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Payal yduvanshi
Payal yduvanshi Jun 16, 2019

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⚓।।Bharat Rathore।। 9926060905 Jun 16, 2019
जय श्री कृष्णा राधे राधे जी दोपहर वंदन जी आपका हर पल मंगलमय हो जी बहुत सुंदर पोस्ट धन्यवाद ईश्वर आपकी मनोकामना पूरी करें जी

Manoj Agarwal Jul 17, 2019

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गुरु पूर्णिमा के शुभ कामनाएँ 🙏🙏🙏 गुरु पूर्णिमा विशेष-शास्त्र कहते हैं-"वासुदेव सुतम देवम कंस चाणूर मर्दनम देवकी परमा नंदम कृष्णम वंदे जगद्गुरुं"यानि परमेश्वर श्रीकृष्ण इस संपूर्ण विश्व के गुरु हैं.शास्त्रों में भगवान श्री कृष्ण को जगद्गुरु कहकर संबोधित किया गया है. अतः जिनका कोई गुरु नही है वे भगवान श्रीकृष्ण को अपना गुरु मानकर उनकी सेवा कर सकते हैं.आज गुरु पूर्णिमा है इसलिए आज के दिन श्रद्धालु अपने अपने गुरुजनों का आदर सत्कार कर उनकी पूजा सेवा करते हैं उन्हें उपहार स्वरूप यथा सामर्थ्य दान आदि भी देते हैं.गुरु पूर्णिमा को "व्यास पूर्णिमा" भी कहा गया है क्योंकि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को महाभारत के रचयिता मुनि वेदव्यास जी का जन्म हुआ था. जिनका पूरा नाम श्री कृष्ण द्वेपायन व्यास था.तो जिन पाठकों का कोई गुरु नही है वे एक गुरु की भांति भगवान श्री कृष्ण की पूजा सेवा कर सकते हैं.ll 💐हरे कृष्ण हरे कृष्णll💐

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Manoj Agarwal Jul 16, 2019

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**अध्यात्मिक विषय । अध्यात्म क्या है श्रीमद्भागवदगीता के आठवे अध्याय मे अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यहीं पुछा है यथा किँँ तद् ब्रह्म किमध्यात्मँ किँ कर्म पुरूषोत्तम अधिभूतं च किँ प्रोत्तमधिदैवं किमुच्यते श्रीकृष्ण भगवान ने तीसरे श्लोक मै अर्जुन से कहाँ है परमअक्षर ब्रह्म है अपना श्वरुप अध्यात्म नाम से कहाँ जाता है ओर उत्पत्ति _ विनाश धर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत है हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है शरीरगत तीनो लोक को भी दर्शाताभाव है अधिदैव । हिरण्यमय है जिसमै सभी दैव शक्तिया बसती है ओर यह सुष्मणा नाडीमे बिराजमान होकर शरीर कोउशमता प्रदान करता है ईसी मै ह हकार ओर स सकार रूप से हंस बसता है जीसके निकलने पर शरीर ठंडा पड जाता है इसी स्थान को सनातन ग्रंथों मै हृदयगुहा नाम दीया है इसी स्थान सेये जो शब्द सपर्श रूप रस गन्ध आदि ओर मन बुद्धि अंह यहीं से अपना 2 कार्य सम्पन्न करते है इसलिए यही शरीर मै देव लोक है अध्यात्म । यह शरीर ही है कयूंकि इन दैव शक्तियो का अपना 2 कार्य करने का माध्यम है यथा द्रश्टा । जो देखने वाला है द्रष्टि । जिसके व्दारा( माध्यम से)देख रहा है जीसमै वरताव कर रहा है श्रोता । सुनता है श्रोत इन्द्रीय व्दारा यह इसका माध्यम है इसी तरह यह जो सथूल शरीर है शरीरस्थ सभी दैव शक्तियो का माध्यम है यहीं मध्यलोक है अधिभोतिक । उत्पत्ति ओर विनश धर्मवाले सब पदार्थ अधिभूतहै यह जीतना भी द्रष्य जगत है वहीं भौतिक है यह सिद्ध होता है शरीर मैं जहाँ दैव शक्तिबसती है वही देव लोक है जीस शरीर को माध्यम बनाकर ये कार्य करती है वहीं मध्यलोक है जो शरीर है यह द्रष्य जगत ही मृत्युलोक है शरीरशथ तीनलोक तो ये है ब्रह्माण्ड के कहाँ हैयह यथा पिन्डे तथा ब्रह्माण्ड धन्यवाद दार्शनिक शिवचरण भुलवाना* श्रीमद्भागवदगीता के आठवे अध्याय मे अर्जुन ने श्रीकृष्ण से यहीं पु

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Purav Jul 17, 2019

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मैडिटेशन। दिव्य योग आध्यात्मिक ज्ञान। प्राण साधना 12 साथियों यह दिव्य योग ऐसा है जिसका ध्यान चलते फिरते उठते बैठते अपने श्वास को ही देखने पर हानि लाभ का ज्ञान साधक प्राप्त कर लेता है यह विद्या प्रायः लोप है। जिन साधकों पास है। वह जन इसे साझा नहीं करते हैं। पिंगला नाडी, सूर्य स्वर में किए जाने वाले और कठिन कार्य। व्यायाम करने में षट्कर्मो में /मारण, मोहन, स्तम्भन, उच्चाटन, वशीकरण, और आकर्षण ये षटकर्म है। इनमें, यक्षिणी, बेताल--भूत, विष आदि के प्रभाव को नष्ट करने में पिंगला नाडी शुभ होती है। प्रेतों को वश में करना, द्वेष करना, शत्रुओं को दण्ड देना, हाथ में तलवार लेना, शत्रुओं से युद्ध करना, उपभोग करना, राजा का दर्शन करना, क्षोभ, दान देना, खरीदना, बेचना, भोजन, स्नान आदि कार्य और तेजस्वी कार्यो में पिंगला नाडी शुभ होती है। मन्दाग्नि में व्यापार कार्य में और सोने में। सभी प्रकार के कठिन कार्य, राजसी भाव वाले छोटे बड़े कार्य सूर्य स्वर में सिद्ध होते है। इसमें कदापि शंका नहीं करनी चाहिए। आगे सुषुम्ना नाडी अर्थात् शिवस्वर का वर्णन करंगे। धन्यवाद जी शिवचरण परमार भुलवाना

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sonali jangle Jul 16, 2019

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