Ranju  Kumari
Ranju Kumari Apr 13, 2021

🙏🌹🌷Jai Mata Di🌹🌷🙏

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कामेंट्स

JIGAR Apr 13, 2021
Jay Mata Di 🙏🙏

K L Tiwari Apr 14, 2021
🌷🏵️🌷जय🌾 श्री 🌷माता 🌼की 💮बहन🌹💜🙏💜🌹🌹🙏🌹🙏💙🙏चरण💜वन्दन🙏💛बहन🙏🌹🙏🌹

CG Sahu Apr 15, 2021
bahut hi sunder geet radhe Krishnaj nice sweet good afternoon laxmi narayan ji ki kripa bani reh app per 🙏🏻🙏🏻

CG Sahu Apr 16, 2021
@ranjukumari ok thanks nice sweet good afternoon laxmi narayan ji ki kripa bani reh app per 🙏🏻🍦👏🌹🙋‍♀️

CG Sahu Apr 20, 2021
@ranjukumari ok thanks nice sweet good afternoon 👌🏻👌🏻🙏🏻🙋‍♀️👏🌹

gobinda kr jaiswar May 11, 2021

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Dr.Rajeev sharma May 11, 2021

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श्री कालिका महापुरण में आज आभूषणों के नाम व प्रकार आदि भूषण बताये जाते हैं, किरीट शिरोरत्न, कुण्डल, ललाटिक, ताल पत्र, हार, ग्रैवैषक, उर्मिका, प्रालम्बिका, रत्न सूत्र, उत्तुंग, तक्ष मालिका, पार्श्वद्योत, नखद्योत, अंगुलीच्छादक, अंगद, बाहुवलय, शिखाभूषण, इंगिका, प्राग्दण्वन्ध, नीवी, मुष्टिबन्ध, प्रकीर्णक, पादांद, हंसक, भूपुर, क्षुद्रघण्टिका, मुखपट्ट, ये परम सुशोभन अलंकार कहे गए हैं ये कुल चालीस होते हैं जो देवलोक में सौम्य के प्रदान करने वाले हैं। अलंकारों के प्रदान करने चारों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) वर्गों का प्रसाधन होता है । इसका पूजन करके ही इष्ट की सिद्धि के लिए समर्पण करना चाहिए। विचक्षण पुरुष को उनके दैवत का उच्चारण करके ही पूजन करना चाहिए । अथवा शिरोगत सौवर्णों को सर्वदा समर्पित करना चाहिए । हे भैरव! चूड़ारत्न आदि भूषण ग्रैवेयक से आदि लेकर हंस के अन्त तक सब सुवर्ण से निर्मित हों अथवा रजत (चाँदी) से रचित होने चाहिए । इन्हीं को देवताओं के लिए समर्पित करना चाहिए और अन्य तेजस अर्थात् धातुओं से विरचितों को निवेदित नहीं करना चाहिए । रीति रंग आदि से निर्मित पात्र और उपकरण आदि ही होने चाहिए । इन भूषणों की बीच में इससे उपभूषण देवे। सब ताम्रमय जो कुछ भी भूषण आदि हैं उन्हें निवेदित करे । सर्वत्र ताम्र आभूषण भी स्वर्ण की ही तरह से दे और अर्घ्य पात्र में अधिक देना चाहिए। पूजा का अर्घ्य पात्र, नैवेद्य का आधार पात्र, पालक है। भगवान् विष्णु के लिए सदा उदुम्बर (गूलर वृक्ष) से निर्मित प्रीति तथा सन्तोष देने वाले होते हैं । ताम्रपात्र में देवगण प्रसन्न हुआ करते हैं क्योंकि ताम्र में देव सदा स्थित रहा करते हैं । ताम्र सबके लिए प्रीति का करने वाला हुआ करता है । अतएव ताम्र का प्रयोग करना चाहिए। हे भैरव! अपने उपयोग में भी ताम्र का ही प्रयोग करे और देवगणों के भी उपयोग में इसका प्रयोग करना चाहिए। ग्रीवा के ऊपर के भाग में कभी भी रौप्य (चाँदी का भूषण का प्रयोग न करे ) । अब उपभूषण बताये जाते हैं। प्रावार, दान पात्र, गण्डक और गृह हैं । पर्य्यक आदि जो और दूसरे है। वे सब आभूषण हैं । जो सौम्य परिपूर्ण के बिना और काँसे के बिना भूषण होता है वह सुवर्ण और रौप्य के अभाव में शरीर में नीचे नियोजित करना चाहिए। इन भूषण आदि में जो भी नरों के द्वारा दिया जा सकता है, वही सम्भव होने पर सब ही देना चाहिए । इस प्रकार से भूषण चतुर्वर्ग का दाता और सब सौख्य का प्रदान करने वाला हुआ करता है । अपनी शक्ति के ही अनुसार तुष्टि और पुष्टि के करने वाला भूषण कहा गया है हे पुत्रों ! हे वेताल और भैरव! अब भली भाँति गन्ध का श्रवण कीजिए । यह गन्ध पाँच प्रकार का होता है, जो देवों की प्राप्ति को प्रदान करने वाला है । चूर्णीकृत, घृष्ट अर्थात् घिसा हुआ, दाह को आकर्षित करने वाला, सम्मर्दन से समुत्पन्न रस अथवा प्राणी के अंग से उद्मन ये ही पाँच भेद हैं । गन्ध का चूर्ण, गन्ध पत्र, पुष्पों का चूर्ण प्रशस्त गन्ध से युक्तों के पत्रों का चूर्ण जो है वे सब गन्ध वह होते हैं । घृष्ट मलय से समुत्पन्न गन्ध है जो मेरु के द्वारा चूर्णीकृत हैं । अगुरु प्रति भी गन्ध है जिसका पंक प्रदान किया जाया करता है । घिस कर भी अघृष्ट गन्ध प्रियादि का जो दग्ध करके ग्रहण किया जाता है वह दाह से समुत्पन्न रस हैं । दाह के साथ आकर्षित गन्ध तीसरा कहा जाता है वह निपीड़न करके ही परिग्रहीत किया जाया करता है । वही सम्मर्द से उत्पन्न गन्ध सम्मर्द से, इस नाम से अभीष्ट हुआ करता । मृग की नाभि से समुत्पन्न, उसके कोप उद्धृत गन्ध प्राणी के अंग से जायमान कहा गया है जो स्वर्ग के निवासियों का भी मोह देनेवाला । कर्पूर गन्ध, साराद्यक्षोद के धृष्टि होने पर संस्थित होते हैं । चन्द्र भाग आदि भी रस में और पंक में संगत हैं । गन्धसार, सर्वरस और गन्धादि में प्रयुक्त किया जाता है । मृग नाभि और घृष्ट, चूर्ण भी अन्य के योग से होता है । रीति से सभी जगह पर गन्ध पाँच प्रकार का होता है । जो मलराज गन्ध है वह दैव कार्य और पितृगण के कार्य में सम्मत होता है। उसका पंकरस अथवा चूर्ण भी भगवान् विष्णु की तुष्टि प्रदान करने वाला होता है। समस्त गन्धों में मलय से समुत्पन्न गन्ध परम प्रशस्त होता है इस प्रकार होता है । इस कारण सम्पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए । हे भैरव ! कर्पूर के सहित कृष्ण अगुरु मलयोद्भूत के साथ वैष्णवी प्रीति का देने वाला होता है तथा यह गन्ध चण्डी देवी के लिए भी प्रशस्त माना जाता है। साधक को चाहिए कि देवता के उद्देश्य के पूर्व में गन्ध का सम्पूजन करे फिर अपने इष्टदेव के लिए उसका वितरण करे तो यह सदा समस्त सिद्धियों के प्रदान करने वाला हुआ करता है । गन्ध के द्वारा मनुष्य अपनी कामनाओं का भला किया करता है और गन्ध सदा ही धर्म देने वाला होता है । गन्ध अर्थों का भी साधन हुआ करता है और गन्ध में मोक्ष भी प्रतिष्ठित है । हे वेताल और भैरव! यह गन्ध आप दोनों को बता दिया गया है । अब वैष्णवी देवी के परम प्रिय जो पुष्प हैं उनके विषय में श्रवण कीजिए । वैष्णवी देवी, कामाख्यादेवी तथा त्रिपुरा देवी का अर्चन निम्नांकित पुष्पों द्वारा करना चाहिए । वकुल, मन्दार, कुन्द, कुरुण्टक, करवीर, अर्क, शाल्मल, अपराजित, दमन, सिन्धुवार, सुरभी, कुरुवक, ब्रह्मावृक्ष की लता, कोमल दुर्वा के अंकुर, दशाओं की मञ्जरी, सुशोभव विल्वपत्र, इनसे यजन करे और अन्य जो भगवान् शिव की प्रीति के लिए पुष्पों की जातियाँ होती हैं । हे वैताल भैरव! उनका भी अब आप श्रवण कीजिए जो मेरे द्वारा अभी कही जा रही है। मल्लिका, मालती, जाती, यूथिका, माधवी, पाटला, करवीर, जवा, तार्परिका, कुब्जक, नगर, कर्णिकार, रोचना, चम्पक, आम्रतक, वाण, वर्वरामल्लिका, अशोक, लोध्र, तिलक, अष्टरूप, शिरीष, शमी, द्रोण, पद्म, उत्पल, वकारुण, श्रेतारुण, विसन्ध्य, पलाश, खादिर, वनमाला सेवन्ती, कुमुद कदम्ब, चक्र कोकन्द, तण्डिल, गिरिकर्णिका, नागकेशर, पुन्नाग, केतकी, अञ्जलिका, दोहदा, बीजापुर, नमेरु, शाल, त्रपुषी, चण्डविल, झिठरी पाँचों प्रकार की ऐवमादि कथित पुष्पों के द्वारा वरदा शिवा का अर्चन करना चाहिए। अपामार्ग के पत्र, भृंगार के पत्र, गन्धिनी के पत्र, वलाहक इससे भी पर हैं। खदिर का पत्र, वञ्जुलान्तवक, आम्र, कवगच्छ इससे भी पर जम्बु का पत्र, बीजपुर का पत्र, इससे भी पर कुश पत्र है । इससे भी पर दूर्वा का अंकुर कहा गया है। इससे पर शमी का पत्र इससे अमालक पत्र और उससे अन्त में आमल पत्र है। सबसे अधिक प्रीति करने वाला देवी को विल्व पत्र होता है । सबसे अधिक प्रीति करने वाला देवी को विल्व पत्र होता है । कोकनद पुष्प, पद्म, जवा, बन्धूक, इन सबसे विल्व पत्र वैष्णवी देवी की तुष्टि देनेवाला माना गया है । सब पुष्पों की जातियों में रक्त पद्म अतीव उत्तम होता है । एक सहस्त्र पद माला की रचना करके जो महादेवी को समर्पित किया करता है और भक्ति की भावना से युक्त रहा करता है उसका ! जो पुण्य फल हुआ करता है उसको सुनिए । एक सहस्त्र करोड़ और सौ करोड़ कल्पों तक वह मानव मेरे पुत्र में स्थित रहकर फिर वह श्रीमान् भूमण्डल में राजा हुआ करता है। सभी पत्रों में विल्व पत्र देवी की परमाधिक प्रीति करने वाला माना गया है। उन विल्व पत्रों की एक सहस्त्र की बनाई हुई माला पूर्व की ही भाँति फल देने वाली हुआ करती है । इस विषय में बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है। साधारण रूप से यही कहा जाता है कि कहे हुए तथा न कहे हुए पुष्पों में समुत्पन्न जल तथा सब पत्रों से जो भी जैसा लाभ होता है वह सर्वोषधियों के समुदाय से भी होता है। सभी वन में समुत्पन्न पुष्पों से और पत्रों के द्वारा भी शिवा का यजन करना चाहिए। पुष्पों के अभाव में पत्रों के द्वारा भी पूजन करना चाहिए। यदि पत्रों का भी अभाव हो तो अवसर में तृण, गुल्म और औषध आदि के द्वारा यजन करे । इनके अभाव में सरसों से जो सित हों उनमें पूजन करे । सित के भी न प्राप्त होने पर मानसी भक्ति का समाचरण करना चाहिए । वाजिदन्तक पत्रों से और पुष्पों की राशि के द्वारा पूजन करे । तुलसी के कुसुमों अर्थात् मञ्जरियों से और तुलसी दलों से श्री की वृद्धि के लिए अर्चन करे । पुरश्चरण के कार्यों में विल्व पत्रों से युक्त तिल, अक्षत अथवा घृत से शिवा का उद्देश्य लेकर यत्नपूर्वक काम की वृद्धि के लिए संस्कार की हुई अग्नि में हवन करना चाहिए । कामना की वृद्धि के लिए संख्या से जो जप संकल्प किया गया है उसके अन्त में पूजन किया है वह द्विजों के द्वारा करना चाहिए । श्रेष्ठ द्विजों ने जिसको पुरश्चरण के नाम से कीर्तित किया हैं उसमें पूर्व में पुराण पूर्वोक्त और विस्तार से वर्णित विधानों के द्वारा कामाख्या और वैष्णवी देवी का पूजन करे । जहाँ तक भी सम्भव हो साधक को यहाँ पर सोलह उपचार समर्पित करने ही चाहिए। उसी भाँति षोडश पूर्वोक्त उपचारों का और विधान के कृत्यों का लंघन नहीं करना चाहिए । सम्पूर्ण पूजन करके कल्पोक्त का सौ बार जप करे । जाप के अन्त में अग्नि में होम करे और होम के अन्त में तीन बलि दे। तीन जाति के बलियों का वितरण करे तथा इसके उपरान्त नृत्य गीत करना चाहिए । पत्नी स्वयं अथवा भाई या गुरु, अपना पुत्र अथवा शिष्य नैवेद्य आदि का विनियोजन करना चाहिए । यज्ञ की समाप्ति पर श्री गुरुदेव को शुभ दक्षिणा देनी चाहिए । सुवर्ण, तिल, गौएं दक्षिणा में देवे और इनके देने की शक्ति न हो तो केवल चेटक ही निवेदित करे । मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में ब्रह्मचर्य रखने वाला तथा इन्द्रियों को जीत लेने वाला रहे और नवमी में अथवा चतुर्दशी में महादेवी का पुरश्चरण करे। है भैरव ! श्री गुरुदेव के मुख से आदान करना करना चाहिए। जो भी विधि और विस्तार कल्प में कहा गया हो उससे इन उक्त तिथियों में भली भाँति पूजन करे । सम्पूर्ण पूजा को न करके ईप्सित मन्त्र को नहीं देना चाहिए अथवा पुरश्चरण भी नहीं करे । यदि ऐसा करता है तो अवसाद प्राप्त किया करता है। जो नित्य पूजा है, यदि की जा सकती है तो सम्पूर्ण पूजा करे और उस समय में अतीन्द्रिय होकर की कल्प में वर्णित पूजन करना चाहिए । हे भैरव ! यदि विस्तार से देवी की पूजा करना न हो तो कल्प में कथित अन्य देव की पूजा करे । अर्घ्य पात्र में आठ बार जप कर उपचारों का प्रसेचन करना चाहिए । आधार शक्ति के प्रमुख मूल वर्गों का प्रयोग करे और हृदय में संस्थित देवता का ध्यान करके और वायु के द्वारा बाहर करके मण्डल में आरेहण करके विधि के अनुसार उपचारों को देना चाहिए । अंगों का पूजन करके उसी भाँति दल देवताओं का यजन करे । फिर तीन पुष्पांजलियों को देकर, जप करके, स्तवन करके और प्रणाम करे । देवता के सामने मुद्रा को प्रदर्शित करके पीछे विसर्जन करना चाहिए। सभी देवताओं की यह ही विधि कही गई है । यदि कल्प में कही हुई पूजा भली भाँति नहीं की जा सकती है तो उपचारों को उस भाँति देने के लिए उस समय में इन पाँचों को सदा वितरित करे । गन्ध, पुष्प, दीप और नैवेद्य, ये पाँच हैं । अभाव में पुष्प और दीप के द्वारा करे, इनके भी अभाव में भक्ति की भावना से ही करना चाहिए । यह संक्षेप पूजा कह दी गई है । *🙏🌹जय भगवती जय महामाया🌹🙏*

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gobinda kr jaiswar May 11, 2021

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