Babita Sharma
Babita Sharma Nov 10, 2017

प्राचीन हिंदु परंपराएं और उनसे जुडे फायदे:

प्राचीन हिंदु परंपराएं और उनसे जुडे फायदे:
प्राचीन हिंदु परंपराएं और उनसे जुडे फायदे:
प्राचीन हिंदु परंपराएं और उनसे जुडे फायदे:
प्राचीन हिंदु परंपराएं और उनसे जुडे फायदे:

14 प्राचीन हिन्दू परम्पराएं और उनसे जुड़े फायदे

14 प्राचीन हिन्दू परम्पराएं और उनसे जुड़े फायदे :
पुराने समय से बहुत सी परंपराएं प्रचलित हैं, जिनका पालन आज भी काफी लोग कर रहे हैं। ये परंपराएं धर्म से जुड़ी दिखाई देती हैं, लेकिन इनके वैज्ञानिक कारण भी हैं। जो लोग इन परंपराओं को अपने जीवन में उतारते हैं, वे स्वास्थ्य संबंधी कई परेशानियों से बचे रहते हैं। यहां जानिए ऐसी ही 14 खास परंपराएं, जिनका पालन अधिकतर परिवारों में किया जाता है…

1. एक ही गोत्र में शादी नहीं करना
कई शोधों में ये बात सामने आई है कि व्यक्ति को जेनेटिक बीमारी न हो इसके लिए एक इलाज है ‘सेपरेशन ऑफ़ जींस’, यानी अपने नजदीकी रिश्तेदारो में विवाह नहीं करना चाहिए। रिश्तेदारों में जींस सेपरेट (विभाजन) नहीं हो पाते हैं और जींस से संबंधित बीमारियां जैसे कलर ब्लाईंडनेस आदि होने की संभावनाएं रहती हैं। संभवत: पुराने समय में ही जींस और डीएनए के बारे खोज कर ली गई थी और इसी कारण एक गोत्र में विवाह न करने की परंपरा बनाई गई।

2. कान छिदवाने की परंपरा
स्त्री और पुरुषों, दोनों के लिए पुराने समय से ही कान छिदवाने की परंपरा चली आ रही है। हालांकि, आज पुरुष वर्ग में ये परंपरा मानने वालों की संख्या काफी कम हो गई है। इस परंपरा की वैज्ञानिक मानयता ये है कि इससे सोचने की शक्ति बढ़ती है, बोली अच्छी होती है। कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित और व्यवस्थित रहता है। कान छिदवाने से एक्यूपंक्चर से होने वाले स्वास्थ्य लाभ भी मिलते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे छोटे बच्चों को नजर भी नहीं लगती है।

3. माथे पर तिलक लगाना
स्त्री और पुरुष माथे पर कुमकुम, चंदन का तिलक लगाते हैं। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क यह है कि दोनों आंखों के बीच में आज्ञा चक्र होता है। इसी चक्र स्थान पर तिलक लगाया जाता है। इस चक्र पर तिलक लगाने से हमारी एकाग्रता बढ़ती है। मन बेकार की बातों में उलझता नहीं है। तिलक लगाते समय उंगली या अंगूठे का जो दबाव बनता है, उससे माथे तक जाने वाली नसों का रक्त संचार व्यवस्थित होता है। रक्त कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं।

4. जमीन पर बैठकर भोजन करना
जमीन पर बैठकर भोजन करना पाचन तंत्र और पेट के लिए बहुत फायदेमंद है। पालथी मारकर बैठना एक योग आसन है। इस अवस्था में बैठने से मस्तिष्क शांत रहता है और भोजन करते वक्त दिमाग शांत हो तो पाचन क्रिया अच्छी रहती है। पालथी मारकर भोजन करते समय दिमाग से एक संकेत पेट तक जाता है कि पेट भोजन ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाए। इस आसन में बैठने से गैस, कब्ज, अपच जैसी समस्याएं दूर रहती हैं।

5. हाथ जोड़कर नमस्ते करना
हम जब भी किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर नमस्ते या नमस्कार करते हैं। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क यह है नमस्ते करते समय सभी उंगलियों के शीर्ष आपस में एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं और उन पर दबाव पड़ता है। हाथों की उंगलियों की नसों का संबंध शरीर के सभी प्रमुख अंगों से होता है। इस कारण उंगलियों पर दबाव पड़ता है तो इस एक्यूप्रेशर (दबाव) का सीधा असर हमारी आंखों, कानों और दिमाग पर होता है। साथ ही, नमस्ते करने से सामने वाला व्यक्ति हम लंबे समय तक याद रह पाता है। इस संबंध में एक अन्य तर्क यह है कि जब हम हाथ मिलाकर अभिवादन करते है तो सामने वाले व्यक्ति के कीटाणु हम तक पहुंच सकते हैं। जबकि नमस्ते करने पर एक-दूसरे का शारीरिक रूप से संपर्क नहीं हो पाता है और बीमारी फैलाने वाले वायरस हम तक पहुंच नहीं पाते हैं।

6. भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मीठे से
धार्मिक कार्यक्रमों में भोजन की शुरुआत अक्सर मिर्च-मसाले वाले व्यंजन से होती है और भोजन का अंत मिठाई से होता है। इसका वैज्ञानिक तर्क यह है कि तीखा खाने से हमारे पेट के अंदर पाचन तत्व एवं अम्ल सक्रिय हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र ठीक तरह से संचालित होता है। अंत में मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है। इससे पेट में जलन नहीं होती है।

7. पीपल की पूजा
आमतौर पर लोगों की मान्यता यह है कि पीपल की पूजा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसका एक तर्क यह है कि इसकी पूजा इसलिए की जाती है, ताकि हम वृक्षों की सुरक्षा और देखभाल करें और वृक्षों का सम्मान करें, उन्हें काटें नहीं। पीपल एक मात्र ऐसा वृक्ष है, जो रात में भी ऑक्सीजन छोड़ता है। इसीलिए अन्य वृक्षों की अपेक्षा इसका महत्व काफी अधिक बताया गया है।

8. दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना
दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोने पर बुरे सपने आते हैं। इसीलिए उत्तर दिशा की ओर पैर करके सोना चाहिए। इसका वैज्ञानिक तर्क ये है कि जब हम उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोते हैं, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुंबकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोहा दिमाग की ओर प्रवाहित होने लगता है। इससे दिमाग से संबंधित कोई बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर भी असंतुतित हो सकता है। दक्षिण दिशा में सिर करके सोने से ये परेशानियां नहीं होती हैं।

9. सूर्य की पूजा करना
सुबह सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परंपरा बहुत पुराने समय से चली आ रही है। इस परंपरा का वैज्ञानिक तर्क ये है कि जल चढ़ाते समय पानी से आने वाली सूर्य की किरणें, जब आंखों हमारी में पहुंचती हैं तो आंखों की रोशनी अच्छी होती है। साथ ही, सुबह-सुबह की धूप भी हमारी त्वचा के लिए फायदेमंद होती है। शास्त्रों की मान्यता है कि सूर्य को जल चढ़ाने से घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान मिलता है। कुंडली में सूर्य के अशुभ फल खत्म होते हैं।

10. चोटी रखना
पुराने समय में सभी ऋषि-मुनी सिर पर चोटी रखते थे। आज भी कई लोग रखते हैं। इस संबंध में मान्यता है कि जिस जगह पर चोटी रखी जाती है, उस जगह दिमाग की सारी नसों का केंद्र होता है। यहां चोटी रहती है तो दिमाग स्थिर रहता है। क्रोध नहीं आता है और सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है। मानसिक मजबूती मिलती है और एकाग्रता बढ़ती है।

11. व्रत रखना
पूजा-पाठ, त्योहार या एकादशियों पर लोग व्रत रखते हैं। आयुर्वेद के अनुसार व्रत से पाचन क्रिया अच्छी होती है और फलाहार लेने से पाचनतंत्र को आराम मिलता है। शोधकर्ताओं के अनुसार व्रत करने से कैंसर का खतरा कम होता है। हृदय संबंधी, मधुमेह आदि रोग होने की संभावनाएं भी कम रहती हैं।

12. चरण स्पर्श करना
किसी बड़े व्यक्ति से मिलते समय उसके चरण स्पर्श करने की परंपरा पुराने समय से चली आ रही है। यही संस्कार बच्चों को भी सिखाते हैं, ताकि वे भी बड़ों का आदर करें। इस परंपरा के संबंध में मान्यता है कि मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा हमारे हाथों से सामने वाले पैरों तक पहुंचती है और बड़े व्यक्ति के पैरों से होते हुए उसके हाथों तक पहुंचती है। आशीर्वाद देते समय व्यक्ति चरण छूने वाले के सिर पर अपना हाथ रखता है, इससे हाथों से वह ऊर्जा पुन: हमारे मस्तिष्क तक पहुंचती है। इससे ऊर्जा का एक चक्र पूरा होता है।

13. मांग में सिंदूर लगाना
विवाहित महिलाओं के लिए मांग में सिंदूर लगाना अनिवार्य परंपरा है। इस संबंध में तर्क यह है कि सिंदूर में हल्दी, चूना और मरकरी (पारा- तरल धातु) होता है। इन तीनों का मिश्रण शरीर के ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है। इससे मानसिक तनाव भी कम होता है।

14. तुलसी की पूजा
तुलसी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। शांति रहती है। इसका तर्क यह है कि तुलसी के संपर्क से हमारा इम्यून सिस्टम मजबूत होता है। यदि घर में तुलसी होगी तो इसकी पत्तियों का इस्तेमाल भी होगा और उससे कई बीमारियां दूर रहती हैं।

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कामेंट्स

Ravi Pandey Nov 10, 2017
jai shree Radhe Krishna radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe Je

ओम प्रकाश सिंह Nov 13, 2017
नमस्कार, हम गाँव से जुडे है, इस परँपरा को हमसभी भली भाँति निभाते है ।

Anita Sharma May 17, 2021

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Ravindra Singh May 17, 2021

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Ravi Art May 16, 2021

*अपनी मृत्यु...अपनों की मृत्यु डरावनी लगती है। बाकी तो मौत का उत्सव मनाता है मनुष्य, मौत के स्वाद के चटखारे लेता है मनुष्य।* थोड़ा कड़वा लिखा है पर मन का लिखा है...... *मौत से प्यार नहीं, मौत तो हमारा स्वाद है।* बकरे का, पाए का, तीतर का, मुर्गे का, हलाल का, बिना हलाल का, ताजा बच्चे का, भुना हुआ, छोटी मछली, बड़ी मछली, हल्की आंच पर सिका हुआ। न जाने कितने बल्कि अनगिनत स्वाद हैं मौत के। क्योंकि मौत किसी और की, ओर स्वाद हमारा। स्वाद से कारोबार बन गई मौत। मुर्गी पालन, मछली पालन, बकरी पालन, पोल्ट्री फार्म्स। नाम "पालन" और मक़सद "हत्या"। स्लाटर हाउस तक खोल दिये, वो भी ऑफिशियल। गली गली में खुले नाॅन वेज रेस्टॉरेंट मौत का कारोबार नहीं तो और क्या हैं? *मौत से प्यार और उसका कारोबार इसलिए क्योंकि मौत हमारी नहीं है।* जो हमारी तरह बोल नहीं सकते, अभिव्यक्त नही कर सकते, अपनी सुरक्षा स्वयं करने में समर्थ नहीं हैं, उनकी असहायता को हमने अपना बल कैसे मान लिया ? कैसे मान लिया कि उनमें भावनाएं नहीं होतीं ? या उनकी आहें नहीं निकलतीं ? *डाइनिंग टेबल पर हड्डियां नोचते बाप बच्चों को सीख देते है, बेटा कभी किसी का दिल नहीं दुखाना ! किसी की आहें मत लेना ! किसी की आंख में तुम्हारी वजह से आंसू नहीं आना चाहिए !* बच्चों में झुठे संस्कार डालते बाप को, अपने हाथ में वो हड्डी दिखाई नहीं देती, जो इससे पहले एक शरीर थी, जिसके अंदर इससे पहले एक आत्मा थी, उसकी भी एक मां थी ...?? जिसे काटा गया होगा ? जो कराहा होगा ? जो तड़पा होगा ? जिसकी आहें निकली होंगी ? जिसने बद्दुआ भी दी होगी ? कैसे मान लिया कि जब जब धरती पर अत्याचार बढ़ेंगे तो *भगवान सिर्फ तुम इंसानों की रक्षा के लिए अवतार लेंगे ?* क्या मूक जानवर उस परमपिता परमेश्वर की संतान नहीं हैं ? क्या उस इश्वर को उनकी रक्षा की चिंता नहीं है ? आज कोरोना वायरस उन जानवरों के लिए, ईश्वर के अवतार से कम नहीं है। *जब से इस वायरस का कहर बरपा है, जानवर स्वच्छंद घूम रहे है। पक्षी चहचहा रहे हैं।* *उन्हें पहली बार इस धरती पर अपना भी कुछ अधिकार सा नज़र आया है। पेड़ पौधे ऐसे लहलहा रहे हैं, जैसे उन्हें नई जिंदगी मिली हो। धरती को भी जैसे सांस लेना आसान हो गया हो।* सृष्टि के निर्माता द्वारा रचित करोड़ों-करोड़ योनियों में से एक कोरोना ने हमें हमारी ओकात बता दी। घर में घुस के मारा है और मार रहा है। ओर उसका हम सब कुछ नहीं बिगाड़ सकते। अब घंटियां बजा रहे हो, इबादत कर रहे हो, प्रेयर कर रहे हो और भीख मांग रहे हो उससे कि हमें बचा ले। धर्म की आड़ में उस परमपिता के नाम पर अपने स्वाद के लिए कभी ईद पर बकरे काटते हो, कभी दुर्गा मां या भैरव बाबा के सामने बकरे की बली चढ़ाते हो। कहीं तुम अपने स्वाद के लिए मछली का भोग लगाते हो। कभी सोचा.....!!! क्या ईश्वर का स्वाद होता है ? ....क्या है उनका भोजन ? किसे ठग रहे हो ? भगवान को या खुद को ? मंगलवार को नाॅनवेज नहीं खाता ...!!! आज शनिवार है इसलिए नहीं...!!! अभी रोज़े चल रहे हैं ....!!! नवरात्रि में तो सवाल ही नहीं उठता....!!! झूठ पर झूठ.... झूठ पर झूठ.... झूठ पर झूठ...!! फिर कुतर्क सुनो.... फल सब्जियों में भी तो जान होती है !! .....तो सुनो फल सब्जियाँ संसर्ग नहीं करतीं, ना ही वो किसी प्राण को जन्मती हैं। इसीलिए उनका भोजन उचित है। *ईश्वर ने बुद्धि सिर्फ तुम्हें दी। ताकि तमाम योनियों में भटकने के बाद मानव योनि में तुम जन्म-मृत्यु के चक्र से निकलने का रास्ता ढूँढ सको। लेकिन तुमने इस मानव योनि को पाते ही स्वयं को भगवान समझ लिया।* आज कोरोना के रूप में मौत हमारे सामने खड़ी है। *तुम्ही कहते थे कि हम जो प्रकृति को देंगे, वही प्रकृति हमे लौटायेगी। मौते दीं हैं प्रकृति को तो मौतें ही लौट रही हैं।* *बढ़ो...!! आलिंगन करो मौत का....!!!* यह संकेत है ईश्वर का। प्रकृति के साथ रहो। प्रकृति के होकर रहो।* वर्ना..... ईश्वर अपनी ही बनाई कई योनियों को धरती से हमेशा के लिए विलुप्त कर चुके हैं। उन्हें एक क्षण भी नही लगेगा। 🙏 *प्रकृति की ओर चलो* 🙏 🌳🌲🎄jai johar🎄🌲🌳

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G.SHARMA May 16, 2021

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Garima Gahlot Rajput May 17, 2021

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Garima Gahlot Rajput May 15, 2021

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अगर व्‍यक्ति कई बीमार‍ियों से ग्रसित हो तो उसे सोमवार के दिन भगवान शिव के मंत्रों का श्रद्धानुसार 11, 21, 51 या 108 बार जाप करना चाहिए। ऐसा करना उस व्यक्ति के लिए अत्‍यंत शुभ होगा और सभी प्रक्रार के बंधनों से मुक्त भी कराएगा। कई बार जाने-अनजाने में हम से बहुत सी गलतियां हो जाती है जिसकी सजा हमें किसी ना किसी रूप में भुगतनी पड़ती हैं। ऐसे में सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करके उन कष्टों को कम किया जा सकता है। साथ ही साथ भोलेनाथ की कृपा से सभी रोगों का नाश होता है और सोमवार के दिन भगवान शिव के ‘दारिद्रदहन शिव स्‍तोत्र’ का पाठ करने से आर्थिक लाभ की प्राप्ति होती है। तो चलिए बताते है 5 शिव महामंत्र - भगवान शिव के संकटहारी मंत्र- 1. " ॐ नमः शिवाय " 2. " नमो नीलकण्ठाय " 3. " ॐ पार्वतीपतये नमः " 4. " ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवाय " 5. " ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्त्तये मह्यं मेधा प्रयच्छ स्वाहा " जय श्री भोलेनाथ जय श्री पार्वती माता की 🌹 नमस्कार 🙏 🚩 हर हर महादेव जय श्री महाकाली जय श्री महाकाल जी ॐ नमः शिवाय आपको भगवान श्री भोलेनाथ और पार्वती माता की असिम कृपा सदैव बनी रहे नमस्कार 🙏 शुभ रात्री वंदन 👣 🌹 👏 जय हो 🌹 👏 🚩🎪🌙💜💞🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃

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