Hi!!!! Good morning my friends!!!! Have a bright and beautiful sunday morning.... 💟

#बासी_____रोटी

#एक__नई__सीख >>>>>>>>✓

एक धनी परिवार की कन्या 'तारा' का विवाह एक सुयोग्य
परिवार मे होता है। लड़का पढ़ा लिखा और अति सुन्दर
लेकिन बेरोजगार था।

परिवार की आर्थिक स्थति बहुत ही अच्छी थी जिसके
कारण उसके माता -पिता उसे किसी भी कार्य करने के
लिये नहीं कहते थे।

और कहते थे कि बेटा 'जिगर' तू हमारी इकलौती संतान
है , तेरे लिये तो हमने खूब सारा धन दौलत जोड़ दिया है
और हम कमा रहे हैं , तू तो बस मज़े ले।

इस बात को सुनकर लड़की 'तारा' बेहद चिंतित रहती
मगर किसी से अपनी मन की व्यथा कह नहीं पाती।

एक दिन एक महात्मा जो छ: माह मे फेरी लगाते थे उस
घर पर पहुँच गये और बोले : माई एक रोटी की आस है..

लड़की 'तारा' रोटी ले कर महात्मा फ़क़ीर को देने चल
पड़ी , सास भी दरवाजे पर ही खड़ी थी।

महात्मा ने लड़की से कहा : बेटी रोटी ताजा है या बासी..?

लड़की 'तारा' ने जबाब दिया कि महाराज रोटी बासी है।

सास वही खड़ी सुन रही थी... उसने कहा हरामखोर तुझे
ताजी रोटी भी बासी दिखाई पड़ रही है।

महात्मा चुप चाप घर से मुख मोड़ कर चल पड़ा और
लड़की 'तारा' से बोल़ा कि बेटी मैं उस दिन वापस आऊंगा
जब रोटी ताजी होगी।

समय व्यतीत होता गया और तारा के पति 'जिगर' को
कुछ समय बाद रोजगार मिल गया। अब तारा बहुत खुश
रहने लगी।

कुछ दिन बाद महात्मा जी वापस फेरी लगाने आये और
तारा के ससुराल जाकर रोटी मांगने लगे।

महात्मा के लिये तारा रोटी लाती है।

महात्मा जी का फिर वही सवाल था , बेटी रोटी ताजा है
या बासी..?

तारा ने जवाब दिया : महात्मा जी रोटी एक दम ताजी है।

महात्मा ने रोटी ले ली और लड़की को खुशी से बहुत
आशीर्वाद दिया।

सास दरवाजे पर खड़ी सुन रही थी और बोली : हरामखोर
उस दिन तो रोटी बासी थी और आज ताजी.. वाह ! बहुत
बढ़िया..

संत रुके और बोले अरी पगली तू क्या जाने तू तो अज्ञानी
है , तेरी बहू वास्तब मे बहुत होशियार है।

जब मैं पहले आया था तो इसने रोटी को बासी बताया था
क्योकि यह तुम्हारे जोड़े और कमाये धन से गुजारा कर
रहे थे जो इनके लिये बासी था।

मगर अब तेरा बेटा रोजगार पर लग गया है और अपनी
कमाई का ताजा धन लाता है , इसलिये तेरी बहू ने पहले
बासी और अब ताजी रोटी बताई।

माँ बाप के द्वारा जोड़ा गया धन किसी ओखे- झोके के
लिये होता है जो बासी होता है , काम तो अपने द्वारा
कमाये ताजा धन से ही चलता है।

सास महात्मा के पैरों मे गिर पड़ी और उसको ताजी बासी
का ज्ञान व अपनी बहू पर गर्व हुआ।

दोस्तों हमें हमेशा जुड़े धन पर आश्रित नहीं रहना चाहिये ,
वल्कि सदैव ताजे धन की ओर ललायित रहना चाहिये।

अगर हम जुडे धन पर ही आश्रित रहेंगे तो वो भी एक
दिन खत्म हो जायेगा। इसलिये हमे ताजा धन की आस
करके सदैव प्रगति पथ पर निरंतर प्रवाह करना चाहिये।

~~~~~~~~~~~~~~~~~
((((((( जय जय श्री राधे )))))))
~~~~~~~~~~~~~~~~~
🙏🌹🙏🌹

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कामेंट्स

*प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि का आश्रम था। एक दिन गुरुजी ने अपने शिष्यों से कहा की- शिष्यों! अब मुझे कोढ़ निकलेगा और मैं अंधा भी हो जाऊँगा, इसिलिए काशी में जाकर रहूँगा। है कोई शिष्य जो मेरे साथ रह कर सेवा करने के लिए तैयार हो ? सब चुप हो गये। उनमें संदीपनी ने कहा- गुरुदेव! मैं आपकी सेवा में रहूँगा। गुरुदेव ने कहा इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा। संदीपनी बोले इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है आपको। वेदधर्म मुनि एवं संदीपन काशी में रहने लगे । कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया । शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया । संदीपनी के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ । वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा । गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता । गुरुजी डाँटते, तमाचा मार देते... किंतु संदीपनी की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव और प्रगाढ़ होता गया।* *गुरु निष्ठा देख काशी के अधिष्ठाता देव विश्वनाथ संदीपनी के समक्ष प्रकट होकर बोले- तेरी गुरुभक्ति देख कर हम प्रसन्न हैं । कुछ भी वर माँग लो । संदीपनी गुरु से आज्ञा लेने गया और बोला भगवान शिवजी वरदान देना चाहते हैं, आप आज्ञा दें तो आपका रोग एवं अंधेपन ठीक होने का वरदान मांग लूँ ? गुरुजी ने डाँटा,बोले- मैं अच्छा हो जाऊँ और मेरी सेवा से तेरी जान छूटे यही चाहता है तु ? अरे मूर्ख ! मेरा कर्म कभी-न-कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा । संदीपनी ने भगवान शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित हो गये और गोलोकधाम पहुंच के श्रीकृष्ण से पूरा वृत्तान्त कहा। श्रीकृष्ण भी संदीपनी के पास वर देने आये। संदीपनी ने कहा- प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप मुझे यही वर दें कि गुरुसेवा में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे।* *एक दिन गुरुजी ने संदीपनी को कहा कि- मेरा अंत समय आ गया है। सभी शिष्यों से मिलने की इच्छा है । संदीपनी ने सब शिष्यों को सन्देश भेज दिया। सारे शिष्य उनके दर्शन के लिए आये। गुरुजी ने सभी शिष्यों कुछ न कुछ दिया । किसी को पंचपात्र, किसी को आचमनी , किसी को आसन किसी को माला दे दी । जब संदीपनी का आये तो सभी वस्तुएं समाप्त हो चुकी थी । गुरुजी चुप हो गए,फिर बोले कि मैं तुम्हे क्या दूँ ? तुम्हारी गुरूभक्ति के समान मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है । मैं तुम्हें यह वर देता हूँ कि- त्रिलोकी नाथ का अवतार होने वाला है, वह तुम्हारे शिष्य बनेंगे । संदीपनी के लिए इससे बड़ी भेंट और क्या होती । उन्होंने गुरूजी की अंत समय तक सेवा की। जब श्रीकृष्ण अवतार हुआ तो गुरुजी के दिए उस वरदान को फलीभूत करने के लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दूर उज्जैन में स्थित संदीपनी ऋषि के आश्रम में भ्राता बलराम जी के साथ आए और संदीपनी ऋषि के शिष्य बने... ऐसी है गुरुभक्ति की शक्ति। इसिलिए गुरुभक्ति ही सार है... राधे राधे...संगृहीत कथा*🙏🚩

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rekha sunny May 10, 2020

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rekha sunny May 10, 2020

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Sanjay Singh May 10, 2020

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Sanjay Singh May 10, 2020

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BIJAY PANDAY May 10, 2020

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rekha sunny May 10, 2020

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Sharma May 10, 2020

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Meena Dubey May 10, 2020

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