Suraj Jaiswal
Suraj Jaiswal Dec 15, 2016

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Renu Singh Oct 23, 2020

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Neha Sharma, Haryana Oct 23, 2020

*नवरात्री के सातवें दिन आदि शक्ति माँ दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की उपासना विधि....... *माता कालरात्रि स्वरूप एवं पौराणिक महात्म्य...... *श्री माँ दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में स्थिर कर साधना करनी चाहिए। संसार में कालो का नाश करने वाली देवी कालरात्री ही है। भक्तों द्वारा इनकी पूजा के उपरांत उसके सभी दु:ख, संताप भगवती हर लेती है। दुश्मनों का नाश करती है तथा मनोवांछित फल प्रदान कर उपासक को संतुष्ट करती हैं। दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है। इनके शरीर का रंग घने अंधकार की भाँति काला है, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भाँति चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं जो ब्रह्माण्ड की तरह गोल हैं, जिनमें से बिजली की तरह चमकीली किरणें निकलती रहती हैं। इनकी नासिका से श्वास, निःश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। इनका वाहन ‘गर्दभ’ (गधा) है। दाहिने ऊपर का हाथ वरद मुद्रा में सबको वरदान देती हैं, दाहिना नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा और निचले हाथ में खड्ग है। माँ का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है किन्तु सदैव शुभ फलदायक है। अतः भक्तों को इनसे भयभीत नहीं होना चाहिए । दुर्गा पूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन सहस्त्रारचक्र में अवस्थित होता है। साधक के लिए सभी सिध्दैयों का द्वार खुलने लगता है। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णत: मां कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है, उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह अधिकारी होता है, उसकी समस्त विघ्न बाधाओं और पापों का नाश हो जाता है और उसे अक्षय पुण्य लोक की प्राप्ति होती है। मधु कैटभ नामक महापराक्रमी असुर से जीवन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु को निंद्रा से जगाने के लिए ब्रह्मा जी ने इसी मंत्र से मां की स्तुति की थी। यह देवी काल रात्रि ही महामाया हैं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा हैं। इन्होंने ही सृष्टि को एक दूसरे से जोड़ रखा है। देवी काल-रात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो अमावस की रात्रि से भी अधिक काला है। मां कालरात्रि के तीन बड़े बड़े उभरे हुए नेत्र हैं जिनसे मां अपने भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रखती हैं। देवी की चार भुजाएं हैं दायीं ओर की उपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। बायीं भुजा में क्रमश: तलवार और खड्ग धारण किया है। देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए हैं और हवाओं में लहरा रहे हैं। देवी काल रात्रि गर्दभ पर सवार हैं। मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है। देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है अत: देवी को शुभंकरी भी कहा गया है। दुर्गा सप्तशती के प्रधानिक रहस्य में बताया गया है कि जब देवी ने इस सृष्टि का निर्माण शुरू किया और ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का प्रकटीकरण हुआ उससे पहले देवी ने अपने स्वरूप से तीन महादेवीयों को उत्पन्न किया। सर्वेश्वरी महालक्ष्मी ने ब्रह्माण्ड को अंधकारमय और तामसी गुणों से भरा हुआ देखकर सबसे पहले तमसी रूप में जिस देवी को उत्पन्न किया वह देवी ही कालरात्रि हैं। देवी कालरात्रि ही अपने गुण और कर्मों द्वारा महामाया, महामारी, महाकाली, क्षुधा, तृषा, निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, एवं दुरत्यया कहलाती हैं। माँ कालरात्रि पूजा विधि देवी का यह रूप ऋद्धि सिद्धि प्रदान करने वाला है। दुर्गा पूजा का सातवां दिन तांत्रिक क्रिया की साधना करने वाले भक्तों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है, सप्तमी पूजा के दिन तंत्र साधना करने वाले साधक मध्य रात्रि में देवी की तांत्रिक विधि से पूजा करते हैं। इस दिन मां की आंखें खुलती हैं। षष्ठी पूजा के दिन जिस विल्व को आमंत्रित किया जाता है उसे आज तोड़कर लाया जाता है और उससे मां की आँखें बनती हैं। दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि का काफी महत्व बताया गया है। इस दिन से भक्त जनों के लिए देवी मां का दरवाज़ा खुल जाता है और भक्तगण पूजा स्थलों पर देवी के दर्शन हेतु पूजा स्थल पर जुटने लगते हैं। सप्तमी की पूजा सुबह में अन्य दिनों की तरह ही होती परंतु रात्रि में विशेष विधान के साथ देवी की पूजा की जाती है। इस दिन अनेक प्रकार के मिष्टान एवं कहीं कहीं तांत्रिक विधि से पूजा होने पर मदिरा भी देवी को अर्पित कि जाती है। सप्तमी की रात्रि सिद्धियों की रात भी कही जाती है। कुण्डलिनी जागरण हेतु जो साधक साधना में लगे होते हैं आज सहस्त्रसार चक्र का भेदन करते हैं। पूजा विधान में शास्त्रों में जैसा वर्णित हैं उसके अनुसार पहले कलश की पूजा करनी चाहिए फिर नवग्रह, दशदिक्पाल, देवी के परिवार में उपस्थित देवी देवता की पूजा करनी चाहिए फिर मां कालरात्रि की पूजा करनी चाहिए। देवी की पूजा से पहले उनका ध्यान करना चाहिए। देवी कालरात्रि शप्तशती मंत्र १ ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते।। जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तु ते।। २ धां धीं धूं धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु।। बीज मंत्र ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ( तीन, सात या ग्यारह माला करें) ३ एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।। वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।। ४ देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्तया, निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां, भक्त नता: स्म विदाधातु शुभानि सा न:.. माँ कालरात्रि का ध्यान मंत्र करालवंदना धोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजाम्। कालरात्रिं करालिंका दिव्यां विद्युतमाला विभूषिताम॥ दिव्यं लौहवज्र खड्ग वामोघोर्ध्व कराम्बुजाम्। अभयं वरदां चैव दक्षिणोध्वाघः पार्णिकाम् मम॥ महामेघ प्रभां श्यामां तक्षा चैव गर्दभारूढ़ा। घोरदंश कारालास्यां पीनोन्नत पयोधराम्॥ सुख पप्रसन्न वदना स्मेरान्न सरोरूहाम्। एवं सचियन्तयेत् कालरात्रिं सर्वकाम् समृध्दिदाम्॥ माँ कालरात्रि स्तोत्र पाठ हीं कालरात्रि श्री कराली च क्लीं कल्याणी कलावती। कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥ कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी। कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥ क्लीं हीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी। कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥ माँ कालरात्रि कवच पाठ ऊँ क्लीं मे हृदयं पातु पादौ श्रीकालरात्रि। ललाटे सततं पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥ रसनां पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम। कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशंकरभामिनी॥ वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि। तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥ भगवती कालरात्रि का ध्यान, कवच, स्तोत्र का जाप करने से ‘भानुचक्र’ जागृत होता है। इनकी कृपा से अग्नि भय, आकाश भय, भूत पिशाच स्मरण मात्र से ही भाग जाते हैं। कालरात्रि माता भक्तों को अभय प्रदान करती है। माँ कालरात्रि पार्वती काल अर्थात् हर तरह के संकट का नाश करने वाली है इसीलिए कालरात्रि कहलाती है। देवी की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए। माँ कालरात्रि की आरती कालरात्रि जय-जय-महाकाली। काल के मुह से बचाने वाली॥ दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा। महाचंडी तेरा अवतार॥ पृथ्वी और आकाश पे सारा। महाकाली है तेरा पसारा॥ खडग खप्पर रखने वाली। दुष्टों का लहू चखने वाली॥ कलकत्ता स्थान तुम्हारा। सब जगह देखूं तेरा नजारा॥ सभी देवता सब नर-नारी। गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥ रक्तदंता और अन्नपूर्णा। कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥ ना कोई चिंता रहे बीमारी। ना कोई गम ना संकट भारी॥ उस पर कभी कष्ट ना आवें। महाकाली माँ जिसे बचाबे॥ तू भी भक्त प्रेम से कह। कालरात्रि माँ तेरी जय॥ माँ दुर्गा की आरती जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ ॐ जय… मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥ ॐ जय… कनक समान कलेवर, रक्तांबर राजै । रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥ ॐ जय… केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी । सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥ ॐ जय… कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योती ॥ ॐ जय… शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ॐ जय… चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे । मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे ॥ॐ जय… ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय… चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू । बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय… तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता । भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता ॥ॐ जय… भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी । मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ॐ जय… कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती । श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय… श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे । कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥ॐ जय ❇️✳️❇️✳️❇️✳️❇️✳️❇️✳️❇️✳️❇️✳️❇️ #नवरात्रि- सप्तम दिवस देवी कालरात्रि । #नारी_तो_सदैव_नारायणी_है_शक्ति_स्वरूपीणी है। 🙏🙏🙏#स्त्री_शक्ति 🙏🙏🙏🙏🙏 ✍नारी के समस्त स्वरूपों को प्रतिबिंबित करने वाली नवरूप लिए नवदुर्गा का सप्तम रूप है देवी कालरात्रि, अन्य आठ रूपों में गौरवर्ण देवी दुर्गा-का यह सप्तम तेजोमय रूप श्यामवर्ण है - क्योंकि नारी तो सदैव नारायणी है- शक्तिस्वरूपीणी है-वर्ण भले ही भिन्न हो-अन्तर्निहित दैवीय तत्व तो एक ही है । ✍ कालरात्रि अर्थात अंधियारी रात-इस निमित्त्त देवी का रंग काला है- तथा वे अपने वाहन गर्दभ पर सवार हैं । रणचंडी रूप में बिखरे बाल और आग्नेय नेत्रों वाली क्रोधित भंगिमा एवं रणन्ग देहि, या युद्धरत भाव लिए चारभुजाधारी व त्रिनेत्रवाली देवी कालरात्रि गले में चमकीली माला धारण किये हुए हैं, एक हाथ में खड्ग ,एक हाथ में शस्त्र स्वरुप लौह काँटा है - जो देवी के रौद्र रूप का प्रतिबिम्ब है - परन्तु अन्य दो हाथ देवी के सौम्य रूप का प्रतिबिम्ब है- तीसरा हाथ वर देने की मुद्रा में जबकि चौथा हाथ भक्तों को अभयदान देने की मुद्रा में है - क्योंकि माता अपनी संतान के शत्रुओं पर क्रोधित हो उनका विनाश कर सकती है -परन्तु अपनी संतान को तो अभयदान देकर सदैव उसकी रक्षा ही करती है । ✍ धर्मशास्त्रों में वर्णित है कि देवी कालरात्रि का ही एक अन्य नाम है-शुभंकरी - क्योंकि रौद्ररूपीणी होते हुए भी देवी कालरात्रि अपने निष्ठावान भक्तों के लिए सदैव शुभफलदायिनी हैं । ✍ नवरात्रि के इस सप्तम दिवस शास्त्रोक्त विधि -विधान अनुसार देवी कालरात्रि की निष्काम भक्ति में लीन भक्त का मन -"सहस्रार चक्र " में स्थापित होता है- जो सिद्धिद्वार खोलकर भक्त को पापशमन और पुण्यलाभ के वरदान का सौभाग्य प्रदाता है। ✍ शास्त्रों के अनुसार देवी कालरात्रि की महिमा अपरम्पार है- वे अपने भक्तरुपी संतानों के लिए जीवनदायिनी पालनहार मात्र्स्वरूपा हैं - परन्तु दुष्टों ,अत्याचारियों और दुराचारी धर्मद्रोहियों के लिए साक्षात काल बनकर टूट पड़ने को आतुर संहारक स्वरूपिणी हैं । ✍ यह सनातन धर्मशास्त्रों की उसी विधान के अनुरूप है जिसमे ब्रह्माजी सृष्टिकर्ता, शिवजी संहारक और विष्णुजी पालनहार की दैवीय भूमिका का अनादिकाल से निर्वहन करते रहे हैं -और अनंतकाल तक करते रहेंगे । ✍ जब देवी दुर्गा ने राक्षस शुम्भ और निशुम्भ का वध करने के साथ ही रक्तबीज नामक भयावह दानव का भी संहार किया - तब रक्तबीज के शरीर से झरते रक्त की एक -एक बूँद से हज़ारों अन्य रक्तबीज राक्षस उत्पन्न होने लगे- तब देवी दुर्गा ने देवी कालरात्रि के रूप में रक्तबीज का रक्त भूमि पर गिरने से पूर्व ही उसका पान किया- और इस तरह दानव रक्तबीज का समूल नाश हो गया । ✍ तभी तो यह सनातन मान्यता है कि जो काल से भी भक्तों की रक्षा करें और काल बनकर दुर्जनों पर टूट पड़े - वही हैं देवी कालरात्रि - तीनो लोकों में गाई जाए जिनकी महिमा- आसुरी शक्ति विनाशक और शुभ फलदायक । ✍ देवी कालरात्रि के पूजन के समय निरंतर-"क्लीं ऐ श्री कालिकायै नम" - बीजमंत्र का जाप किया जाता है-जबकि दैनन्दिन देवी स्मरण-"ॐ देवी कालरात्र्यई नम "-मंत्रोच्चार द्वारा किया जाता है | ✍ स्वतंत्रता पश्चात विगत 73 वर्षों के अनुभव से हम भारतवंशियों ने इस सनातन तथ्य को भली भाँति आत्मसात किया है कि शान्ति दो प्रकार की होती है - श्मशान की शांति और मंदिर की भक्तिमय शान्ति । ✍ दुर्जन शक्ति के हाथों मार खाते रहने और समर्पण करने की प्रवृत्ति शान्ति तो कायम कर सकती है,परन्तु वह चिरनिद्रा में लीन निर्जीव लाशों की भीड़ वाली शमशान की ही शान्ति होगी । ✍ हिन्दू धर्मशास्त्रों के अध्ययन से यह तथ्य रेखांकित होता है कि समस्त देवी -देवताओं के हाथों में शस्त्र है -जिसका उपयोग वे आसुरी शक्तियों के विनाश हेतु करते है --जो हिंसा नही -धर्म है। ✍ कुरुक्षेत्र की समरभूमि में अर्जुन को भगवद गीता उपदेश देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने ईश्वर के मानव अवतार लेने के मुख्य उद्देश्य को इन शब्दों में प्रतिपादित किया था- "परित्राणाय साधुनां, विनाशाय च दुष्क्र्ताम "- अर्थात सज्जन शक्ति की सुरक्षा और दुर्जन शक्ति का विनाश - यही परम धर्म है ,यही कर्म है । ✍ शक्तिपर्व नवरात्रि के सप्तम दिवस शक्तिपुंज देवी कालरात्रि की आराधना करते समय हम देवी के समस्त भक्तजनों का भी प्रभु श्रीकृष्ण के श्रीमुख से अभिव्यक्त यही देववाणी प्रण हो - सज्जन शक्ति की सुरक्षा और दुर्जन शक्ति का विनाश - तभी हम सुरक्षित रूप से समाज और राष्ट्र को उत्तरोत्तर प्रगति और समृद्धि के मार्ग पर ले जाने में सक्षम होंगे - क्योंकि हम आराधक हैं उस देवी कालरात्रि के,जो हैं - "वाम्पदोल्लसल्ललोह लताकंटकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भय्न्करी" ।। *जय त्वं देवि चामुंडे जय भूतार्तिहारिणी | *जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोस्तुते || " #कालरात्रि" ✍ समाज मे जब जब अन्याय व बुराई ने नारी के लिए अवरोध खडे किए है तब तब नारी उसके विरुद्ध कालरात्रि स्वरुप रुद्र रुप धारण किए खडी हुई है, कभी अकेले तो कभी संगठित रुप से। #धर्म_परंपरा_व_संस्कृति_के_संरक्षण_के_लिए_नारी_हमेशा_ही_उठ_खडी_हुई_है। ● सावित्रीबाई फुले..... ➖➖➖➖➖➖ ✍ सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। *सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना। ✍ आज से 170 साल पहले बालिकाओं के लिये जब विद्यालय खोलना पाप का काम माना जाता था उस समय सावित्रीबाई ने स्त्री शिक्षा का बीड़ा उठाया था। ✍ सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे। ✍ सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और विद्यालय पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं,अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं। ✍ एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। ✍ लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी, सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया, वह भी पुणे जैसे शहर में।आज औरतों को उन्हें आदर्श मानना चाहिए। ● रानी लक्ष्मीबाई...... ➖➖➖➖➖➖ ✍ झाँसी के राजा व अपने पति गंगाधार राव की मृत्यू के पश्चात लक्ष्मीबाई ने झाँसी का आत्मसम्मान वापस दिलवाने के लिए ब्रिटिश फौजों से बहादुरी से युद्ध किया था। ✍ महिलाओं को भी युद्ध के लिए शस्त्र प्रशिक्षण देकर तैयार किया था। झाँसी के रानी की कहानी हम सब जानते ही है। ✍ आज उनके बारे मे उनके दुश्मन अन्ग्रेज अफसर क्या सोचते थे इसकी चर्चा करते है जो रानी की बहादुरी का ही प्रमाण देते है। ✍ एक अंग्रेज अफ़सर ने लक्ष्मीबाई के बारे में लिखा था, 'वो बहुत ही अद्भुत और बहादुर महिला थी. यह हमारी खुशकिस्मती थी कि उसके पास उसी के जैसे आदमी नहीं थे'। ✍ रानी लक्ष्मीबाई की क्षमताओं का लोहा उनके प्रशंसक ही नहीं बल्कि उनके दुश्मन भी मानते थे। ✍ झांसी पर आखिरी कार्रवाई करने वाले सर ह्यू रोज ने कहा था, ‘सभी विद्रोहियों में लक्ष्मीबाई सबसे ज्यादा बहादुर और नेतृत्वकुशल थीं। सभी बागियों के बीच वही मर्द थी।’ ✍ उनके सम्मान में लॉर्ड कंबरलैंड ने लिखा था, ‘लक्ष्मीबाई असाधारण बहादुरी, विद्वता और दृढ़ता की धनी हैं। वह अपने अधीन लोगों के लिए बेहद उदार है। ये सारे गुण सभी विद्रोही नेताओं में उन्हें सबसे ज्यादा खतरनाक बनाते हैं। ● गीता टंडन...... ➖➖➖➖➖ ✍ ये बोलीवूड की पहली स्टंट वुमन हैं। इनकी कहानी संघर्ष से भरी है, 12 वर्ष की कच्ची आयु मे नशेडी आदमी से विवाह हुआ जो बिना किसी वजह उसे पिटता था। ✍ दहेज की मांग से गीता परेशान होकर 20 साल की आयु में अपने दो बच्चों को लेकर भाग गई। ✍ जीवन संघर्ष के लिए गुरुद्वारे मे खाना बनाने का काम करने लगी, पर गुजारा करने के लिए पैसे कम पडते थे। तभी टीवी शो के लिए स्टंट करने वाली लड़की की जरुरत के बारे में जानकारी मिली। ✍ उसने ये नौकरी शुरु की उनका पहला शो था जिसमें उन्हें खुद को आग लगानी थी उन्होंने इस स्टंट को किया और आगे जाकर वे प्रोफ़ेशनल स्टंट वुमन बनी। ✍वो अब गर्व से कहती है कि मुझे खुद को बचाने के लिए किसी हीरो की जरुरत नहीं।मैं अपनी हिरो खुद हूं, आज जहां भी जाती हैं उनके सम्मान मे तालियां ही बजती हैं। #हमने_जितना_सम्मान_शिव_को_दिया_हैउससे_अधिक_शक्ती_का_भी_किया_है। *जय माता की*🙏🌸🌸 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। मां काली को देवी दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक माना जाता है। पराशक्ति भगवती निराकार होकर भी देवताओं का दु:ख दूर करने के लिये युग-युग में साकार रूप धारण करके अवतार लेती हैं। हिंदू मान्यतानुसार काली जी का जन्म राक्षसों के विनाश के लिए हुआ था। काली मां को खासतौर पर बंगाल और असम में पूजा जाता है। काली माता को बल और शक्ति की देवी माना जाता है। इनकी महिमा अनंत है, इन्हीं से सृष्टि है यानी सम्पूर्ण ब्रह्मांड की संचालिका ये ही हैं। माना जाता है कि महादेव के महाकाल अवतार में देवी महाकाली के रूप में उनके साथ थीं। मां काली का गुणगान शब्दों से नहीं, भावों से किया जाता हैं। इनकी आराधना से मनुष्य के सभी भय दूर हो जाते हैं।

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namrta chhbra Oct 23, 2020

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Manoj Sahu Oct 23, 2020

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Priya Shri Ji Oct 23, 2020

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Gopal Jalan Oct 23, 2020

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