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Anju Mishra
Anju Mishra Feb 18, 2019

ओम् नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🌹 माघ पूर्णिमा इस बार 19 फरवरी 2019 मंगलवार को है। इस  दिन पुष्य नक्षत्र होने से इस दिन का महत्व और अधिक हो गया है।  माघ पूर्णिमा पर स्नान, दान और जप करना काफी काफी फलदायी माना गया है। माघ पूर्णिमा पर ब्रह्म मुहूर्त में नदी स्नान करने से रोग दूर होते हैं। इस दिन तिल और कंबल का दान करने से नरक लोक से मुक्ति मिलती है। जानें कब से शुरु होगी पूर्णिमा पूर्णिमा आरंभ: 19 फरवरी 2019, मंगलवार 01:11 बजे से  पूर्णिमा समाप्त: 19 फरवरी 2019, मंगलवार 21:23 बजे। शुभ मुहूर्त 1: 20 बजे से रात 9 बजकर 10 मिनट तक है  माघ पूर्णिमा व्रत कथा पौराणिक कथा के मुताबिक नर्मदा नदी के तट पर शुभव्रत नामक विद्वान ब्राह्मण रहते थे, लेकिन वे काफी लालची थे। इनका लक्ष्य किसी भी तरह धन कमाना था और ऐसा करते-करते ये समय से पूर्व ही वृद्ध दिखने लगे और कई बीमारियों की चपेट में आ गए। इस बीच उन्हें अंर्तज्ञान हुआ कि उन्होंने पूरा जीवन तो धन कमाने में बीता दिया, अब जीवन का उद्धार कैसे होगा। इसी क्रम में उन्हें माघ माह में स्नान का महत्व बताने वाला एक श्लोक याद आया। इसके बाद स्नान का संकल्प लेकर ब्राह्मण नर्मदा नदी में स्थान करने लगे। करीब 9 दिनों तक स्नान के बाद उऩकी तबियत ज्यादा खराब हो गई और मृत्यु का समय आ गया। वे सोच रहे थे कि जीवन में कोई सत्कार्य न करने के कारण उन्हें नरक का दुख भोगना होगा, लेकिन वास्तव में मात्र 9 दिनों तक माघ मास में स्नान के कारण उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।  जय श्री हरि विष्णु की 🙏🌹

ओम् नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🌹

माघ पूर्णिमा इस बार 19 फरवरी 2019 मंगलवार को है। इस  दिन पुष्य नक्षत्र होने से इस दिन का महत्व और अधिक हो गया है। 

माघ पूर्णिमा पर स्नान, दान और जप करना काफी काफी फलदायी माना गया है। माघ पूर्णिमा पर ब्रह्म मुहूर्त में नदी स्नान करने से रोग दूर होते हैं। इस दिन तिल और कंबल का दान करने से नरक लोक से मुक्ति मिलती है।

जानें कब से शुरु होगी पूर्णिमा
पूर्णिमा आरंभ: 19 फरवरी 2019, मंगलवार 01:11 बजे से 
पूर्णिमा समाप्त: 19 फरवरी 2019, मंगलवार 21:23 बजे।
शुभ मुहूर्त 1: 20 बजे से रात 9 बजकर 10 मिनट तक है 
माघ पूर्णिमा व्रत कथा

पौराणिक कथा के मुताबिक नर्मदा नदी के तट पर शुभव्रत नामक विद्वान ब्राह्मण रहते थे, लेकिन वे काफी लालची थे। इनका लक्ष्य किसी भी तरह धन कमाना था और ऐसा करते-करते ये समय से पूर्व ही वृद्ध दिखने लगे और कई बीमारियों की चपेट में आ गए। इस बीच उन्हें अंर्तज्ञान हुआ कि उन्होंने पूरा जीवन तो धन कमाने में बीता दिया, अब जीवन का उद्धार कैसे होगा।

इसी क्रम में उन्हें माघ माह में स्नान का महत्व बताने वाला एक श्लोक याद आया। इसके बाद स्नान का संकल्प लेकर ब्राह्मण नर्मदा नदी में स्थान करने लगे। करीब 9 दिनों तक स्नान के बाद उऩकी तबियत ज्यादा खराब हो गई और मृत्यु का समय आ गया।

वे सोच रहे थे कि जीवन में कोई सत्कार्य न करने के कारण उन्हें नरक का दुख भोगना होगा, लेकिन वास्तव में मात्र 9 दिनों तक माघ मास में स्नान के कारण उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। 
जय श्री हरि विष्णु की 🙏🌹
ओम् नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🌹

माघ पूर्णिमा इस बार 19 फरवरी 2019 मंगलवार को है। इस  दिन पुष्य नक्षत्र होने से इस दिन का महत्व और अधिक हो गया है। 

माघ पूर्णिमा पर स्नान, दान और जप करना काफी काफी फलदायी माना गया है। माघ पूर्णिमा पर ब्रह्म मुहूर्त में नदी स्नान करने से रोग दूर होते हैं। इस दिन तिल और कंबल का दान करने से नरक लोक से मुक्ति मिलती है।

जानें कब से शुरु होगी पूर्णिमा
पूर्णिमा आरंभ: 19 फरवरी 2019, मंगलवार 01:11 बजे से 
पूर्णिमा समाप्त: 19 फरवरी 2019, मंगलवार 21:23 बजे।
शुभ मुहूर्त 1: 20 बजे से रात 9 बजकर 10 मिनट तक है 
माघ पूर्णिमा व्रत कथा

पौराणिक कथा के मुताबिक नर्मदा नदी के तट पर शुभव्रत नामक विद्वान ब्राह्मण रहते थे, लेकिन वे काफी लालची थे। इनका लक्ष्य किसी भी तरह धन कमाना था और ऐसा करते-करते ये समय से पूर्व ही वृद्ध दिखने लगे और कई बीमारियों की चपेट में आ गए। इस बीच उन्हें अंर्तज्ञान हुआ कि उन्होंने पूरा जीवन तो धन कमाने में बीता दिया, अब जीवन का उद्धार कैसे होगा।

इसी क्रम में उन्हें माघ माह में स्नान का महत्व बताने वाला एक श्लोक याद आया। इसके बाद स्नान का संकल्प लेकर ब्राह्मण नर्मदा नदी में स्थान करने लगे। करीब 9 दिनों तक स्नान के बाद उऩकी तबियत ज्यादा खराब हो गई और मृत्यु का समय आ गया।

वे सोच रहे थे कि जीवन में कोई सत्कार्य न करने के कारण उन्हें नरक का दुख भोगना होगा, लेकिन वास्तव में मात्र 9 दिनों तक माघ मास में स्नान के कारण उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। 
जय श्री हरि विष्णु की 🙏🌹

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कामेंट्स

Shanker Singh Feb 18, 2019
Om Shri हरी विष्णु जय श्री राम जय श्री राधे श्याम जी

Hemant Mavji Kasta Feb 19, 2019
Om Namo Bhagvate Vasudevay Beautiful Post Dhanyavad Friends Aapka Din Mangalmay Ho Suprabhat

Gopal Jethwani Feb 19, 2019
jai Shri Hari Vishnu Shri Krishna Narayan Hari Om namo bhagwatey vasudevaye namah om namo bhagwatey laxminarayan Hari Om namo bhagwatey Narayan Hari Om namo bhagwatey laxminarayan Hari Om namo bhagwatey radhey Krishna vasudevaye namah

Gopal Jethwani Feb 19, 2019
Om namo bhagwatey vasudevaye namah om Shri tulsiyey namah shukrana thank you 💙

pappu. jha Feb 19, 2019
जय श्री राम जय हनुमान शुभ प्रभात प्यारी बहना आप का हर पल मंगलमय हो श्री बजरंगबली की कृपा सदैव आप पर बनी रहे माघी पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं जय हिंद जय भारत वंदे मातरम

Shalini Gotham Feb 19, 2019
जय जय श्री राधे कृष्णा।

मां लक्ष्मी जी की उत्पत्ति कैसे हुई । पुराणों में माता लक्ष्मी की उत्पत्ति के बारे में विरोधाभास पाया जाता है। एक कथा के अनुसार माता लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान निकले रत्नों के साथ हुई थी, लेकिन दूसरी कथा के अनुसार वे भृगु ऋषि की बेटी हैं। दरअसल, पुराणों की कथा में छुपे रहस्य को जानना थोड़ा मुश्किल होता है, इसे समझना जरूरी है। आपको शायद पता ही होगा कि शिवपुराण के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के माता-पिता का नाम सदाशिव और दुर्गा बताया गया है। उसी तरह तीनों देवियों के भी माता-पिता रहे हैं। समुद्र मंथन से जिस लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी, दरअसल वह स्वर्ण के पाए जाने के ही संकेत रहा हो। *जन्म समय :शास्त्रों के अनुसार देवी लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। कार्तिकेय का जन्म भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। कार्तिक कृष्ण अमावस्या को उनकी पूजा की जाती है। *नाम :देवी लक्ष्मी। *नाम का अर्थ :'लक्ष्मी' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- एक 'लक्ष्य' तथा दूसरा 'मी' अर्थात लक्ष्य तक ले जाने वाली देवी लक्ष्मी। अन्य नाम :श्रीदेवी, कमला, धन्या, हरिवल्लभी, विष्णुप्रिया, दीपा, दीप्ता, पद्मप्रिया, पद्मसुन्दरी, पद्मावती, पद्मनाभप्रिया, पद्मिनी, चन्द्र सहोदरी, पुष्टि, वसुंधरा आदि नाम प्रमुख हैं। *माता-पिता :ख्याति और भृगु। *भाई :धाता और विधाता *बहन :अलक्ष्मी *पति :भगवान विष्णु। *पुत्र :18 पुत्रों में से प्रमुख 4 पुत्रों के नाम हैं- आनंद, कर्दम, श्रीद, चिक्लीत। *निवास :क्षीरसागर में भगवान विष्णु के साथ कमल पर वास करती हैं। *पर्व: दिवाली। *दिन :ज्योतिषशास्त्र एवं धर्मग्रंथों में शुक्रवार की देवी मां लक्ष्मी को माना गया है। *वाहन :उल्लू और हाथी। एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू है और धन की देवी महालक्ष्मी का वाहन हाथी है। कुछ के अनुसार उल्लू उनकी बहन अलक्ष्मी का प्रतीक है, जो सदा उनके साथ रहती है। देवी लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर बैठकर भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी भ्रमण करने आती हैं। *दो रूप :लक्ष्मीजी की अभिव्यक्ति को दो रूपों में देखा जाता है- 1. श्रीरूप और 2. लक्ष्मी रूप। श्रीरूप में वे कमल पर विराजमान हैं और लक्ष्मी रूप में वे भगवान विष्णु के साथ हैं। महाभारत में लक्ष्मी के 'विष्णुपत्नी लक्ष्मी' एवं 'राज्यलक्ष्मी' दो प्रकार बताए गए हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार लक्ष्मी के दो रूप हैं- भूदेवी और श्रीदेवी। भूदेवी धरती की देवी हैं और श्रीदेवी स्वर्ग की देवी। पहली उर्वरा से जुड़ी हैं, दूसरी महिमा और शक्ति से। भूदेवी सरल और सहयोगी पत्नी हैं जबकि श्रीदेवी चंचल हैं। विष्णु को हमेशा उन्हें खुश रखने के लिए प्रयास करना पड़ता है। *बीज मंत्र :ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नम:।। *व्रत-पूजा: लक्ष्मी चालीसा, लक्ष्मीजी की आरती, लक्ष्मी की महिमा, लक्ष्मी व्रत, लक्ष्मी पूजन आदि। दीपावली पर लक्ष्मीजी की पूजा गणेशजी के साथ की जाती है। देवी लक्ष्मी की पूजा भगवान विष्णु के साथ ही होती है। जहां ऐसा नहीं होता वहां लक्ष्मी की बड़ी बहन अलक्ष्मी निवास करती है। *अष्टलक्ष्मी क्या है? अष्टलक्ष्मी माता लक्ष्मी के 8 विशेष रूपों को कहा गया है। माता लक्ष्मी के 8 रूप ये हैं- आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी। *माता लक्ष्मी के प्रिय भोग :मखाना, सिंघाड़ा, बताशे, ईख, हलुआ, खीर, अनार, पान, सफेद और पीले रंग के मिष्ठान्न, केसर-भात आदि। *माता लक्ष्मी के प्रमुख मंदिर :पद्मावती मंदिर तिरुचुरा, लक्ष्मीनारायण मंदिर वेल्लूर, महालक्ष्मी मंदिर मुंबई, लक्ष्मीनारायण मंदिर दिल्ली, लक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर, अष्टलक्ष्मी मंदिर चेन्नई, अष्टलक्ष्मी मंदिर हैदराबाद, लक्ष्मी-कुबेर मंदिर वडलूर (चेन्नई), लक्ष्मीनारायण मंदिर जयपुर, महालक्ष्मी मंदिर इंदौर, श्रीपुरम् का स्वर्ण मंदिर तमिलनाडु, पचमठा मंदिर जबलपुर आदि। *धन की देवी :देवी लक्ष्मी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से है। इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं। देवी लक्ष्मी ही इन्द्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं। *समुद्र मंथन की लक्ष्मी :समुद्र मंथन की लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। उनके हाथ में स्वर्ण से भरा कलश है। इस कलश द्वारा लक्ष्मीजी धन की वर्षा करती रहती हैं। उनके वाहन को सफेद हाथी माना गया है। दरअसल, महालक्ष्मीजी के 4 हाथ बताए गए हैं। वे 1 लक्ष्य और 4 प्रकृतियों (दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति) के प्रतीक हैं और मां महालक्ष्मीजी सभी हाथों से अपने भक्तों पर आशीर्वाद की वर्षा करती हैं। विष्णुप्रिया लक्ष्मी :ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं। उनकी माता का नाम ख्याति था। (समु द्र मंथन के बाद क्षीरसागर से जो लक्ष्मी उत्पन्न हुई थीं, उसका इनसे कोई संबंध नहीं।) म‍हर्षि भृगु विष्णु के श्वसुर और शिव के साढू थे। महर्षि भृगु को भी सप्तर्षियों में स्थान मिला है। राजा दक्ष के भाई भृगु ऋषि थे। इसका मतलब वे राजा द‍क्ष की भतीजी थीं। माता लक्ष्मी के दो भाई दाता और विधाता थे। भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती उनकी (लक्ष्मीजी की) सौतेली बहन थीं। सती राजा दक्ष की पुत्री थी। विवाह कथा :एक बार लक्ष्मीजी के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ। माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णुजी को पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे। नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। नारदजी वहां से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में उन्होंने अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गए, क्योंकि उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था। 'हरि' का एक अर्थ विष्णु होता है और एक वानर होता है। भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया। उनको भगवान पर बड़ा क्रोध आया। नारद सीधे बैकुंठ पहुंचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा। जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा। इसलिए राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा। *पुराणानुसार लक्ष्मीजी के 8 अवतार :महालक्ष्मी, जो वैकुंठ में निवास करती हैं। स्वर्गलक्ष्मी, जो स्वर्ग में निवास करती हैं। राधाजी, जो गोलोक में निवास करती हैं। दक्षिणा, जो यज्ञ में निवास करती हैं। गृहलक्ष्मी, जो गृह में निवास करती हैं। शोभा, जो हर वस्तु में निवास करती हैं। सुरभि (रुक्मणी), जो गोलोक में निवास करती हैं और राजलक्ष्मी (सीता) जी, जो पाताल और भूलोक में निवास करती हैं। समुद्र मंथन वाली लक्ष्मी : समुद्र मंथन से कुल 14 तरह के रत्न आदि उत्पन्न हुए थे। उनको सुरों (देव) और असुरों ने आपस में बांट लिया था। पहले हलाहल विष निकला, फिर क्रमश: कामधेनु गाय, उच्चै:श्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पद्रुम ग्रंथ, रम्भा नामक अप्सरा, अप्सरा के बाद महालक्ष्मी निकलीं। कहते हैं कि महालक्ष्मी के रूप में सोना निकला था जिसे भगवान विष्णु ने धारण कर लिया। इसके बाद वारुणी नामक मदिरा, फिर चन्द्रमा, फिर पारिजात का वृक्ष, फिर पांचजञ्य शंख, धन्वंतरि वैद्य (औषधि) और अंत में अमृत निकला था। समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी की उत्पत्ति भी हुई। 'लक्ष्मी' अर्थात श्री और समृद्धि की उत्पत्ति। कुछ लोग इसे सोने (गोल्ड) से जोड़ते हैं, लेकिन कुछ लोग इसे देवी मानते हैं। समुद्र मंथन से उत्पन्न लक्ष्मी को 'कमला' कहते हैं, जो 10 महाविद्याओं में से अंतिम महाविद्या है। अध्ययन से पता चलता है कि समुद्र मंथन से निकली लक्ष्मी को वैभव और समृद्धि से जोड़कर देखा गया जिसमें सोना-चांदी आदि कीमती धातुएं थीं, जो कि लक्ष्मी का प्रतीक है। लक्ष्मी-विष्णु विवाह कथा :कहते हैं कि समुद्र की पुत्री लक्ष्मी देवी थीं। जब लक्ष्मीजी बड़ी हुईं तो वे भगवान नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुनकर उनमें ही अनुरक्त हो गईं और उनको पाने के लिए तपस्या करने लगीं। उसी तरह, जिस तरह पार्वतीजी ने शिव को पाने के लिए तपस्या की थी। वे समुद्र तट पर घोर तपस्या करने लगीं। तदनंतर लक्ष्मीजी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

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TR. Madhavan Jun 17, 2019

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विश्व के सबसे बड़े पांच धर्म हैं:- हिंदुत्व, ईसाईयत, इस्लाम, बुद्धिज़्म और जुडिस्म (यहूदी धर्म)... इन सभी धर्मो को अधिकारिक रूप से मानने वाला कोई ना कोई देश अवश्य है... अर्थात इन देशों ने अपने संविधान में अपना एक राष्ट्रीय धर्म (state religion) माना है। जैसे कि:- #ईसाईयत: इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, जर्मनी, डेनमार्क, आइसलैंड, नॉर्वे, फ़िनलैंड, सायप्रस, ग्रीस, अर्जेंटीना, बोलीविया, कोस्टारिका, अल साल्वाडोर, माल्टा, मोनाको, स्लोवाकिया, स्विट्ज़रलैंड और वैटिकन सिटी ने ईसाइयत को अपने राष्ट्रीय धर्म के रूप में संविधान में जगह दी है। #इस्लाम: अफगानिस्तान, अल्जीरिया, बहरीन, बांग्लादेश, ब्रूनेई, कोमोरोस, मिस्र, ईरान, ईराक, जॉर्डन, कुवैत, लीबिया, मलेशिया, मालदीव, मोरक्को, ओमान, पाकिस्तान, क़तर, सऊदी अरब, सोमालिया, ट्यूनिशिया, UAE और यमन आदि देशों ने राष्ट्रीय धर्म के रूप में इस्लाम को अपनाया। #बौद्ध_धर्म: भूटान, कम्बोडिया, श्रीलंका, थाईलैंड, चीन आदि देशों ने खुल कर बौद्ध धर्म को अपने संविधान में अपना पथ प्रदर्शक माना। #जुडिस्म (यहूदी धर्म): इजरायल देश विश्व भर से विस्थापित हो रहे अंसख्य यहूदियों के लिए एकमात्र शरणस्थली बना और फिर इजरायल ने अपने संविधान में भी अपने धर्म को जगह दी। #हिन्दू: निल बटे सन्नाटा..... पूरे विश्व में एक भी हिन्दू देश नहीं है.. (अधिकारिक रूप से).... 'हिन्दू एक देश रहित धर्म है' (Hinduism is a stateless religion)। आखिरी हिन्दू देश नेपाल था, जो कि अंततः 2006 में माओवाद की बलि चढ़ा दिया गया... यदि पूरे विश्व में कहीं कोई इसाई प्रताड़ित होता है... तो इंग्लैंड उसकी मदद को आता है। यदि कोई मुसलमान प्रताड़ित होता है तो UAE आवाज उठाता है और यदि कहीं किसी यहूदी पर अत्याचार होता है तो इजरायल बीच में आता है। लेकिन आप कहीं भी अपनी सुविधा अनुसार किसी भी हिन्दू को प्रताड़ित कर सकते हैं। कोई कुछ नहीं कहेगा। क्योंकि, जिस धर्म को अपना मानने वाला कोई देश ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में नहीं है, उस धर्म के अनुयायियों की क्या औकात है?? क्या आपको पता है... यदि पूरे विश्व में कहीं से कोई यहूदी अगर विस्थापित होता है या किसी कारणवश वह देशविहीन (stateless) हो जाता है तो वो प्राकृतिक रूप से इसराइल का नागरिक हो जाता है। इसराइल उसे बिना किसी शर्त के अपनाएगा... क्यों? क्योंकि वो उनका धर्म भाई है। क्योंकि वो यहूदी है और क्योंकि यहूदी धर्म ही उनका राष्ट्रधर्म भी है। लेकिन यदि किसी हिन्दू के साथ ऐसा कुछ होता है... तो? तो भारत तो उसे नहीं अपनाएगा... क्यों? क्योंकि उसे अपनाएगा तो फिर बांग्लादेशियों को भी अपनाओ... वाला तर्क दिया जाएगा। सवाल उठाए जाएंगे कि अगर पाकिस्तान या बंगलादेश से प्रताड़ित हिन्दुओं को अपना रहे हो तो म्यांमार से विस्थापित रोहिंग्या मुसलमानों को क्यों नहीं अपनाया था? ऐसे तर्क संवेधानिक रूप से सही भी होंगे, क्योंकि संविधान के अनुसार हमारे राष्ट्र का कोई धर्म नहीं है। भारत एक #धर्मनिरपेक्ष देश है, जो किसी धर्म को नहीं मानता... या यूँ भी कह सकते हैं कि हर धर्म को समान रूप से मानता है। परन्तु क्या ऐसा हकीकत में है?... बिल्कुल नहीं। क्योंकि भारत 60 वर्षो तक एक ऐसा देश बन कर रहा है, जिसे हर धर्म की पीड़ा दिखाई देती है, सिवाय हिन्दू पीड़ा के... ऐसे परिदृश्य में यदि ममता दीदी आपको कुछ आंशिक प्रतिबंधों के साथ ही सही, अगर त्यौहार मनाने की इज़ाज़त दे रही हैं, तो आप लोगों को उनका एहसान मानना चाहिए। वो तो शुक्र मनाओ, डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर जी का, जो संविधान में भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना गए। इसीलिए आज आपको हिन्दू त्यौहार मानने की छूट तो है, भले ही कुछ प्रतिबंधों के साथ हो। (हमारे सविंधान में हमे तोड़ने के इलावा ,जोड़ने की कोई बात नही है) मत भूलो कि आप एक देश रहित धर्म (स्टेटलेस रिलीजन) से वास्ता रखते हैं.... जय हिंदुत्व... (सिर्फ बोलने के लिय है ) इस हिंदुत्व के न आगे और न पीछे कुछ है।

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Ramesh Soni.33 Jun 17, 2019

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १४.१० . प्रश्न १ : मनुष्य किस प्रकार प्रकृति का विशेष गुण की अवस्था प्राप्त कर सकता है ? मनुष्य वासुदेव अवस्था को किस प्रकार प्राप्त कर सकता है ? . उत्तर १ : "प्रकृति के किसी एक गुण की प्रधानता मनुष्य के आचरण में, उसके कार्यकलापों में, उसके खान-पान आदि में प्रकट होती रहती है | इन सबकी व्याख्या अगले अध्यायों में की जाएगी | लेकिन यदि कोई चाहे तो वह अभ्यास द्वारा सतोगुण विकसित कर सकता है और इस प्रकार रजो तथा तमोगुणों को परास्त कर सकता है | इस प्रकार से रजोगुण विकसित करके तमो तथा सतो गुणों को परास्त कर सकता है | अथवा कोई चाहे तो वह तमोगुण को विकसित करके रजो तथा सतोगुणों को परास्त कर सकता है | यद्यपि प्रकृति के ये तीन गुण होते हैं, किन्तु यदि कोई संकल्प कर ले तो उसे सतोगुण का आशीर्वाद तो मिल ही सकता है और वह इसे लाँघ कर शुद्ध सतोगुण में स्थित हो सकता है, जिसे वासुदेव अवस्था कहते हैं, जिसमें वह ईश्र्वर के विज्ञान को समझ सकता है | विशिष्ट कार्यों को देख कर ही समझा जा सकता है कि कौन व्यक्ति किस गुण में स्थित है |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १४.१०, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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Shakuntla Jun 17, 2019

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भगवान विष्णु ने देवी लक्ष्मी को दिया श्राप ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ हिन्दू पुराणों में ऐसी कई पौराणिक कथाएं मिलती है जिनसे सभी मनुष्यों को कोई न कोई प्रेरणा अवश्य मिलती है. भगवान विष्णु से जुड़ी हुई कहानियां किसी न किसी रूप में आज वर्तमान में भी मनुष्यों को जीवन के प्रति सकरात्मक सोच रखने के लिए प्रेरित करती है. जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भगवान विष्णु ने विभिन्न अवतार, मानव कल्याण के लिए रचे थे. भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के अश्व रूप की ऐसी ही एक कहानी भागवत पुराण में मिलती है.एक बार भगवान विष्णु बैकुण्ठ लोक में लक्ष्मी के साथ विराजमान थे. उसी समय उच्चेः श्रवा नामक अश्व पर सवार होकर रेवंत का आगमन हुआ. उच्चेः श्रवा अश्व सभी लक्षणों से युक्त, देखने में अत्यंत सुन्दर था. उसकी सुंदरता की तुलना किसी अन्य अश्व से नहीं की जा सकती थी. अतः लक्ष्मी जी उस अश्व के सौंदर्य को एकटक देखती रह गई. ये देखकर भगवान विष्णु द्वारा बार-बार झकझोरने पर भी लक्ष्मी एकटक अश्व को देखती रही. तब इसे अपनी अवहेलना समझकर भगवान विष्णु को क्रोध आ गया और खीझंकर लक्ष्मी को श्राप देते हुए कहा- ‘तुम इस अश्व के सौंदर्य में इतनी खोई हो कि मेरे द्वारा बार-बार झकझोरने पर भी तुम्हारा ध्यान इसी में लगा रहा, अतः तुम अश्वी (घोड़ी) हो जाओ.’जब लक्ष्मी का ध्यान भंग हुआ और शाप का पता चला तो वे क्षमा मांगती हुई समर्पित भाव से भगवान विष्णु की वंदना करने लगी- ‘मैं आपके वियोग में एक पल भी जीवित नहीं रह पाऊंगी, अतः आप मुझ पर कृपा करे एवं अपना शाप वापस ले ले.’ तब विष्णु ने अपने शाप में सुधार करते हुए कहा- ‘शाप तो पूरी तरह वापस नहीं लिया जा सकता. लेकिन हां, तुम्हारे अश्व रूप में पुत्र प्रसव के बाद तुम्हे इस योनि से मुक्ति मिलेगी और तुम पुनः मेरे पास वापस लौटोगी’.भगवान विष्णु के श्राप से अश्वी बनी हुई लक्ष्मी यमुना और तमसा नदी के संगम पर भगवान शिव की तपस्या करने लगी. लक्ष्मी के तप से प्रसन्न होकर शिव पार्वती के साथ आए. उन्होंने लक्ष्मी से तप करने का कारण पूछा तब लक्ष्मी ने अश्व हो जाने से संबंधित सारा वृतांत उन्हें सुना दिया और अपने उद्धार की उनसे प्रार्थना की.भगवान शिव ने उन्हें धीरज बंधाते हुए मनोकामना पूर्ति का वरदान दिया.इतना कहकर भगवान शिव अंतर्धान हो गए. कैलाश पहुंचकर भगवान शिव विचार करने लगे कि विष्णु को कैसे अश्व बनाकर लक्ष्मी के पास भेजा जाए. अंत में, उन्होंने अपने एक गण-चित्ररूप को दूत बनाकर विष्णु के पास भेजा. चित्ररूप भगवान विष्णु के लोक में पहुंचे. भगवान शिव का दूत आया है, यह जानकर भगवान विष्णु ने दूत से सारा समाचार कहने को कहा. दूत ने भगवान शिव की सारी बातें उन्हें कह सुनाई.अंत में, भगवान विष्णु शिव का प्रस्ताव मानकर अश्व बनने के लिए तैयार हो गए. उन्होंने अश्व का रूप धारण किया और पहुंच गए यमुना और तपसा के संगम पर जहां लक्ष्मी अश्वी का रूप धारण कर तपस्या कर रही थी. भगवान विष्णु को अश्व रूप में आया देखकर लक्ष्मी काफी प्रसन्न हुई. दोनों एक साथ विचरण एवं रमण करने लगे. कुछ ही समय पश्चात अश्वी रूप धारी लक्ष्मी गर्भवती हो गई. अश्वी के गर्भ से एक सुन्दर बालक का जन्म हुआ. तत्पश्चात लक्ष्मी बैकुण्ठ लोक श्री हरि विष्णु के पास चली गई...

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