જય માતાજી

✔ *एक प्रसंग जिंदगी का:*

✍एक 6 साल का छोटा सा बच्चा अक्सर परमात्मा से मिलने की जिद किया करता था। उसकी चाहत थी की एक समय की रोटी वो परमात्मा के साथ खाये।

✍1 दिन उसने 1 थैले में 5, 6 रोटियां रखीं और परमात्मा को ढूंढने निकल पड़ा।
चलते चलते वो बहुत दूर निकल आया संध्या का समय हो गया।

✍उसने देखा नदी के तट पर 1 बुजुर्ग बूढ़ा बैठा हैं, और ऐसा लग रहा था जैसे उसी के इन्तजार में वहां बैठा उसका रास्ता देख रहा हों।

✍वो 6 साल का मासूम बालक,बुजुर्ग बूढ़े के पास जा कर बैठ गया,।अपने थैले में से रोटी निकाली और खाने लग गया।और उसने अपना रोटी वाला हाँथ बूढे की ओर बढ़ाया और मुस्कुरा के देखने लगा,बूढे ने रोटी ले ली,। बूढ़े के झुर्रियों वाले चेहरे पर अजीब सी ख़ुशी आ गई आँखों में ख़ुशी के आंसू भी थे,,,,

✍बच्चा बुढ़े को देखे जा रहा था, जब बुढ़े ने रोटी खा ली बच्चे ने एक और रोटी बूढ़े को दी।

✍बूढ़ा अब बहुत खुश था। बच्चा भी बहुत खुश था। दोनों ने आपस में बहुत प्यार और स्नेह केे पल बिताये।
जब रात घिरने लगी तो बच्चा इजाज़त ले घर की ओर चलने लगा।

✍वो बार बार पीछे मुड़ कर देखता , तो पाता बुजुर्ग बूढ़ा उसी की ओर देख रहा था।
बच्चा घर पहुंचा तो माँ ने अपने बेटे को आया देख जोर से गले से लगा लिया और चूमने लगी,बच्चा बहूत खुश था।

✍माँ ने अपने बच्चे को इतना खुश पहली बार देखा तो ख़ुशी का कारण पूछा, तो बच्चे ने बताया !
माँ,....आज मैंने परमात्मा के सांथ बैठ कर रोटी खाई,आपको पता है उन्होंने भी मेरी रोटी खाई,,,माँ परमात्मा् बहुत बूढ़े हो गये हैं,,,मैं आज बहुत खुश हूँ माँ

✍उस तरफ बुजुर्ग बूढ़ा भी जब अपने गाँव पहूँचा तो गाव वालों ने देखा बूढ़ा बहुत खुश हैं,तो किसी ने उनके इतने खुश होने का कारण पूछा????
बूढ़ा बोलां,,,,मैं 2 दिन से नदी के तट पर अकेला भूखा बैठा था,,मुझे पता था परमात्मा आएंगे और मुझे खाना खिलाएंगे।

✍आज भगवान् आए थे, उन्होंने मेरे साथ बैठ कर रोटी खाई मुझे भी बहुत प्यार से खिलाई,बहुत प्यार से मेरी और देखते थे, जाते समय मुझे गले भी लगाया,,परमात्मा बहुत ही मासूम हैं बच्चे की तरह दिखते हैं।

✔ *एक सीख:*

इस कहानी का अर्थ बहुत गहराई वाला है। असल में बात सिर्फ इतनी है की दोनों के दिलों में परमात्मा के लिए प्यार बहुत सच्चा है। और परमात्मा ने दोनों को,दोनों के लिये, दोनों में ही (परमात्मा) खुद को भेज दिया। *जब मन परमात्मा भक्ति में रम जाता है तो हमे हर एक में वो ही नजर आने लग जाते है*

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Chandrashekhar Karwa Mar 27, 2020

श्रीरामचरित मानस  Serial No 437 (अयोध्याकाण्ड)    2/234/1  चौपाई / छंद / दोहा - मोरें सरन रामहि की पनही । राम सुस्वामि दोसु सब जनही ॥ व्यक्त भाव एवं प्रेरणा - श्री भरतलालजी श्री चित्रकूटजी में प्रभु श्री रामजी से मिलने के पूर्व विचार करने लगे कि क्या प्रभु उनके मिलने पर उन्हें त्याग देंगे या सेवक मानकर उन्हें अपना लेंगे । श्री भरतलालजी सोचने लगे कि प्रभु श्री रामजी तो अच्छे से भी अच्छे स्वामी है पर दोष तो उनके दास श्री भरतलालजी का ही है । फिर जो श्री भरतलालजी ने सोचा वह अद्भुत है । श्री भरतलालजी अपने मन में विचार करते हैं कि वे प्रभु श्री रामजी के श्री कमलचरणों की शरण के लायक तो शायद नहीं हैं पर प्रभु श्री रामजी के श्री कमलचरणों की पादुका की ही शरण उन्हें मिल जाये तो भी उनका कल्याण हो जायेगा । www.devotionalthoughts.in

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Chandrashekhar Karwa Mar 27, 2020

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Chandrashekhar Karwa Mar 27, 2020

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Chandrashekhar Karwa Mar 27, 2020

*भक्ति हमें जो प्रभु को प्रिय लगता है वह करने के लिए प्रेरित करती है । प्रभु के लिए नियम पालन करना भक्ति हमें सिखाती है । मन को सही मार्ग पर ले जाने का एक ही उपाय है, भक्ति, केवल भक्ति और केवल भक्ति ।* *कभी भी, कितने भी जन्म के बाद भी आखिर मिलना तो प्रभु से ही होगा क्योंकि वे ही हमारे मूल स्वरूप हैं । इसलिए बुद्धिमानी यही है कि इस मानव जन्म में ही ऐसा प्रयास किया जाये । यह सिद्धांत है कि सजातीय तत्व ही मिलता है । हम चेतन तत्व हैं और प्रभु चेतन हैं इसलिए हमारा मिलना प्रभु से ही हो सकता है । संसार जड़ है इसलिए हम कितना भी संसार से चिपके पर संसार से हम कभी भी मिल नहीं पायेंगे ।* प्रभु से जोड़ने वाले इस तरह के रोजाना सुबह व्हाट्सएप पर एक मैसेज पाने के लिए 9462308471 पर SHREE HARI लिखकर व्हाट्सएप करें www.bhaktivichar.in GOD GOD & only GOD जो प्रभु के चिंतन से दिन की शुरुआत करना चाहते हैं उन्हें यह फॉरवर्ड करें और ऐसे ग्रुपों में शेयर करें

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Chandrashekhar Karwa Mar 26, 2020

श्रीरामचरित मानस Serial No 435 (अयोध्याकाण्ड)   2/231/दोहा  चौपाई / छंद / दोहा - भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ॥ कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥ व्यक्त भाव एवं प्रेरणा - जब श्री लक्ष्मणजी ने यह कहा कि राज्य का मद सबसे कठिन मद है तो प्रभु श्री रामजी ने श्री भरतलालजी के बचाव में जो कहा वह ध्यान देने योग्य है । प्रभु ने कहा कि श्री अयोध्याजी के राज्य की बात ही क्या है अगर श्री त्रिदेवजी श्री भरतलालजी को त्रिलोकी का राज्या भी दे देवें तो भी उन्हें राज्य मद नहीं हो सकता । प्रभु ने उपमा देते हुये कहा कि क्या खटाई की कुछ बूंदों से क्षीरसागर फट सकता है । जैसे यह कतई संभव नहीं वैसे ही श्री भरतलालजी को राज्य मद हो यह कतई संभव नहीं है । www.devotionalthoughts.in

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Chandrashekhar Karwa Mar 26, 2020

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Chandrashekhar Karwa Mar 26, 2020

*अन्त में सभी आचार्य प्रभु की भक्ति का ही वर्णन करते हैं । सभी पंथ और संत अन्त में भक्ति के लिए ही पथ प्रदर्शन करते हैं । जीवन का अंतिम कल्याणकारी साधन केवल प्रभु की भक्ति ही है ।शास्त्रों का मत है कि भक्ति ही अकेला और एकमात्र पूर्ण साधन है ।*   *जीवन की हर वृत्ति को प्रभु से जोड़कर और प्रभु को अर्पण कर देनी चाहिए । जैसे डरना हो तो प्रभु से, मांगना हो तो प्रभु से, देना हो तो प्रभु को, याद करना हो तो प्रभु को, रूठना हो तो प्रभु से, मनाना हो तो प्रभु को, खेलना हो तो प्रभु के साथ यानी अपने जीवन की हर वृत्ति प्रभु से जोड़ देनी चाहिए । मन में उठने वाले हर विचार के आधार प्रभु हो जाये ।*   प्रभु से जोड़ने वाले इस तरह के रोजाना सुबह व्हाट्सएप पर एक मैसेज पाने के लिए 9462308471 पर SHREE HARI लिखकर व्हाट्सएप करें   www.bhaktivichar.in GOD GOD & only GOD    जो प्रभु के चिंतन से दिन की शुरुआत करना चाहते हैं उन्हें यह फॉरवर्ड करें और ऐसे ग्रुपों में शेयर करें

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Chandrashekhar Karwa Mar 25, 2020

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