Anuradha Tiwari
Anuradha Tiwari Apr 18, 2019

II नवग्रह स्तोत्र II अथ नवग्रह स्तोत्र II श्री गणेशाय नमः II जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महदद्युतिम् I तमोरिंसर्वपापघ्नं प्रणतोSस्मि दिवाकरम् II १ II दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम् I नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम् II २ II धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांति समप्रभम् I कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणाम्यहम् II ३ II प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम् I सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् II ४ II देवानांच ऋषीनांच गुरुं कांचन सन्निभम् I बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् II ५ II हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् I सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् II ६ II नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् I छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् II ७ II अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनम् I सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् II ८ II पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम् I रौद्रंरौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् II ९ II इति श्रीव्यासमुखोग्दीतम् यः पठेत् सुसमाहितः I दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्न शांतिर्भविष्यति II १० II नरनारी नृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् I ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् II ११ II ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुभ्दवाः I ता सर्वाःप्रशमं यान्ति व्यासोब्रुते न संशयः II १२ II II इति श्रीव्यास विरचितम् आदित्यादी नवग्रह स्तोत्रं संपूर्णं II

II नवग्रह स्तोत्र II 
अथ नवग्रह स्तोत्र II 
श्री गणेशाय नमः II 
जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महदद्युतिम् I 
तमोरिंसर्वपापघ्नं प्रणतोSस्मि दिवाकरम् II १ II 
दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम् I 
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम् II २ II 
धरणीगर्भ संभूतं विद्युत्कांति समप्रभम् I 
कुमारं शक्तिहस्तं तं मंगलं प्रणाम्यहम् II ३ II 
प्रियंगुकलिकाश्यामं रुपेणाप्रतिमं बुधम् I 
सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम् II ४ II 
देवानांच ऋषीनांच गुरुं कांचन सन्निभम् I 
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम् II ५ II 
हिमकुंद मृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम् I 
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम् II ६ II 
नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् I 
छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् II ७ II 
अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनम् I 
सिंहिकागर्भसंभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम् II ८ II 
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम् I 
रौद्रंरौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम् II ९ II 
इति श्रीव्यासमुखोग्दीतम् यः पठेत् सुसमाहितः I 
दिवा वा यदि वा रात्रौ विघ्न शांतिर्भविष्यति II १० II 
नरनारी नृपाणांच भवेत् दुःस्वप्ननाशनम् I 
ऐश्वर्यमतुलं तेषां आरोग्यं पुष्टिवर्धनम् II ११ II 
ग्रहनक्षत्रजाः पीडास्तस्कराग्निसमुभ्दवाः I 
ता सर्वाःप्रशमं यान्ति व्यासोब्रुते न संशयः II १२ II 
II इति श्रीव्यास विरचितम् आदित्यादी नवग्रह स्तोत्रं संपूर्णं II

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Anuradha Tiwari May 20, 2019

चौरासी लाख योनियों का रहस्य,,,,,,, पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है? ये देख कर और भी दुःख होता है कि आज की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी इस बात पर व्यंग करती और हँसती है कि इतनी सारी योनियाँ कैसे हो सकती है। अपने सीमित ज्ञान के कारण वे इसे ठीक से समझ नहीं पाते। गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं। सबसे पहले ये प्रश्न आता है कि क्या एक जीव के लिए ये संभव है कि वो इतने सारे योनियों में जन्म ले सके? तो उत्तर है - हाँ। एक जीव, जिसे हम आत्मा भी कहते हैं, इन ८४००००० योनियों में भटकती रहती है। अर्थात मृत्यु के पश्चात वो इन्ही ८४००००० योनियों में से किसी एक में जन्म लेती है। ये तो हम सब जानते हैं कि आत्मा अजर एवं अमर होती है इसी कारण मृत्यु के पश्चात वो एक दूसरे योनि में दूसरा शरीर धारण करती है। अब प्रश्न ये है कि यहाँ "योनि" का अर्थ क्या है? अगर आसान भाषा में समझा जाये तो योनि का अर्थ है जाति (नस्ल), जिसे अंग्रेजी में हम स्पीशीज (Species) कहते हैं। अर्थात इस विश्व में जितने भी प्रकार की जातियाँ है उसे ही योनि कहा जाता है। इन जातियों में ना केवल मनुष्य और पशु आते हैं, बल्कि पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, जीवाणु-विषाणु इत्यादि की गणना भी उन्ही ८४००००० योनियों में की जाती है। आज का विज्ञान बहुत विकसित हो गया है और दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक वर्षों की शोधों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस पृथ्वी पर आज लगभग ८७००००० (सतासी लाख) प्रकार के जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती है। इन ८७ लाख जातियों में लगभग २-३ लाख जातियाँ ऐसी हैं जिन्हे आप मुख्य जातियों की उपजातियों के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। अर्थात अगर केवल मुख्य जातियों की बात की जाये तो वो लगभग ८४ लाख है। अब आप सिर्फ ये अंदाजा लगाइये कि हमारे हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्षों पहले केवल अपने ज्ञान के बल पर ये बता दिया था कि ८४००००० योनियाँ है जो कि आज की उन्नत तकनीक द्वारा की गयी गणना के बहुत निकट है। हिन्दू धर्म के अनुसार इन ८४ लाख योनियों में जन्म लेते रहने को ही जन्म-मरण का चक्र कहा गया है। जो भी जीव इस जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है, अर्थात जो अपनी ८४ लाख योनियों की गणनाओं को पूर्ण कर लेता है और उसे आगे किसी अन्य योनि में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती है, उसे ही हम "मोक्ष" की प्राप्ति करना कहते है। मोक्ष का वास्तविक अर्थ जन्म-मरण के चक्र से निकल कर प्रभु में लीन हो जाना है। ये भी कहा गया है कि सभी अन्य योनियों में जन्म लेने के पश्चात ही मनुष्य योनि प्राप्त होती है। मनुष्य योनि से पहले आने वाले योनियों की संख्या ८०००००० (अस्सी लाख) बताई गयी है। अर्थात हम जिस मनुष्य योनि में जन्मे हैं वो इतनी विरली होती है कि सभी योनियों के कष्टों को भोगने के पश्चात ही ये हमें प्राप्त होती है। और चूँकि मनुष्य योनि वो अंतिम पड़ाव है जहाँ जीव अपने कई जन्मों के पुण्यों के कारण पहुँचता हैं, मनुष्य योनि ही मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। विशेषकर कलियुग में जो भी मनुष्य पापकर्म से दूर रहकर पुण्य करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति की उतनी ही अधिक सम्भावना होती है। किसी भी अन्य योनि में मोक्ष की प्राप्ति उतनी सरल नहीं है जितनी कि मनुष्य योनि में है। किन्तु दुर्भाग्य ये है कि लोग इस बात का महत्त्व समझते नहीं हैं कि हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि हमने मनुष्य योनि में जन्म लिया है। एक प्रश्न और भी पूछा जाता है कि क्या मोक्ष पाने के लिए मनुष्य योनि तक पहुँचना या उसमे जन्म लेना अनिवार्य है? इसका उत्तर है - नहीं। हालाँकि मनुष्य योनि को मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक आदर्श योनि माना गया है क्यूंकि मोक्ष के लिए जीव में जिस चेतना की आवश्यकता होती है वो हम मनुष्यों में सबसे अधिक पायी जाती है। इसके अतिरिक्त कई गुरुजनों ने ये भी कहा है कि मनुष्य योनि मोक्ष का सोपान है और मोक्ष केवल मनुष्य योनि में ही पाया जा सकता है। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं है कि केवल मनुष्यों को ही मोक्ष की प्राप्ति होगी, अन्य जंतुओं अथवा वनस्पतियों को नहीं। इस बात के कई उदाहरण हमें अपने वेदों और पुराणों में मिलते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की। महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का जिक्र आया है जिसे उनके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जो वास्तव में धर्मराज थे। महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का वर्णन है जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से उतना पुण्य नहीं प्राप्त हुआ जितना एक गरीब के आंटे से और बाद में वो भी मोक्ष को प्राप्त हुआ। विष्णु एवं गरुड़ पुराण में एक गज और ग्राह का वर्णन आया है जिन्हे भगवान विष्णु के कारण मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वो ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज भक्त राजा थे किन्तु कर्मफल के कारण अगले जन्म में पशु योनि में जन्मे। ऐसे ही एक गज का वर्णन गजानन की कथा में है जिसके सर को श्रीगणेश के सर के स्थान पर लगाया गया था और भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में "यमल" एवं "अर्जुन" नमक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था। वो यमलार्जुन वास्तव में पिछले जन्म में यक्ष थे जिन्हे वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था। अर्थात, जीव चाहे किसी भी योनि में हो, अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। एक और प्रश्न पूछा जाता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे अंत में ही मिलती है। तो इसका उत्तर है - नहीं। हो सकता है कि आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों के कारण आपको मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो लेकिन ये भी हो सकता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति के बाद किये गए आपके पाप कर्म के कारण अगले जन्म में आपको अधम योनि प्राप्त हो। इसका उदाहरण आपको ऊपर की कथाओं में मिल गया होगा। कई लोग इस बात पर भी प्रश्न उठाते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में अगले जन्म का भय दिखा कर लोगों को डराया जाता है। जबकि वास्तविकता ये है कि कर्मों के अनुसार अगली योनि का वर्णन इस कारण है ताकि मनुष्य यथासंभव पापकर्म करने से बच सके। हालाँकि एक बात और जानने योग्य है कि मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत ही कठिन है। यहाँ तक कि सतयुग में, जहाँ पाप शून्य भाग था, मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत कठिन थी। कलियुग में जहाँ पाप का भाग १५ है, इसमें मोक्ष की प्राप्ति तो अत्यंत ही कठिन है। हालाँकि कहा जाता है कि सतयुग से उलट कलियुग में केवल पाप कर्म को सोचने पर उसका उतना फल नहीं मिलता जितना करने पर मिलता है। और कलियुग में किये गए थोड़े से भी पुण्य का फल बहुत अधिक मिलता है। कई लोग ये समझते हैं कि अगर किसी मनुष्य को बहुत पुण्य करने के कारण स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो इसी का अर्थ मोक्ष है, जबकि ऐसा नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति केवल आपके द्वारा किये गए पुण्य कर्मों का परिणाम स्वरुप है। स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने के बाद आपको पुनः किसी अन्य योनि में जन्म लेना पड़ता है। अर्थात आप जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं होते। रामायण और हरिवंश पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति का सबसे सरल साधन "राम-नाम" है। पुराणों में ८४००००० योनियों का गणनाक्रम दिया गया है कि किस प्रकार के जीवों में कितनी योनियाँ होती है। पद्मपुराण के ७८/५ वें सर्ग में कहा गया है: जलज नवलक्षाणी, स्थावर लक्षविंशति कृमयो: रुद्रसंख्यकः पक्षिणाम् दशलक्षणं त्रिंशलक्षाणी पशवः चतुरलक्षाणी मानव अर्थात, जलचर जीव - ९००००० (नौ लाख) वृक्ष - २०००००० (बीस लाख) कीट (क्षुद्रजीव) - ११००००० (ग्यारह लाख) पक्षी - १०००००० (दस लाख) जंगली पशु - ३०००००० (तीस लाख) मनुष्य - ४००००० (चार लाख) इस प्रकार ९००००० + २०००००० + ११००००० + १०००००० + ३०००००० + ४००००० = कुल ८४००००० योनियाँ होती है। जैन धर्म में भी जीवों की ८४००००० योनियाँ ही बताई गयी है। सिर्फ उनमे जीवों के प्रकारों में थोड़ा भेद है। जैन धर्म के अनुसार: पृथ्वीकाय - ७००००० (सात लाख) जलकाय - ७००००० (सात लाख) अग्निकाय - ७००००० (सात लाख) वायुकाय - ७००००० (सात लाख) वनस्पतिकाय - १०००००० (दस लाख) साधारण देहधारी जीव (मनुष्यों को छोड़कर) - १४००००० (चौदह लाख) द्वि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख) त्रि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख) चतुरिन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख) पञ्च इन्द्रियाँ (त्रियांच) - ४००००० (चार लाख) पञ्च इन्द्रियाँ (देव) - ४००००० (चार लाख) पञ्च इन्द्रियाँ (नारकीय जीव) - ४००००० (चार लाख) पञ्च इन्द्रियाँ (मनुष्य) - १४००००० (चौदह लाख) इस प्रकार ७००००० + ७००००० + ७००००० + ७००००० + १०००००० + १४००००० + २००००० + २००००० + २००००० + ४००००० + ४००००० + ४००००० + १४००००० = कुल ८४००००० अतः अगर आगे से आपको कोई ऐसा मिले जो ८४००००० योनियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये या उसका मजाक उड़ाए, तो कृपया उसे इस शोध को पढ़ने को कहें। साथ ही ये भी कहें कि हमें इस बात का गर्व है कि जिस चीज को साबित करने में आधुनिक/पाश्चात्य विज्ञान को हजारों वर्षों का समय लग गया, उसे हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही सिद्ध कर दिखाया था। **** जय ब्रह्मदेव।****** ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, " जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !" ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्य देव का प्रकाश नहीं पड़ता है उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है अर्थात मलिन अंतःकरण में शैतान अथवा असुरों का राज होता है ! अतः ऐसा मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त अनेक दिव्य सिद्धियों एवं निधियों का अधिकारी नहीं बन सकता है ! ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, "जब तक मन में खोट और दिल में पाप है, तब तक बेकार सारे मन्त्र और जाप है !" ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ : श्री राजिव दीक्षित द्वारा 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ क्या भारत में मुसलमानों ने 800 वर्षों तक शासन किया है। सुनने में यही आता है पर न कभी कोई आत्ममंथन करता है और न इतिहास का सही अवलोकन। आईये देखते हैं, इतिहास के वास्तविक नायक कौन थे? और उन्होंने किस प्रकार मुगलिया ताकतों को रोके रखा और भारतीय संस्कृति की रक्षा में सफल रहे। राजा दाहिर : 〰️〰️〰️〰️ प्रारम्भ करते है मुहम्मद बिन कासिम के समय से भारत पर पहला आक्रमण मुहम्मद बिन ने 711 ई में सिंध पर किया। राजा दाहिर पूरी शक्ति से लड़े और मुसलमानों के धोखे के शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हुए। बप्पा रावल: 〰️〰️〰️〰️ दूसरा हमला 735 में राजपुताना पर हुआ जब हज्जात ने सेना भेजकर बप्पा रावल के राज्य पर आक्रमण किया। वीर बप्पा रावल ने मुसलमानों को न केवल खदेड़ा बल्कि अफगानिस्तान तक मुस्लिम राज्यों को रौंदते हुए अरब की सीमा तक पहुँच गए। ईरान अफगानिस्तान के मुस्लिम सुल्तानों ने उन्हें अपनी पुत्रियां भेंट की और उन्होंने 35 मुस्लिम लड़कियों से विवाह करके सनातन धर्म का डंका पुन: बजाया। बप्पा रावल का इतिहास कही नहीं पढ़ाया जाता। यहाँ तक की अधिकतर इतिहासकर उनका नाम भी छुपाते है। गिनती भर हिन्दू होंगे जो उनका नाम जानते हैं! दूसरे ही युद्ध में भारत से इस्लाम समाप्त हो चुका था। ये था भारत में पहली बार इस्लाम का नाश। सोमनाथ के रक्षक राजा जयपाल और आनंदपाल: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अब आगे बढ़ते है गजनवी पर। बप्पा रावल के आक्रमणों से मुसलमान इतने भयक्रांत हुए की अगले 300 सालों तक वे भारत से दूर रहे। इसके बाद महमूद गजनवी ने 1002 से 1017 तक भारत पर कई आक्रमण किये पर हर बार उसे भारत के हिन्दू राजाओ से कड़ा उत्तर मिला। पहले राजा जयपाल और फिर उनका पुत्र आनंदपाल, दोनों ने उसे मार भगाया था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर भी कई आक्रमण किये पर 17 वे युद्ध में उसे सफलता मिली थी। सोमनाथ के शिवलिंग को उसने तोडा नहीं था बल्कि उसे लूट कर वह काबा ले गया था। जिसका रहस्य आपके समक्ष जल्द ही रखता हु। यहाँ से उसे शिवलिंग तो मिल गया जो चुम्बक का बना हुआ था। पर खजाना नहीं मिला। भारतीय राजाओ के निरंतर आक्रमण से वह वापिस गजनी लौट गया और अगले 100 सालो तक कोई भी मुस्लिम आक्रमणकारी भारत पर आक्रमण न कर सका। सम्राट पृथ्वीराज चौहान: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1098 में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज राज चौहान को 16 युद्द के बाद परास्त किया और अजमेर व दिल्ली पर उसके गुलाम वंश के शासक जैसे कुतुबुद्दीन, इल्तुमिश व बलवन दिल्ली से आगे न बढ़ सके। उन्हें हिन्दू राजाओ के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। पश्चिमी द्वार खुला रहा जहाँ से बाद में ख़िलजी लोधी तुगलक आदि आये। ख़िलजी भारत के उत्तरी भाग से होते हुए बिहार बंगाल पहुँच गए। कूच बिहार व बंगाल में मुसलमानो का राज्य हो गया पर बिहार व अवध प्रदेश मुसलमानो से अब भी दूर थे। शेष भारत में केवल गुजरात ही मुसलमानो के अधिकार में था। अन्य भाग स्वतन्त्र थे। राणा सांगा:- 〰️〰️〰️ 1526 में राणा सांगा ने इब्राहिम लोधी के विरुद्ध बाबर को बुलाया। बाबर ने लोधियों की सत्ता तो उखाड़ दी पर वो भारत की सम्पन्नता देख यही रुक गया और राणा सांगा को उसने युद्ध में हरा दिया। चित्तोड़ तब भी स्वतंत्र रहा पर अब दिल्ली मुगलो के अधिकार में थी। हुमायूँ दिल्ली पर अधिकार नहीं कर पाया पर उसका बेटा अवश्य दिल्ली से आगरा के भाग पर शासन करने में सफल रहा। तब तक कश्मीर भी मुसलमानो के अधिकार में आ चूका था। महाराणा प्रताप:- 〰️〰️〰️〰️〰️ अकबर पुरे जीवन महाराणा प्रताप से युद्ध में व्यस्त रहा। जो बाप्पा रावल के ही वंशज थे और उदय सिंह के पुत्र थे जिनके पूर्वजो ने 700 सालो तक मुस्लिम आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक सामना किया। जहाँगीर व शाहजहाँ भी राजपूतों से युद्धों में व्यस्त रहे व भारत के बाकी भाग पर राज्य न कर पाये। दक्षिण में बीजापुर में तब तक इस्लाम शासन स्थापित हो चुका था। छत्रपति शिवाजी महाराज: औरंगजेब के समय में मराठा शक्ति का उदय हुआ और शिवाजी महाराज से लेकर पेशवाओ ने मुगलो की जड़े खोद डाली। शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज्य का विस्तार उनके बाद आने वाले मराठा वीरों ने किया। बाजीराव पेशवा इन्होने मराठा सम्राज्य को भारत में हिमाचल बंगाल और पुरे दक्षिण में फैलाया। दिल्ली में उन्होंने आक्रमण से पहले गौरी शंकर भगवान से मन्नत मांगी थी कि यदि वे सफल रहे तो चांदनी चौक में वे भव्य मंदिर बनाएंगे। जहाँ कभी पीपल के पेड़ के नीचे 5 शिवलिंग रखे थे। बाजीराव ने दिल्ली पर अधिकार किया और गौरी शंकर मंदिर का निर्माण किया। जिसका प्रमाण मंदिर के बाहर उनके नाम का लगा हुआ शिलालेख है। बाजीराव पेशवा ने एक शक्तिशाली हिन्दुराष्ट्र की स्थापना की जो 1830 तक अंग्रेजो के आने तक स्थापित रहा।_ अंग्रेजों और मुगलों की मिलीभगत:। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मुगल सुल्तान मराठाओ को चौथ व कर देते रहे थे और केवल लालकिले तक सिमित रह गए थे। और वे तब तक शक्तिहीन रहे। जब तक अंग्रेज भारत में नहीं आ गए। 1760 के बाद भारत में मुस्लिम जनसँख्या में जबरदस्त गिरावट हुई जो 1800 तक मात्र 7 प्रतिशत तक पहुँच गयी थी। अंग्रेजो के आने के बाद मुसल्मानो को संजीवनी मिली और पुन इस्लाम को खड़ा किया गया, ताकि भारत में सनातन धर्म को नष्ट किया जा सके। इसलिए अंग्रेजो ने 50 साल से अधिक समय से पहले ही मुसलमानो के सहारे भारत विभाजन का षड्यंत्र रच लिया था। मुसलमानो के हिन्दु विरोधी रवैये व उनके धार्मिक जूनून को अंग्रेजो ने सही से प्रयोग किया तो यह झूठा इतिहास क्यों पढ़ाया गया? असल में हिन्दुओ पर 1200 सालो के निरंतर आक्रमण के बाद भी जब भारत पर इस्लामिक शासन स्थापित नहीं हुआ और न ही अंग्रेज इस देश को पूरा समाप्त कर सके। तो उन्होंने शिक्षा को अपना अस्त्र बनाया और इतिहास में फेरबदल किये। अब हिन्दुओ की मानसिकता को बदलना है तो उन्हें ये बताना होगा की तुम गुलाम हो। लगातार जब यही भाव हिन्दुओ में होगा तो वे स्वयं को कमजोर और अत्याचारी को शक्तिशाली समझेंगे। इसी चाल के अंतर्गत ही हमारा जातीय नाम आर्य के स्थान पर हिन्दू रख दिया गया, जिसका अर्थ होता है काफ़िर, काला, चोर, नीच आदि ताकि हम आत्महीनता के शिकार हो अपने गौरव, धर्म, इतिहास और राष्ट्रीयता से विमुख हो दासत्व मनोवृति से पीड़ित हो सकें। *वास्तव में हमारे सनातन धर्म के किसी भी शास्त्र और ग्रन्थ में हिन्दू शब्द कहीं भी नहीं मिलता बल्कि शास्त्रो में हमे आर्य, आर्यपुत्र और आर्यवर्त राष्ट्र के वासी बताया गया है। आज भी पंडित लोग संकल्प पाठ कराते हुए "आर्यवर्त अन्तर्गते..."* का उच्चारण कराते हैं । अत: भारत के हिन्दुओ को मानसिक गुलाम बनाया गया जिसके लिए झूठे इतिहास का सहारा लिया गया और परिणाम सामने है। लुटेरे और चोरो को आज हम बादशाह सुलतान नामो से पुकारते है उनके नाम पर सड़के बनाते है। शहरो के नाम रखते है और उसका कोई हिन्दू विरोध भी नहीं करता जो बिना गुलाम मानसिकता के संभव नहीं सकता था। इसलिए उन्होंने नई रण नीति अपनाई। इतिहास बदलो, मन बदलो और गुलाम बनाओ। यही आज तक होता आया है। जिसे हमने मित्र माना वही अंत में हमारी पीठ पर वार करता है। इसलिए झूठे इतिहास और झूठे मित्र दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है। इस लेख को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाएं। हमें अपना वास्तविक इतिहास जानने का न केवल अधिकार है अपितु तीव्र आवश्यकता भी, ताकि हम उस दास मानसिकता से मुक्त हो सकें जो हम सब के अंदर घर कर गयी है, ताकि हम जान सकें की हम कायर और विभाजित पूर्वजों की सन्तान नहीं, हम कर्मठ और संगठित वीरों की सन्तान हैं। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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धेनुक के पूर्वजन्म का परिचय, बलि-पुत्र साहसिक तथा तिलोत्तमा का स्वच्छन्द विहार, दुर्वासा का शाप और वर, साहसिक का गदहे की योनि में जन्म लेना तथा तिलोत्तमा का बाणपुत्री ‘उषा’ होना---------------------------------------- नारद जी ने पूछा– भगवन! किस पाप से बलि-पुत्र साहसिक को गदहे की योनि प्राप्त हुई? दुर्वासा जी ने किस अपराध से दानवराज को शाप दिया? नाथ! फिर किस पुण्य से दानवेश्वर ने सहसा महाबली श्रीहरि का धाम एवं उनके साथ एकत्व (सायुज्य) मोक्ष प्राप्त कर लिया? . संदेह-भंजन करने वाले महर्षे! इन सब बातों को आप विस्तारपूर्वक बताइये। अहो! कवि के मुख में काव्य पद-पद पर नया-नया प्रतीत होता है। भगवान श्रीनारायण ने कहा– वत्स! नारद! सुनो। मैं इस विषय में प्राचीन इतिहास कहूँगा। मैंने इसे पिता धर्म (देवता) के मुख से गन्धमादन पर्वत पर सुना था। यह विचित्र एवं अत्यन्त मनोहर वृत्तान्त पाद्म-कल्प का है और श्री नारायण देव की कथा से युक्त होने के कारण कानों के लिये उत्तम अमृत है। जिस कल्प की यह कथा है, उसमें तुम उपबर्हण नामक गन्धर्व के रूप में थे। तुम्हारी आयु एक कल्प की थी। तुम शोभायमान, सुन्दर और सुस्थिर यौवन से सम्पन्न थे। पचास कामिनियों के पति होकर सदा श्रृंगार में ही तत्पर रहते थे। ब्रह्मा जी के वरदान से तुम्हें सुमधुर कण्ठ प्राप्त हुआ था और तुम सम्पूर्ण गायकों के राजा समझे जाते थे। उन्हीं दिनों दैववश ब्रह्मा का शाप प्राप्त हुआ था और तुम दासीपुत्र हुए और वैष्णवों के अवशिष्ट भोजन जनित पुण्य से इस समय साक्षात ब्रह्मा जी के पुत्र हो। अब तो तुम असंख्य कल्पों तक जीवित रहने वाले महान वैष्णवशिरोमणि हो। ज्ञानमयी दृष्टि से सब कुछ देखते और जानते हो तथा महादेव जी के प्रिय शिष्य हो। मुने! उस पाद्म-कल्प का वृत्तान्त मुझसे सुनो। दैत्य के इस सुधा-तुल्य मधुर वृत्तान्त को मैं तुम्हें सुना रहा हूँ। एक दिन की बात है। बलि का बलवान पुत्र साहसिक अपने तेज से देवताओं को परास्त करके गन्धमादन की ओर प्रस्थित हुआ। उसके सम्पूर्ण अंग चन्दन से चर्चित थे। वह रत्नमय आभूषणों से विभूषित हो रत्न के ही सिंहासन पर विराजमान था। उसके साथ बहुत बड़ी सेना थी। इसी समय स्वर्ग की परम सुन्दरी अप्सरा तिलोत्तमा उस मार्ग से आ निकली। उसने साहसिक को देखा और साहसिक ने उसको। पुंश्चली स्त्रियों का आचरण दोषपूर्ण होता ही है। वहीं दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो गये। चन्द्रमा के समीप जाती हुई तिलोत्तमा वहाँ बीच में ही ठहर गयी। कुलटा स्त्रियाँ कैसी दुष्टहृदया होती हैं और वे किसी भी पाप का विचार न करके सदा पापरत ही रहा करती हैं– यह सब बतलाकर भी तिलोत्तमा ने अपने बाह्य रूप-सौन्दर्य से साहसिक को मोहित कर लिया। तदनन्तर वे दोनों गन्धमादन के एकान्त रमणीय स्थान में जाकर यथेच्छ विहार करने लगे। वहीं मुनिवर दुर्वासा योगासन से विराजमान होकर श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों का चिन्तन कर रहे थे। तिलोत्तमा और साहसिक उस समय कामवश चेतनाशून्य थे। उन्होंने अत्यन्त निकट ध्यान लगाये बैठे हुए मुनि को नहीं देखा। उनके उच्छृंखल अभिसार से मुनि का ध्यान सहसा भंग हो गया। उन्होंने उन दोनों की कुत्सिक चेष्टाएँ देख क्रोध में भरकर कहा। दुर्वासा बोले– ओ गदहे के समान आकार वाले निर्लज्ज नराधम! भक्तशिरोमणि बलि का पुत्र होकर भी तू इस तरह पशुवत आचरण कर रहा है। देवता, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व तथा राक्षस –ये सभी सदा अपनी जाति में लज्जा का अनुभव करते हैं। पशुओं के सिवा सभी मैथुन-कर्म में लज्जा करते हैं। विशेषतः गदहे की जाति ज्ञान तथा लज्जा से हीन होती है; अतः दानवश्रेष्ठ! अब तू गदहे की योनि में जा। तिलोत्तमे! पुंश्चली स्त्री तो निर्लज्ज होती ही है। दैत्य के प्रति तेरी ऐसी आसक्ति है तो अब तू दानव योनि में ही जन्म ग्रहण कर। ऐसा कहकर रोष से जलते हुए दुर्वासा मुनि वहाँ चुप हो गये। फिर वे दोनों लज्जित और भयभीत होकर उठे तथा मुनि की स्तुति करने लगे। साहसिक बोला– मुने! आप ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात महेश्वर हैं। अग्नि और सूर्य हैं। आप संसार की सृष्टि, पालन तथा संहार करने में समर्थ हैं। भगवन! मेरे अपराध को क्षमा करें। कृपानिधे! कृपा करें। जो सदा मूढ़ों के अपराध को क्षमा करे, वही संत-महात्मा एवं ईश्वर है। यों कहकर वह दैत्यराज मुनि के आगे उच्चस्वर से फूट-फूटकर रोने लगा और दाँतों में तिनके दबाकर उनके चरणकमलों में गिर पड़ा। तिलोत्तमा बोली– हे नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! मुझ पर कृपा कीजिये। विधाता की सृष्टि में सबसे अधिक मूढ़ स्त्रीजाति ही है। सामान्य स्त्री की अपेक्षा अधिक मतवाली एवं मूढ़ कुलटा होती है, जो सदा अत्यन्त कामातुर रहती है। प्रभो! कामुक प्राणी में लज्जा, भय और चेतना नहीं रह जाती है। नारद! ऐसा कहकर तिलोत्तमा रोती हुई दुर्वासा जी की शरण में गयी। भूतल पर विपत्ति में पड़े बिना भला किन्हें ज्ञान होता है? उन दोनों की व्याकुलता देखकर मुनि को दया आ गयी। उस समय उन मुनिवर ने उन्हें अभय देकर कहा। दुर्वासा बोले– दानव! तू विष्णुभक्त बलि का पुत्र है। उत्तम कुल में तेरा जन्म हुआ है। तू पैतृक परम्परा से विष्णुभक्त है। मैं तुझे निश्चितरूप से जानता हूँ। पिता का स्वभाव पुत्र में अवश्य रहता है। जैसे कालिय के सिर पर अंकित हुआ श्रीकृष्ण का चरणचिह्न उसके वंश में उत्पन्न हुए सभी सर्पों के मस्तक पर रहता है। वत्स! एक बार गदहे की योनि में जन्म लेकर तू निर्वाण (मोक्ष)– को प्राप्त हो , सत्पुरुषों द्वारा पहले जो चिरकाल तक श्रीकृष्ण की आराधना की गयी होती है, इसके पुण्य-प्रभाव का कभी लोप नहीं होता। अब तू शीघ्र ही व्रज के निकट वृन्दावन के ताल-वन में जा। वहाँ श्रीहरि के चक्र से प्राणों का परित्याग करके तू निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेगा। तिलोत्तमे! तू भारतवर्ष में बाणासुर की पुत्री होगी; फिर श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्ध का आलिंगन प्राप्त करके शुद्ध हो जायेगी। महामुने! यों कहकर दुर्वासा मुनि चुप हो गये। तत्पश्चात वे दोनों भी उन मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम करके यथास्थान चले गये। इस प्रकार दैत्य साहसिक के गदर्भ-योनि में जन्म लेने का सारा वृत्तान्त मैंने कह सुनाया। तिलोत्तमा बाणासुर की पुत्री उषा होकर अनिरुद्ध की पत्नी हुई।

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Anjana Gupta May 18, 2019

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अंगदेश से अंगकोरवाट कंबोडिया तक.. मैं #अंगदेश बोल रहा हूं। अंगराज कर्ण का अंगदेश और आज का #भागलपुर शहर। गंगा मैया के दक्षिणी किनारे पर तकरीबन पिछले तीन हजार साल से मेरा अस्तित्व कायम है। लिहाजा आप यह कह सकते हैं कि मेरा अस्तित्व विश्व सबसे पुराने शहरों में से एक है। एक ऐसा शहर जिसके जलवे समय-सागर के थपेड़ों से वक्त बेवक्त बेरौनक जरूर हुए पर मिटे नहीं। महलों की रंगीनियां, शासकों की शौर्यगाथाएं और विद्वानों का तेज हमेशा मेरे हिस्से में रहा, पर मेरी असली पहचान हमेशा एक व्यावसायिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में रही। वस्त्रों में सबसे अनुपम #रेशम के उत्पादन के लिये मेरा नाम चांदो सौदागर के जमाने से पूरी दुनिया में फैला है और उसी के साथ फैली है #विक्रमशिला विश्वविद्यालय की ख्याति, #कर्ण की दानवीरता की कहानियां, जदार्लू आम और कतरनी चावल की खुशबू, जैन तीर्थंकर वासुपूज्य की ख्याति, महर्षि मेहीं का अध्यात्म और ऐसी ही सैकड़ों चीजें. हजारों साल का वृद्ध मैं भागलपुर आज अपनी कहानी लेकर आपके समक्ष उपस्थित हूँ। पुण्य देश के राजा थे #भागदत्त, जिन्होंने मुझे अपना नाम दिया। पहले मुझे भागदत्तपुरम पुकारा जाता था। बाद में बदलकर यह भागलपुर हो गया। पहले मेरा अस्तित्व एक उपनगर के रूप में था जो अंगदेश की राजधानी चंपा से सटा था। समय का फेर देखिये अब चंपा ही उपनगर बनकर चंपानगर हो गयी है और मैं भागलपुर ही नगर का मुख्यकेंद्र बन चुका हूँ। चंपा का नाम अंगराज चंपा के नाम पर उनके पिता ने रखा था, पहले उस नगरी का नाम मालिनी था। फूल से दो नामों वाले उस शहर की भी क्या रौनक थी। जहां राजा बलि के सबसे बड़े पुत्र अंग का राज्य चलता था, जिन्हें पृथ्वीपति की उपाधि मिली थी, उसी वंश में आगे चलकर चित्ररथ नामक न्यायप्रिय सम्राट हुए जिनके राज्य में लक्ष्मी और सरस्वती अपनी श्रेष्ठता का फैसला कराने पहुंची थीं। राजा रोमपाद जो अयोध्या के राजा दशरथ के समकालीन थे और उनका एक नाम भी दशरथ ही था। अयोध्या नरेश दशरथ की पुत्री शांता रोमपाद के ही महल में उनकी दत्तक पुत्री के रूप में रहती थीं, जिनका विवाह श्रृंगी ऋषि के साथ हुआ और उसी श्रृंगी ऋषि द्वारा कराये गये अनुष्ठान से दशरथ को राम जैसे पुत्र मिले। राजा कर्ण की वीरता और दानशीलता की कहानी जगजाहिर है. वे इसी चंपा शहर में वास करते थे, उनका महल कर्णगढ़ कहलाता था। जहां आजकल पुलिस प्रशिक्षण अकादमी संचालित हो रही है। उनका विवाह भागदत्त की एक पुत्री से हुआ था, जबकि दूसरी पुत्री का विवाह उनके मित्र दुर्योधन से हुआ था। फिर इस शहर पर जगत प्रसिद्ध चांदो सौदागर का राज हुआ, जिसकी बहू बिहुला ने अपने तप से अपने मृत पति और पांच जेठों को फिर से जिलाने में सफलता प्राप्त की और मनसा पूजा की शुरुआत की। अविश्वसनीय सी लगने वाली ये तमाम कहानियां पुराण के पन्नों में दर्ज हैं। और यह भी कि #कंबोडिया कभी भागलपुर का सांस्कृतिक उपनिवेश हुआ करता था और वहां का #अंकोरवाट मंदिर वस्तुत: अंगकोरवाट मंदिर है। हालांकि इस तथ्य से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी सहमत नजर आते हैं और राष्ट्र कवि दिनकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में भी इस तथ्य का उल्लेख किया है। बहरहाल इसके बाद की ऐतिहासिक कथा भी कम गौरवशाली नहीं। खास तौर पर पाल राजाओं का जमाना, जब मेरे शहर के पड़ोस में एक गांव अंतीचक में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय खुला, जिसे विक्रमशिला महाविहार का नाम दिया गया। उस तंत्र शिक्षण केंद्र में दुनिया भर से छात्र आते थे। इसी विश्वविद्यालय का कमाल था कि मेरे इलाके से आर्यभट्ट और अतिश दीपंकर जैसे विद्वान पैदा हुए। आर्यभट्ट की कीर्ति तो दुनिया जानती ही है पर सबौर वासी अतिश दीपंकर का योगदान भी कम नहीं है, जिन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया और लामा संप्रदाय की शुरुआत की। बहरहाल काल के कपाल में चंपा, मालिनी, कर्णगढ़ तो समा ही गये और विक्रमशिला महाविहार भी जमींदोज हो गया और उसके साथ ही मिटने लगी यहां पैदा हुई तंत्र साधना व सिद्ध और नाथ संप्रदाय की परंपराएं। पहले अंग देश मगध का हिस्सा बना फिर बंगाल का। बंगाल से पाल और सेन वंश मिटे और तुर्क-अफगानों और मुगलों का शासन हुआ। फिर अंग देश से राज्य और राज्य से क्षेत्र बनकर रह गया। सम्राट मिटे, राजा आये और राजा मिटे तो शासक और फिर महज जमींदार। मगर इसके बावजूद इस क्षेत्र की महत्ता कभी कम नहीं हुई। यह उसी दौर की बात है जब शहर का केंद्र चंपानगर और नाथनगर से हटकर भागलपुर में मेरे आगोश में समाने लगा था। पाल वंश के बाद सेन वंश के राजाओं ने बंगाल पर शासन करना शुरू किया, मगर उसका एक राजा लक्ष्मण सेन इतना कायर निकला कि वह मोहम्मद गोरी को आता देख गद्दी छोड़ भाग खड़ा हुआ। इस तरह बंग के अधीन अंग के इलाकों तुर्क-अफगानों और फिर मुगलों का आधिपत्य कायम हुआ। इसके बाद मेरे इलाकों में रोशन खयाल और कला प्रेमी मुसलमानों की आबादी ने ठिकाना बनाना शुरू किया। मेरे इन बाशिंदों ने पूरे शहर में जगह-जगह इमारतें, मसजिदें और मकबरे खड़े किये जो आज भी मेरी धरोहरों की श्रृंखला में चार चांद लगाते हैं। उनकी हुनरमंदी इमारतों के कंगूरों से उतर कर रेशम के डिजाइनों तक में जा पहुंची। इसकी जौहर का नमूना था कि लोग मुझे सिल्क सिटी या रेशम नगरी कह कर पुकारने लगे हैं। फिर शायरी के तरानों का क्या कहना कि बीड़ी बनाने वाला एक मजदूर कौस भी अपने शेरों से मीर और मोमिन को टक्कर देता रहा। वैसे तो मोहम्मद गोरी के आगमन से लेकर मीर कासिम के पतन तक इस शहर पर मुसलमानों की ही हुकूमत चली पर कई दौर ऐसे आये जब यह दिल्ली की सल्तनत से आजाद अस्तित्व बनाने में सफल रही। यही वजह है कि दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक उठा पटक में मात खाने वाले कई शहजादे गुप्त रूप से भागलपुर में अपना ठिकाना बनाकर रहने लगे। शहर के लोग कई गुमनाम मकबरों के बारे में बताते हैं कि फलां मुहम्मद शाह का मकबरा है तो फलां अहमद शाह का। इसके अलावा कई पीर-फकीरों ने भी मुझे अपना आशियाना बनाये। इनमें से कइयों के मजार आज भी कायम हैं। कई लोगों का यह भी मानना है कि मेरा नाम भागलपुर इसलिये पड़ा क्योंकि यहां दूसरे इलाकों से भागकर आये लोगों ने अपना ठिकाना बनाया है। यह भाग कर आये लोगों की नगरी है इसलिये भागलपुर है। पता नहीं भागदत्त वाली कथा सही है या यह, मगर इस बात में सच्चाई जरूर है कि मेरे शहर के आगोश में कई दूर दराज के वाशिंदों ने पनाह ली है। चाहे वह सरयूपारी ब्राह्मण हों या बंग भाषी या दरभंगा-मधुबनी के मैथिल या राजस्थान से पहुंचे माड़वाड़ी समुदाय के लोग। पता नहीं मेरी आबोहवा में क्या आकर्षण था कि इन सारे लोगों ने रहने के लिये मुझे ही चुना। मगर मेरे मिजाज को तय करने में इन लोगों का बड़ा योगदान है, खास तौर पर बंग भाषियों का जिन्होंने इस शहर के लोगों को कविता-कहानी लिखने और जात्रा-नाटक करने का चस्का लगाया। मेरे शहर में बसे मुहल्ले आदमपुर की गलियों में मशहूर कथाकार शरतचंद्र को #देवदास उपन्यास की कथा मिली तो टील्हा कोठी के एकांत में रविन्द्रनाथ टैगोर के #गीतांजलि की प्रथम कड़ियों ने आकार लिया। यह उन्हीं लोगों की रोशन खयाली का नतीजा था कि इस शहर की एक बेटी कादंबिनी गांगुली को ग्रेजुएट होने वाली देश की पहली महिला बनने का सौभाग्य हासिल हुआ और अशोक कुमार और किशोर कुमार जैसे जमींदार खानदान के नवासे फिल्मी दुनिया के सतरंगी परदे पर अपनी हुकूमत कायम करने में कामयाब रहे। प्रीतीश नंदी ने साहित्य और मनोरंजन की दुनिया को एक नई पहचान दी। इसी आजाद ख्याली का नतीजा था कि यह शहर अंग्रेजी हुकूमत की खिलाफत में भी अगुआ साबित हुआ। पहाड़िया विद्रोही तिलकामांझी ने जब विद्रोह की लौ सुलगाई थी तब दुनिया अंग्रेजी जुल्म की हकीकत का आंकलन भी नहीं कर पाये थे। गांधी जी के सत्याग्रह के मौके पर शहर में आंदोलनकारियों का हुजूम उमड़ता था। 1934 में जब मुंगेर में भीषण भूकंप आया और जबरदस्त तबाही मची तो इन्हीं सेनानियों ने बाना बदला और रिलीफ के काम में जुट गये। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई जगह प्रदर्शन हुए और प्रदर्शनकारियों ने अंग्रेजी फौज की गोलियों का सामना बहादुरी के साथ किया। देश आजाद हुआ तो नेहरूजी प्रधानमंत्री बने। इसके बाद वे जब पहली बार भागलपुर आये तो लोगों ने सैंडिस कंपाउंड में चांदी कुर्सी उन्हें बैठने के लिये दी। मगर उस जननायक ने चांदी की कुर्सी यह कहते हुए फेंक दी कि जनता जमीन पर और नेता सिंहासन पर यह नहीं चलेगा। आजादी की लड़ाई में इस शहर ने जितनी कुर्बानियां दीं आजादी के बाद उसका हासिल हमारे हिस्से में बहुत कम आया। शहर धीरे-धीरे ढहता रहा और लोगों में निराशा बढ़ती रही। उस निराशा का विस्फोट तब हुआ जब जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। एक बार फिर मैं व्यवस्था की तानाशाही के खिलाफ लड़ने वालों का केंद्र बन गया। भागलपुर जेल में ही उस दौरान इमरजेंसी की खिलाफत करने वाले बंदियों को रखा गया था और जेल की चाहरदीवारी के अंदर से विरोध के स्वर फूटते रहे। कुछ ही सालों बाद शहर में ऐसी वारदातें हुईं जो आज भी मेरे चरित्र पर बदनुमा दाग बनकर कायम है। अपराध नियंत्रण में नाकामयाब होकर पुलिस कर्मियों ने ३३ युवकों की आंखों में तेजाब डाल दिया। खुद फैसला करने की इस पुलिसिया मनोवृत्ति ने एक गलत काम के कारण पूरी दुनिया में मुझे चर्चा का केंद्र बना दिया। दस साल बाद फिर पुलिसिया करतूत के कारण शहर की फिजा बिगड़ी और हजारों लोग सांप्रदायिक हिंसा की बलि चढ़ गये। पहली घटना ने तो शहर के चरित्र का हनन किया था दूसरी ने शहर की आबोहवा में जहर घोल दिया। इस कारोबारी शहर के कारोबारी रिश्ते तक गड़बड़ाने लगे। खैर यह बुनकर-व्यवसायी का ही रिश्ता था कि शहर के अमन-चैन को पटरी पर आ गया। खैर उसके बाद से शहर का अमन-चैन बरकरार है। लोग जात-धर्म के बदले कारोबार की बातें करते हैं। सन २००१ में विक्रमशिला सेतु बना तो उत्तर बिहार के कई जिले भागलपुर के संपर्क में आ गये। इसके बाद यहां के कारोबार ने तो जैसे उड़ान पकड़ लिया। डल चादर के लिये मशहूर यह शहर तो पहले डल स्वभाव का था अब महानगरों की तेज रफ्तार जिंदगी से कदम मिलाने की कोशिश कर रहा है। धड़ाधड़ अपार्टमेंट बन रहे हैं, शोरूम खुल रहे हैं। लक्ज़री कारों से शहर की सड़कें अटी रहती हैं। इसके बावजूद शहर के शोर में अंगिका की खनक कायम है। बिहुला विषहरी के बोल अब भी गूंजते हैं, गंगा घाटों पर अब भी स्नानार्थियों का मेला लगता है। कतरनी की खुशबू और जरदालू आम की गमक अब भी सैलानियों को मेरे पास खींच लाती है। मैं आज भी आपका ही शहर हूं, वही भागलपुर। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

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