🍃भाग्य से बढ़कर पुरूषार्थ है🍃 राजा विक्रमादित्य के पास सामुद्रिक लक्षण जानने वाला एक ज्योतिषी पहुँचा। विक्रमादित्य का हाथ देखकर वह चिंतामग्न हो गया। उसके शास्त्र के अनुसार तो राजा दीन, दुर्बल और कंगाल होना चाहिए था, लेकिन वह तो सम्राट थे, स्वस्थ थे। लक्षणों में ऐसी विपरीत स्थिति संभवतः उसने पहली बार देखी थी। ज्योतिषी की दशा देखकर विक्रमादित्य उसकी मनोदशा समझ गए और बोले कि 'बाहरी लक्षणों से यदि आपको संतुष्टि न मिली हो तो छाती चीरकर दिखाता हूँ, भीतर के लक्षण भी देख लीजिए।' इस पर ज्योतिषी बोला - 'नहीं, महाराज! मैं समझ गया कि आप निर्भय हैं, पुरूषार्थी हैं, आपमें पूरी क्षमता है। इसीलिए आपने परिस्थितियों को अनुकूल बना लिया है और भाग्य पर विजय प्राप्त कर ली है। यह बात आज मेरी भी समझ में आ गई है कि 'युग मनुष्य को नहीं बनाता, बल्कि मनुष्य युग का निर्माण करने की क्षमता रखता है यदि उसमें पुरूषार्थ हो, क्योंकि एक पुरूषार्थी मनुष्य में ही हाथ की लकीरों को बदलने की सामर्थ्य होती है।' अर्थात स्थिति एवं दशा मनुष्य का निर्माण नहीं करती, यह तो मनुष्य है जो स्थिति का निर्माण करता है। एक दास स्वतंत्र व्यक्ति हो सकता है और सम्राट एक दास बन सकता है। उपरोक्त प्रसंग से ये बातें प्रकाश में आती हैं- हम स्वयं परिस्थितियों को अनुकूल या प्रतिकूल बनाते हैं, अपने विचारों से, अपनी सोच से। जो व्यक्ति यह सोचता है कि वह निर्धन है, तो उसके विचार भी निर्धन होते हैं। विचारों की निर्धनता के कारण ही वह आर्थिक रूप से विपन्न होता है। यह विपन्नता उसे इस कदर लाचार कर देती है, कि उसे धरती पर बिखरी संपन्नता नजर ही नहीं आती। नजर आते हैं सिर्फ संपन्न लोग, उनके ठाठबाट और शानो-शौकत जो उसे कुंठित करते हैं, जबकि उनसे प्रेरणा लेकर वह भी संपन्न होने की कोशिश कर सकता है। अतः जरूरत है अपनी सोच में बदलाव लाने की। मन की स्थिती अजेय है, अपराजेय है। उसकी दृढ़ इच्छा-शक्ति मनुष्य को विवश कर देती है कि वह किसी की परवाह किए बिना अपने काम को जी-जान से पूरा करें, अपनी सामर्थ्य से उस काम को पूरा करे। मनुष्य निर्धनता और संपन्नता का सम्बन्ध भाग्य से जोड़ता है। वह सोचता है कि जो सौभाग्यशाली है, लक्ष्य उस पर प्रसन्न रहती है और बदकिस्मती का मारा कोशिश करने के बावजूद निर्धन ही बना रहता है। निष्कर्ष: सफलता की मुख्य शर्त है- पुरूषार्थ। पुरूषार्थ करने से ही 'सार्थक जीवन' बनता है, केवल भाग्यवादी रहकर नहीं। भाग्य तो अतीत में किए गए कर्मों के संचित फलों का भूल है, जो मनुष्य को सुखःदुःख के रूप में भोगने को मिलते हैं और वे फल भोगने के पश्चात क्षीण हो जाते हैं। विशेष बात यह है कि भोग करने का समय भी निश्चित नहीं है। ऐसी स्थिति में वह कब तक भाग्य के भरोसे सुख की प्रतीक्षा करता रहेगा? यथार्थ में पुरूषार्थ करने में ही जीवन की सफलता सुनिश्ति है, जबकी व्यक्ति भाग्य के सहारे निष्क्रियता को जन्म देकर अपने सुनहरे अवसर को नष्ट कर देता है। महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण यदि चाहते तो पांडवों को पलक झपकते ही विजय दिला देते, किन्तु वे नहीं चाहते थे कि बिना कर्म किए उन्हें यश मिले। उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का पाठ पढ़ाकर उसे युद्ध में संलग्न कराया और फिर विजय-श्री एवं कीर्ति दिलवाकर उसे लोक-परलोक में यशस्वी बनाया। अतः आप विकास की नई-नई मंजिलें तय करने और उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँचने के लिए अपने पुरूषार्थ को कभी शिथिल न होने दें और पूर्ण उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहें। पुरूषार्थ उसी में है जो संकट की घड़ी में निर्णय लेने में संकोच नहीं करता। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

🍃भाग्य से बढ़कर पुरूषार्थ है🍃

राजा विक्रमादित्य के पास सामुद्रिक लक्षण जानने वाला एक ज्योतिषी पहुँचा। विक्रमादित्य का हाथ देखकर वह चिंतामग्न हो गया। उसके शास्त्र के अनुसार तो राजा दीन, दुर्बल और कंगाल होना चाहिए था, लेकिन वह तो सम्राट थे, स्वस्थ थे। लक्षणों में ऐसी विपरीत स्थिति संभवतः उसने पहली बार देखी थी। ज्योतिषी की दशा देखकर विक्रमादित्य उसकी मनोदशा समझ गए और बोले कि 'बाहरी लक्षणों से यदि आपको संतुष्टि न मिली हो तो छाती चीरकर दिखाता हूँ, भीतर के लक्षण भी देख लीजिए।' इस पर ज्योतिषी बोला - 'नहीं, महाराज! मैं समझ गया कि आप निर्भय हैं, पुरूषार्थी हैं, आपमें पूरी क्षमता है। इसीलिए आपने परिस्थितियों को अनुकूल बना लिया है और भाग्य पर विजय प्राप्त कर ली है। यह बात आज मेरी भी समझ में आ गई है कि 'युग मनुष्य को नहीं बनाता, बल्कि मनुष्य युग का निर्माण करने की क्षमता रखता है यदि उसमें पुरूषार्थ हो, क्योंकि एक पुरूषार्थी मनुष्य में ही हाथ की लकीरों को बदलने की सामर्थ्य होती है।'

अर्थात स्थिति एवं दशा मनुष्य का निर्माण नहीं करती, यह तो मनुष्य है जो स्थिति का निर्माण करता है। एक दास स्वतंत्र व्यक्ति हो सकता है और सम्राट एक दास बन सकता है। 

उपरोक्त प्रसंग से ये बातें प्रकाश में आती हैं- 

हम स्वयं परिस्थितियों को अनुकूल या प्रतिकूल बनाते हैं, अपने विचारों से, अपनी सोच से। जो व्यक्ति यह सोचता है कि वह निर्धन है, तो उसके विचार भी निर्धन होते हैं। विचारों की निर्धनता के कारण ही वह आर्थिक रूप से विपन्न होता है। यह विपन्नता उसे इस कदर लाचार कर देती है, कि उसे धरती पर बिखरी संपन्नता नजर ही नहीं आती। नजर आते हैं सिर्फ संपन्न लोग, उनके ठाठबाट और शानो-शौकत जो उसे कुंठित करते हैं, जबकि उनसे प्रेरणा लेकर वह भी संपन्न होने की कोशिश कर सकता है। अतः जरूरत है अपनी सोच में बदलाव लाने की। 

मन की स्थिती अजेय है, अपराजेय है। उसकी दृढ़ इच्छा-शक्ति मनुष्य को विवश कर देती है कि वह किसी की परवाह किए बिना अपने काम को जी-जान से पूरा करें, अपनी सामर्थ्य से उस काम को पूरा करे। 

मनुष्य निर्धनता और संपन्नता का सम्बन्ध भाग्य से जोड़ता है। वह सोचता है कि जो सौभाग्यशाली है, लक्ष्य उस पर प्रसन्न रहती है और बदकिस्मती का मारा कोशिश करने के बावजूद निर्धन ही बना रहता है। 

निष्कर्ष: 

सफलता की मुख्य शर्त है- पुरूषार्थ। पुरूषार्थ करने से ही 'सार्थक जीवन' बनता है, केवल भाग्यवादी रहकर नहीं। भाग्य तो अतीत में किए गए कर्मों के संचित फलों का भूल है, जो मनुष्य को सुखःदुःख के रूप में भोगने को मिलते हैं और वे फल भोगने के पश्चात क्षीण हो जाते हैं। विशेष बात यह है कि भोग करने का समय भी निश्चित नहीं है। ऐसी स्थिति में वह कब तक भाग्य के भरोसे सुख की प्रतीक्षा करता रहेगा? 

यथार्थ में पुरूषार्थ करने में ही जीवन की सफलता सुनिश्ति है, जबकी व्यक्ति भाग्य के सहारे निष्क्रियता को जन्म देकर अपने सुनहरे अवसर को नष्ट कर देता है। महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण यदि चाहते तो पांडवों को पलक झपकते ही विजय दिला देते, किन्तु वे नहीं चाहते थे कि बिना कर्म किए उन्हें यश मिले। उन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का पाठ पढ़ाकर उसे युद्ध में संलग्न कराया और फिर विजय-श्री एवं कीर्ति दिलवाकर उसे लोक-परलोक में यशस्वी बनाया। 

अतः आप विकास की नई-नई मंजिलें तय करने और उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँचने के लिए अपने पुरूषार्थ को कभी शिथिल न होने दें और पूर्ण उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहें। 

पुरूषार्थ उसी में है जो संकट की घड़ी में निर्णय लेने में संकोच नहीं करता। 
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संकल्प का प्रभाव 🔸🔸🔹🔸🔸 न जाने क्यों, वह भगवान के नाममात्र से ही भड़क उठता था। यहाँ तक कि किसी आस्तिक से बात करना भी वह गुनाह समझता था। एक बार उसके गाँव में एक बड़ महात्मा प्रवचन देने के लिये आए। पूरा गाँव उनका प्रवचन सुनने के लिए उमड़ पड़ा। कई दिनों तक महात्मा जी का प्रवचन चलता रहा। मगर उसने उधर जाना तक उचित न समझा। एक दिन वह संध्या के समय अपने खेत से लौट रहा था, सभी प्रवचन दे रहे महात्मा जी का स्वर उसके कानों से टकराया, “ अगर तुम जीवन में सफल होना चाहते हो तो मन में कुछ न कुछ दृढ़ संकल्प कर लो और पूर्ण निष्ठा से उसे पूरा करने में लगे रहो। एक न एक दिन तुम्हें उसका सुफल जरूर मिलेगा। न चाहते हुए भी आखिर यह बात उसके कानों टकरा ही गयी। उसने इस बात को भूल जाना चाहा, लेकिन जब रात में सोया तो रह- रहकर महात्मा जी के कहे शब्द उसके दिमाग में गूँजने लगे। लाख कोशिश करके भी वह उनसे अपना पीछा नहीं छुड़ा पाया। आखिर थक-हारकर उसने इस कथन की सत्यता को परखने का निश्चय किया। लेकिन वह क्या दृढ़ संकल्प करें? उसने ऐसी बात सोचनी चाही जिससे कभी भी कोई प्रतिफल न मिलने वाला हो। उसका मंतव्य सिर्फ इतना था कि किसी भी तरह महात्मा जी का कथन असत्य सिद्ध हो जाए। काफी सोच विचार में उलझे रहने के बाद उसका ध्यान अपने घर के सामने रहे वाले कुम्हार पर गया। उसने संकल्प किया वह प्रतिदिन कुम्हार का मुँह देखे बिना भोजन नहीं करेगा। अपनी इस सोच पर वह मन ही मन खूब हँसा, क्योंकि वह जानता था कि इसका किसी तरह कोई भी सुफल नहीं मिल सकता है। अगले ही दिन से उसने अपने संकल्प पर अमल करना शुरू कर दिया। अब वह अंधेर में ही उठकर अपने घर के बाहर चबूतरे पर बैठ जाता जब कुम्हार उठकर बाहर आता जाता तो वह उसका मुँह देख लेता, फिर अपने काम में लग जाता। कभी-कभी ऐसे भी अवसर आते, जब कुम्हार बाहर चला जाता तो उसके एक दो दिन तक उपवास करना पड़ता। लेकिन न तो वह इससे विचलित हुआ और नहीं उसने अपने संकल्प की भनक कुम्हार अथवा अपने किसी परिवार जन को लगने दी। धीरे धीरे छह महीने बीत गए। किंतु उसे कुछ भी लाभ न हुआ। फिर भी अपने संकल्प पर अटल एवं अडिग रहा। उस पर तो नास्तिकता का भूत सवार था। कुछ भी करके वह महात्मा जी की बात झूठी साबित करना चाहता था। एक दिन उसकी नींद देर से खुली। तब तक कुम्हार मिट्टी लेने के लिए गाँव के बाहर खदान में चला गया था। जब उसे इसका पता चला तो वह भी घूमते-घूमते उधर जा निकला ताकि कुम्हार का मुँह देख ले। उसने थोड़ी खड़े होकर कुम्हार को देखा। वह मिट्टी खोदने में तल्लीन था। अतः वह चुपचाप वापस चल पड़ा उधर मिट्टी खोदते-खोदते कुम्हार के सामने सोने की चार ईंटें निकल आयीं। उसने गरदन उठाकर चारों तरफ देखा कि कोई उसे देख तो नहीं रहा है। तभी उसकी नजर कुछ दूर तेज कदमों से जाते उस पर पड़ी। उसने अपनी घबराहट पर नियंत्रण किया और उसे पुकारा अरे भाई शिवराम किधर से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो? और कहा जा रहे हो? वह किधर से आया था, पूछकर कुम्हार तसल्ली कर लेना चाहता था। उसने रुककर जवाब दिया, “ बस इधर ही आया था। जो देखना था सो देख लिया। अब वापस घर जा रहा हूँ।” उसके कहने का तो मतलब था कि उसने कुम्हार का मुँह देख लिया था। लेकिन कुम्हार घबरा गया। उसे पक्का विश्वास था कि उसने सोना देख लिया है। कहीं उसने रियासत के राजा से शिकायत कर दी तो हाथ आयी लक्ष्मी निकल जायेगा। उसने तुरंत कुछ निर्णय किया और उससे बोला “अरे भाई शिवराम देख लिया है तो तुम भी आधा ले जाओ। लेकिन राजा से शिकायत न करना” उसने सोचा कि कुम्हार मजाक कर रहा है। वह मना करते हुए चल पड़ा। अब तो कुम्हार एकदम घबरा गया। उसने दौड़कर उसे पकड़ लिया और हाथ जोड़ते हुए बोला, भाई तुम्हें आधा ले जाने में क्या हर्ज है?” अब तो वह थोड़ा चकराया। कुम्हार उसे अपने साथ खदान में ले गया। वहाँ सोने की ईंटें पड़ी देखकर वह सारा माजरा समझ गया उसने चुपचाप चार में दो ईंटें उठा ली। ईंटें उठाते समय महात्मा जी के वाक्य की महिमा समझ में आ रही थी। वहां से लौट कर उसने वह सारा सोना गाँव वालों के हित में लगा दिया। इसी के साथ उसने शेष जीवन कठोर तप एवं भगवद्भक्ति में लगान का निश्चय किया। संकल्प के इसी प्रभाव के कारण अब उसे लो नास्तिक नहीं परम आस्तिक, महान तपस्वी महात्मा शिवराम के नाम से जानने लगे थे।

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शाखाहार द ग्रेट 🌹👏🚩 खीरा शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में मदद करता है। साथ ही यह बढ़े हुए यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में कारगर है। ऐसे में आप खीरे के जूस का सेवन कर सकते हैं। आज की अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण जो समस्याएं पहले बड़े-बुजुर्गों को हुआ करती थीं, वह अब युवाओं को होने लगी हैं। ऐसी ही एक समस्या है यूरिक एसिड की। शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा तब बढ़ती है, जब किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम हो जाती है। इसके कारण यूरिक एसिड हड्डियों के बीच में इक्ट्ठा होने लगता है, जिससे जोड़ों में दर्द, गठिया-बाय, गाउट, हाथों-पैरों की उंगलियों में दर्द, उठने-बैठने में तकलीफ जैसी शारिरिक परेशानियां होने लगती हैं। बता दें, खून में यूरिक एसिड बढ़ने के कारण इसके छोटे-छोटे टुकड़े जोड़ों, टेंडन, मांसपेशियों और टिश्यूज में क्रिस्टल के रूप में जमा होने लगते हैं। केवल इतना ही नहीं यूरिक एसिड के मरीजों को किडनी फेलियर और हार्ट अटैक जैसी जानलेवा दिक्कतें हो सकती हैं। बता दें, शरीर में बढ़े हुए यूरिक एसिड की स्थिति को हाइपरयूरिसेमिया कहा जाता है। हालांकि, घरेलू उपायों के जरिए यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए आप घर में बनें ऐसे जूस का सेवन कर सकते हैं, जो यूरिक एसिड की मात्रा को कंट्रोल करने में कारगर हैं। -टमाटर का सूप: शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए विटामिन-सी युक्त चीजों का सेवन करना चाहिए। विटामिन-सी उन चीजों में होता है, जो खाने में खट्टी लगती हैं। ऐसे में आप टामाटर के सूप का सेवन कर सकते हैं। इसके लिए टमाटर का मिक्सी में जूस निकाल लें। फिर इसमें हल्का काला नमक डालकर नियमित तौर पर सेवन करें। -खीरे का जूस: खीरा शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में मदद करता है। साथ ही यह बढ़े हुए यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में कारगर है। इसके लिए खीरे को काट लें फिर इसे मिक्सी में डालें। उसमें एक गिलास पानी और काला नमक मिलाएं। इस मिश्रण को पीसने के बाद जूस को पिएं। -धनिये का जूस: धनिये में कई तरह के पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर में फ्री रैडिकल्स से लड़ने में मदद करते हैं। ऐसे में धनिये के जूस का सेवन करने से शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। जय श्री गुरुदेव जय श्री गजानन जय श्री भोलेनाथ जय श्री पार्वती माता की 🌹 नमस्कार 🙏 शुभ प्रभात वंदन 👣 🌹 🌅👏🚩शुभ बुधवार ॐ गं गणपतये नमः 👏 मांस मच्छी मत खाओ शाखाहारी बनो धर्म का हर पल पालण करो धष्टपुष्ट बनो अपना सनातन धर्म ☸ बढायें रोग भगाओ जय हिंद जय भारत वंदेमातरम 💐 🚩 आप का हर पल शुभ रहे मस्त रहे सदा स्वस्थ रहे नमस्कार 🙏 आपको सादर प्रणाम 🌹 👏 🌿 🚩 जय श्री गजानन 🙏 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

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* *🚩॥श्री गणेशाय नम:॥🚩* *🛣️ <दैनिक~पंचांग> 🛣️* *🛤️ 08 - 05 - 2021* *🛤️ श्रीमाधोपुर~पंचांग* 🛤️ तिथि *द्वादशी* 17:23:11 🛤️ नक्षत्र उत्तराभाद्रपद 14:47:31 🛤️ करण तैतिल 17:23:11 🛤️ पक्ष कृष्ण 🛤️ योग विश्कुम्भ 19:57:38 🛤️ वार शनिवार 🛤️ सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ 🛤️ सूर्योदय 05:43:42 🛤️ चन्द्रोदय 28:25:00 🛤️ चन्द्र राशि मीन 🛤️ सूर्यास्त 19:04:52 🛤️ चन्द्रास्त 16:11:00 🛤️ ऋतु ग्रीष्म 🛤️ हिन्दू मास एवं वर्ष 🛤️ शक सम्वत 1943 प्लव 🛤️ कलि सम्वत 5123 🛤️ दिन काल 13:21:10 🛤️ विक्रम सम्वत 2078 🛤️ मास अमांत चैत्र 🛤️ मास पूर्णिमांत वैशाख 🛤️ शुभ और अशुभ समय 🛤️ शुभ समय 🛤️ अभिजित 11:57:35 - 12:50:59 🛤️ अशुभ समय 🛤️ दुष्टमुहूर्त : 05:43:42 - 06:37:06 06:37:06 - 07:30:31 🛤️ कंटक 11:57:35 - 12:50:59 🛤️ यमघण्ट 15:31:14 - 16:24:38 🛤️ राहु काल 09:03:59 - 10:44:08 🛤️ कुलिक 06:37:06 - 07:30:31 🛤️ कालवेला या अर्द्धयाम 13:44:24 - 14:37:49 🛤️ यमगण्ड 14:04:26 - 15:44:35 🛤️ गुलिक काल 05:43:42 - 07:23:50 🛤️ दिशा शूल 🛤️ दिशा शूल पूर्व 🛤️ चन्द्रबल और ताराबल 🛤️ ताराबल 🛤️ अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, चित्रा, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, उत्तराषाढ़ा, धनिष्ठा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती 🛤️ चन्द्रबल 🛤️ वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर, मीन 0️⃣8️⃣🔲0️⃣5️⃣🔲2️⃣1️⃣ *🔥🌷जयश्री कृष्णा🌷🔥* *ज्योतिषशास्त्री- सुरेन्द्र कुमार चेजारा व्याख्याता राउमावि होल्याकाबास निवास-श्रीमाधोपुर* 🛣️🛣️🛣️🛣️🛣️🛣️🛣️🛣️

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Amar jeet mishra May 8, 2021

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