Ravi shanker
Ravi shanker Apr 13, 2021

Jai Mata Sheetla Jaunpur. U P

Jai Mata Sheetla Jaunpur. U P

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श्रीदुर्गा तत्त्व,मंत्र रहस्य , यंत्र रहस्य बिचार ( श्रीदेव्यथर्वशीर्षोक्त ) सभी देव-देवी के समीप पहुँच कर नम्रता से प्रार्थना करने लगे कि हे देवि! तुम कौन हो? देवी ने कहा—मैं ब्रह्म-स्वरूप हूँ। मुझसे प्रकृति पुरुषात्मक सद्रूप और असहप जगत् उत्पन्न हुआ है। मैं आनन्द और अनानन्द-रूपा हूँ। मैं विज्ञान और अविज्ञान-रूपा हूँ। अवश्य जानने योग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पञ्चीकृत और अपक्षीकृत महा भूत भी मैं ही हूँ। यह सारा दृश्य जगत् में ही हूँ। वेद और अवेद भी मैं हूँ। विद्या और अविद्या मैं, अजा और अनजा भी मैं नीचे ऊपर, अगल बगल भी मैं ही हैं। मैं रुद्रों और वसुओं के रूप में सञ्चार करती हूँ। मैं आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में फिरा करती हूँ। मैं दोनों मित्रावरुण का इन्द्राग्नि का और दोनों अश्विनीकुमारों का पोषण करती हूँ। मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूँ त्रैलोक्य पर आक्रमण करने के लिए विस्तीर्ण पाद-क्षेप करनेवाले विष्णु, ब्रह्मदेव और प्रजापति को मैं ही धारण करती हूँ। देवों को उत्तम हवि पहुंचानेवाले और सोम-रस निकालनेवाले यजमान के लिए हविद्रव्यों से युक्त धन धारण करती हूँ। मैं सम्पूर्ण जगत् की ईश्वरी, उपासकों को धन देनेवाली, ब्रह्मरूप और यज्ञाहों (यजन करने योग्य देवों) में मुख्य हूँ। मैं आत्म-स्वरूप पर आकाशादि का निर्माण करती हूँ। मेरा स्थान आत्म-स्वरूप को धारण करनेवाली बुद्धि-वृत्ति में है जो इस प्रकार जानता है, वह दैवी सम्पत्ति लाभ करता है। तब देवों ने स्तुति की देवी को नमस्कार है। बड़े-बड़ों को अपने-अपने कर्तव्य में प्रवृत्त करनेवाली कल्याण-कर्त्री को सदा नमस्कार है। गुण-साम्यावस्था - रूपिणी मङ्गलमयी देवी को नमस्कार है। नियम युक्त होकर हम उन्हें प्रणाम करते हैं। उन अग्नि के से वर्णवाली, ज्ञान से जगमगानेवाली, दीप्ति मती कर्म-फल प्राप्ति के हेतु सेवन की जानेवाली दुर्गा देवी की शरण में हम हैं। असुरों का नाश करनेवाली देवी! तुम्हें नमस्कार है। प्राण-रूप देवों ने जिस प्रकाशमान वैखरी बाणों को उत्पन्न किया, उसे अनेक प्रकार से प्राणी बोलते हैं वह कामधेनु तुल्य आनन्द दायक और अन तथा बल देनेवाली वाग्-रूपिणी भगवती उत्तम स्तुति से सन्तुष्ट होकर हमारे समीप आवे काल का भी नाश करनेवाली, वेदों द्वारा स्तुत हुई विष्णु शक्ति, स्कन्दमाता, सरस्वती, देव माता अदिति और दक्ष कन्या, पाप-नाशिनी कल्याणकारिणी भगवती शिवा को हम प्रणाम करते हैं। हम महालक्ष्मी को जानते हैं और उन सर्व-शक्ति-रूपिणी का ही ध्यान करते हैं। वह देवी हमे उस विषय (ज्ञान-ध्यान) में प्रवृत्त करें। हे दक्ष आपकी जो कन्या अदिति है, वह प्रसूता हुई और उनके स्तुत्यर्ह तथा मृत्यु रहित देव उत्पन्न हुए। काम (क), योनि (ए), कमला (ई), वज्रपाणि इन्द्र (ल), गुहा (हीं)। इस २ वर्ण मातरिश्वा वायु (क), अ (ह), इन्द्र (ल), पुनः गुहा (हीं) स, क, ल ३ वर्ण और माया (ही)– 'कएईलही इसकहलहीं सकलही'- यह सर्वात्मिका जगन्माता की मूल विद्या है और यह ब्रह्म स्वरुपणि है ( शिव शक्त्यभेद रूपा ब्रह्म-विष्णु-शिवात्मिका, सरस्वती लक्ष्मी गौरी रूपा, अशुद्ध मिश्र शुद्धोपासकात्मिका, समरसीभूत शिव शक्त्यात्मक ब्रह्म स्वरूप का निर्विकल्प ज्ञान देनेवाली, सर्व तत्त्वात्मिका, महा त्रिपुर सुन्दरी- यही इस मन्त्र का भावार्य है। यह मन्त्र सब मन्त्री का मुकुट मणि है मन्त्र-शाख में पक्ष-दशी कादि श्रीविद्या के नाम से प्रसिद्ध है) यह परमात्मा की शक्ति हैं। यह विश्व मोहिनी है। पाश, अंकुश, धनुष और वाण धारण करनेवाली हैं। यह 'श्रीमहा-विद्या' हैं। जो ऐसा जानता है, वह शोक को पार कर जाता है। हे भगवती, तुम्हे नमस्कार है। हे माता सब प्रकार से हमारी रक्षा करो। वही अष्ट वसु है; वही एकादश रुद्र है वही द्वादश आदित्य है वही सोम-पान करनेवाले और न करनेवाले विश्वेदेव है वहीं यातुधान (एक प्रकार के राक्षस), असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध है; यहीं सत्व-रज-तम है; यही ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-रूपिणी है वही प्रजापति इन्द्र-मनु है वहीं ग्रह, नक्षत्र और तारा है; वही कला-काष्ठादि काल रूपिणी है। पाप नाश करनेवाली, भोग-मोक्ष देनेवाली, अन्त-रहित, विजयाधिष्ठात्री निर्दोष, शरण लेने योग्य, कल्याण-दात्री और मङ्गल-रूपिणी उन देवी को हम सदा प्रणाम करते हैं। वियत्-आकाश (ह) तथा 'ई' कार से युक्त, नीति-होत्र— अग्नि (र) सहित, अर्धचन्द्र (*) से अलंकृत जो देवी का योग (हीं) है, वह सब मनोरथ पूर्ण करनेवाला है। इस एकाक्षर ब्रह्म का ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जो निरतिशयानन्द-पूर्ण हैं और जो ज्ञान के सागर हैं। ('' मन्त्र देवी प्रणव है। कार के समान ही यह प्रणव भी व्यापक अर्थ से भरा हुआ है। संक्षेप में इसका अर्थ इच्छा ज्ञान क्रियाधार, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द समरसी भूत शिव शक्ति स्फुरण है।) वाक या वाणी (ऐ), माया (ही), ब्रह्मसू-काम (क्लीं), इसके आगे छठा व्यञ्जन अर्थात् च, वही वक्त्र अर्थात् आकार से युक्त (घा), सूर्य (म), 'अवाम श्रोत्र दक्षिण कर्ण (उ) और बिन्दु अर्थात् अनुस्वार से युक्त (मुं), टकार से तीसरा ड. वहीं नारायण अर्थात् 'आ' से मिश्र (डा), वायु (य), वहीं अधर अर्थात् 'ऐ' से युक्त (ये) और 'विच्चे' यह नवार्ण मन्त्र- 'ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे'–उपासकों को आनन्द और ब्रह्म सायुज्य देनेवाला है। (नवार्ण मन्त्र का अर्थ- हे विस्वरूपिणी महासरस्वती हे सहूपिंणी महालक्ष्मी हे आनन्द-रूपिणी महा-काली! ब्रह्म विद्या पाने के लिए हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं। हे महा-काली, महालक्ष्मी, महा सरस्वती स्वरूपिणी चण्डिके! तुम्हे नमस्कार है। अविद्या रूप रज्जु की दृढ़ ग्रन्थि को खोलकर मुझे मुक्त करो।) हत्कमल के मध्य में रहनेवाली, प्रातः कालीन सूर्य के समान प्रभावाली, पाश और अंकुश धारण करनेवाली, मनोहर रूपवाली, वरद और अभय मुद्रा धारण किए हुए हाथोंवाली, तीन नेत्रवाली, रक्तवस्त्र पहननेवाली, भक्तों के मनोरथ पूर्ण करनेवाली देवी को मैं भजता हूँ। महा भय का नाश करनेवाली, महा सङ्कट को शान्त करनेवाली और महान् करुणा की साक्षात् मूर्ति तुम महा देवी को मैं नमस्कार करता हूँ। जिसका स्वरूप ब्रह्मादिक नहीं जानते, इसलिए जिसे 'अज्ञेया' कहते हैं जिसका अन्त नहीं। मिलता, इसलिए जिसे 'अनन्ता' कहते हैं, जिसका लक्ष्य देख नहीं पड़ता, इसलिये जिसे 'अलक्ष्या' कहते है जिसका जन्म समझ में नहीं आता, इसलिए जिसे 'अजा' कहते हैं जो अकेली ही सर्वत्र है, इसलिए जिसे 'एका' कहते हैं, जो अकेली ही विश्व रूप में सजी हुई है, इसलिए जिसे 'नैका' कहते हैं। वह इसीलिए 'अज्ञेया', 'अनन्ता', 'अजा', 'एका' और 'नेका' कहलाती है। सब मन्त्रों में 'मातृका'- मूलाक्षर रूप से रहनेवाली शब्दों में अर्थ रूप से रहनेवाली, ज्ञानों में 'चिन्मयातीता' शब्दों में 'शून्य साक्षिणी तथा जिनसे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, वह 'दुर्गा' नाम से प्रसिद्ध है। उन दुर्विज्ञेया, दुराचार-नाशिनी और संसार सागर से तारनेवाली 'दुर्गा देवी' को संसार से डरा हुआ मैं नमस्कार करता हूँ। ॥ फलश्रुति ॥ उक्त अथर्वशीर्ष का जो अध्ययन करता है, उसे पांचों अथर्वशीपों के जप का फल प्राप्त होता है। इस अथर्वशीर्ष को न जानकर जो प्रतिमा स्थापन करता है, वह सैकड़ों लाख जप करके भी अर्चा-सिद्धि नहीं प्राप्त करता अष्टोत्तरशत (१०८) जप (इत्यादि) इसकी पुरश्चरण विधि है। जो इसका दस बार पाठ करता है, वह उसी क्षण पापों से मुक्त हो जाता है और महा-देवी के प्रसाद से बड़े दुस्तर सङ्कटों को पार कर जाता है। इसका सायं काल में अध्ययन करनेवाला दिन में किए हुए पापों का नाश करता है, प्रातः काल में अध्ययन करनेवाला रात्रि में किए हुए पापों का नाश करता है, दोनों समय अध्ययन करनेवाला निष्पाप होता है। मध्य रात्रि में तुरीय सन्ध्या के समय जप करने से 'वाक् सिद्धि' प्राप्त होती है। नई प्रतिमा के समक्ष जप करने से 'देवता सान्निध्य' प्राप्त होता है। भामाश्विनी ( अमृत सिद्धि योग में महा देवी को सन्निधि में जप करने से महा मृत्यु से तर जाता है। इस प्रकार यह अविद्या नाशिनी ब्रह्म विद्या है। ... श्रीदुर्गा-मन्त्र-तत्त्व भगवती दुर्गा के मन्त्रार्थ का संक्षिप्त दिग्दर्शन भगवती दुर्गा के ध्यान अनेक हैं। ऐसा अनिवार्य है क्योकि 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी। इसी प्रकार मन्त्र भी असंख्य हैं। ये मन्त्र देवी के शाब्दिक रूप वा सूक्ष्म रूप है। इन्हीं के आधार पर ध्यान व स्थूल रूप की कल्पना है। ध्यान- निर्गुण और सगुण दोनों ही रूपों के द्योतक हैं। इन सबका ज्ञाता कोई भी नहीं है और सभी के ज्ञान की आवश्यकता भी नहीं है। आवश्यकता है प्रधान मन्त्र से सम्बन्धित ध्यान की, जिसके मनन एवं निदिध्यासन से परमार्थ का साधन होता है। परन्तु वह निर्णय करना कठिन है कि अमुक ध्यान प्रधान है और सब गौण है। कारण सबका मत एक नहीं। कोई एक ध्यान को प्रधान मानता है, तो कोई उसे अपने दृष्टिकोण के अनुसार अप्रधान ही बताता है। ऐसी दशा में कोई भी निर्णय सर्व सम्मत नहीं हो सकता। अतएव प्रचलित मतों का ही मन्थन कर सिद्धान्त का प्रतिपादन करना पड़ता है। शास्त्रीय ग्रन्थों के अनुसार भगवती दुर्गा के श्रौत उपासना क्रम के अतिरिक्त दो प्रधान उपासना क्रम है—१ शुद्ध तन्त्रोक्त और २ तन्त्र और स्मृति या पुराण-मिश्रोक्त तन्त्रोक्त क्रम के दो प्रधान मन्त्र है – १ एकाक्षर वीज मन्त्र और २ अष्टाक्षर मन्त्र राज या विद्याराज्ञी। पुराणोक्त मन्त्र है नवार्ण, जो श्रोत मन्त्र भी है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि तन्त्र-शास्त्र में श्रुति, स्मृति, दर्शन आदि सभी सन्निहित है। अर्थात् सभी शास्त्रों के सार तन्त्रों में कट-छंट कर भरे पड़े हैं। (१) भगवती दुर्गा का एकाक्षर वीज मन्त्र है- 'दु' या 'हूं'। विश्वसार तन्त्र में मन्त्रोद्धार है- 'धान्त वीज ('थ' के बाद का वर्ण अर्थात् 'द') समुद्धृत्य वाम-कर्ण-विभूषिते (वाम-कर्ण ऊ) इत्यादि। वरदा तन्त्र में दं दुर्गा वाचकं (प्राण शक्ति वाचक) देवि! ऊकारो रक्षणार्थः' इत्यादि। रुद्र पामल तन्त्र के अनुसार 'दु' (दं हस्व उकार) बीज है। (२) श्रुति के अनुसार एकाक्षर वीज मन्त्र है 'हो' इसका उद्धार कैवल्योपनिषत् में दिया वियदीकार संयुक्तं, वीति होत्र-समन्वितं । अर्जेन्दु-लसितं देव्या वीजं सर्वार्थ-साधकम्॥वियत् (आकाश) = 'ह' + ई + वीति-हक्षेत्र (अग्नि)– 'र' + अर्धेन्दु-अर्थमकार (३) 'हिन्दी तन्त्र-सार, पृष्ठ ११६ पर अष्टाक्षर मन्त्र का उद्धार यह दिया है मायाद्रि कर्णविन्द्राढ्यो भूयोऽसौ सर्गवान् भवेत्। पञ्चान्तकः प्रतिष्ठावान्, मारुतो भौतिकासनः । तारादि हृदयान्तोऽयं मन्त्रो वस्वक्षरात्मकः ॥ अर्थात् माया ही अद्रि (द) + कर्ण (उ) + बिन्दु () दु, पुनः यही कर्ण विसर्ग युक्त (दुः) + पञ्चान्तक (ग) + प्रतिष्ठा (आ) + मारुत (य) + भौतिक (ऐ) = दुर्गायै। इनके आदि में तार (ॐ) और अन्त में हृदय (नमः) लगाने से वसु (आठ) अक्षर का मन्त्र बनता है— 'ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः। (४) मन्त्र महोदधि में 'नवार्ण मन्त्र' का उद्धार यह दिया है— वाङ् माया मदनो दीर्घा, लक्ष्मीस्तन्द्री श्रुतीन्दु युक् डायै सद्गु जलं कूर्म-द्वयं झिण्टीश संयुतम् ॥ अर्थात् वाक् = ऐं, माया हीं, मदनः क्लीं, दीर्घा लक्ष्मीचा श्रुति एवं इन्दु सहित तन्द्री मुं + डायै स-दृक् जल वि + झिण्टीश सहित दो कूर्म च्चे। पूरा मन्त्र- 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।' यह 'नवार्ण मन्त्र' तन्त्र, श्रुति तथा स्मृति तीनों से प्रतिपादित पूर्ण स्वरूप का द्योतक मन्त्र है। 'सप्तशती' द्वारा भी इसी विशिष्ट मन्त्र का उद्घाटन होता है। इस मन्त्र की उपासना वैष्णव, शव और शाक्त (समयाचारी और कुलाचारी दोनों) आदि सभी लोग अपने-अपने क्रम के अनुसार करते हैं। (५) 'नवार्ण मन्त्र' का त्र्यक्षर रूपान्तर है- 'ऐं क्लीं ', जो श्रीवाला मन्त्र (ऐं क्लीं सौः ) का पर्यायवाचक है। 'मन्त्र विद्या' मूलतः ब्रह्म विद्या है, जिसे गुप्त रखा गया है क्योंकि ब्रह्म-विद्यात्मक मन्त्र की उपासना में असावधानी करनेवाले का अनिष्ट होता है। मन्त्रार्थ भी अनेक प्रकार के होते हैं। सद्-गुरु शिष्य की योग्यता के अनुसार ही अर्थ का ज्ञान कराते हैं। साधक व शिष्य की साधन प्रगति के अनुसार मन्त्रार्थ बदलता रहता है। इसी से यह गुरु-गम्य कहा गया है। यहाँ भगवती दुर्गा के सामान्य मन्त्रार्थ का संक्षिप्त दिग्दर्शन मात्र कराया जा रहा है (१) 'दु' से 'प्राण' शक्ति का बोध होता है, जो समष्टि रूपिणी और व्यष्टिरूपिणी दोनों है। इस बीज के पर्याप्त आवृत्ति अभ्यास से अर्थात् जप की पर्याप्त मात्रा से 'प्राण' शक्ति चैतन्य होती है। इसका प्रत्यक्ष अनुभव 'मूलाधार' में स्पन्दन होने से होता है। 'दु' वीज में 'द + उ + मू' ढाई अक्षर है। इससे नाद-विन्दु-निसृत 'द' अर्थात् 'दुर्गा + उ' अर्थात् शिव का ज्ञान होता है। यह पर विन्दु अर्थात् निराकारा शक्ति के प्रकाश शक्ति और शिव अर्थात् रक्त और शुक्ल विन्दु-द्वयका परिचय करानेवाला वीज है। (२) 'दूँ' से प्राण-महा शक्ति की पुष्टि सम्बर्धन क्रिया सम्पादित होती है। इसका रुपन्दन 'हृदय' में होता है। 'दूँ' में 'द + ऊ + म्' डाई अक्षर हैं। इस बीज का भी अर्थ 'दु' बीज के समान है। 'उ' और 'ऊ' दोनों से शिव का बोध होता है। (३) 'ह्रीं' से प्रपञ्चेश्वरी विश्व रूपिणी त्रिपुर सुन्दरी की पर्याय वाचक देवता का बोध होता है। यह भोग और मोक्ष-दायक मन्त्र है। पर्याप्त अभ्यास के पश्चात् इसका स्पन्दन 'आज्ञा' चक्र या 'भू' मध्य में होता है। इससे अभेद-वृत्ति और भेद वृत्ति का ज्ञान होता है। 'मोक्ष' की आकांक्षा करनेवालों के लिए यह अभेद वृत्ति' द्योतक और सकाम उपासकों के हेतु 'भेद-वृत्ति' द्योतक है। 'हाँ' को 'देवी-प्रणव' कहते हैं। यह काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी आदि अनेक महा-विद्याओं का और अन्य देवताओं यथा बटुक भैरव आदि का भी वीज मन्त्र अर्थात् सूक्ष्म शाब्दिक स्वरूप है। इस बीज में सन्निहित वर्ण है 'हर ई म्' इन वर्गों के तात्पयों से ही बीज के पूर्ण तात्पर्य का पता मिलता है। (१) 'ह' कार-प्राण-वीज है, जिससे सृष्टि क्रिया होती है। इसकी छ ऊर्मियाँ हैं १ बुभुक्षा २ पिपासा, ३ मोह, ४ मद, ५ जरा और ६ मृत्यु (२) 'रेफ' वा 'र' कार अग्नि वा तैजस बीज है। इसी से दीप्त होकर प्राण या चेतना गतिशील होती है। इसके चार गुण हैं 'रेफोत्था गुणाश्चत्वार एव च । (३) 'ई' कार षट्-गुण का घोतक है। इन गुणों के नाम है–१ मन, २ बुद्धि, ३ अहङ्कार ४ चित्त ५ सङ्गगत और ६ चेतना (४) अर्ध म' कार वा नाद-बिन्दु से घनीभूता पराशक्ति के विकास वा संसृति का बोध होता है। परा घनीभूता विन्दु-रूपिणी अव्यक्ता मूला प्राण व चिति महा शक्ति है। इसको 'नाद' रूपी संसृति है। यही संसृति 'ह' कार या चञ्चला, मध्यावस्था प्राण शक्ति हो जाती है, जिसकी तैजस शक्ति रेफ 'र' कार है। यह वीज महा शक्ति प्रणव की महा शक्ति के सदृश है। इन दोनों में कोई भेद नहीं है। सृष्टि क्रम से या अनुलोम-क्रम से यह प्रपञ्च कारिका या भोग-दायिनी शक्ति है और संहार क्रम या विलोम क्रम से यह लय कारिका या मोक्षअथवा 'ही' से पर विन्दु से निसृत 'नाद' शक्ति और उससे निसृत 'शिव' एवं तंजस प्राण शक्ति का बोध होता है 'ह' शिव र 'ई' प्रकृति (ओजम्)। पुनः 'ह' से परमात्मज जीव (हंस) के, और 'र' से रक्त या रजोगुण के अर्थ से इस बीज से नाद-विन्दु से निसृत रजो गुण मय परमात्मा और जीवात्मा दोनों का बोध होता है। अष्टाक्षरी विद्या (मन्त्र)-ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः' का अर्थ यह है कि निर्गुणा और सगुणा अर्थात् चिदचिदात्मक ब्रह्म स्वरूप दुर्गा में एकता है अर्थात् परमात्मा और जीवात्मा में अभेद है। इसी प्रकार पूर्वोक्त बोज-द्वय और इस व्यापक देवी प्रणय से तथा नवार्ण मन्त्र से अनेक तात्पयों का बोध होता है। (४) नवार्ण मन्त्र 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' का अर्थ है कि वाक्-शक्ति, अर्थ शक्ति और काम शक्ति रखनेवाली चामुण्डा अर्थात् भोग एवं मोक्षदायिनी परमा शक्ति या धर्म शक्ति शालिनी परमा धर्म शक्ति से मैं तादाम्य भाव स्थापित करता हूँ। 'बोज' से सत् चित् और आनन्द का बोध होता है। 'नवार्ण मन्त्र' को कोई-कोई 'नवार्णव' मन्त्र भी कहते हैं। नव अव अर्थात् नी समुद्र इस मन्त्र में भी अक्षर है, तथा प्रत्येक अक्षर एक समुद्र है। यथा 'ऍ-कार'— ॐकार की भाँति 'ऐ' ढाई अक्षर का वीज है-अ+ई ऐं जैसे 'अ' को गति मिलने से 'उ' बनता है, वैसे ही उसके प्रसारित होने से 'इ' कार बनता है। इस प्रकार 'अ' कार पर मन द्वारा दबाव डालकर उसे जबर्दस्तो खींचने से 'ऐ' बनता है। 'प्रणय' से मात्र क्रिया बताई गई है। उसमें दर्शन नहीं है। मन को दर्शन में लगाने से उसमें सङ्घर्षण पैदा होता है। इसी प्रकार अ-कार को दर्शनात्मक बनाकर दबाव डालने से 'ऐ' बनेगा। 'प्रणव' को क्रिया शून्य में है। 'प्रणव' का दर्शन लक्ष्य से वाणी में स्थूल उपयोग करने पर 'ऐ' बनता है। अतएव 'ऐ' बाग-बीज यानी वाणी का बीज है। 'ॐ' की भाँति 'ऐ' में भी तीनों क्रियाएँ समाई हुई है। 'अ-कार' उत्पत्ति बताता है, अ-कार में धारणा उत्पन्न होकर वह स्त्रींचा जाएगा तब 'इ' कार बनेगा, जो स्थिति बताता है और बिन्दु लय बताता है। वाग्-बीज का चिद्-भाव प्रसरण युक्त है। इसलिए क्रिया प्रसरण में मिल जाती है। कार में गति है और 'अ' को गति मिलने पर 'उ' बनता है। प्रकृति में है. प्रसरण नहीं इसलिए प्रकृति में 'उ' कार मिलेगा, 'ए' कार नहीं मिल सकता 'प्रणय' और 'वाग्-वीज' में यही एक अन्तर है। 'ऐं' याने विज्ञान युक्त वाणी, जिससे अस्तित्व उठकर उन्नत होता है। बाग-बीज - वाक् शक्ति, जो विश्व ज्ञान प्राप्त करने का एक मात्र साधन है। क्रोध-रूपी सागर को वाग् बीज ही पार करा सकता है। २. 'ह्रीं' माया बीज है। यह अत्यन्त विचित्र वीज है। तुलसीदास जी ने कहा है- 'मैं अरु मोर तोर तँ माया' अर्थात् 'मैं, मेरा, तेरा' यही 'माया' है। 'माया ममत्व, मोह ममत्व के कारण मन का सुखेच्छा में फँसना ही 'मोह' है। माया-रूपी सागर को 'माया' बीज ही पार करा सकता है। इस बीज के विषय में ऊपर लिखा जा चुका है। ३. 'क्ली' अर्थात् काम बीज नवार्ण का तीसरा अक्षर है। 'काम' अत्यन्त ही भयङ्कर समुद्र है। 'काम' व्यक्ति को अवनत कर सकता है, किन्तु इसका सदुपयोग किया जाय, तो इससे व्यक्ति उत्तमोत्तम मार्ग प्राप्त कर सकता है, इसलिए भगवती 'श्री' की अनन्त शक्ति कामेश्वरी है। काम बीज 'क्लीं' क ल ई तथा मू से बना है। 'क'– 'कामना भाव बताता है। 'ल' कार भू-बीज है, 'इ' कार शक्ति बीज है और 'बिन्दु'– लय-भाव बताता है। 'क' कार बाहर ढँका हुआ है, उसमें स्वर, बिस या बिन्दु के भाव जाग्रत् नहीं होते, किन्तु वह ज्योतिर्मय है। देखने का प्रयत्न करने पर इसमें आच्छादित प्रकाश दिखलाई पड़ेगा। यह चैतन्य चित् है तथा इससे दूसरे पदार्थों के भोगने की लालसा होती है। जब 'क' में 'ल' मिल कर माया में वासना-युक्त चित् 'ई' शक्ति-सहित प्रस्फुटित होता है, तब सब प्रकार की वासनाएँ जागती हैं। कामना न करते हुए भी सारे विश्व की सम्पूर्ण कामनाएँ जिसमें लय होती है, वही पूर्ण काम है। प्रत्येक कामना उसके सम्मुख t. , मानो कहती हैं, 'मुझे स्वीकार करो।' ऐसा व्यक्ति कुछ भी कामना नहीं करता। सम्पूर्ण कामनाएँ स्थूल भाव और शक्ति सहित उसमें लय होती हैं।" 'चा' चकार 'लोभ' रूपी चौथा सागर है। अतृप्ति' का नाम ही 'लोभ' है। इससे मनुष्य एक दूसरे का गला काटने को तैयार हो जाता है। लोभवश संग्रहण करने की प्रवृत्ति से स्वार्थ इतना अधिक बढ़ जाता है कि व्यक्ति किसी भी प्रकार का अन्याय करने में सोच नहीं करता। अतएव अगर लोभ की बाह्य रूप से न बढ़ने देकर मात्र आन्तरिक रूप से मन को सशक्त बनाने में लगाए, तो जितनी अधिक शक्ति सञ्चित होगी, व्यक्ति उतना ही उन्नत होगा तथा मन उतना ही प्रस्फुटित होगा। ५. 'मु' 'मद' रूपी सागर है। 'म' कार '' बीज है। इसलिए द्रध-पूजन के अवसर पर 'ई' योज कहा जाता है। 'म अमृतबीज है तथा द्रव का अमृतीकरण करने के लिए इसका ध्यान करना पड़ता है। द्रव लेने से प्रारम्भ में उन्माद तथा अन्त मूछ आती है। इन दोनों में मन की निरोध वृत्ति निष्क्रिय हो जाती है तथा इसको निष्क्रियता से मन अन्य किसी भी वृत्ति के वश में हो सकता है, किन्तु अगर मन को किसी आनन्द मय एकामता में स्थिर किया जाए, तो मन का बुद्धि से एकाकार होगा तथा बुद्धि से मिलाप होने के कारण मन अन्य विषयों की ओर आकर्षित न होकर बुद्धि में, जिसका आत्मा से सम्बन्ध है, मग्न हो जाएगा। ६. 'डा' – 'मत्सर' रूपी छठे समुद्र को पार कराता है। 'ड' जड़ता बोधक अक्षर है। जड़त्व से व्यक्ति में मत्सर बढ़ता है, जो व्यक्ति को पतित करता है। व्यक्ति में जितना हो जानबढ़ता है उतनी ही बढ़ती जाती है, जिससे उसमें अद्धा उत्पन्न नहीं होती। जड़त्व से भरा हुआ मूर्ख चरवाहा 'भेड़ी भेड़ पाती खा' को गुरु का दिया मन्त्र समझ कर उसका श्रद्धापूर्वक जप कर गुड़ से चीनी बन गया। इसी प्रकार वाल्मीकि भी अपने जड़त्व के कारण 'मरा-मरा' जपकर महान् व्यक्ति बन गए। इसीलिए अगर मूर्ख में भी अद्धा उत्पन्न हो जाए तो उसकी राह में अधिक आपत्तियों नहीं आती। श्रद्धा के कारण एकाग्रता हो जाने से व्यक्ति ध्येय पर पहुंच जाता है। ७. 'यै'—'वायु' तथा वाग्-बीज के संयोग से बना है। इसका विकार 'द्वेष' है अर्थात् यह 'द्वेष' रूपी सागर पार कराता है। 'बाक्' से वायु बढ़ती है। व्यक्तियों के वाद-विवाद में जो जीतेगा, उससे दूसरा द्वेष करेगा। उदाहरणार्थ दो समान व्यक्ति अगर एक हो नौकरी के लिए करते हो, जिस एक को नौकरी नहीं मिली, वह दूसरे से द्वेष करेगा द्वेष से अन्तरङ्ग मित्र शत्रु हो जाते हैं तथा एक दूसरे के कर्म से कलुषित होकर दोनों का पतन होता है। किन्तु द्वेष न कर अगर वह व्यक्ति दूसरे को बधाई दे, तो दूसरा कोशिश कर उसे भी नौकरी दिलाने का प्रयत्न करेगा। अतएव द्वेष से व्यक्ति का पतन होता है तथा द्वेष न करने से व्यक्ति उन्नत होता है। ८. 'वि'–'ईर्ष्या'-रूपी समुद्र पार करानेवाला बीज है। 'व' कार सदैव शक्तियुक्त रहता है। 'व' कार जल बीज है जल-बीज शक्ति युक्त हो, तो बड़े-बड़े जहाज डूब जायें, किन्तु अगर तूफान न आए, तो वर्षा न हो। अतएव तूफान क्षय-कारक होते हुए भी जीवन प्रद है. कारण वर्षा अन्न उत्पन्न होता है। ९. 'च्चे' यह नवम सागर है। इसका सम्बन्ध उपर्युक्त आठों सागरों से है। जिस प्रकार आठ कड़ियाँ एक में रखने के लिए फन्दे में फँसाई जाती है, उसी प्रकार 'मन्त्र' रूपी अष्टाक्षरों को शृङ्खलाबद्ध रखने के लिए द्वित्य से भरे हुए 'च्चे' अक्षर-रूपी फन्दे से दोनों तरफ उन्हें जकड़ा गया है। नवार्ण मन्त्र नवार्ण मन्त्र 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' का अर्थ है कि वाक् शक्ति, अर्थ-शक्ति और काम शक्ति रखनेवाली चामुण्डा अर्थात् भोग एवं मोक्षदायिनी परमा शक्ति या धर्म शक्ति शालिनी परमा धर्म शक्ति से मैं वादात्म्य-भाय स्थापित करता हूँ। 'बीज'-प्रय से सत् चित् और आनन्द का बोध होता है 'नवार्ण मन्त्र' को कोई-कोई 'नवार्णव' मन्त्र भी कहते हैं। नव + अर्णव अर्थात् नी समुद्र इस मन्त्र में नौ अक्षर है, तथा प्रत्येक अक्षर एक समुद्र है। | श्रीदुर्गा यन्त्र तत्त्व 'यन्त्र' अर्थात् 'यत्र' का ज्ञान मोक्ष दायक है, क्योंकि यन्त्र' आवरण का द्योतक है। इसके ज्ञान से आवरण का भेदन होता है, जिससे साधक 'विन्दु' तक पहुंचता है अर्थात् विन्दु का ज्ञान होता है। यह ज्ञान संहार क्रम की पूजा से प्राप्त होता है। सृष्टि क्रम के अनुसार अन्तिम और संहार क्रम के अनुसार प्रथम आवरण 'भू-पुर' का भेदन करते हुए दलों, वृत्तियों और त्रिकोणों का भेदन कर 'बिन्दु' तक जाकर 'विन्दु' स्थित कूटस्था शक्ति का ज्ञान साधक प्राप्त करता है। यही आवरण पूजा का रहस्यार्थ है देखिए, पूजा-रहस्य (मूल्य ४०००)। 'यन्त्र' की पर्यायवाचक संज्ञा'' है, जो अनेकार्य वाचक है। 'चक्र' च धातु से बना है (चक्र + र क्) जिसका प्रयोग शत्रु पदार्थ के वाहन में भी होता है। इस प्रकार यह 'दुर्गा' का बोधक है, जिसमें 'बिन्दु'रूपिणी या 'बिन्दु' मध्यावस्थिता दुर्गा महा शक्ति रहती है। स्थूल दृष्टि से 'चक्र' या 'यत्र' को भगवती दुर्गा का निवास स्थान कह सकते हैं। फिर इसी 'चक्क' पद को, यदि 'कु' धातु से बना मानें, तो अर्थ होता है काम करने का उपकरण अर्थात् जिससे कोई कार्य सम्पादित हो यहाँ पूर्वार्थ हो लगता है। मन्त्र के सदृश 'चक्र' या 'यन्त्र' असंख्य है। 'ध्यान' अर्थात् रूप कल्पना के सदृश अपनी अपनी सूझ या दृष्टिकोण के अनुसार ही 'चन्द्रों' या 'चक्रों' की संख्या असीम है। वस्तुतः सनातन आर्य धर्म में एक साध्य के साधन स्वरूप नाम, रूप, मन्त्र यन्त्र मार्ग आदि सब ही अगणित है। साधक अपनी मनोवृत्ति और अधिकार के अनुसार किसी भी रूप की उपासना कर सकता है, परन्तु उपासना सम्बन्धी प्रत्येक वस्तु का रहस्वार्थ समझ कर भगवती दुर्गा के असंख्य पूजन-यन्त्रों में सर्व प्रधान यन्त्र का उद्धार 'रुद्रयामल' के अनुसार यह है विन्दु-त्रिकोण रस कोण विम्बे, वृत्ताष्ट-पत्राञ्चित वह्नि-वृत्तम्। धरा-गृहोद्-भासितमिन्दु-चूड़े, दुर्गाश्रयं यन्त्रमिदं प्रदिष्टम्॥ अर्थात् १ मध्य में 'विन्दु', २ फिर एक 'त्रि-कोण', उसके आहर के 'अष्ट दलान्वित वृत्त से वेष्टित ४ एक 'पद्-कोण' और ५ सबके बाहर एक भू-पुर। (१) विन्दु – यह घनीभूता, अचिन्त्या, अवर्णनीया, अदृष्टा आदि लक्षणोपेता निराकारा महा शक्ति का घोतक है। जिस प्रकार यह महतो महीयान अर्थात् बड़े से बड़ी अर्थात् सबसे बड़ी है, उसी प्रकार अशोरणीयान् अर्थात् अणु का भी अणु अर्थात् छोटे-से-छोटी, जिसकी धारणानहीं हो सकती, भी है। बड़े से बड़ी से यहाँ तात्पर्य है, तशाली होने से, न कि परिमाण में। कारण परिमाण में तो 'विन्दु'– जिससे शून्य रूपी है। वास्तव में 'विन्दु' प्राण शक्ति का परिचायक है, किसी भी पदार्थ का अस्तित्व है। साथ ही जो सर्वव्यापी है। इसे वैज्ञानिक शब्दों में 'सर्गाणु' अर्थात् सृजन या संमृति का मूलाणु कह सकते हैं। 'नित्या हृदय' के अनुसार 'वैन्दव चक्र' की गति अप्रतिम अप्रमेय और अचिन्त्य है। योग वासिष्ठ' के शब्दों में 'विन्दु' मध्य स्थित विलक्षण रूप वह है, जिसका ज्ञान प्रज्ञावानों को भी नहीं है। यहीं विकासात्मिका आदि-शक्ति है, जिससे क्रमशः कर्षाणु, परमाणु विद्युत् कण (ऐलेक्ट्रोन) आदि बन कर दृश्यमान भौतिक जगत् की सृष्टि हुई है। यह द्वि-अणुक (दो अणुवाला) होकर भी अलक्ष्य है। इसमें जब स्फुरत्ता होती है, तो यह सर्व प्रथम एक रेखा हो द्वि-अणुक हो जाता है। फिर 'सरेणु' अर्थात् तीन विन्दु-रूप होकर एक त्रिकोणाकृति का होता है। इसी को 'त्रिकोण' कहते हैं। ( २ ) त्रिकोण यह 'विन्दु' का प्रथम रूप है, जो लक्ष्य में आ सकता है। अप में 'बिन्दु' अचिन्त्य था। अब वहीं परिच्छिन्न रूप में विन्त्य है। इसको तीनों भुजाएँ सत्त्वगुणादि त्रय गुणोपेत है तात्पर्य है कि एक एक भुया एक-एक गुण रूपा है। यह त्रिकोण'–त्रि भुवन अर्थात् ज्ञा, ज्ञान, ज्ञेय वा प्रमात् प्रमाण प्रमेय का द्योतक भी है। फिर त्रि-प्रकाश अर्थात् सूर्य, चन्द्र, अग्नि-रूप वृत्त जय प्रकाश रूप का भी बोध इससे होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से 'विन्दु ही स्वेच्छा से सम्बाई, चौड़ाई और मोटाई युक्त साव और परिमित 'त्रिकोण'-स्वरूप बनता है। यही प्रथम विकास है। अव्यक्ता प्रकृति व्यक्त होने चली है। 'त्रिकोण' की तीनों भुजाएँ क्रमशः इच्छा ज्ञान और क्रिया-इनन शक्तियों की घोतक है। द्वि-अणुक स्वरूप में केवल इच्छा और ज्ञान शक्ति द्वय रूप होने से जो अलक्षित भी वह क्रिया शक्ति द्योतक तीसरे विन्दु के संयोग से अर्थात् जसरेणु तक प्रसारित होने पर लक्षितावस्था में आ (३) पद कोण-त्रि-गुणात्मिका महा-शक्ति-रूपी 'त्रि कोण' अपने को षट्-गुण द्योतक 'पद- कोण' से वेष्टित करता है। पर ज्योति रूपी 'बिन्दु' के त्रिगुणात्मक होने से किरणें प्रसारित होती हैं, जिससे ब्रह्म ईश्वर रूप में आता है। 'ईश्वर'- षट्-गुणोपेत या षडैश्वर्ण्य युक्त होता है। 'ईश्वर' के पे छः गुण है १ ऐश्वर्य, २ धर्म, ३ वश ४ श्री ५ ज्ञान और ६ विज्ञान अन्य मत से १ ऐश्वर्य, २ वीर्य, ३ यश ४ सौभाग्य ५ ज्ञान और ६ वैराग्य ये ही छः प्रकार के 'भग' या 'ऐश्वर्य' है। ये कहाँ कोई द्रव्य नहीं है, प्रकाश शक्ति घोतक 'विन्दु' की प्रतिभाएँ है, अतः वे 'बिम्ब' कहे गए हैं। (४) अष्ट दलान्वित वहि-वृत्त षट् गुणात्मक ईश्वरी सत्ता को 'विन्दुरूप परमा सत्ता अपनी आवरण शक्ति अर्थात् माया द्वारा करती है। इसी को अर्थात् आवृत्त करनेवाली को 'वृत्ति' वृत्त कहते हैं 'विन्दु' रूपी मन से समष्टि मन का तात्पर्य है, व्यष्टि मन का नहीं प्राण शक्ति अपनी स्पन्दन शक्ति से आठ प्रकार की चाल से वृद्धि बनाती है, अपने को वृत्ताकार में परिणत करती है। इस 'वृत्त' की अष्ट-वृत्तियों अष्टधा प्रकृति की आठ वृत्तियाँ हैं, जो दृश्यमान प्रपञ्च है। 'वृत्त' से अनेक तात्पयों का ज्ञान होता है। इससे 'माया' अर्थात् परिच्छिन्न करनेवाली आवरण शक्ति का 'संमृति' अर्थात् पूर्ण रूपिणी के अनेक पूर्ण रूपों में परिणत होने का, 'काल 'शक्ति' के नृत्य का भाव व्यक्त होता है। संक्षेप में यह चित् ज्योति का प्रसार है। इसी कारण यह ज्योति-वाचक 'वह्नि' के विशेषण से युक्त है। वृत्त के आठ 'दल' या 'पत्र' है। विकास क्रिया में वक्रता अर्थात् मोड़-माड़ 'अष्ट-दल'– होती है। ये पत्र इन्हीं के द्योतक है। 'पत्र' का शब्दार्थ भी ऐसा ही है-'पतृ ष्टन्' पत्र का अर्थ है चलन, साधन इसी से इनका अर्थ है- रथ, घोड़ा, ऊँट इत्यादि पक्षी के डैने (पंखो) को भी पत्र कहते हैं। जिस प्रकार हम रथ, घोड़े, ऊँट आदि पर बैठकर एक स्थान से दूसरे स्थान को शीघ्र और से जा आ सकते है, पक्षी अपने पक्षों सुगमता के सहारे उड़ सकते हैं, उसी प्रकार प्रकृति अपने आठ पत्रों अर्थात् १ अहङ्कार, २ बुद्धि, ३ मन, ४ आकाश, जल और अव्यक्ता के द्वारा अपने आपको व्यक्त करती है। इन्हीं को सूक्ष्म आठ पुरियाँ' (सूक्ष्म पुर्य्यष्टक) श्रुतियों में और तन्त्रों में कहा है। समष्टि-भाव में ये 'अष्ट दल' १ प्रकृति, २ महत्तत्त्व, वायु, ६ अग्नि ७ ३. अहङ्कार, ४ पञ्चतन्मात्रा-गण, ५ पञ्च भूत ६ दश इन्द्रिय ७ अन्तःकरण और ८ पुरुष के द्योतक है। व्यष्टि भाव में १ काम, २ क्रोध, ३ लोभ, ४ मोह, ५ मद, ६ मात्सयं, ७ पुण्य और ८ पाप का इससे बोध होता है। इन पत्रों की अधिष्ठात्री देवताओं ब्राह्मी आदि की भावना भी ऐसी ही है। देखिए, 'भावनोपनिषत् । ५ भू-पुर- सूक्ष्म महाप्राण शक्ति अष्टधा प्रकृति-रूप में दसों दिशाओं में दश-प्राण [सम्पन्ना सृष्टि करता है। इन दस प्राण शक्तियों को क्रमशः १ प्राण, २ अपान, ध्यान, ४ उदान, ५ समान ६ नाग, ७ कूर्म, ८ कुकर, ९ देवदत्त और १० धनजय कहते हैं। इन्हीं शक्तियों के साधन से अणिमादि दस सिद्धियां मिलती है। व्यष्टि भाव में प्रथम पञ्च-यापु जठराग्नि के १ रेचक, २ पाचक, ३ शोषक, ४ दाहक और ५ प्लावक पाँच रूप है तथा अन्तिम पाँच नागादि पञ्च प्राण – १ क्षारक, २ उद्गारक, ३ क्षोभकर, ४ जृम्भक और ५ मोहक रूपों में अवस्थित हैं। ये दशों प्राण वह्नि की दश कलाओं के द्योतक हैं। श्रीदुर्गा भगवती के 'यन्त्र' या 'चक्र' का संक्षेप में यही त (भावार्थ) है। यह समष्टधात्मक चक्र सभी जीवों के शरीर में है, जिस प्रकार अन्य महा शक्तियों ( महाविद्याओं) के चक्र का भी अस्तित्व पिण्डाण्ड (जीव-शरीर) में उन-उन विशेष शक्ति या महाविद्या के उपासक अपने-अपने क्रम से मानते हैं। सारांश यह है कि सभी श्री चक्र' एक ही प्राण-शक्ति तत्व के परिचायक है। इसका ज्ञान प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है।श्रीदुर्गा आराधना तत्त्व भगवान् राम ने भगवती दुर्गा की आराधना की थी। 'राम कथा' से 'श्रीदुर्गा-आराधना तत्व' भली भाँति स्पष्ट होता है। अतएव यहाँ इस सन्दर्भ में 'राम कथा' का सारांश प्रस्तुत है। यथा भगवान् राम ने भगवती दुर्गा प्राण महा शक्ति की आराधना करके ही 'रावण' आदि राक्षसों का वध किया था। वास्तव में देव, दानव, यक्ष, किन्नर, प्रेत आदि के स्थूल शरीर नहीं होते। वे आसुरी भावों के रूप में मनुष्यादि जीव-शरीर में रहकर आत्म भाव को नष्ट करने का त प्रगल करते हैं और इन्द्रिय-सुख बाह्य भोगों में ही तत्पर रहते हैं। इसी उद्देश्य से ये देह-रूपी 'लङ्का' अवस्थित है। 'लङ्का' शब्द का, जो 'लकि' धातु से बना है और सुख पाने के अर्थ में प्रयुक्त होता है, अर्थ है–सम्वेदन (यहाँ सुख-सम्वेदन) स्थान अर्थात् देह। इसी देव-रूप पुरी में महा मोह या मूर्तिमान् अहङ्कार स्वरूप दश-मस्तक 'रावण' रहता है। दत्तो इन्द्रियाँ ही महामोह या अहन्ता (अपराहन्ता) के दश मस्तक स्वरूप है। उक्त अहन्ता रूप रावण, इन्द्रिय-गण की वृत्तियों रूप परिवार गण सहित मन्द-भावों के भाण्डार स्वरूप 'मन्दोदरी' (मन्दी भावो यस्या उदरे अस्ति सा) नाम सह-धर्मिणों से युक्त इसी जीव-देह में अवस्थित है। वर्तमान जीव-देह हो राक्षस-पुरी है, ऐसा कहना अत्युक्ति नहीं है। कारण पाश-बद्ध जीव और राक्षस भाव की प्रवृत्ति में पार्थक्य नहीं है। इस प्रकार जीव-भाव ही राक्षस-भाव है। अन्य राक्षसों का अस्तित्व कवि की कल्पना मात्र है। स्थिर प्राण शक्ति से सम्पन्न आत्माराम स्व-विस्मृति भाव में जीव-देह में रहता के विषयों में शब्द से रमण करनेवाले का बोध होता है। इस पद से संसार के है। 'राम' रमण करनेवाले और आत्मा में रमण करनेवाले दोनों का ज्ञान होता है। ये दोनों लक्षण जीव के हैं। तात्पर्य यह कि 'रमा' के सङ्ग रमण करनेवाले ही 'राम' है अर्थात् चञ्चला प्राण शक्ति ही राम-रूपा प्रकृति है और स्थिर प्राण-रूप ही ईश्वर या पुरुष आत्माराम है। वहीं ईश्वर (राम) सब भूतों के अन्दर आत्म-विस्मृति भाव में समान भाव से रहते हैं। जिस प्रकार सुन्दर शरीर विशिष्ट 'सुरथ ने प्राण शक्ति रूपा महा-माया दशभुजा दुर्गा की आराधना से आसुर भावों को जीत कर 'मन' अर्थात् पूर्ण ज्ञानी होने में सफलता पाई थी, उसी प्रकार श्री रामचन्द्र' ने भी तय भाव में साधन-समर द्वारा निज-देह स्थित आसुरी सगों को जीतकर आत्म-शक्ति स्वरूपा 'सीता' को पुनः प्राप्त किया था। रामचन्द्र ने धनुर्भङ्ग कर 'गुरु' रूपी जनक से 'विद्या' या 'ज्ञान' रूपिणी 'सीता' (आत्म विद्या) को पाया था। धनुर्भङ्ग से किया योग का बोध होता जो प्राण योग या प्राण याग का एक है। यह ग्रन्थि भेद योग क्रिया की पर्यायवाचक भङ्ग क्रिया या त्रिभङ्ग क्रिया योग है। संक्षेप में इसका रूप है- मूलाधार भङ्ग या ब्रह्म ग्रन्थि भेद अनाहत भट्ट या विष्णु ग्रन्थि भेद और आज्ञा भट्ट या रुद्र ग्रन्थि भेद। यहाँ शाखों में मतभेद है। एक मत है कि विशुद्ध चक्र-भेद होने से रुद्र-ग्रन्थि-भेद होता है और दूसरा मत पूर्वोक्त है। श्रीकृष्ण भगवान् को त्रिभङ्गी छवि इसी भाव के आधार पर कही गई है। क्यों न हो? आप योगेश्वर जो थे। गुरु नानक का भी वचन है—'तीनों बन्ध लगाय के, सुनो अनाहत टङ्को 'नानक' शून्य समाधि में, ना है भोर ना है सन्च्या तात्पर्य यह है कि इन्हीं भिङ्ग स्थानों में आसुर भावों का नाश होता है। दुर्गा भगवती के एक ध्यान में इसी भाव की परिचायक उक्ति है-'त्रिभङ्ग संस्थानां महिषासुर मर्दिनीम्' (प्राण-तोषिणी तन्त्र 'विदेह जनक ने भी 'क्षेत्र' का कर्षण कर 'विद्या' को पाया था, कवियों ने आलङ्कारिक शब्दों में कहा है कि दुर्लक्ष होने पर राजर्षि जनक ने शस्य क्षेत्र को हल से जोतते समय 'सीता' नाम की कन्या को पाया था। कवियों की इस प्रकार की कल्पनाओं और पुराण-कर्ताओं के रूपच्छलात्मक कथानकों की अपनी सार्थकता है। इस प्रकार के लेखों से अपमाधिकारी व्यक्तियों को, जिनके निमित्त ये लिखे गए है, प्राथमिक ज्ञान मिलता है और भगवत् अनुरक्ति उनमें बढ़ती है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा है कि पुराण और इतिहासादि ग्रन्थ स्त्री और शूद्रों के लिए उपयोगी है। इस 'क्षेत्र' (खेत) के सम्बन्ध में कहा है कि वर्तमान जीव शरीर (ज्ञान की प्ररोह भूमि) ही यथार्थ 'क्षेत्र' है। इसके तत्व वेता को 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं- "इदं शरीरं कौन्तेय! क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद् यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः १३१। गौतोकि से ज्ञात होता है कि जीव के वर्तमान शरीरस्थ स्थिर प्राण-रूप महा-पुरुष अर्थात् छिन्न-पाश जीव अर्थात् शिव ही एक मात्र 'क्षेत्रज्ञ' पद से वाच्य है क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि, सर्व क्षेत्रेषु भारत! क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोज्ञान, यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ -'गीता', १३२ यह शिव अपर शिव अर्थात् जीवन्मुक्तात्मा है। यही 'जनक' थे। यह पद प्राप्त के द्वारा जीव शरीर रूप क्षेत्र कर्षित करने से ज्ञान की प्राप्ति से मिलता है। यही यथार्थ कृषि कर्म है, जो क्रियोपयोग के अन्तर्गत केवल गुरूपदेश से समझ आता है। यह पौस्तिकी ज्ञान से भिन्न यथार्थ विशेष ज्ञान है। अथवा ऐसा कहना अत्युक्ति न होगा कि पौस्तिको ज्ञान विडम्बना मात्र है। कार्य साधन करानेवाली एकमात्र गुरु-वाक् है 'मुक्तिदा गुरुवागेका, विद्या सर्वां विडम्बना' (कुलार्णव)। अस्तु, 'जनक' रूपी गुरु ने इसी प्रकार की शरीर-कर्षण-रूप प्राणायामादे क्रिया द्वारा विद्या रूपिणी 'सीता' नाम्नी कन्या आत्म विद्या का जिससे आत्म शक्ति की प्राप्ति होती है, लाभ किया था। इसी कृषि कार्य को लक्ष्य में रखकर बङ्ग-देशीय सिद्ध साधक वर रामप्रसाद सेन ने कविता लिखी है—'मन तुमि कृषि कार्य जानी नो' इत्यादि। वस्तुतः जीवन्मुक्त 'जनक' ने स्थूल रूप से क्षेत्र कर्षण कर कन्या लाभ नहीं किया था।रामचन्द्र ने भी स्थूल धनुष नहीं तोड़ा था। इनका धनुष को तीन टुकड़ों में तोड़ना रहस्य भाव से यह जताता है कि इन्होंने गुरु परम्पराक्रम से जनक रूपी गुरु से त्रिभङ्ग विद्या प्राप्त कर सीता रूपी आत्म-विद्या लाभ की थी। इसी भाव की समर्थक यह शाखांति है अथ मे कृषतः क्षेत्रं, लाङ्गलादुत्थिता ततः । क्षेत्र शोधयता लब्धा, नाम्नी सीतेति विभुता ॥ तत्पश्चात् राम की वनवासावस्था में अर्थात् कालवश आत्माकार-वृत्ति मण्डल से हट जाने पर राम के शरीरस्य महा-मोह-रूप या अहङ्कार-रूप आसुर सपन रावण द्वारा इनकी आत्म-शक्ति-रूपिणी सीता हर ली गई अर्थात् यह आत्म-शक्ति-आवृता या आच्छन्ना हो गई। कथानकों लिखा है कि चौदह वर्षों का वनवास हुआ तात्पर्य यह कि चौदहों आवरणों में वृ आवरणेस उणादि विचरण वा रमने का आदेश मिला अर्थात् वैसी चित्तवृत्ति उत्पन्न हुई। यह कुवृत्ति 'दशरथ' अर्थात् दशों दिशाओं में जानेवाले अर्थात् मन की 'भौतिक' नाम की तीसरी शक्ति ( कौशल्या और सुमित्रा क्रमशः 'पर शक्ति' और 'सूक्ष्म शक्ति' की योतिका है) 'कैकेयी' की प्रेरणा से उत्पन्न हुई। इस पर राम आत्म विस्मृत हो स्व-शरीर रूप वन में आत्मानुसन्धान करने लगे। अनुसन्धान करते-करते राम ऋष्यमूक अर्थात् आज्ञा चक्र (भू मध्य) पर गए। यहाँ पर प्रधान दश प्राणों में प्रथम रुद्ररूपी पवन तनय हनुमान से इनका साक्षात्कार हुआ। इसके बाद अपर प्रधान प्राण-रूपी वायु-गण से साक्षात्कार हुआ। दशी प्राण वायु 'ऋष्यमूक' पर्वत पर इन्द्रिय-गण के अधिपति इन्द्र-रूपी वर्तमान मन के पुत्र 'वालि' अर्थात् कुपित वायु के डर से प्रच्छन भाव से (लुक छिप कर) रहते थे। इसी कुपित वायु-रूपी 'बालि' को दशों प्राणों के उद्धार के हेतु, जिससे इनको अपनी-अपनी क्रिया अबाधित रूप से हो सकेमरूपी 'राम' ने कौशल से अर्थात् प्राणायाम योग-रूप कौशल से मार डाला अर्थात् कुपित वायु को साम्यावस्था में ले आए। कथानकों में रूपक-स्थल में लिखा है कि गले में माला पहना कर उसे बालि से युद्ध करने को भेजा गया था। यह भी रहस्यार्थ से खाली नहीं है। 'सुग्रीव' से श्वसन-वायु का बोध होता है। इस श्वसन-वायु के सदा-शिव के आलय अर्थात् कण्ठ- देश में अजपा माला (माला से दीप्ति का बोध होता है) दी गई थी। यह स्वतः सिद्ध है कि बिना अजपा जप माला-साधन के श्वसन वायु बलिष्ठ नहीं होता। कथानक में यह भी लिखा है कि राम की शक्ति की जाँच पूर्व ही सप्त दल-भेद से कर ली गई थी। अर्थात् राम ने सातों तालों अर्थात् सातों दुर्गासनों को एक ही शर से विद्ध किया था। सप्त-दुर्ग अर्थात् शरीर के सातों आसनों से १ भूः (मूलाधार), २ भुवः (स्वाधिष्ठान), ३ स्वः (मणिपुर), ४ महः (अनाहत ), ५ जनः (विशुद्ध), ६ तपः (आज्ञा) और ७ सत्यं (सहस्रार)- इन सातों चक्रों का बोध होता है। इन सातों चक्ररूपी तालों का भेदन एक ही शर अर्थात् एक ही प्राण शक्ति की आरोहण क्रिया से जो नहीं कर सकता, यह कुपित महाबलिष्ठ 'बालि' को नहीं मार सकता तात्पर्य यह कि जो सहस्रार में अजपाजप-रूप गायत्री दुर्गा के आवास स्थल में अजपाजप-रूप काल की स्थिति अर्थात् श्वास काल की अवस्थिति नहीं कर सरकता है अर्थात् पर्याप्त काल-स्थित प्राण-शक्ति को स्थिर नहीं कर सकता, वह कुपित वायु को नष्टः नहीं कर सकता। अब जब कुषित वायु (बालि) नष्ट हो गया, तब दशों प्राणों में से प्रधान स्वसन वायु रूपी शिव हो गया अर्थात् छिन्न-पाश हो गया। 'सुग्रीव' शब्द का अर्थ है- सुन्दर कन्धरवाला कधर से क्रिया योग प्रकरण में वायु धरनेवाला अर्थात् प्राणों का आयमन करनेवाला (श्वास क्रिया को बन्द करनेवाला) 'कं वायुं धरतीति कन्धरः', ज्ञान-योग-प्रकरण में ब्रह्मा ब्रह्मभाव के धारण करनेवाले कारण 'क' से ब्रह्मा का भी बोध होता है। (अनिर्वचनीय ब्रह्म को श्रुतियों के ब्रह्म' कहती हैं।) रामचन्द्र ने इन्हीं दशों प्राण-रूपी और असंख्य वायु-रूपी अप्रधान बन्दर और भालू की सहायता से खोई हुई सीता-रूपिणी आत्मशक्ति का पुनरुद्धार किया था। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि वायु तो ४९ ही हैं, असंख्य किस प्रकार हुए? वायु असंख्य नहीं है वरन् ४९ ही हैं, परन्तु शरीर में धमनियों असंख्य हैं, जिनमें से प्रत्येक धमनी में वायु नाना भाव से नाना रूप से प्रवेश कर जाना रूप का कार्य करते हैं। अतएव क्रिया-गुणवतः वायु को असंख्य कहा है। इनकी सहायता से और सब आसुरी सर्ग तो नष्ट हो गए। अब बचा केवल 'रावण' अर्थात् द्वैत-भावापन्न 'अहन्ता भाव'। इस 'रावण' को रामचन्द्र प्राण महा शक्ति' या 'महा-चिति-स्वरूपा' दुर्गा की आराधना अर्थात् सम्बद्धनी क्रिया कर इसको प्रसन्न कर (प्रकर्ष-रूपेण सन्ना) अर्थात् पूर्ण रूप से प्राण-शक्ति को स्थिर कर प्राणायाम द्वारा ही मार सके थे। यह तो हुई क्रिया या कर्म योग की बात 'ज्ञान योग में प्राणायाम से तात्पर्य है पूर्ण तादात्म्य तात्पर्य यह कि अद्वैत-भाव के स्थिरत्व से ही द्वैत-भाव का नाश होता है। 'रावण' मरा नहीं है। असंख्य रावण- हम सब में विद्यमान है। मनन करनेवाले ऐसा अवश्य ही जानते हैं और जान सकेंगे। तभी तो राधेश्याम ने कहा है मुनि बोले जग को अभी मिला नहीं विश्राम अभी हुआ ही है कहाँ, रावण का वध राम॥ माया का सागर चहुँ दिश है, उसमें शरीर यह लङ्का है। अभिमान का रावण बैठा है, जो बजा रहा निज डड्डा है। है स्वार्थ का इसमें मेघनाद, आलस है कुम्भकर्ण भगवन् । बंध करो कृपा शर से इनका, तब हो भू-भार हरण भगवन् । अस्तु हम सब में विद्यमान असंख्य रावण को श्रीदुर्गा-आराधना' के द्वारा ही नष्ट किया जा सकता है। 'श्रीदुर्गा' की आराधना का यही मुख्य लक्ष्य है। संदर्भ ग्रंथ -श्रीदुर्गा कल्पतरू

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Bhavana Gupta May 5, 2021

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