*🔱श्री शिव रुद्राष्टकम स्तोत्रम✍🏻✍🏻✍🏻 संजय विद्यार्थी**       *🔱🌹समय:-08.10🌹🔱* ​•··············••●◆❁✿❁◆●••············

Audio - *🔱श्री शिव रुद्राष्टकम स्तोत्रम✍🏻✍🏻✍🏻
            संजय विद्यार्थी**

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कामेंट्स

🌹रुमी माहेश्वरी Mar 11, 2021
मैं शब्द हुँ शिव हे मेरे अर्थ...! शिव बिन सब शव है मैं शिव बिन व्यर्थ...!! *🚩🚩ॐ नमः शिवाय🚩🚩* *महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं*

Gajendrasingh kaviya Mar 11, 2021
Radhe Radhe good evening my sweet sis 🌹🌷🌷🌷 aap sada khush raho my pyari bena 🌹🌹🌹🌹🌹 maha Shivaratri ki hardik shubhkamnaye my pyari bena 🙏🌹🌹🌹

Anilkumar Marathe Mar 11, 2021
जय श्री कृष्ण नमस्कार खुशियोकी सदाबहार आदरणीय प्यारीरूमी जी !! 🌹हर हर महादेव शिव कि शक्ति से नूर मिलता है, सबके दिलों को सुरूर मिलता है, जो भी जाता है भोले के दरवार में उसे कुछ न कुछ जरूर मिलता है, भोलेनाथ महादेव आप की सभी मनोकामना पूरी करे और संसार की सारी खुशियां आपके कदमो में हो इशी शुभकामनाओ के साथ महा शिवरात्रि की ढेर सारी शुभकामनाएं !! 🙏आपका शुभ व मंगलमय हो, हर हर महादेव

neeraj Mar 11, 2021
om namah shivaay🌹 sunder post🌹 shubh sandhyaji 🌹

Vijaythakur Mar 12, 2021
Om Namah Shivay Om Gauri Namah Om Gauri Namah Om

ललन कुमार-8696612797 Mar 14, 2021
जीवन का सबसे कठिन कार्य है इंसानों को पहचाना जी। जय श्री राधे राधे जी।शुभ रात्रि वंदन जी।

इस स्तुति से जल्द प्रसन्न होते हैं भोलेनाथ सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है और इस दिन पूरे विधि-विधान से इनका पूजन करना चाहिए. शिव शंभू भक्तों की प्रार्थना से बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं भगवान शंकर भक्तों की प्रार्थना से बहुत जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं. इसी कारण उन्हें 'आशुतोष' भी कहा जाता है. वैसे तो धर्मग्रंथों में भोलेनाथ की कई स्तुतियां हैं, पर श्रीरामचरितमानस का 'रुद्राष्टकम' अपने-आप में बेजोड़ है. 'रुद्राष्टकम' केवल गाने के लिहाज से ही नहीं, बल्कि भाव के नजरिए से भी एकदम मधुर है. यही वजह है शिव के आराधक इसे याद रखते हैं और पूजा के समय सस्वर पाठ करते हैं. 'रुद्राष्टकम' और इसका भावार्थ आगे दिया गया है... नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ॥ निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥1॥ (हे मोक्षरूप, विभु, व्यापक ब्रह्म, वेदस्वरूप ईशानदिशा के ईश्वर और सबके स्वामी शिवजी, मैं आपको नमस्कार करता हूं. निज स्वरूप में स्थित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन, आकाश रूप शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूं.) निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं । गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ॥ करालं महाकालकालं कृपालं । गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥2॥ (निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत) वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलाशपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे परमेशवर को मैं नमस्कार करता हूं.) तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं । मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ॥ स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा । लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥3॥ (जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा और गले में सर्प सुशोभित है...) चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ॥ मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥4॥ (जिनके कानों में कुण्डल शोभा पा रहे हैं. सुन्दर भृकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्न मुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं. सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए और मुण्डमाल पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके नाथ श्री शंकरजी को मैं भजता हूं.) ्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥ त्रय: शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥5॥ (प्रचंड, श्रेष्ठ तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोडों सूर्य के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूं.) कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ॥ चिदानन्दसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥6॥ (कलाओं से परे, कल्याण स्वरूप, प्रलय करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुरासुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालनेवाले हे प्रभो, प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए.) न यावद् उमानाथपादारविन्दं । भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् । न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥7॥ (जब तक मनुष्य श्रीपार्वतीजी के पति के चरणकमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इहलोक में, न ही परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और अनके कष्टों का भी नाश नहीं होता है. अत: हे समस्त जीवों के हृदय में निवास करने वाले प्रभो, प्रसन्न होइए.) न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ॥ जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥8॥ (मैं न तो योग जानता हूं, न जप और न पूजा ही. हे शम्भो, मैं तो सदा-सर्वदा आप को ही नमस्कार करता हूं. हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म के दु:ख समूहों से जलते हुए मुझ दुखी की दु:खों से रक्षा कीजिए. हे शम्भो, मैं आपको नमस्कार करता हूं.) रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ॥। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥9॥ (जो मनुष्य इस स्तोत्र को भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर शम्भु विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं.) 🍁📿🍁📿🍁📿🍁📿🍁📿🍁📿🍁📿🍁📿

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