प्रस्तुत है गीता अध्याय–4 का संक्षिप्त वर्णन।

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प्रस्तुत है गीता अध्याय–4 का संक्षिप्त वर्णन।

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ पंद्रहवां अध्याय : (पुरूषोत्तमयोग) प्रथम दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ भाई-बहनों, चौदहवें अध्याय में पाँचवें श्लोक से उन्नीसवें श्लोक तक तीनों गुणों का स्वरूप, उनके कार्य, उनका बँधनस्वरूप और बँधे हुये मनुष्य की उत्तम, मध्यम आदि गतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया, बीसवें श्लोक में उन गुणों से रहित होकर भगवद्धाम को पाने का उपाय और फल बताया, फिर अर्जुन के पूछने पर भगवान् ने बाइसवें श्लोक से लेकर पच्चीसवें श्लोक तक गुणातीत पुरूष के लक्षणों तथा आचरण का वर्णन किया। सब्बीसवें श्लोक में सगुण परमेश्वर को अनन्य भक्तियोग तथा गुणातीत होकर ब्रह्मप्राप्ति का पात्र बनने का सरल उपाय बताया, अब भगवान् श्रीकृष्ण भक्तियोगरूप अनन्य प्रेम उत्पन्न करने के उद्देश्य से सगुण परमेश्वर के गुण, प्रभाव और स्वरूप का गुणातीत होने में मुख्य साधन वैराग्य और भगवद्शरण का वर्णन करने के लिये पन्द्रहवाँ अध्याय शुरू करते हैं, इसमें प्रथम संसार से वैराग्य पैदा करने हेतु भगवान् तीन श्लोक द्वारा वृक्ष के रूप में संसार का वर्णन करके वैराग्यरूप शस्त्र द्वारा उसे काट डालने को कहते हैं। श्रीभगवानुवाच ऊध्र्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ।।1।। भगवान् ने कहा- कहा जाता है कि एक शाश्वत अश्वत्थ वृक्ष है, जिसकी जड़े तो ऊपर की ओर है और शाखायें नीचे की ओर तथा पत्तियाँ वैदिक स्तोत्र है, जो इस वृक्ष को जानता है, वह वेदों का ज्ञाता है। सज्जनों, भक्तियोग की महत्ता की विवेचना के बाद यह पूछा जा सकता है कि वेदों का क्या प्रयोजन है? इस अध्याय में बताया जायेगा कि वैदिक अध्ययन का प्रयोजन भगवान् श्रीकृष्ण को समझना है, इसलिये जो भगवद्भक्ति में रत है, वह वेदों को पहले से ही जानता है, इस भौतिक जगत् के बन्धन की तुलना अश्वत्थ के वृक्ष से की गई है, जो व्यक्ति सकाम कर्मों में लगा है, उसके लिये इस वृक्ष का कोई अन्त नहीं है, वह एक शाखा से दूसरी में और दूसरी से तीसरी में घूमता रहता है। इस जगत् रूपी वृक्ष का कोई अन्त नहीं है और जो इस वृक्ष में आसक्त है, उसकी मुक्ति की कोई सम्भावना नहीं है, वैदिक स्तोत्र, जो आत्मोन्नति के लिये है, वे ही इस वृक्ष के पत्ते है, इस वृक्ष की जड़े ऊपर की ओर बढ़ती है, क्योंकि वे इस ब्रह्माण्ड के सर्वोच्चलोक से प्रारम्भ होती है, जहाँ पर ब्रह्माजी स्थित है, यदि कोई इस मोह रूपी अविनाशी वृक्ष को समझ लेता है, तो वह इससे बाहर निकल सकता है, बाहर निकलने की इस विधि को जानना आवश्यक है, पिछले अध्यायों में बताया जा चुका है कि भवबन्धन से निकलने की कई विधियाँ है हम तेरहवें अध्याय तक यह पढ़ चुके है कि भगवद्भक्ति ही सर्वोत्कृष्ट विधि है, भक्ति का मूल सिद्धान्त है भौतिक कार्यों से विरक्ति तथा भगवान् की दिव्य सेवा में अनुरक्ति, इस पन्द्रहवें अध्याय के प्रारम्भ में ही संसार से आसक्ति तोड़ने की विधि का वर्णन हुआ है, इस संसार की जड़े ऊपर को बढ़ती है, इसका अर्थ है कि ब्रह्माण्ड के सर्वोच्चलोक से पूर्ण भौतिक पदार्थ से यह प्रक्रिया शुरू होती है, वहीं से सारे ब्रह्माण्ड का विस्तार होता है, जिसमें अनेक लोक उसकी शाखाओं के रूप में होते हैं, इसके फल जीवों के कर्मो के फल के, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के द्योतक है। यद्यपि इस संसार में ऐसे वृक्ष का कोई अनुभव नहीं है जिसकी शाखायें नीचे की ओर हो तथा जड़े ऊपर की ओर हो, किन्तु बात कुछ ऐसी ही है, ऐसा वृक्ष जलाशय के निकट पाया जा सकता है, हम देख सकते हैं कि जलाशय के तट पर उगे वृक्ष का प्रतिबिम्ब जल में पड़ता है तो उसकी जड़े ऊपर तथा शाखायें नीचे की ओर दिखती है, यानी यह जगत् रूपी वृक्ष आध्यात्मिक जगत् रूपी वास्तविक वृक्ष का प्रतिबिम्ब मात्र है, इस आध्यात्मिक जगत् का प्रतिबिम्ब हमारी इच्छाओं में स्थित है। जिस प्रकार वृक्ष का प्रतिबिम्ब जल में रहता है, इच्छा ही इस प्रतिबिम्बित भौतिक प्रकाश में वस्तुओं के स्थित होने का कारण है, जो व्यक्ति इस भौतिक जगत् से बाहर निकलना चाहता है, उसे वैश्लेषिक अध्ययन के माध्यम से इस वृक्ष को भलीभाँति जान लेना चाहिये, फिर वह इस वृक्ष से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर सकता है, यह वृक्ष वास्तविक वृक्ष का प्रतिबिम्ब होने के कारण वास्तविक प्रतिरूप है, आध्यात्मिक जगत् में सब कुछ है। ब्रह्म को निर्विशेषवादी इस भौतिक वृक्ष का मूल मानते हैं और सांख्यदर्शन के अनुसार इसी मूल से पहले प्रकृति, पुरूष और तब तीन गुण निकलते है और पाँच स्थूल तत्त्व यानी पंच महाभूत फिर दस इन्द्रियाँ, मन आदि, इस प्रकार वे सारे संसार को चौबीस तत्त्वों में विभाजित करते हैं, यदि ब्रह्म समस्त अभिव्यक्तियों का केन्द्र है तो एक प्रकार से यह भौतिक जगत् एक अंश में है तो दूसरे अंश में आध्यात्मिक जगत् है, चूँकि यह भौतिक जगत् उल्टा प्रतिबिम्ब है, अतः आध्यात्मिक जगत् में भी इसी प्रकार की विविधता होनी चाहिये। प्रकृति परमेश्वर की बहिरंगा शक्ति है और पुरुष साक्षात् परमेश्वर है, इसकी व्याख्या हो चुकी है, चूँकि यह अभिव्यक्ति भौतिक है, अतः क्षणिक है, प्रतिबिम्ब भी क्षणिक होता है, क्योंकि कभी यह दिखता है और कभी नहीं दिखता, परन्तु वह स्त्रोत जहाँ से यह प्रतिबिम्ब प्रतिबिम्बित होता है, शाश्वत है, वास्तविक वृक्ष के भौतिक प्रतिबिम्ब का विच्छेदन करना होता है, जब कोई कहता है कि अमुक व्यक्ति वेद जानता है, तो इससे समझा जाता है कि वह जगत् की आसक्ति से विच्छेद करना जानता है। यदि वह इस विधि को जानता है तो समझिये कि वह वास्तव में वेदों को जानता है, जो व्यक्ति वेदों के कर्मकाण्ड द्वारा आकृष्ट होता है, वह इस वृक्ष की सुन्दर हरी पत्तियों से आकृष्ट होता है, वह वेदों के वास्तविक उद्देश्य को नहीं जानता, वेदों का उद्देश्य भगवान् ने स्वयं प्रकट किया है और वह है इस प्रतिबिम्बित वृक्ष को काट कर आध्यात्मिक जगत् के वास्तविक वृक्ष को प्राप्त करना। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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ramkumar verma May 21, 2019

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Naresh Shakya May 21, 2019

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ramkumar verma May 21, 2019

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ पंद्रहवां अध्याय : (पुरूषोत्तमयोग) महात्म्य 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ श्रीमहादेवजी देवी पार्वतीजी से कहते हैं- पार्वती! अब गीता के पन्द्रहवें अध्याय का माहात्म्य सुनो, गौड़ देश में कृपाण नामक एक राजा था, जिसकी तलवार की धार से युद्ध में देवता भी परास्त हो जाते थे, उसका बुद्धिमान सेनापति शस्त्र कलाओं में निपुण था, उसका नाम था सरभमेरुण्ड, उसकी भुजाओं में प्रचण्ड बल था, एक समय उस पापी ने राजकुमारों सहित महाराज का वध करके स्वयं ही राज्य करने का विचार किया। इस निश्चय के कुछ ही दिनों बाद वह हैजे का शिकार होकर मर गया. थोड़े समय में वह पापात्मा अपने पूर्व कर्म के कारण सिन्धु देश में एक तेजस्वी घोड़ा हुआ, उसका पेट सटा हुआ था, घोड़े के लक्षणों का ठीक-ठाक ज्ञान रखने वाले किसी वैश्य पुत्र ने बहुत सा मूल्य देकर उस अश्व को खरीद लिया और यत्न के साथ उसे राजधानी तक ले आया, वैश्यकुमार वह अश्व राजा को देने को लाया था, यद्यपि राजा उस वैश्यकुमार से परिचित था, तथापि द्वारपाल ने जाकर उसके आगमन की सूचना दी। राजा ने पूछा- किसलिए आये हो? तब उसने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया कि महाराज सिन्धु देश में एक उत्तम लक्षणों से सम्पन्न अश्व था, जिसे तीनों लोकों का एक रत्न समझकर मैंने बहुत सा मूल्य देकर खरीद लिया है, राजा ने आज्ञा दी उस अश्व को यहाँ ले आओ, वास्तव में वह घोड़ा गुणों में उच्चैःश्रवा के समान था, सुन्दर रूप का तो मानो घर ही था, शुभ लक्षणों का समुद्र जान पड़ता था, वैश्य घोड़ा ले आया और राजा ने उसे देखा, अश्व का लक्षण जानने वाले राजा के मंत्रीयों ने इसकी बड़ी प्रशंसा की। सुनकर राजा अपार आनन्द में निमग्न हो गया और उसने वैश्य को मुँह माँगा सुवर्ण देकर तुरन्त ही उस अश्व को खरीद लिया, कुछ दिनों के बाद एक समय राजा शिकार खेलने के लिए उत्सुक हो उसी घोड़े पर चढ़कर वन में गया, वहाँ मृगों के पीछे उन्होंने अपना घोड़ा बढ़ाया, पीछे-पीछे सब ओर से दौड़कर आते हुए समस्त सैनिकों का साथ छूट गया, वे हिरनों द्वारा आकृष्ट होकर बहुत दूर निकल गया, प्यास ने उसे व्याकुल कर दिया, तब वे घोड़े से उतर कर जल की खोज करने लगा। घोड़े को तो उन्होंने वृक्ष के तने के साथ बाँध दिया और स्वयं एक चट्टान पर चढ़ने लगा, कुछ दूर जाने पर उसने देखा कि एक पत्ते का टुकड़ा हवा से उड़कर शिलाखण्ड पर गिरा है, उसमें गीता के पंद्रहवें अध्याय का आधा श्लोक लिखा हुआ था, राजा उसे पढ़ने लगा, उस राजा के मुख से गीता के अक्षर सुनकर घोड़ा तुरन्त गिर पड़ा और अश्व शरीर को छोड़कर तुरंत ही दिव्य विमान पर बैठकर वह स्वर्गलोक को चला गया। तत्पश्चात् राजा ने पहाड़ पर चढ़कर एक उत्तम आश्रम देखा, जहाँ नागकेशर, केले, आम और नारियल के वृक्ष लहरा रहे थे, आश्रम के भीतर एक ब्राह्मण बैठे हुये थे, जो संसार की वासनाओं से मुक्त थे, राजा ने उन्हे प्रणाम करके बड़े भक्ति के साथ पूछा- ब्रह्मन्! मेरा अश्व अभी-अभी स्वर्ग को चला गया है, इसका क्या कारण है? राजा की बात सुनकर त्रिकालदर्शी, मंत्रवेत्ता और महापुरुषों में श्रेष्ठ विष्णु शर्मा नामक ब्राह्मण ने कहा- राजन! पूर्वकाल में तुम्हारे यहाँ जो सरभमेरुण्ड नामक सेनापति था, वह तुम्हें पुत्रों सहित मारकर स्वयं राज्य हड़प लेने को तैयार था, इसी बीच में हैजे का शिकार होकर वह मृत्यु को प्राप्त हो गया, उसके बाद वह उसी पाप से घोड़ा हुआ था, तुम्हें यहाँ गीता के पंद्रहवें अध्याय का आधा श्लोक लिखा मिल गया था, उसी को तुम्हारे मुख से सुनकर वह अश्व स्वर्ग को प्राप्त हुआ है। तदनन्तर राजा के सैनिक राजा को ढूँढते हुए वहाँ आ पहुँचे, उन सबके साथ ब्राह्मण को प्रणाम करके राजा प्रसन्नता पूर्वक वहाँ से चले और गीता के पंद्रहवें अध्याय के श्लोकाक्षरों से अंकित उसी पत्र को पढ़कर प्रसन्न होने लगे, उनके नेत्र हर्ष से खिल उठे थे, घर आकर उन्होंने मन्त्रवेत्ता मन्त्रियों के साथ अपने पुत्र सिंहबल को राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त किया और स्वयं पंद्रहवें अध्याय के जप से विशुद्धचित्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लिया। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! हर हर महादेव! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ चौदहवां अध्याय : (गुणत्रयविभागयोग) एकादश दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ।।26।। जो समस्त परिस्थतियों में अविचलित भाव से पूर्ण भक्ति में प्रवृत्त होता है, वह तुरन्त ही प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर तक पहुँच जाता है। सज्जनों, यह श्लोक अर्जुन के तृतीय प्रश्न के उत्तरस्वरूप है, प्रश्न था दिव्य स्थिति प्राप्त करने का साधन क्या है? जैसा कि पहले बताया जा चुका है, यह भौतिक जगत् प्रकृति के गुणों के चमत्कार के अन्तर्गत कार्य कर रहा है, मनुष्य को गुणों के कर्मो से विचलित नहीं होना चाहिये, मनुष्य को चाहिये कि अपनी चेतना ऐसे कार्यो में न लगाकर उसे श्रीकृष्ण के कार्यों में लगाये, श्रीकृष्ण के कार्य भक्तियोग के नाम से जाने जाते हैं, जिनमें सदैव श्रीकृष्ण के लिये कार्य करना होता है। इसमें न केवल श्रीकृष्ण ही आते हैं, अपितु यथा श्रीरामजी, श्रीनारायण जैसे श्रीकृष्ण के विभिन्न पूर्वांश भी आते है, उनके असंख्य अंश है, जो श्रीकृष्ण के किसी भी रूप या उनके पूर्वांश की सेवा में प्रवृत्त होते हैं, उन्हें दिव्य पद पर स्थित समझना चाहिये, यह ध्यान देना होगा कि श्रीकृष्ण के सारे रूप पूर्णतया दिव्य और सच्चिदानन्द स्वरूप है, ईश्वर के ऐसे रूप सर्वशक्तिमान तथा सर्वज्ञ होते हैं और उनमें समस्त दिव्यगुण पाये जाते हैं। इसलिये यदि कोई श्रीकृष्ण या उनके पूर्णांशों की सेवा में दृढ़संकल्प के साथ प्रवृत्त होता है, तो यद्यपि प्रकृति के गुणों को जीत पाना कठिन है, लेकिन वह उन्हें सरलता से जीत सकता है, इसकी विशद व्याख्या हम सातवें अध्याय में पहले ही कर चुके है, श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करने पर तुरन्त ही प्रकृति के गुणों के प्रभाव को लाँघा जा सकता है, भगवद्भक्ति या श्रीकृष्ण-भक्ति में होने का अर्थ है श्रीकृष्ण के साथ समानता प्राप्त करना। भगवान् कहते हैं कि उनकी प्रकृति सच्चिदानन्द स्वरूप है और सारे जीव परम के अंश हैं, जिस प्रकार सोने के कण सोने की खान के अंश हैं, इस प्रकार जीव अपनी आध्यात्मिक स्थिति में सोने के समान या श्रीकृष्ण के समान ही गुण वाला होता है, किन्तु व्यष्टित्व का अन्तर बना रहता है, अन्यथा भक्तियोग का प्रश्न ही नहीं उठता, भक्तियोग का अर्थ है कि भगवान् है, भक्त है तथा भगवान् और भक्त के बीच प्रेम का आदान-प्रदान चलता रहता है, इसलिये भगवान् में और भक्त में दो व्यक्तियों का व्यष्टित्व वर्तमान रहता है, अन्यथा भक्तियोग का कोई अर्थ नहीं है। यदि कोई भगवान् जैसे दिव्य स्तर पर स्थित नहीं है तो वह भगवान् की सेवा नहीं कर सकता, जैसे राजा का निजी सहायक बनने के लिये कुछ योग्यतायें आवश्यक है, इस तरह भगवत्सेवा के लिये योग्यता है कि ब्रह्म बना जाय या भौतिक कल्मष से मुक्त हुआ जाय, शास्त्रों में कहा गया है "ब्रह्मैव सन्ब्ह्याप्येति" इसका अर्थ है कि गुणात्मक रूप से मनुष्य को ब्रह्म से एकाकार हो जाना चाहिये, लेकिन ब्रह्मत्व प्राप्त करने पर मनुष्य व्यष्टि आत्मा के रूप में अपने शाश्वत ब्रह्म-स्वरूप को खोता नहीं। ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ।।27।। और मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आश्रय हूंँ, जो अमत्र्य, अविनाशी तथा शाश्वत है और चरम सुख का स्वाभाविक पद है। सज्जनों! ब्रह्म का स्वरूप है अमरता, अविनाशिता, शाश्वतता तथा सुख, ब्रह्म तो दिव्य साक्षात्कार का शुभारम्भ है, परमात्मा इस दिव्य साक्षात्कार की मध्य या द्वितीय अवस्था है और भगवान् परम सत्य के चरम साक्षात्कार है, इसलिये परमात्मा तथा निराकार ब्रह्म दोनों ही परम पुरूष के भीतर रहते हैं, सातवें अध्याय में बताया जा चुका है कि प्रकृति परमेश्वर की अपरा शक्ति की अभिव्यक्ति है, भगवान् इस अपरा प्रकृति में परा प्रकृति को गर्भस्थ करते हैं और भौतिक प्रकृति के लिये यह आध्यात्मिक स्पर्श है। जब इस प्रकृति द्वारा बद्धजीव आध्यात्मिक ज्ञान का अनुशीलन करना प्रारम्भ करता है, तो वह इस भौतिक जगत् के पद से ऊपर उठने लगता है और क्रमशः परमेश्वर के ब्रह्म-बोध तक उठ जाता है, ब्रह्म-बोध की प्राप्ति आत्म-साक्षात्कार की दिशा में प्रथम अवस्था है, इस अवस्था में ब्रह्मभूत व्यक्ति भौतिक पद को पार कर जाता है, लेकिन वह ब्रह्म-साक्षात्कार में पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता, यदि वह चाहे तो इस ब्रह्मपद पर बना रह सकता है और धीरे-धीरे परमात्मा के साक्षात्कार को और फिर भगवान् के साक्षात्कार को प्राप्त हो सकता है। जो व्यक्ति निराकार ब्रह्मपद से ऊपर नहीं उठ पाता, उसके नीचे गिरने का डर बना रहता है, श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि भले ही कोई निराकार ब्रह्म की अवस्था को प्राप्त कर ले, किन्तु इससे ऊपर उठे बिना तथा परम पुरूष के विषय में सूचना प्राप्त किये बिना उसकी बुद्धि विमल नहीं हो पाती, इसलिये ब्रह्मपद तक उठ जाने के बाद भी यदि भगवान् की भक्ति नहीं की जाती, तो नीचे गिरने का भय बना रहता है। तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है- "रसो वै सः रसं ह्योवायं लब्ध्वानन्दी भवति" रस के आगार भगवान् श्रीकृष्ण को जान लेने पर मनुष्य वास्तव में दिव्य आनन्दमय हो जाता है, परमेश्वर छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण है और जब भक्त निकट पहुँचता है तो इन छह ऐश्वर्यों का आदान-प्रदान होता है, राजा का सेवक लगभग राजा के ही समान पद का भोग करता है, इस प्रकार के शाश्वत सुख, अविनाशी सुख तथा शाश्वत जीवन भक्ति के साथ-साथ चलते है, इसलिये भक्ति में ब्रह्म-साक्षात्कार या शाश्वतता या अमरता सम्मिलित रहते हैं, भक्ति में प्रवृत्त व्यक्ति में ये पहले से ही प्राप्त रहते हैं। जीव यद्यपि स्वभाव से ब्रह्म होता है, लेकिन उसमें भौतिक जगत् पर प्रभुत्व जताने की इच्छा रहती है, जिसके कारण वह नीचे गिरता है, अपनी स्वाभाविक स्थिति में जीव तीनों गुणों से परे होता है, लेकिन प्रकृति के संसर्ग से वह अपने को तीनों गुणों यानी सतो, रजोतथा तमोगुण में बाँध लेता है, इन्हीं तीनों गुणों के संसर्ग के कारण उसमें भौतिक जगत् पर प्रभुत्व जताने की इच्छा होती है, पूर्ण भगवद्भक्ति में प्रवृत्त होने पर वह तुरन्त दिव्य पद को प्राप्त होता है और उसमें प्रकृति को वश में करने की जो अवैध इच्छा है, वह दूर हो जाती है इसलिये भक्तोंकी संगति कर के भक्ति की जो नौ विधियाँ है, जैसे श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि का अभ्यास करना चाहिये, धीरे-धीरे ऐसी संगति से तथा गुरु के प्रभाव से मनुष्य की प्रभुता जताने वाली इच्छा समाप्त हो जायगी और वह भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में दृढ़तापूर्वक स्थित हो सकेगा, इस विधि की संस्तुति इस अध्याय के बाइसवें श्लोक से लेकर इस अन्तिम श्लोक तक की गई है, भगवान् की भक्ति बहुत सरल है, मनुष्य को चाहिये कि भगवान् की सेवा में लगे, श्रीविग्रह को अर्पित भोजन का उच्छिष्ट खाये। भगवान् के चरणकमलों पर चढ़ाये गये पुष्पों की सुगंध सूँघे, भगवान् के लीलास्थलों का दर्शन करें, भगवान् के विभिन्न कार्यकलापों के बारे में चिन्तन करें, भगवान् के भक्तों के साथ प्रेम-विनिमय के बारे में पढ़े, सदा भगवान् के नाम का स्मरण करे, भगवान् के महामन्त्रों की दिव्य ध्वनि का कीर्तन करे और भगवान् तथा उनके भक्तों के आविर्भाव तथा तिरोधानों को मनाने वाले दिनों में उपवास करे, ऐसा करने से मनुष्य समस्त भौतिक गतिविधियों से विरक्त हो जायेगा, इस प्रकार जो व्यक्ति अपने को ब्रह्मज्योति या ब्रह्म-बोध के विभिन्न प्रकारों में स्थित कर सकता है, वह गुणात्मक रूप में भगवान् के तुल्य है। ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्राकृतिकगुणविभागयोगो नामचतुर्दशोऽध्यायः। इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद्भगवद्गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में गुणत्रयविभागयोग नाम का चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ।। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Mysuvichar May 20, 2019

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KSMishra May 20, 2019

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