vandana rajput
vandana rajput Jun 10, 2018

MAA BAP KI SEVA KARNA HAMARA KARTAVY HAI

+68 प्रतिक्रिया 13 कॉमेंट्स • 501 शेयर

कामेंट्स

ardeya ba v jadeja Jun 12, 2018
ap ne ma or baaba ki to sob korte he pon jo apne sas or sosr ko ma bap ka dor ja do bai bou job ati he to un me jivn ata he or job bou unko tod kor jovab deti tob unki nid ud jati he bai ogr ma bap ki seva korni he to dosro ke ma bao ko som jo bou bonke ni beti bon ke jay ram ji

Chandrashekhar Karwa Jan 26, 2020

+11 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 6 शेयर
Chandrashekhar Karwa Jan 26, 2020

BHAKTI Vichar  Chapter - 09,  Serial No  386 – 400 386. जिनके मन में प्रभु को प्राप्त करने का दीप जल गया है उन्हें उस दीप के रूई को कथारूपी घी में डुबोकर रखना चाहिए जिससे आग निरंतर जलती रहे । 387. प्रभु के विरह का अनुभव जीवन में करना चाहिए । 388. संतजन कहते हैं श्री वृंदावनजी में राधे-राधे कहा जाता है क्योंकि कृष्ण-कृष्ण कहने से श्रीगोपिजन विरह में टूट जायेगी और बेहोश हो जायेगी । राधे-राधे कहने से मथुरा में प्रभु तक आवाज पहुँचती है कि श्रीगोपिजन प्रभु को याद कर रही हैं । इसलिए श्री नंदबाबा के भाई श्री उपनंदजी ने श्री वृंदावनजी के द्वारपालों को यह नियम बताया था कि आने वालों को राधे-राधे कहने को कहो । तब से यह नियम है कि श्रीबृज में सब राधे-राधे कहते हैं । 389. या तो हम दुनिया के काम आ सकते हैं और या श्रीगोविंद के काम आ सकते हैं । दोनों में से एक ही हो सकता है । अब यह चुनाव हमारे ऊपर है । 390. प्रभु की कथा हमें संसार से वैराग्य करा देती है । 391. प्रभु कथा हमारे जीवन में अध्यात्म को स्थिर कर देती है । 392. प्रभु कथा से प्रभु के वियोग की ज्वाला जल उठती है । 393. प्रभु की कथा सबके लिए अति रसदायी है । 394. मन की गंदगी को प्रभु की कथा दूर कर देती है । 395. जैसे एक मटकी जिसमें गंदगी भरी हुई है उसमें हम स्वच्छ जल डालते रहेंगे तो गंदगी धीरे-धीरे ऊपर आती जायेगी और एक समय ऐसा आयेगा कि पूरे मटके की गंदगी पूरी तरह निकल जायेगी और मटका स्वच्छ पानी से भर जायेगा । इसी तरह निरंतर प्रभु की कथा सुनते रहने से मन की गंदगी एक दिन पूरी तरह से निकल जायेगी और मन प्रभु को पाने के लिए पूरा स्वच्छ हो जायेगा । 396. जहाँ प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी की कथा हो वहाँ प्रभु श्री हनुमानजी नहीं हो ऐसा हो ही नहीं सकता । प्रभु श्री हनुमानजी सदा वहाँ आकर कथा श्रवण करते हैं । 397. जैसे भगवान की कथा भक्तों को आनंद देती है वैसे ही भक्तों की कथा प्रभु को आनंद देती है । 398. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में भक्तों का चरित्र है, इसलिए प्रभु को श्रीमद् भागवतजी महापुराण अति प्रिय है । 399. प्रभु श्री हनुमानजी की कृपा से श्रीराम प्रेम का रोग हमें लग जाता है । 400. श्री ठाकुरजी को सबसे प्रिय कथा है । www.bhaktivichar.in GOD, GOD & Only GOD   Request you to please SHARE THIS POST to spread the message related to ALMIGHTY GOD.

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Chandrashekhar Karwa Jan 25, 2020

+9 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 3 शेयर
Chandrashekhar Karwa Jan 25, 2020

BHAKTI Vichar  Chapter - 09,  Serial No  371 – 385 371. प्रभु के श्री कमलचरणों में हमारा मस्तक सदैव के लिए झुक जाये, जीवन में इससे सुंदर बात कुछ नहीं हो सकती । 372. प्रभु श्री शुकदेवजी भगवती सरस्वती माता से प्रार्थना करते हैं कि उनकी वाणी को प्रभु गुनानुवाद और लीला गान के लिए अलंकृत कर देवें । 373. ऋषि, संत और भक्त जो कह देते हैं प्रभु को उसे सार्थक करके निभाना पड़ता है । 374. प्रभु कथा सुनकर कभी ऐसी भावना नहीं आनी चाहिए कि हम तृप्त हो गये । ऐसा मानना चाहिए कि मानो हमारी प्यास और बढ़ गई प्रभु के गुणानुवाद को सुनने के लिए । 375. प्रभु का प्रेमी ऐसा होता है कि उसके लिए प्रभु को परिश्रम करते देखना असहनीय हो जाता है । प्रभु जब श्रीगोपिजन के यहाँ माखन का भोग लगाने आते थे तो वे यह सोचती थी कि प्रभु को आने में कितना परिश्रम होता होगा । 376. रावण ने मृत्यु बेला पर श्री लक्ष्मणजी को कहा कि प्रभु इतने दयालु हैं कि मैंने अपनी जीते जी प्रभु को लंका में प्रवेश नहीं करने दिया पर प्रभु ने मेरे जीते जी मुझे वैकुंठ में प्रवेश करवा दिया । 377. जो गति शरणागति लेने पर प्रभु ने श्री विभिषणजी को दी वही गति प्रभु ने विरोध करने वाले रावण को भी दे दी । प्रभु इतने कृपालु की दोनों को प्रभु ने वैकुंठ भेजा और दोनों का उद्धार किया । 378. प्रभु के श्रीमद् भगवद गीताजी में कहे हर वाक्य हमारी रक्षा करते हैं । प्रभु के श्रीवचनों में चलने से हमारी रक्षा स्वत: ही हो जाती है । 379. भक्त वह है जो भक्ति में अमीर है । 380. श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवत गीताजी और श्री रामचरितमानसजी जैसा धन और कुछ भी नहीं हो सकता । ऐसा धन भारतवर्ष के अलावा कहीं नहीं मिलेगा । 381. संत कहते हैं कि प्रभु का नाम ही महाधन है । 382. संत कहते हैं कि हरि नाम ही हीरा है जिसमें ने तो कभी जंग लगता है और नहीं ही कभी कीड़े पड़ते हैं । 383. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के कथा अमृत को जी भर कर पीना चाहिए । 384. प्रभु की कथा का अमृत हमें इस संसार तापों से बचाकर रखता है  । 385. प्रभु की कथा  के रूप में प्रभु ही हमें साक्षात मिल जाते हैं । www.bhaktivichar.in GOD, GOD & Only GOD   Request you to please SHARE THIS POST to spread the message related to ALMIGHTY GOD.

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Chandrashekhar Karwa Jan 24, 2020

BHAKTI Vichar  Chapter - 09,  Serial No  356 – 370 356. प्रभु भक्तों के भाव को स्वीकार करते हैं और उस भाव में बहकर उसका आनंद लेते हैं । 357. जब कालिया नाग ने प्रभु को डंक मारने के लिए अपने फन से प्रहार किया तो प्रभु दो कदम पीछे चले गये और उसका फन धरती को छू गया । प्रभु ने इसे ही प्रणाम मान लिया और कालिया नाग को माफ कर उस पर कृपा कर दी । प्रभु जीव पर कृपा करने का बहाना खोजते रहते हैं । 358. कालिया नाग पर प्रभु ने इतनी कृपा कर दी कि उसे मारा नहीं बल्कि तार दिया । 359. प्रभु का ठप्पा अपने ऊपर लगा लेना चाहिए कि हम केवल प्रभु के ही हैं । 360. प्रभु से सदैव शरणागति की मांग करनी चाहिए । 361. प्रभु के श्री कमलचरणों में दिव्यता है और वे अद्भुत हैं । 362. प्रभु के श्री कमलचरणों के लिए सबसे श्रेष्ठ स्थान अपने सिर को बना लेना चाहिए । यह भक्ति के द्वारा ही संभव है । 363. प्रभु से संवाद करने की आदत डालनी चाहिए । प्रभु से संवाद कभी भी बंद नहीं होना चाहिए । 364. जैसी प्रभु की इच्छा हो वैसा प्रभु करें । भक्तों को ऐसा ही निवेदन प्रभु से करते रहना चाहिए । 365. प्रभु की कथा ही सच्चा अमृत है । श्री गोपिजन प्रभु से कहती हैं कि कथा सुनकर ही उनमें प्रभु के प्रति प्रेम जगा और वे प्रभु के पीछे पीछे चली । प्रभु कथा का इतना बड़ा प्रभाव होता है । 366. भक्ति में प्रभु से कुछ भी नहीं लिया जाता । भक्ति के बदले प्रभु से कुछ लेना तो व्यापार है । 367. जीवन में वैभव बढ़े तो अक्सर देखा जाता है कि हमारी माला कम हो जाती है । ऐसा होना एकदम गलत है । 368. जिस घर में भगवान का स्थान नहीं है वह घर नहीं श्मशान है, ऐसा शास्त्र मत है । 369. घर में प्रभु की प्रतिमा को कभी भी मूर्ति नहीं मानना चाहिए । उन्हें साक्षात प्रभु ही मानना चाहिए । 370. जिस चीज का भोग प्रभु को नहीं लगता वह खाना भी शास्त्रों द्वारा निषेध किया गया है । www.bhaktivichar.in GOD, GOD & Only GOD   Request you to please SHARE THIS POST to spread the message related to ALMIGHTY GOD.

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Chandrashekhar Karwa Jan 24, 2020

+4 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 4 शेयर
Neha Sharma, Haryana Jan 25, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ रात्रि वंदन अगर सत्संग, कीर्तन, हरि कथा में मन नहीं लगता, तो समझ लेना की पाप ज्यादा है। श्रीतुलसीदासजी महाराजने कहा है— तुलसी पूरब पाप ते हरि चर्चा न सुहात । जैसे ज्वरके जोरसे भूख बिदा हो जात ॥ जब ज्वर (बुखार) का जोर होता है तो अन्न अच्छा नहीं लगता । उसको अन्नमें भी गन्ध आती है । जैसे भीतरमें बुखारका जोर होता है तो अन्न अच्छा नहीं लगता, वैसे ही जिसके पापोंका जोर ज्यादा होता है, वह भजन कर नहीं सकता, सत्संगमें जा नहीं सकता। बंगाल के गांवों में एक बुढ़ा आदमी सरोवरके किनारे मछलियाँ पकड़ रहा था। दो भगवान के भक्तो ने उसे देखा और कहा—‘यह बूढ़ा हो गया, बेचारा भजनमें लग जाय तो अच्छा है ।’ उससे जाकर कहा कि तुम भगवन्नाम- उच्चारण करो तो, उसे ‘राम’ नाम आया ही नहीं ।वह मेहनत करनेपर भी सही उच्चारण नहीं कर सका । कई नाम बतानेके बादमेंअन्तमें ‘होरे-होरे’ कहने लगा । इस नामका उच्चारण हुआ और कोई नाम आया ही नहीं । उससे पूछा गया कि ‘तुम्हें एक दिनमें कितने पैसे मिलते हैं ?’ तो उन्होंने बताया कि इतनी मछलियाँ मारनेसे इतने पैसे मिलते हैं । तो उन्होंने कहा कि ‘उतने पैसोंके चावल हम तुम्हें दे देंगे । तुम हमारी दूकानमें बैठकर दिनभर होरे-होरे (हरि-हरि) किया करो ।’ उसको किसी तरह ले गये दूकानपर । वह एक दिन तो बैठा । दूसरे दिन देरसे आया और तीसरे दिन आया ही नहीं । फिर दो-तीन दिन बाद जाकर देखा, वह उसी जगह धूपमें मछली पकड़ता हुआ मिला । उन्होंने उसे कहा कि ‘तू वहाँ दूकानमें छायामें बैठा था । क्या तकलीफ थी ? तुमको यहाँ जितना मिलता है, उतना अनाज दे देंगे केवल दिनभर बैठा हरि-हरि कीर्तन किया कर ।’उसने कहा—‘मेरेसे नहीं होगा ।’वह दूकानपर बैठ नहीं सका । पापीका शुभ काममें लगना कठीन होता है । इसलिए श्री रामसुखदासजी महाराज कहते हैं कि जो भाई सत्संगमें रुचि रखते हैं, सत्संगमें जाते हैं, नाम लेते हैं, जप करते हैं, उन पुरुषोंको मामूली नहीं समझना चाहिये । वे साधारण आदमी नहीं हैं । वे भगवान्‌का भजन करते हैं, शुद्ध हैं और भगवान्‌के कृपा-पात्र हैं । परन्तुजो भगवान्‌की तरफ चलते हैं, उनको अपनी बहादुरी नहीं माननी चाहिये कि हम बड़े अच्छे हैं । हमें तो भगवान्‌की कृपा माननी चाहिये, जिससे हमें सत्संग, भजन-ध्यानका मौका मिलता है । हमें ऐसा समझना चाहिये कि ऐसे कलियुगके समयमें हमें भगवान्‌की बात सुननेको मिलती है, हम भगवान्‌का नाम लेते हैं, हमपर भगवान्‌की बड़ी कृपा है । !! जय श्री राम !! शुभ बोले अच्छा सुने करें शुद्ध व्यवहार दुखियों की आवाज सुन बांटे जग में प्यार !! जय श्री राम !! कागभुशुण्डिजी और गरुड़जी का संवाद?? रामचरितमानस के उत्तरकांड में बाबा तुलसी ने कलयुग का बहुत सुंदर वर्णन किया है, आप भी पढ़ें!!!!! * पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल। नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥ पूर्व के एक कल्प में पापों का मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपारायण और वेद के विरोधी थे॥ हे गरुड़जी! वह कलिकाल बड़ा कठिन था। उसमें सभी नर-नारी पापपरायण (पापों में लिप्त) थे। कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रंथ लुप्त हो गए, दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिए। सभी लोग मोह के वश हो गए, शुभ कर्मों को लोभ ने हड़प लिया। हे ज्ञान के भंडार! हे श्री हरि के वाहन! सुनिए, अब मैं कलि के कुछ धर्म कहता हूँ। कलियुग में न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता। जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आरंभ करता (आडंबर रचता) है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं। जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है। जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान्‌ है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है। जो अमंगल वेष और अमंगल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य-भक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुग में पूज्य हैं। जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं। हे गोसाईं! सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह (उनके नचाए) नाचते हैं। ब्राह्मणों को शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं। सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतों के विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणों के धाम सुंदर पति को छोड़कर पर पुरुष का सेवन करती हैं। सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणों से रहित होती हैं, पर विधवाओं के नित्य नए श्रृंगार होते हैं। शिष्य और गुरु में बहरे और अंधे का सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरु के उपदेश को सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं (उसे ज्ञानदृष्टि) प्राप्त नहीं है), जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरक में पड़ता है। माता-पिता बालकों को बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे। स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञान के सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों (बहुत थोड़े लाभ) के लिए ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते हैं। शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं (और कहते हैं) कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्म को जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। ऐसा कहकर वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं। जो पराई स्त्री में आसक्त, कपट करने में चतुर और मोह, द्रोह और ममता में लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी (ब्रह्म और जीव को एक बताने वाले) ज्ञानी हैं। मैंने उस कलियुग का यह चरित्र देखा। वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं, जो कहीं सन्मार्ग का प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेद की निंदा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरक में पड़े रहते हैं। स्त्री के मरने पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं। वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं। शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यास गद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। कलियुग में सब लोग वर्णसंकर और मर्यादा से च्युत हो गए। वे पाप करते हैं और (उनके फलस्वरूप) दुःख, भय, रोग, शोक और (प्रिय वस्तु का) वियोग पाते हैं। वेद सम्मत तथा वैराग्य और ज्ञान से युक्त जो हरिभक्ति का मार्ग है, मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेकों नए-नए पंथों की कल्पना करते हैं। संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुग की लीला कुछ कही नहीं जाती। कुलवती और सती स्त्री को पुरुष घर से निकाल देते हैं और अच्छी चाल को छोड़कर घर में दासी को ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं, जब तक स्त्री का मुँह नहीं दिखाई पड़ता। जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए। राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही (बिना अपराध) दंड देकर उसकी विडंबना (दुर्दशा) किया करते हैं। धनी लोग मलिन (नीच जाति के) होने पर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विज का चिह्न जनेऊ मात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वी का। जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं। कवियों के तो झुंड हो गए, पर दुनिया में उदार (कवियों का आश्रयदाता) सुनाई नहीं पड़ता। गुण में दोष लगाने वाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्न के बिना सब लोग दुःखी होकर मरते हैं। हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनिए कलियुग में कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाखंड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात्‌ काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभर में व्याप्त हो गए (छा गए)। मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भाव से करने लगे। देवता (इंद्र) पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं। स्त्रियों के बाल ही भूषण हैं (उनके शरीर पर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात्‌ वे सदा अतृप्त ही रहती हैं)। वे धनहीन और बहुत प्रकार की ममता होने के कारण दुःखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्म में उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है, उनमें कोमलता नहीं है। मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा सा जीवन है, परंतु घमंड ऐसा है मानो कल्पांत (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा। कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगने वाले हो गए। ईर्षा (डाह), कडुवे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गई। सब लोग वियोग और विशेष शोक से मरे पड़े हैं। वर्णाश्रम धर्म के आचरण नष्ट हो गए। इंद्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही। मूर्खता और दूसरों को ठगना, यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री-पुरुष सभी शरीर के ही पालन-पोषण में लगे रहते हैं। जो पराई निंदा करने वाले हैं, जगत्‌ में वे ही फैले हैं। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, कलिकाल पाप और अवगुणों का घर है, किंतु कलियुग में एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबंधन से छुटकारा मिल जाता है। सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान्‌ के नाम से पा जाते हैं। सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं। द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं। कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है, वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं। नाम का प्रताप कलियुग में प्रत्यक्ष है। कलियुग का एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर (मानसिक) पाप नहीं होते। यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, (क्योंकि) इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार (रूपी समुद्र) से तर जाता है। धर्म के चार चरण (सत्य, दया, तप और दान) प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलि में एक (दान रूपी) चरण ही प्रधान है। जिस किसी प्रकार से भी दिए जाने पर दान कल्याण ही करता है। श्री रामजी की माया से प्रेरित होकर सबके हृदयों में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मन का प्रसन्न होना, इसे सत्ययुग का प्रभाव जानें। सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार से सुख हो, यह त्रेता का धर्म है। रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मन में हर्ष और भय हो, यह द्वापर का धर्म है। तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुग का प्रभाव है। पंडित लोग युगों के धर्म को मन में ज्ञान (पहचान) कर, अधर्म छोड़कर धर्म में प्रीति करते हैं। जिसका श्री रघुनाथजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षीराज! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट चरित्र (इंद्रजाल) देखने वालों के लिए बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नट के सेवक (जंभूरे) को उसकी माया नहीं व्यापती। - डॉ0 विजय शंकर मिश्र

+485 प्रतिक्रिया 63 कॉमेंट्स • 150 शेयर
Anamika Singh Jan 26, 2020

+12 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 14 शेयर
sahil grover Jan 26, 2020

+8 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB