Krishna Singh
Krishna Singh Sep 15, 2017

समुद्र मंथन में से निकले थे 14रत्न, जानिए इन रत्नों अर्थ 🌷🌹

समुद्र मंथन  में से निकले थे 14रत्न, जानिए इन रत्नों अर्थ 🌷🌹
समुद्र मंथन  में से निकले थे 14रत्न, जानिए इन रत्नों अर्थ 🌷🌹
समुद्र मंथन  में से निकले थे 14रत्न, जानिए इन रत्नों अर्थ 🌷🌹
समुद्र मंथन  में से निकले थे 14रत्न, जानिए इन रत्नों अर्थ 🌷🌹

कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन धनवंतरि त्रयोदशी मनाई जाती है।मान्यता के अनुसार, इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन भगवान धन्वंतरि की विशेष पूजा की जाती है। समुद्र मंथन से धन्वतंरि के साथ अन्य रत्न भी निकले थे। आज हम आपको समुद्र मंथन की पूरी कथा व उसमें छिपेसमुद्र मंथन की कथा
धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक बार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण स्वर्ग श्रीहीन (ऐश्वर्य, धन, वैभव आदि) हो गया। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने का उपाय बताया और ये भी बताया कि समुद्र मंथन को अमृत निकलेगा, जिसे ग्रहण कर तुम अमर हो जाओगे। यह बात जब देवताओं ने असुरों के राजा बलि को बताई तो वे भी समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। वासुकि नाग की नेती बनाई गई और मंदराचल पर्वत की सहायता से समुद्र को मथा गया। समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी, भगवान धन्वन्तरि सहित 14 रत्न निकले।
क्या सीखें
समुद्र मंथन को अगर लाइफ मैनेजमेंट के नजरिए से देखा जाए तो हम पाएंगे कि सीधे-सीधे किसी को अमृत (परमात्मा) नहीं मिलता। उसके लिए पहले मन को विकारों को दूर करना पड़ता है और अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना पड़ता है। समुद्र मंथन में 14 नंबर पर अमृत निकला था। इस 14 अंक का अर्थ है ये है 5 कमेन्द्रियां, 5 जनेन्द्रियां तथा अन्य 4 हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन सभी पर नियंत्रण करने के बाद में परमात्मा प्राप्त होते हैं।
1.🌷 कालकूट विष
समुद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट विष निकला, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण कर लिया। इससे तात्पर्य है कि अमृत (परमात्मा) हर इंसान के मन में स्थित है। अगर हमें अमृत की इच्छा है तो सबसे पहले हमें अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही बाहर निकलेंगे। यही बुरे विचार विष है। हमें इन बुरे विचारों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इनसे मुक्त हो जाना चाहिए।
2. 🌷कामधेनु
समुद्र मंथन में दूसरे क्रम में निकली कामधेनु। वह अग्निहोत्र (यज्ञ) की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने उसे ग्रहण कर लिया। कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता की। क्योंकि विष निकल जाने के बाद मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है।
3. 🌷उच्चैश्रवा घोड़ा
समुद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। इसका रंग सफेद था। इसे असुरों के राजा बलि ने अपने पास रख लिया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखें तो उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। मन की गति ही सबसे अधिक मानी गई है। यदि आपको अमृत (परमात्मा) चाहिए तो अपने मन की गति पर विराम लगाना होगा। तभी परमात्मा से मिलन संभव है।
4. 🌷ऐरावत हाथी
समुद्र मंथन में चौथे नंबर पर ऐरावत हाथी निकला, उसके चार बड़े-बड़े दां थे। उनकी चमक कैलाश पर्वत से भी अधिक थी। ऐरावत हाथी को देवराज इंद्र ने रख लिया। ऐरावत हाथी प्रतीक है बुद्धि का और उसके चार दांत लोभ, मोह, वासना और क्रोध का। चमकदार (शुद्ध व निर्मल) बुद्धि से ही हमें इन विकारों पर काबू रख सकते हैं।
5. 🌷कौस्तुभ मणि
समुद्र मंथन में पांचवे क्रम पर निकली कौस्तुभ मणि, जिसे भगवान विष्णु ने अपने ह्रदय पर धारण कर लिया। कौस्तुभ मणि प्रतीक है भक्ति का। जब आपके मन से सारे विकार निकल जाएंगे, तब भक्ति ही शेष रह जाएगी। यही भक्ति ही भगवान ग्रहण करेंगे।
6. 🌷कल्पवृक्ष
समुद्र मंथन में छठे क्रम में निकला इच्छाएं पूरी करने वाला कल्पवृक्ष, इसे देवताओं ने स्वर्ग में स्थापित कर दिया। कल्पवृक्ष प्रतीक है आपकी इच्छाओं का। कल्पवृक्ष से जुड़ा लाइफ मैनेजमेंट सूत्र है कि अगर आप अमृत (परमात्मा) प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं तो अपनी सभी इच्छाओं का त्याग कर दें। मन में इच्छाएं होंगी तो परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है।
7. 🌷रंभा अप्सरा
समुद्र मंथन में सातवे क्रम में रंभा नामक अप्सरा निकली। वह सुंदर वस्त्र व आभूषण पहने हुई थीं। उसकी चाल मन को लुभाने वाली थी। ये भी देवताओं के पास चलीं गई। अप्सरा प्रतीक है मन में छिपी वासना का। जब आप किसी विशेष उद्देश्य में लगे होते हैं तब वासना आपका मन विचलित करने का प्रयास करती हैं। उस स्थिति में मन पर नियंत्रण होना बहुत जरूरी है।
8. 🌷देवी लक्ष्मी
समुद्र मंथन में आठवे स्थान पर निकलीं देवी लक्ष्मी। असुर, देवता, ऋषि आदि सभी चाहते थे कि लक्ष्मी उन्हें मिल जाएं, लेकिन लक्ष्मी ने भगवान विष्णु का वरण कर लिया। लाइफ मैनेजमेंट के नजरिए से लक्ष्मी प्रतीक है धन, वैभव, ऐश्वर्य व अन्य सांसारिक सुखों का। जब हम अमृत (परमात्मा) प्राप्त करना चाहते हैं तो सांसारिक सुख भी हमें अपनी ओर खींचते हैं, लेकिन हमें उस ओर ध्यान न देकर केवल ईश्वर भक्ति में ही ध्यान लगाना चाहिए।
9. 🌷वारुणी देवी
समुद्र मंथन से नौवे क्रम में निकली वारुणी देवी, भगवान की अनुमति से इसे दैत्यों ने ले लिया। वारुणी का अर्थ है मदिरा यानी नशा। यह भी एक बुराई है। नशा कैसा भी हो शरीर और समाज के लिए बुरा ही होता है। परमात्मा को पाना है तो सबसे पहले नशा छोड़ना होगा तभी परमात्मा से साक्षात्कार संभव है।
10. 🌷चंद्रमा
समुद्र मंथन में दसवें क्रम में निकले चंद्रमा। चंद्रमा को भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया। चंद्रमा प्रतीक है शीतलता का। जब आपका मन बुरे विचार, लालच, वासना, नशा आदि से मुक्त हो जाएगा, उस समय वह चंद्रमा की तरह शीतल हो जाएगा। परमात्मा को पाने के लिए ऐसा ही मन चाहिए। ऐसे मन वाले भक्त को ही अमृत (परमात्मा) प्राप्त होता है।
11.🌷 पारिजात वृक्ष
इसके बाद समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष निकला। इस वृक्ष की विशेषता थी कि इसे छूने से थकान मिट जाती थी। यह भी देवताओं के हिस्से में गया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष के निकलने का अर्थ सफलता प्राप्त होने से पहले मिलने वाली शांति है। जब आप (अमृत) परमात्मा के इतने निकट पहुंच जाते हैं तो आपकी थकान स्वयं ही दूर हो जाती है और मन में शांति का अहसास होता है।
12.🌷 पांचजन्य शंख
समुद्र मंथन से बारहवें क्रम में पांचजन्य शंख निकला। इसे भगवान विष्णु ने ले लिया। शंख को विजय का प्रतीक माना गया है साथ ही इसकी ध्वनि भी बहुत ही शुभ मानी गई है। जब आप अमृत (परमात्मा) से एक कदम दूर होते हैं तो मन का खालीपन ईश्वरीय नाद यानी स्वर से भर जाता है। इसी स्थिति में आपको ईश्वर का साक्षात्कार होता है।
13 🌷व 14. भगवान धन्वंतरि व अमृत कलश
समुद्र मंथन से सबसे अंत में भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर निकले। भगवान धन्वंतरि प्रतीक हैं निरोगी तन व निर्मल मन के। जब आपका तन निरोगी और मन निर्मल होगा तभी इसके भीतर आपको परमात्मा की प्राप्ति होगी। समुद्र मंथन में 14 🌷. पर अमृत निकला। इस 14 अंक का अर्थ है ये है 5 कमेंद्रियां, 5 जननेन्द्रियां तथा अन्य 4 हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। इन सभी पर नियंत्रण करने के बाद में परमात्मा प्राप्त होते हैं।

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कामेंट्स

BHAARAT JAANGID Sep 16, 2017
बहुत ही सराहनीय लेख रहा

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Neha Sharma, Haryana Jan 22, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ प्रभात वंदन *कुएँ का गिरगिट अर्थात राजा नृग की कथा:* श्रीकृष्ण उन दिनों अपनी राजधानी द्वारका पुरी में ही रह रहे थे। जरासंध के उत्पातों से तंग आकर उन्होंने वहाँ से दूर पश्चिमी समुद्र के पास द्वारका में अपनी राजधानी बनाई थी। यह राजधानी अत्यन्त सुंदर थी। इसमें ऊँचे-ऊँचे महल और अट्टालिकाएँ थीं। ऊँचे शिखरों और लहराते ध्वजों वाले मन्दिर थे। सुन्दर और आकर्षक वस्तुओं से पटे बड़े-बड़े बाजार थे। इसकी सड़कें चौड़ी और चिकनी थीं। इन पर दोनों शाम सुगन्धित जल का छिड़काव होता था। बाजार में सुन्दर-सुन्दर सरोवर और जलाशय थे जिनकी सीढ़ियाँ सफेद संगमरमर की बनी हुई थीं। इन तालाबों में सदा जल भरा रहता था जिसमें कमल, कुमुदनी आदि विविधरंगी और सुगन्धपूरित पुष्प खिले रहते थे। फूलों पर भौरे मंडराते रहते थे, जिसके फलस्वरूप कोई उनके पास जाकर उन्हें तोड़ने का प्रयास नहीं करता था। इन जलाशयों में विविध मछलियाँ अठखेलियाँ करती थीं, जिसके फलस्वरूप इन सरोवरों की शोभा निराली हो उठती थी। नगर के भीतर ऐसी शोभा थी तो बाहर भी वह कुछ कम नहीं थी। नगर के किनारे-किनारे बड़े-बड़े और मन मोहक उपवन लगे थे। कुछ में सभी ऋतुओं में फल देने वाले फलदार वृक्ष लगे थे तो कुछ में सभी प्रकार के गन्ध-पूरित फूल। उन फूलों में सभी थे-गुलाब, जूही चमेली बेला, रातरानी कनैल, अड़हुल, गेंदा, गन्धराज आदि। इन सुन्दर उपवनों में नगरवासी प्रायः भ्रमण-हेतु आते ही रहते थे शुद्ध वायु के लिए उपवनों से अच्छा स्थान नहीं हो सकता था। एक दिन श्रीकृष्ण-पुत्र प्रद्युम्न अपने कुछ साथियों के साथ जैसे चारुभानु, गद और साम्ब आदि के साथ उपवन के परिभ्रमण को आए। वह देर तक इधर-उधर घूमते फूलों की शोभा निहारते रहे और उनकी गन्ध से अपने को तृप्त करते रहे। घूमते-घूमते उन्हें प्यास लग आई। वे प्यास बुझाने के लिए पानी ढूँढ़ते रहे पर दुर्भाग्यवश पानी उन्हें कहीं नहीं मिला। नगर के अन्दर तो कई सरोवर थे पर नई बस रही राजधानी के उपवनों में अभी तक जलाशय की व्यवस्था करने की बात किसी के ध्यान में नहीं आई थी। श्रीकृष्ण-पुत्र प्रद्युम्न ने सोचा, वह पिता से कहकर इन उपवनों में सुन्दर स्वच्छ जलाशयों का निर्माण कराएँगे जिससे आगे चलकर किसी को पेयजल के संकट का सामना नहीं करना पड़े। पर यह तो भविष्य की बात थी। अभी जो सभी पिपासा से पीड़ित हो रहे थे, उसका क्या उपाय था। घूमते-घूमते वे एक कुएँ के पास पहुँचे। उन्हें कुएँ को देखकर बहुत प्रसन्नता हुई। प्यास से व्याकुल उन लोगों ने सोचा कि उनकी प्यास अब शान्त होकर रहेगी। वे कुएँ के पास गये और उसके भीतर झाँका तो उनकी सारी आशा निराशा में परिवर्तित हो गई। कुएँ में एक बूँद जल नहीं था। पता नहीं वह कब से सूखा पड़ा था किन्तु उसमें एक विचित्र जीव को देख कर उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उसमें एक बहुत बड़ा गिरगिट पड़ा था। कुआँ काफी लम्बा-चौड़ा और गहरा था। गिरगिट का आकार किसी पर्वत की तरह लग रहा था। कुछ देर तक तो इन लोगों ने गिरगिट को कौतूहल पूर्वक देखा किन्तु शीघ्र ही उसकी छटपटाहट से द्रवित हो गये। वह कुएँ से निकलने को बेचैन था किन्तु लाख प्रयासों के बाद भी वह उससे बाहर नहीं निकल पा रहा था। वह कुएँ की दीवार पर, शक्ति लगाकर चढ़ने का प्रयास करता किन्तु थोड़ा ऊपर जाने के बाद ही फिसल कर गिर पड़ता। वह बारी-बारी से कुएँ के चारों दीवारों पर चढ़ने का प्रयास करता किन्तु थोड़ा ऊपर जाने के बाद ही फिसलकर गिर पड़ता। इन लोगों को उसके कष्ट के निवारण का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। दीवारों से फिसलने और गिरने के कारण उसका शरीर लहूलुहान हो रहा था। दर्शकों को इन पर बहुत दया आई। उन्होंने पेड़ की डालियों और रस्सियों के सहारे उसको निकालने का प्रयास किया किन्तु इस पर्वताकार गिरगिट को निकालना आसान नहीं था। कोई भी रस्सी या पेड़ की डाली उसके भार को सहन नहीं कर पाती और टूट जाती। वे निराश हो गए और उन्होंने मन ही मन भगवान कृष्ण को स्मरण किया। वह तत्काल उस कुएँ के पास पहुँच गए। जिसमें वह गिरगिट गिरा पड़ा था। दर्शकों ने उन्हें बताया कि इस दुःखी जीव को निकालने का उन्होंने बहुत प्रयास किया परन्तु वे उसे निकालने में सफल नहीं हो सके। उसके दुःख से सभी दुःखी हैं। उन्होंने आगे कहा, *"पता नहीं कब से भूख-प्यास से पीड़ित इस अन्धे कुएँ में पड़ा है। आप सर्व-शक्तिमान हैं। कृपाकर इस निरीह प्राणी को इस अन्धकूप से निकालिए।"* भगवान श्रीकृष्ण के लिए यह कौन-सी बड़ी बात थी ? उन्होंने बाएँ हाथ से ही उस विशाल गिरगिट को कुएँ से बाहर निकाल दिया। निकलते ही वह गिरगिट गिरगिट नहीं रहा। एक प्रकाशवान पुरुष के रूप में वह परिवर्तित हो गया। उसके सिर पर मुकुट और शेष शरीर पर बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण शोभा पा रहे थे। उसका रंग इतना गोरा था कि लगता था कि वह कच्चे सोने से बना है। इस तेजोमय पुरुष को देखकर भगवान श्रीकृष्ण सब कुछ समझ गए किन्तु अन्य लोगों की जानकारी के लिए उन्होंने उससे पूछा *"आप देखने से ही कोई देवपुरुष लगते हैं। आपको गिरगिट की योनि में जन्म लेकर इतना कष्ट क्यों सहना पड़ा ? निश्चित ही आप पूर्व जन्म में कोई पराक्रमी राजा-महराजा थे।"* उस पुरुष ने श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हुए कहा, *"आपका सोचना एकदम ठीक है। आप कोई अन्तर्यामी हैं ? आप से क्या छिपा है फिर भी आप पूछते हैं तो बताना ही पड़ेगा। क्योंकि आपकी मुझ पर अपार कृपा है। आपके दर्शन-मात्र से बिना कोई यज्ञ जाप या तपस्या किए गिरगिट की योनि से मेरा उद्धार हो गया।"* *"मैं पहले नृग नामक राजा था। मेरे पास अपार सम्पत्ति थी। मैं उसे अपने भोग-विलास में नहीं लगाकर दूसरों के मध्य उनके दान में लगा रहता था। दान लेने वालों की मेरे यहां भीड़ लगी रहती थी। विशेषकर ब्राह्मणों की।"* *"मैंने कई दुधारी गायों को बछड़ों के साथ ब्राह्मणों को दान दिया। दान देने के पूर्व मैं गायों के सींगों को सोने से मढ़वाना नहीं भूलता था।"* *"उनके खुरों में चाँदी मढ़वाता था तथा उन्हें रेशमी वस्त्र, स्वर्णनिर्मित हार और अन्य आभूषणों से सजाकर ही दान करता था। भगवान ! मेरी दानशीलता प्रसिद्ध थी। मैंने गायें ही नहीं, भूमि, सोना, घर, घोड़े, हाथी, तिलों के पर्वत, चाँदी, शय्या, वस्त्र, रत्न आदि दान किए। अनेक यज्ञों का अनुष्ठान किया। बहुत से कुएँ जलाशय आदि बनवाए।"* भगवान कृष्ण ने पूछा, *"इतना सब करने के बाद भी आपको यह निकृष्ट गिरगिट योनि क्यों प्राप्त हुई ?"* राजा नृग ने कहा *"भगवान ने ठीक ही पूछा। एक अनजानी गलती से मेरी यह दुर्दशा हुई। एक दिन ऐसे तपस्वी ब्राह्मण की गाय, जो कभी दान नहीं लेता था मेरी गायों के झुण्ड में आ मिली। मुझे इसका कोई पता नहीं था। मैंने अन्य गायों की तरह उसे भी सजा-सँवार कर किसी अन्य ब्राह्मण को दान में दे दिया।"* *"जब वह ब्राह्मण इस सजी-सजाई गाय को लेकर चला तो गाय के वास्तविक मालिक से उसकी मुलाकात हो गई।"* *"उसने कहा, ‘यह गाय मेरी है तुम कहाँ लिये जा रहे हो ? इसको सजाने-सँवारने से मैं इसको पहचानने में भूल नहीं सकता।’"* *"दान लिए ब्राह्मण ने कहा, ‘गाय तुम्हारी नहीं मेरी है क्योंकि राजा नृग ने मुझे इसे दान में दिया है। वे दोनों ब्राह्मण आपस में झगड़ते हुए मेरे समीप पहुँचे। एक ने कहा—‘यह गाय मुझे अभी-अभी दान में दी गई है।’ दूसरे ने कहा, ‘यदि ऐसी बात है तो राजा द्वारा मेरी गाय चुरा ली गई है।"* *मैंने दोनों ब्राह्मणों से अनुनय-विनय की और कहा, ‘मैं लाख उच्चकोटि की गाय दूँगा। आप लोग यह गाय मुझे वापिस कर दीजिए।"* *"गाय के वास्तविक मालिक ने कहा, ‘मैं अपनी गाय के बदले कुछ नहीं लूँगा और वह चला गया।"* *"दूसरे ने कहा, ‘एक लाख क्या कई लाख गाएँ भी मुझे दीजिए तो भी मैं लेने को तैयार नहीं।’ और दूसरा ब्राह्मण भी चला गया।"* *"कालक्रम से मेरी मृत्यु हुई। मैं यमलोक पहुँचा।’ यमराज ने पूछा, ‘आप ने बहुत पुण्य कार्य किए हैं किन्तु एक छोटा-सा पाप भी आपसे हुआ है। भले ही अनजाने में हुआ हो। आप बताइए कि आप पहले अपने पाप का फल भोगेंगे अथवा पुण्य का ?"* *‘‘मैंने कहा, ‘पहले पाप का ही भोग लेता हूँ।’ मेरे कहते ही मैं विशाल गिरगिट बन कर धरती पर आ गिरा। यही मेरी कहानी है"* शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।

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simran Jan 22, 2020

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