मनुष्य देह के घटक कौन से हैं ? 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ इस लेख में हमने मनुष्य देह की रचना और उसके विविध सूक्ष्म देहों का विवरण दिया है। आधुनिक विज्ञान ने मनुष्य के स्थूल शरीर का कुछ गहराई तक अध्ययन किया है; किंतु मनुष्य के अस्तित्व के अन्य अंगों के संदर्भ में आधुनिक विज्ञान की समझ आज भी अत्यंत सीमित है। मनुष्य के मन एवं बुद्धि के संदर्भ में ज्ञान अब भी उनके स्थूल अंगों तक सीमित है। इसकी तुलना में अध्यात्मशास्त्र ने मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व का विस्तृतरूप से अध्ययन किया है। अध्यात्मशास्त्र के अनुसार मनुष्य किन घटकों से बना है ? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 👉 जीवित मनुष्य आगे दिए अनुसार विविध देहों से बना है। 👉 स्थूल शरीर अथवा स्थूलदेह 👉 चेतना (ऊर्जा) अथवा प्राणदेह 👉 मन अथवा मनोदेह 👉 बुद्धि अथवा कारणदेह 👉 सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह 👉 आत्मा अथवा हम सभी में विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व स्थूलदेह 〰️〰️〰️ आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से यह देह सर्वाधिक परिचित है। यह देह अस्थि-ढांचा, स्नायु, ऊतक, अवयव, रक्त, पंच ज्ञानेंद्रिय आदि से बनी है। चेतनामय अथवा प्राणदेह 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यह देह प्राणदेह के नाम से परिचित है । इस देह द्वारा स्थूल तथा मनोदेह के सभी कार्यों के लिए आवश्यक चेतनाशक्ति की (ऊर्जा की) आपूर्ति की जाती है । यह चेतनाशक्ति अथवा प्राण पांच प्रकार के होते हैं : प्राण :👉 श्‍वास के लिए आवश्यक ऊर्जा उदान :👉 उच्छवास तथा बोलने के लिए आवश्यक ऊर्जा समान :👉 जठर एवं आंतों के कार्य के लिए आवश्यक ऊर्जा व्यान :👉 शरीर की ऐच्छिक तथा अनैच्छिक गतिविधियों के लिए आवश्यक ऊर्जा अपान :👉 मल-मूत्र विसर्जन, वीर्यपतन, प्रसव आदि के लिए आवश्यक ऊर्जा मृत्यु के समय यह ऊर्जा पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन होती है और साथ ही सूक्ष्मदेह की यात्रा में गति प्रदान करने में सहायक होती है। मनोदेह अथवा मन 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मनोदेह अथवा मन हमारी संवेदनाएं, भावनाएं और इच्छाआें का स्थान है । इस पर हमारे वर्तमान तथा पूर्वजन्म के अनंत संस्कार होते हैं। इसके तीन भाग हैं : बाह्य (चेतन) मन👉 मन के इस भाग में हमारी वे संवेदनाएं तथा विचार होते हैं, जिनका हमें भान रहता है। अंतर्मन (अवचेतन मन)👉 इसमें वे संस्कार होते हैं, जिन्हें हमें इस जन्म में प्रारब्ध के रूप में भोगकर पूरा करना आवश्यक है । अंतर्मन के विचार किसी बाह्य संवेदना के कारण, तो कभी-कभी बिना किसी कारण भी बाह्यमन में समय-समय पर उभरते हैं । उदाहरण👉 कभी-कभी किसी के मन में अचानक ही बचपन की किसी संदिग्ध घटना के विषय में निरर्थक एवं असम्बंधित विचार उभर आते हैं । सुप्त (अचेतन) मन👉 मन के इस भाग के संदर्भ में हम पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं । इसमें हमारे संचित से संबंधित सर्व संस्कार होते हैं । अंतर्मन तथा सुप्त मन, दोनों मिलकर चित्त बनता है। कभी-कभी मनोदेह के एक भाग को हम वासनादेह भी कहते हैं। मन के इस भाग में हमारी सर्व वासनाएं संस्कारूप में होती हैं। मनोदेह से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है । बुद्धि 〰️〰️ कारणदेह अथवा बुद्धि का कार्य है निर्णय प्रक्रिया एवं तर्कक्षमता। बुद्धि से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है। सूक्ष्म अहं 〰️〰️〰️ सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह मनुष्य की अज्ञानता का अंतिम शेष भाग (अवशेष) है। मैं ईश्‍वर से अलग हूं, यह भावना ही अज्ञानता है। आत्मा 〰️〰️〰️ आत्मा हमारे भीतर का ईश्‍वरीय तत्त्व है और हमारा वास्तविक स्वरूप है । सूक्ष्मदेह का यह मुख्य घटक है, जो कि परमेश्‍वरीय तत्त्व का अंश है । इस अंश के गुण हैं – सत, चित्त और आनंद (शाश्‍वत सुख) । आत्मा पर जीवन के किसी सुख-दुःख का प्रभाव नहीं पडता और वह निरंतर आनंदावस्था में रहती है । वह जीवन के सुख-दुःखों की ओर साक्षीभाव से (तटस्थता से) देखती है। आत्मा तीन मूल सूक्ष्म-घटकों के परे है; तथापि हमारा शेष अस्तित्व स्थूलदेह एवं मनोदेह से बना होता है। सूक्ष्मदेह 〰️〰️〰️ हमारे अस्तित्व का जो भाग मृत्यु के समय हमारे स्थूल शरीर को छोड जाता है, उसे सूक्ष्मदेह कहते हैं । इसके घटक हैं – मनोदेह, कारणदेह अथवा बुद्धि, महाकारण देह अथवा सूक्ष्म अहं और आत्मा । मृत्यु के समय केवल स्थूलदेह पीछे रह जाती है । प्राणशक्ति पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है । सूक्ष्मदेह के कुछ अंग निम्नानुसार हैं । 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय👉 सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय अर्थात हमारे पंचज्ञानेंद्रियों का वह सूक्ष्म भाग जिसके द्वारा हमें सूक्ष्म विश्‍व का बोध होता है। उदाहरण👉 कोई उत्तेजक न होते हुए भी हम चमेली के फूल जैसी सूक्ष्म सुगंध अनुभव कर सकते हैं । यह भी संभव है कि एक ही कक्ष में किसी एक को इस सूक्ष्म सुगंध की अनुभूति हो और अन्य किसी को न हो । इसका विस्तृत विवरण दिया है । सूक्ष्म कर्मेंद्रिय👉 सूक्ष्म कर्मेंद्रिय अर्थात, हमारे हाथ, जिह्वा (जीभ) स्थूल कर्मेंद्रियों का सूक्ष्म भाग। सर्व क्रियाओ का प्रारंभ सूक्ष्म कर्मेंद्रियों में होता है और तदुपरांत ये क्रियाएं स्थूल स्तर पर व्यक्ति की स्थूल कर्मेंद्रियों द्वारा की जाती हैं। अज्ञान (अविद्या) 〰️〰️〰️〰️〰️ आत्मा के अतिरिक्त हमारे अस्तित्व के सभी अंग माया का ही भाग हैं । इसे अज्ञान अथवा अविद्या कहते हैं, जिसका शब्दशः अर्थ है (सत्य) ज्ञान का अभाव । अविद्या अथवा अज्ञान शब्द का उगम इस तथ्य से है कि हम अपने अस्तित्व को केवल स्थूल शरीर, मन एवं बुद्धि तक ही सीमित समझते हैं । हमारा तादात्म्य हमारे सत्य स्वरूप (आत्मा अथवा स्वयंमें विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व) के साथ नहीं होता । अज्ञान (अविद्या) ही दुःख का मूल कारण है । मनुष्य धनसंपत्ति, अपना घर, परिवार, नगर, देश आदि के प्रति आसक्त होता है । किसी व्यक्ति से अथवा वस्तु से आसक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही इस आसक्ति से दुःख निर्मिति की संभावना अधिक होती है । एक आदर्श समाज सेवक अथवा संतके भी क्रमशः समाज तथा भक्तों के प्रति आसक्त होने की संभावना रहती है । मनुष्य की सबसे अधिक आसक्ति स्वयं के प्रति अर्थात अपने ही शरीर एवं मन के प्रति होती है । अल्पसा कष्ट अथवा रोग मनुष्य को दुःखी कर सकता है । इसलिए मनुष्य को स्वयं से धीर-धीरे अनासक्त होकर अपने जीवन में आनेवाले दुःख तथा व्याधियों को स्वीकार करना चाहिए, इस आंतरिक बोध के साथ कि जीवन में सुख-दुःख प्रमुखतः हमारे प्रारब्ध के कारण ही हैं (हमारे ही पिछले कर्मों का फल हैं ।) आत्मा से तादात्म्य होने पर ही हम शाश्‍वत (चिरस्थायी) आनंद प्राप्त कर सकते हैं । आत्मा और अविद्या मिलकर जीवात्मा बनती है । जीवित मनुष्य में अविद्या के कुल बीस घटक होते हैं – स्थूल शरीर, पंचसूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय, पंचसूक्ष्म कर्मेंद्रिय, पंचप्राण, बाह्यमन, अंतर्मन, बुद्धि और अहं । सूक्ष्म देह के घटकों का कार्य निरंतर होता है, जीवात्मा का ध्यान आत्मा की अपेक्षा इन घटकों की ओर आकर्षित होता है; अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान की अपेक्षा अविद्या की ओर जाता है । 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

मनुष्य देह के घटक कौन से हैं ?
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इस लेख में हमने मनुष्य देह की रचना और उसके विविध सूक्ष्म देहों का विवरण दिया है। आधुनिक विज्ञान ने मनुष्य के स्थूल शरीर का कुछ गहराई तक अध्ययन किया है; किंतु मनुष्य के अस्तित्व के अन्य अंगों के संदर्भ में आधुनिक विज्ञान की समझ आज भी अत्यंत सीमित है। मनुष्य के मन एवं बुद्धि के संदर्भ में ज्ञान अब भी उनके स्थूल अंगों तक सीमित है। इसकी तुलना में अध्यात्मशास्त्र ने मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व का विस्तृतरूप से अध्ययन किया है।

अध्यात्मशास्त्र के अनुसार मनुष्य किन घटकों से बना है ?
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👉 जीवित मनुष्य आगे दिए अनुसार विविध देहों से बना है।

👉 स्थूल शरीर अथवा स्थूलदेह

👉 चेतना (ऊर्जा) अथवा प्राणदेह

👉 मन अथवा मनोदेह

👉 बुद्धि अथवा कारणदेह

👉 सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह

👉 आत्मा अथवा हम सभी में विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व

 स्थूलदेह
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आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से यह देह सर्वाधिक परिचित है। यह देह अस्थि-ढांचा, स्नायु, ऊतक, अवयव, रक्त, पंच ज्ञानेंद्रिय आदि से बनी है।

चेतनामय अथवा प्राणदेह
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यह देह प्राणदेह के नाम से परिचित है । इस देह द्वारा स्थूल तथा मनोदेह के सभी कार्यों के लिए आवश्यक चेतनाशक्ति की (ऊर्जा की) आपूर्ति की जाती है । यह चेतनाशक्ति अथवा प्राण पांच प्रकार के होते हैं :

प्राण :👉 श्‍वास के लिए आवश्यक ऊर्जा

उदान :👉 उच्छवास तथा बोलने के लिए आवश्यक ऊर्जा

समान :👉 जठर एवं आंतों के कार्य के लिए आवश्यक ऊर्जा

व्यान :👉 शरीर की ऐच्छिक तथा अनैच्छिक गतिविधियों के लिए आवश्यक ऊर्जा

अपान :👉 मल-मूत्र विसर्जन, वीर्यपतन, प्रसव आदि के लिए आवश्यक ऊर्जा

मृत्यु के समय यह ऊर्जा पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन होती है और साथ ही सूक्ष्मदेह की यात्रा में गति प्रदान करने में सहायक होती है। 

मनोदेह अथवा मन
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मनोदेह अथवा मन हमारी संवेदनाएं, भावनाएं और इच्छाआें का स्थान है । इस पर हमारे वर्तमान तथा पूर्वजन्म के अनंत संस्कार होते हैं। इसके तीन भाग हैं :

बाह्य (चेतन) मन👉  मन के इस भाग में हमारी वे संवेदनाएं तथा विचार होते हैं, जिनका हमें भान रहता है।

अंतर्मन (अवचेतन मन)👉  इसमें वे संस्कार होते हैं, जिन्हें हमें इस जन्म में प्रारब्ध के रूप में भोगकर पूरा करना आवश्यक है । अंतर्मन के विचार किसी बाह्य संवेदना के कारण, तो कभी-कभी बिना किसी कारण भी बाह्यमन में समय-समय पर उभरते हैं । 

उदाहरण👉 कभी-कभी किसी के मन में अचानक ही बचपन की किसी संदिग्ध घटना के विषय में निरर्थक एवं असम्बंधित विचार उभर आते हैं ।

सुप्त (अचेतन) मन👉 मन के इस भाग के संदर्भ में हम पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं । इसमें हमारे संचित से संबंधित सर्व संस्कार होते हैं । अंतर्मन तथा सुप्त मन, दोनों मिलकर चित्त बनता है। कभी-कभी मनोदेह के एक भाग को हम वासनादेह भी कहते हैं। मन के इस भाग में हमारी सर्व वासनाएं संस्कारूप में होती हैं। मनोदेह से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है ।

बुद्धि
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कारणदेह अथवा बुद्धि का कार्य है निर्णय प्रक्रिया एवं तर्कक्षमता। बुद्धि से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है।

सूक्ष्म अहं
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सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह मनुष्य की अज्ञानता का अंतिम शेष भाग (अवशेष) है। मैं ईश्‍वर से अलग हूं, यह भावना ही अज्ञानता है।

आत्मा
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आत्मा हमारे भीतर का ईश्‍वरीय तत्त्व है और हमारा वास्तविक स्वरूप है । सूक्ष्मदेह का यह मुख्य घटक है, जो कि परमेश्‍वरीय तत्त्व का अंश है । इस अंश के गुण हैं – सत, चित्त और आनंद (शाश्‍वत सुख) । आत्मा पर जीवन के किसी सुख-दुःख का प्रभाव नहीं पडता और वह निरंतर आनंदावस्था में रहती है । वह जीवन के सुख-दुःखों की ओर साक्षीभाव से (तटस्थता से) देखती है। आत्मा तीन मूल सूक्ष्म-घटकों के परे है; तथापि हमारा शेष अस्तित्व स्थूलदेह एवं मनोदेह से बना होता है।

सूक्ष्मदेह
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हमारे अस्तित्व का जो भाग मृत्यु के समय हमारे स्थूल शरीर को छोड जाता है, उसे सूक्ष्मदेह कहते हैं । इसके घटक हैं – मनोदेह, कारणदेह अथवा बुद्धि, महाकारण देह अथवा सूक्ष्म अहं और आत्मा । मृत्यु के समय केवल स्थूलदेह पीछे रह जाती है । प्राणशक्ति पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है ।

सूक्ष्मदेह के कुछ अंग निम्नानुसार हैं ।
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सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय👉 सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय अर्थात हमारे पंचज्ञानेंद्रियों का वह सूक्ष्म भाग जिसके द्वारा हमें सूक्ष्म विश्‍व का बोध होता है।

उदाहरण👉  कोई उत्तेजक न होते हुए भी हम चमेली के फूल जैसी सूक्ष्म सुगंध अनुभव कर सकते हैं । यह भी संभव है कि एक ही कक्ष में किसी एक को इस सूक्ष्म सुगंध की अनुभूति हो और अन्य किसी को न हो । इसका विस्तृत विवरण दिया है । 

सूक्ष्म कर्मेंद्रिय👉 सूक्ष्म कर्मेंद्रिय अर्थात, हमारे हाथ, जिह्वा (जीभ) स्थूल कर्मेंद्रियों का सूक्ष्म भाग। सर्व क्रियाओ का प्रारंभ सूक्ष्म कर्मेंद्रियों में होता है और तदुपरांत ये क्रियाएं स्थूल स्तर पर व्यक्ति की स्थूल कर्मेंद्रियों द्वारा की जाती हैं।

अज्ञान (अविद्या)
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आत्मा के अतिरिक्त हमारे अस्तित्व के सभी अंग माया का ही भाग हैं । इसे अज्ञान अथवा अविद्या कहते हैं, जिसका शब्दशः अर्थ है (सत्य) ज्ञान का अभाव । अविद्या अथवा अज्ञान शब्द का उगम इस तथ्य से है कि हम अपने अस्तित्व को केवल स्थूल शरीर, मन एवं बुद्धि तक ही सीमित समझते हैं । हमारा तादात्म्य हमारे सत्य स्वरूप (आत्मा अथवा स्वयंमें विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व) के साथ नहीं होता ।

अज्ञान (अविद्या) ही दुःख का मूल कारण है । मनुष्य धनसंपत्ति, अपना घर, परिवार, नगर, देश आदि के प्रति आसक्त होता है । किसी व्यक्ति से अथवा वस्तु से आसक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही इस आसक्ति से दुःख निर्मिति की संभावना अधिक होती है । एक आदर्श समाज सेवक अथवा संतके भी क्रमशः समाज तथा भक्तों के प्रति आसक्त होने की संभावना रहती है । मनुष्य की सबसे अधिक आसक्ति स्वयं के प्रति अर्थात अपने ही शरीर एवं मन के प्रति होती है । अल्पसा कष्ट अथवा रोग मनुष्य को दुःखी कर सकता है । इसलिए मनुष्य को स्वयं से धीर-धीरे अनासक्त होकर अपने जीवन में आनेवाले दुःख तथा व्याधियों को स्वीकार करना चाहिए, इस आंतरिक बोध के साथ कि जीवन में सुख-दुःख प्रमुखतः हमारे प्रारब्ध के कारण ही हैं (हमारे ही पिछले कर्मों का फल हैं ।) आत्मा से तादात्म्य होने पर ही हम शाश्‍वत (चिरस्थायी) आनंद प्राप्त कर सकते हैं ।

आत्मा और अविद्या मिलकर जीवात्मा बनती है । जीवित मनुष्य में अविद्या के कुल बीस घटक होते हैं – स्थूल शरीर, पंचसूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय, पंचसूक्ष्म कर्मेंद्रिय, पंचप्राण, बाह्यमन, अंतर्मन, बुद्धि और अहं । सूक्ष्म देह के घटकों का कार्य निरंतर होता है, जीवात्मा का ध्यान आत्मा की अपेक्षा इन घटकों की ओर आकर्षित होता है; अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान की अपेक्षा अविद्या की ओर जाता है ।
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*गाली देकर कर्म काट रही है* 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था। उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया। राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है। जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा।' प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है?" वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था" राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा। उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा?" ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।" ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ.... राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः "मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।" ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ। किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषी जी महाराज कहाँ गये हैं?" तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।" इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषी जी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ?" "आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है?" "यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है। यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतेरपि॥ 'अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।' इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े।" "महाराज ! आपने क्या कर्म किया था?" "सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी। मेरा स्वभाव बड़ा दुष्ट था, इसलिए मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर इसे ज्यादा दुःखी करता था। जब दर्द के कारण यह कूदती थी तो इसकी फजीहत देखकर मैं खुश होता था। मेरे डर के कारण यह सहसा बाहर नहीं निकलती थी किंतु मैं इसको ढूँढता फिरता था। यह जहाँ मिले वहीं इसे दुःखी करता था। आखिर मेरे द्वारा बहुत सताये जाने पर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ गंगा जी के किनारे सघन वन में हरा-हरा घास खाकर और मेरी चोटों से बचकर सुखपूर्वक रहने लगी। लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह सकता था। इसको ढूँढते-ढूँढते मैं उसी वन में जा पहुँचा और वहाँ इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी। मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। 'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी स्त्री हुई। जो मेरे मरणपर्यन्त अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा, इसका दोष नहीं मानूँगा क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ। अब अपना प्रश्न पूछो।" ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया?" ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है।" "किस प्रकार?" "पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गया है?" आपने प्रण कर रखा था कि 'झूठ नहीं बोलूँगा।' अतः जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। गंगा के किनारे वह उसकी चमड़ी निकाल रहा था, इतने में ही उस जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खाकर गंगाजी के किनारे ही उनकी हड्डियाँ उसमें बह गयीं। गंगाजी के प्रताप से कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो।" कितना सहज है ज्ञानसंयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्मसिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे। भगवान श्रीकृष्ण इस समत्व के अभ्यास को ही 'समत्व योग' संबोधित करते हैं, जिसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त होने पर मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Garima Gahlot Rajput Feb 25, 2021

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सुबह जागने से पहले दोनो हात देखने चाहिए  अक्सर लोगों से कहते हुए सुना होगा कि दिन की शुरुआत बेहतर हो जाए तो पूरा दिन बन जाता है, लेकिन दिन की अच्छी शुरुआत के लिए कुछ अच्छे काम भी करने होते हैं। बहुत से लोग अपने दिन को बेहतर बनाने के लिए अपने कमरे में तरह-तरह के पोस्टर…या अपनी मेज पर किसी खास धार्मिक देवता की तस्वीर लगाते हैं जिन्हें वो सबसे पहले देखना चाहते हैं, ताकि उनका दिन बन जाए। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो दिन में उठते ही सबसे पहले धरती मां के पैर छूते हैं और फिर बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से लोगों पर ईश्वर की कृपा बनी रहती है। आज सन्मार्ग आपको बतायेगा कि आपको सबह उठते ही सबसे पहले क्या देखना चाहिए। सुबह उठकर सबसे पहले क्या देखें- बिस्तर से उठने के बाद सबसे पहले अपने हाथों को देखना चाहिए। ऐसा करना बहुत ही अच्छा माना जता है और यह काम कुछ लोगों की नियमित दिनचर्या का हिस्सा भी होता है। हमें सबसे पहले अपना हाथ देखकर प्रात: स्मरण मंत्र बोलना चाहिए। कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्द:, प्रभाते करदर्शनम्।। क्या है श्लोक का अर्थ- इस श्लोक का अर्थ है कि हमारे हाथ के अग्र भाग में लक्ष्मी और हाल के मूल में सरस्वती का वास है। यानी भगवान ने हमारे हाथों में इतनी ताकत दे रखी है कि हम लक्ष्मी अर्जित कर सकते हैं। इतना ही नहीं सरस्वती और लक्ष्मी जिसे हम अर्जित करते हैं उनमें समन्वय बनाने के लिए प्रभु स्वयं हाथ के मध्य में बैठे हैं। इसलिए हमें दिन की बेहतर शुरुआत के लिए सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों को जोड़कर देखना चाहिए। जय श्री राम जय श्री कृष्ण जय श्री हरी ॐ 🙏 शुभ 🌅 शुभ शुक्रवार जय श्री लक्ष्मी नारायण 🙏 जय श्री गुरुदेव जय श्री गजानन 💐 जय श्री भोलेनाथ ॐ ऐं र्‍हिं ल्किं चामुण्डायै विच्चे जय माता की जय हो 🌹👏🚩🐚🎪🌷👪👬🚩

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Garima Gahlot Rajput Feb 25, 2021

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Garima Gahlot Rajput Feb 25, 2021

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मर्यादा किसे कहते हैं? 〰️〰️🔸〰️🔸〰️〰️ जीवन निर्वाह के नियमों को संतुलन में रखने वाली निर्धारित सीमा रेखा को मर्यादा कहा जाता है, जीवन निर्वाह के सभी विषयों एवं सम्बन्धों के नियम निर्धारित होते हैं, ताकि इन्सान का जीवन सुचारू रूप से गतिमान रहे, तथा उन नियमों के द्वारा जीवन का संतुलन बनाए रखने के लिये सीमा तय होती है, ताकि जीवन में किसी प्रकार का असंतुलन ना हो ऐसे नियमों की निर्धारित रेखा को ही मर्यादा कहा गया है। मर्यादा पालन करना इन्सान के लिए अनिवार्य है, क्योंकि मर्यादा भंग होने अर्थात सीमा रेखा को लांघकर नियमों की अनदेखी करने से इन्सान के जीवन में अनेकों प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं, जिसके कारण जीवन निर्वाह अत्यंत कठिन हो जाता है, जो इन्सान मर्यादा को भलीभांति समझते हैं, तथा पालन करते हैं, उनके जीवन से समस्यायें हमेशा दूर रहती हैं, तथा उनका जीवन आनन्द पूर्वक निर्वाह होता है। सज्जनों! इन्सान को सर्वप्रथम अपनी मर्यादाएं समझना आवश्यक है, क्योंकि एक पूर्ण मर्यादित इन्सान ही परिवार एवं समाज में सम्मानित जीवन निर्वाह कर सकता है, इन्सान की मर्यादा स्वभाव, व्यवहार एवं आचरण पर निर्भर करती है, इन्सान का स्वभाव भाषा, शब्दों एवं वाणी द्वारा समझा जाता है, सरल भाषा, कर्ण प्रिय शब्द तथा मधुर वाणी इन्सान के स्वभाव की मर्यादा है, जिसे लांघने से इन्सान कटु स्वभाविक समझा जाता है। दूसरों का सम्मान करने वाला समाज में व्यवहारिक माना जाता है, अधिक बहस करना, आलोचनायें या चापलूसी करना, प्रताड़ित करना, बकवास करना अथवा बात-बात पर टोकना व्यवहार की मर्यादा भंग करना है, जो समाज में इन्सान को अव्यवहारिक प्रमाणित करती है, आचरण की मर्यादा इन्सान के अपराधी होने से ही भंग नहीं होती, अपितु झूट बोलने, बुराई का साथ देने, उधार लेकर ना चुकाने, बहाने बनाने, आवश्यकता पड़ने पर गायब होने, नशा करने, जुआ, सट्टा जैसे अनुचित कार्य करने जैसे अनेकों कारण भी खराब आचरण प्रस्तुत करते हैं। इन्सान के जीवन में परिवार की मर्यादा बनायें रखना भी अत्यंत आवश्यक होता है, परिवार से जितना अधिकार प्राप्ति का होता है उतना ही कर्तव्य परिवार को प्रदान करने का भी होता है, परिवार द्वारा शिक्षा, परवरिश, गृहस्थ जीवन एवं सुरक्षा प्राप्त होती है तो परिवार की सेवा तथा सुखों का ध्यान रखना भी इन्सान का कर्तव्य है, कोई भी ऐसा कार्य जिससे परिवार के सम्मान में हानि पहुँचे परिवार की मर्यादा भंग करना होता है, जिसके कारण परिवार उसे दोषी समझता है। इन्सान की परिवार के प्रति कर्तव्य परायणता एवं सम्मान में वृद्धि आवश्यक मर्यादा है, जिसे पूर्ण करने पर ही परिवार में सम्मान प्राप्त होता है, रिश्तों एवं सम्बन्धों की मर्यादा निभाने पर ही रिश्ते कायम रहते हैं, रिश्तों को समय ना देना अथवा रिश्तों पर आवश्यकता से अधिक समय बर्बाद करना रिश्तों को खोखला करना है, इसलिये रिश्तों की मर्यादा बनाए रखना आवश्यक होता है, रिश्ता कितना भी प्रिय हो निजी कार्यों में दखल देना रिश्ते की मर्यादा भंग करना है। क्योंकि इन्सान के निजी एवं गुप्त कार्यों में बिना अनुमति किर्याशील होना दखल समझा जाता है, तथा समाज ने किसी को भी किसी के जीवन में अनुचित दखल देने की अनुमति नहीं दी है, रिश्ते बुरे समय में सर्वाधिक सहायक होते हैं, परन्तु नित्य रिश्तों से सहायता की आशा रखना भी रिश्तों की मर्यादा भंग करना है, क्योंकि रिश्ते सहायक अवश्य हैं उन्हें व्यापार बनाने से उनका अंत निश्चित होता है। सज्जनों! इन्सान के परिवारिक सम्बन्धों के अतिरिक्त समाज में सबसे प्रिय सम्बन्ध मित्रता का होता है, जो कभी-कभी परिवारिक रिश्तों से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, मित्रता वैचारिक सम्बन्ध है, अर्थात जिससे विचार मिलते हैं इन्सान उसे मित्र बना लेता है, मित्र कितना भी प्रिय हो यदि वह मर्यादा लांघने की धृष्टता करता है तो सम्बन्ध विच्छेद हो जाते हैं, मित्रता में आयु, शिक्षा एवं धन की समानता आवश्यक नहीं होती सिर्फ विचार समान होने पर ही मित्रता कायम रह सकती है। मित्र का अधिक समय नष्ट करना, बार-बार व असमय घर जाना, निजी जीवन में दखल देना, नित्य सहायता की अपेक्षा करना, अनावश्यक खर्च करवाना, अनुचित शब्दों का उपयोग करना, अधिक परिहास करना जैसे कार्य मित्रता की मर्यादा भंग करते हैं जिसके कारण मित्रता में कटुता उत्पन्न हो जाती है, सम्बन्ध कितना भी प्रिय हो मर्यादाओं का पालन ही उसे सुरक्षित रख सकता है। इंसानों की तरह विषयों की भी अपनी मर्यादायें होती हैं, जिनका पालन करने से जीवन निर्वाह सरल एवं आनन्दमय हो जाता है, इन्सान के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव विश्वास का होता है, क्योंकि विश्वास के बगैर किसी भी इन्सान से सम्बन्ध या कार्य असंभव हो जाता है, विश्वास के कारण ही धोखे का आरम्भ है, तथा अन्धविश्वास हो तो धोखा निश्चित होता है, इसलिये विश्वास की मर्यादा सावधानी पूर्वक विश्वास करना है सावधानी की मर्यादा लांघते ही विश्वास का विश्वासघात बन जाता है। इन्सान का शक करना जब तक मर्यादा में होता है वह इन्सान को सतर्क रखता है परन्तु मर्यादा लांघते ही शक सनक बन जाता है जो प्रेम, विश्वास, श्रद्धा का अंत कर देता है, मोह, लोभ, काम, क्रोध, अहंकार, ईर्षा, घृणा, कुंठा, निराशा, आक्रोश, प्रेम, श्रद्धा, शक, विश्वास, ईमानदारी, परोपकार, दान, भीख, चंदा, स्वार्थ, चापलूसी, आलोचना, बहस, तर्क, कोई भी विषय हो जब तक मर्यादा में रहता है कभी हानिप्रद नहीं होता, परन्तु मर्यादा भंग होते ही समस्या अथवा मुसीबत बन जाता है। अग्नि, जल एवं वायु संसार को जीवन प्रदान करते हैं, परन्तु अपनी मर्यादा लांघते ही प्रलयंकारी बन जाते हैं, जिसका परिणाम सिर्फ तबाही होता है, इन्सान जब तक मर्यादाओं का पालन करता है वह सुखी एवं संतुलित जीवन निर्वाह करता है, भाई-बहनों! किसी भी प्रकार की मर्यादा भंग करने से किसी ना किसी इन्सान से द्वेष आरम्भ हो जाता है तथा समस्यायें उत्पन्न होना आरम्भ हो जाती हैं। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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श्री विष्णु चालीसा* दोहा* विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय। कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय। चौपाई* नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥ प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥ सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥ तन पर पीतांबर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत॥ शंख चक्र कर गदा बिराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥ सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥ संतभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥ सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन॥ पाप काट भव सिंधु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥ करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण॥ धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा॥ भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा॥ आप वराह रूप बनाया। हरण्याक्ष को मार गिराया॥ धर मत्स्य तन सिंधु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया॥ अमिलख असुरन द्वंद मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥ देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छवि से बहलाया॥ कूर्म रूप धर सिंधु मझाया। मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥ शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया॥ वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया॥ मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया॥ असुर जलंधर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लडाई॥ हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई॥ सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी॥ तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥ देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥ हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी॥ तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे॥ गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥ हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥ देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥ चहत आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥ जानूं नहीं योग्य जप पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥ शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥ करहुं आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण॥ करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण। कौन भांति मैं करहु समर्पण॥ सुर मुनि करत सदा सेवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई॥ दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥ पाप दोष संताप नशाओ। भव-बंधन से मुक्त कराओ॥ सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥ निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥ ॐ गं गणपतये नमः ॐ नमः शिवाय श्री हरी ॐ जय श्री हरी विष्णू जी जय श्री राम जय श्री कृष्ण जय श्री हरी ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏 शुभ 🌅 शुभ बुधवार राम राम 👏 🚩 🐚 🌹 नमस्कार जय श्री जिनेंद्र 🌹🙏 🚩

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RAJ RATHOD Feb 26, 2021

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