधे -आज का भगवद् चिंतन 6 मई 2021 🌞वाणी के बजाय कार्य से दिए गए उदाहरण कहीं ज्यादा प्रभावी होते हैं। कोरा उपदेश भी तब तक कोई काम नहीं आता जब तक उसे चरितार्थ न किया जाए। 🌞वर्तमान समय की एक समस्या यह भी है कि आज की पीढ़ी करने में कम और कहने में ज्यादा विश्वास रखती है। किसी बात को केवल कहा जाए और किया न जाए तो वो रेगिस्तान में बरसे उन बादलों के समान ही है, जो बरसे तो जरूर हैं मगर किसी के काम न आ पाये। बरसते ही उनकी बूँदें रेत में समा जाती हैं। 🌞प्रत्येक सफल आदमियों में एक बात की समानता मिलती है और वो ये कि उन्होंने केवल वाणी से नहीं अपितु अपने कार्यों से भी उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने जो कहा वो किया अथवा कहने की बजाय करने पर ज्यादा जोर दिया। 🌞बिना पुरुषार्थ के हमारे महान से महान संकल्प भी केवल रेत के विशाल महल का निर्माण करने जैसे हो जाते हैं। हमारे पास संकल्प रूपी मजबूत आधार शिला तो होनी ही चाहिए मगर पुरुषार्थ रूपी पिलर भी होने चाहिए, जिस पर सफलता रुपी गगनचुम्बी महल का निर्माण संभव हो सके। 🌞कहना जीवन की माँग नहीं, करना जीवन की माँग है। महत्वपूर्ण ये नहीं कि आप अच्छा कह रहे हैं अपितु महत्वपूर्ण तो ये है कि आप अच्छा कर रहे हैं। सृजनात्मकता जीवन की माँग ही नहीं अपितु अनिवार्यता भी है। इसलिए केवल अच्छा कहना नहीं अपितु अच्छा करना भी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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Putul Devi May 6, 2021

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ashok chaturvedi May 6, 2021

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sn.vyas May 5, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *जब कोई व्यक्ति कुछ बोलता है* *तो उसकी वाणी में संस्कार और* *मान्यताओं का मिला-जुला स्वर* *हमें सुनाई देता है।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° भगवान् राम की जो यात्रा है, उसमें प्रभु ने दो रूपों में अपने को अभिव्यक्त किया है। एक ओर तो भगवान् राम साक्षात् ईश्वर हैं और दूसरी ओर वे मानवीय लीला सम्पन्न कर रहे हैं। इसके द्वारा गोस्वामीजी मानो यह बताना चाहते हैं कि यदि एक पक्ष को हम देखें, तो मनुष्य के रूप में उन्होंने हमें और आपको चलना सिखाया, और दूसरे रूप को यदि देखें, तो इसके द्वारा उन्होंने अपने एक दूसरे पक्ष -- वात्सल्य को प्रगट किया। वनगमन पर प्रभु श्री राम द्वारा मार्ग के विषय में महर्षि भारद्वाज से जिज्ञासा प्रगट करने पर वनयात्रा-क्रम में पहले महर्षि भारद्वाज चार विद्यार्थियों को मार्ग-दर्शक के रूप में भगवान् श्री राम देते हैं। और उन्हीं चार विद्यार्थियों के मार्ग-दर्शन में भगवान् राम आगे की ओर प्रस्थान करते हैं। चारों विद्यार्थियों के पीछे चलते हैं। आध्यात्मिक अर्थों में इस पर यदि दृष्टि डालें कि यह चारों विद्यार्थी कौन हैं ? तो उनका एक दूसरा रूप ही हमें दिखाई देगा। महर्षि भरद्वाज जब अपनी पाठशाला के विद्यार्थियों से पूछते हैं कि आप लोगों में से मार्ग जानने वाला कौन है ? तो, पचासों विद्यार्थी यह दावा करते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है -- *साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए।* *सुनि मन मुदित पचासक आए।।* *सबन्हि राम पर प्रेम अपारा।* *सकल कहहिं मगु दीख हमारा।।* २/१०८/३-४ -- अब यह पचासों शब्द भौतिक अर्थों में बहुसंख्यक हैं, कि बहुत से विद्यार्थियों ने ऐसा कहा। और *आध्यात्मिक अर्थों में इसका तात्पर्य है कि महर्षि भरद्वाज के आश्रम में विद्यार्थियों के रूप में जो दिखाई दे रहे हैं, वस्तुतः वे हमारे विविध धर्मग्रन्थ ही हैं। और ये जितने हमारे धर्मग्रन्थ हैं, उनको आप पचास के रूप में देख सकते हैं। अठारह पुराण, अठारह स्मृतियाँ, दस उपनिषद और चार वेद। इस तरह मानो हमारे पचास ग्रन्थ ही मूर्तिमान होकर आग्रह कर रहे हैं कि इन सबके मन में भगवान् राम के प्रति प्रेम भी है। इसका अभिप्राय है कि समस्त धर्मग्रन्थ ईश्वर की महिमा का वर्णन करते हैं। ईश्वर की भक्ति का उपदेश देते हैं। और सभी ईश्वर की ओर बढ़ने का मार्ग व्यक्ति को बताते हैं। और वे ग्रन्थ जो दावा करते हैं, वे किसी-न-किसी के लिए समान रूप से उपयोगी हैं।* अब यहाँ पर विचारणीय प्रश्न यह है कि इन ग्रन्थों में प्रमुखता किस ग्रन्थ को दी गई ? और तब गोस्वामीजी अपनी अद्भुत शैली के माध्यम से दोनों पक्षों का निर्वाह कर रहे हैं। यदि केवल भौतिक पक्ष का निर्वाह करना होता तो चार विद्यार्थियों को भेजने का तुक समझ में नहीं आता। क्योंकि अगर किसी व्यक्ति को मार्ग दिखाना है, तो आप एक व्यक्ति को भेजेंगे कि चार-चार व्यक्तियों से कहेंगे कि जाओ मार्ग दिखा जाओ। परन्तु यह चार शब्द बड़ा प्रतीकात्मक है। हमारी मान्यता है कि *समस्त ग्रन्थों में परम प्रमाण चारों वेद ही हैं। वेद ही परम प्रामाणिक तथा अपौरुषेय हैं। इसलिए अन्य सब ग्रन्थों का स्थान वेदों के बाद ही है।* इस सन्दर्भ में यह भी कह सकते हैं कि अन्य ग्रन्थों के रचयिता के रूप में किसी-न-किसी ऋषि का नाम प्रचलित है। पुराण, स्मृतियाँ, आदि के रचयिता के रूप में किसी-न-किसी महापुरुष के नाम हमारे सामने आते हैं। पर वेदों के सम्बन्ध में हमारी मान्यता यह है कि *वेद तो अपौरुषेय हैं। क्योंकि उनके प्रणयन में किसी व्यक्ति का प्रयत्न नहीं है। इसलिए वेद का कर्ता किसी को न मानकर ऋषियों को मन्त्रदृष्टा माना गया है।* अलग-अलग ऋषियों ने अन्तःकरण की पवित्रता के काल में, समाधि काल में, जिन मंत्रों को श्रवण किया वे ही मंत्र वेदों के रूप में संग्रहीत कर दिए गये। इसलिए वेद का एक नाम *श्रुति* भी है। *श्रुति शब्द का अर्थ है, सुना गया।* वेदों में व्यक्ति की बुद्धि का समावेश नहीं है। माना यह जाता है कि जब व्यक्ति की बुद्धि का समावेश होगा तब उसमें कुछ-न-कुछ बात तो मिश्रित हो ही जाएगी। इसे हम दृष्टान्त के रूप में यों कह सकते हैं, कि जैसे मेघ से जल की वर्षा होती है, लेकिन *वर्षा का जल चाहे जितना स्वच्छ हो अगर वह मिट्टी के ऊपर गिर जाए, तो उस जल में कुछ न कुछ मलिनता तो आ ही जायेगी। और यदि किसी सुगन्धित पदार्थ के सम्पर्क में आ जाय तो उसमें हमें सुगन्ध की भी अनुभूति होगी। यद्यपि उस जल में मलिनता तथा सुगन्ध दोनों की ही अनुभूति होती है पर जल की जो मलिनता है, वह भी जल का शुद्ध रूप नहीं है, और न ही जल की जो सुगन्ध है, वही जल का सहज रूप है। इसी प्रकार से व्यक्ति की बुद्धि तो पृथ्वी है। और अगर व्यक्ति की बुद्धि में किसी प्रकार की मलिनता हुई, तो ग्रहण की जाने वाली वस्तु में भी किसी-न-किसी प्रकार की मलिनता तो आ ही जाएगी।* और तब व्यक्ति जो कुछ कहेगा, उसमें उसका कुछ संस्कार होगा कि नहीं ? उसकी कुछ मान्यताएँ होंगी कि नहीं ? और भई ! ऐसा तो कोई व्यक्ति होगा ही नहीं कि जिसके जीवन में कुछ मान्यताएँ न बनी हुई हों, कुछ संस्कार न बने हुए हों। इसलिए *जब कोई व्यक्ति कुछ बोलता है तो उसकी वाणी में संस्कार और मान्यताओं का मिला-जुला स्वर हमें सुनाई देता है। अगर मलिन संस्कार हैं तो सामने वाले की वाणी में मलिनता दिखाई देगी और अगर उसमें पवित्रता के संस्कार हैं तो उसकी वाणी को सुगन्ध के दृष्टान्त के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।* 🌧️🌹जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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sn.vyas May 4, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *कर्म-मार्ग माने सद्गुणों का सदुपयोग,* और *भक्ति मार्ग का तात्पर्य है दुर्गुणों का सदुपयोग।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° श्री सीताजी को आप चाहे मूर्तिमती भक्ति कह लीजिए, चाहे शान्ति कह लीजिए, चाहे माया कहिए और चाहे शक्ति कह लीजिए, पर बन्दरों के समान ही सीताजी की खोज में सारे संसार के लोग लगे हुए हैं। लेकिन जो श्रेष्ठ लोग हैं, उनमें से भी अधिकांश समुद्र के किनारे जाकर ही अटक जाते हैं। पर अटकने वालों के लिए भी अन्त में यह उपाय निकला कि हनुमानजी लंका से लौटकर अपना अनुभव उन्हें सुनाते हैं। इसका सीधा-सा तात्पर्य है कि अगर आप स्वयं चल सकें तो चलिए, पर अगर बीच में थककर अटक गए हों, तो हनुमानजी से कथा जरूर सुनिए। क्योंकि हनुमानजी से कथा सुनकर ही बन्दरों में यह उत्साह जागृत हुआ कि कोई बात नहीं, एक बार यदि अटक गए हैं, तो फिर पार होंगे। इसीलिए सारे बन्दर पहले तो लौट जाते हैं और नए सिरे से पुनः भगवान के साथ यात्रा करते हुए फिर से समुद्र के किनारे आते हैं। किन्तु भई ! समुद्र को पार किए बिना लंका में जाने को नहीं मिलेगा। और लंका में जाये बिना श्री सीताजी की प्राप्ति नहीं होगी। परन्तु यह समुद्र तथा लंका का आध्यात्मिक स्वरूप क्या है ? आइए थोड़ा-सा इस पर भी विचार करें। *समुद्र वस्तुतः देह का अभिमान है। और समस्या यह है कि हम चाहे कितनी भी साधना करें, सत्कर्म करें पर इस अभिमान के समुद्र को पार नहीं कर पाते। और इसको पार किए बिना, शांति तथा भक्ति स्वरूपा श्री सीताजी का साक्षात्कार नहीं होगा।* इसलिए सरल-सा उपाय यही है कि हम निराश न हों, अपितु सत्संग के माध्यम से, कथा के माध्यम से भगवान का आश्रय लेकर हम भगवान से ही कहें कि महाराज ! अपनी शक्ति से तो हम पार नहीं हो पाए, अब तो आप ही कृपा करके, इस अभिमान के समुद्र से पार लगा दीजिए। किन्तु इस समुद्र को पार करने की विधि क्या है ? इसका उपाय बताते हुए *भगवान ने ज्ञान, भक्ति एवं कर्म तीनों मार्गों का समन्वय किया है।* रामचरितमानस में वर्णन आता है कि समुद्र पर पहले पत्थरों का पुल बनाया गया। यह पत्थरों का पुल *कर्म-मार्ग* है। और जब पुल बन गया तो जाम्बवानजी से प्रभु ने पूछा कि अब तो समुद्र पार करने की समस्या समाप्त हो गई ! किन्तु जाम्बवान जी ने कहा -- महाराज ! पुल छोटा है, और सेना बड़ी है, इसलिए सारी सेना को पार होने में बड़ा समय लगेगा। परन्तु भगवान श्री राघवेन्द्र ने कहा -- अच्छा अब एक पुल मैं बनाता हूँ। और तब प्रभु पुल के ऊपर खड़े हो गये। उस समय प्रभु की रूप-माधुरी का पान करने के लिए जब समुद्र के सारे जलचर ऊपर आ गए तब भगवान् राम ने कहा कि अब तो चारों ओर मार्ग ही मार्ग हैं जो जिधर से जाना चाहे चला जाय । किन्तु बन्दर पहले डरे, उन्हें लगा कि कहीं ऐसा न हो कि हम इन पर चढ़ें और ये हमें लेकर ही समुद्र में डूब जाएँ, इसलिए बन्दरों ने पत्थर आदि फेंककर देखा और जब उन्हें यह लगा कि जलचर डूबने वाले नहीं हैं, तो सेना पार होने लगी। गोस्वामीजी ने लिखा कि -- *सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।* *अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहिं जाहि ।।* ६/४ -- कुछ लोग हनुमानजी की तरह आकाश मार्ग से गए। कुछ पत्थर के पुल से गए तथा कुछ जलचरों के पुल से गए। इस प्रकार तीन मार्गों से सेना पार हुई। मानो *भगवान ने बता दिया कि कर्म, ज्ञान और भक्ति इन तीनों ही मार्गों के द्वारा व्यक्ति पार हो सकता है।* पत्थर का पुल कर्म-मार्ग है। पत्थर यद्यपि मजबूत होता है, पर उसमें एक ही बुराई है कि वह बहुत वजनदार होता है, इसलिए डूब जाता है। अत: कोई ऐसा उपाय करना चाहिए कि जिससे पत्थर की मजबूती बनी रहे पर वह हल्का हो जाय। और जब इसका उपाय खोजा गया तो पता चला कि नल, नील जिस पत्थर को छू देंगे वह हल्का तो हो जाएगा पर मजबूत ज्यों का त्यों रहेगा। इसी प्रकार *हम लोगों के जीवन में भी सत्कर्म का जो पत्थर है, वह है तो बड़ा मजबूत, पर उसमें अहंकार का बोझ इतना अधिक है कि वह डुबो ही देता है। इसलिए किसी तरह से सत्संग कीजिए, महापुरुषों का आशीर्वाद प्राप्त कीजिए कि सत्कर्म हो, पर उसमें अहंकार का बोझ न हो। और निरभिमानी होकर, 'रा' और 'म' शब्द लिखकर पत्थरों को परस्पर जोड़ दीजिए। और इस प्रकार जब ईश्वर का आश्रय लेकर व्यक्ति पुल बना लेगा तो वह सरलता से देहाभिमान के समुद्र को पार कर लेगा, डूबेगा नहीं।* पत्थर के साथ-साथ भगवान ने जो दूसरा पुल बनाया वह *भक्ति-मार्ग* का पुल है । दूसरा पुल बनाने का अभिप्राय है कि यद्यपि पत्थर का पुल तो है, पर डर यह है कि चलते समय अगर कहीं समुद्र में गिर गए तो जलचर उठाकर खा जाएंगे। और वस्तुतः ये जलचर ही हमारे जीवन के दुर्गुण हैं तथा सद्गुण ही पत्थर हैं । और पत्थर तथा जलचर दोनों के द्वारा पुल बनाकर मानो भगवान ने बता दिया कि *कर्म-मार्ग माने सद्गुणों का सदुपयोग, और भक्ति मार्ग का तात्पर्य है दुर्गुणों का सदुपयोग।* सचमुच जलचर तो ऐसे थे कि जो बन्दरों को गिरने पर 'उठाकर खा लेते, पर जब उन्होंने भगवान की सुन्दरता देखी तो देखते ही रह गए। इसका अभिप्राय है कि *जितनी भी दोष-वृत्तियाँ हैं, उनको भगवान से जोड़ दीजिए। जब ये भगवान में लग जाएंगी तो इनका भी सदुपयोग हो जाएगा। यह भक्ति-मार्ग है, भगवद् कृपा का मार्ग है।* हनुमानजी की तरह जो ऊपर उड़कर गए, वे *ज्ञान-मार्गी* हैं। समुद्र से ऊपर चले जाना माने अभिमान से ऊपर उठ जाना। ज्ञान की परिभाषा करते हुए कहा भी यही गया है कि *जिनके जीवन में ज्ञान होता है उनमें अभिमान का अभाव हो जाता है।* *ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं।* -- लेकिन जो बन्दर कभी अटक गए थे, वे भी, अन्त में, समुद्र पार कर लेते हैं। तथा समुद्र पार करने के बाद लंका में युद्ध होता है। रावण और कुम्भकर्ण मारे जाते हैं। ⚔️ जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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