Vinod Agarwal
Vinod Agarwal Aug 11, 2017

दिल से भक्ति

दिल से भक्ति

#भक्ति
एक बार जरूर पढे.......
वह शख्स गाड़ी से उतरा.. और बड़ी तेज़ी से एयरपोर्ट मे घुसा , जहाज़ उड़ने के लिए तैयार था , उसे किसी कांफ्रेंस मे पहुंचना था जो खास उसी के लिए आयोजित की जा रही थी.....
वह अपनी सीट पर बैठा और जहाज़ उड़ गया...अभी कुछ दूर ही जहाज़ उड़ा था कि....कैप्टन ने ऐलान किया , तूफानी बारिश और बिजली की वजह से जहाज़ का रेडियो सिस्टम ठीक से काम नही कर रहा....इसलिए हम क़रीबी एयरपोर्ट पर उतरने के लिए मजबूर हैं.।
जहाज़ उतरा वह बाहर निकल कर कैप्टन से शिकायत करने लगा कि.....उसका एक-एक मिनट क़ीमती है और होने वाली कांफ्रेस मे उसका पहुचना बहुत ज़रूरी है....पास खड़े दूसरे मुसाफिर ने उसे पहचान लिया....और बोला डॉक्टर पटनायक आप जहां पहुंचना चाहते हैं.....टैक्सी द्वारा यहां से केवल तीन घंटे मे पहुंच सकते हैं.....उसने शुक्रिया अदा किया और टैक्सी लेकर निकल पड़ा...

लेकिन ये क्या आंधी , तूफान , बिजली , बारिश ने गाड़ी का चलना मुश्किल कर दिया , फिर भी ड्राइवर चलता रहा...
अचानक ड्राइवर को एह़सास हुआ कि वह रास्ता भटक चुका है...
ना उम्मीदी के उतार चढ़ाव के बीच उसे एक छोटा सा घर दिखा....इस तूफान मे वही ग़नीमत समझ कर गाड़ी से नीचे उतरा और दरवाज़ा खटखटाया....
आवाज़ आई....जो कोई भी है अंदर आ जाए..दरवाज़ा खुला है...

अंदर एक बुढ़िया आसन बिछाए भगवद् गीता पढ़ रही थी...उसने कहा ! मांजी अगर इजाज़त हो तो आपका फोन इस्तेमाल कर लूं...

बुढ़िया मुस्कुराई और बोली.....बेटा कौन सा फोन ?? यहां ना बिजली है ना फोन..
लेकिन तुम बैठो..सामने चरणामृत है , पी लो....थकान दूर हो जायेगी..और खाने के लिए भी कुछ ना कुछ फल मिल जायेगा.....खा लो ! ताकि आगे सफर के लिए कुछ शक्ति आ जाये...

डाक्टर ने शुक्रिया अदा किया और चरणामृत पीने लगा....बुढ़िया अपने पाठ मे खोई थी कि उसकेे पास उसकी नज़र पड़ी....एक बच्चा कंबल मे लपेटा पड़ा था जिसे बुढ़िया थोड़ी थोड़ी देर मे हिला देती थी...
बुढ़िया फारिग़ हुई तो उसने कहा....मांजी ! आपके स्वभाव और एह़सान ने मुझ पर जादू कर दिया है....आप मेरे लिए भी दुआ
कर दीजिए....यह मौसम साफ हो जाये मुझे उम्मीद है आपकी दुआऐं ज़रूर क़बूल होती होंगी...

बुढ़िया बोली....नही बेटा ऐसी कोई बात नही...तुम मेरे अतिथी हो और अतिथी की सेवा ईश्वर का आदेश है....मैने तुम्हारे लिए भी दुआ की है.... परमात्मा का शुक्र है....उसने मेरी हर दुआ सुनी है..
बस एक दुआ और मै उससे माँग रही हूँ शायद जब वह चाहेगा उसे भी क़बूल कर लेगा...

कौन सी दुआ..?? डाक्टर बोला...

बुढ़िया बोली...ये जो 2 साल का बच्चा तुम्हारे सामने अधमरा
पड़ा है , मेरा पोता है , ना इसकी मां ज़िंदा है ना ही बाप , इस बुढ़ापे मे इसकी ज़िम्मेदारी मुझ पर है , डाक्टर कहते हैं...इसे कोई खतरनाक रोग है जिसका वो इलाज नही कर सकते , कहते हैं एक ही नामवर डाक्टर है , क्या नाम बताया था उसका !
हां "डॉ पटनायक " ....वह इसका ऑप्रेशन कर सकता है , लेकिन मैं बुढ़िया कहां उस डॉ तक पहुंच सकती हूं ? लेकर जाऊं भी तो पता नही वह देखने पर राज़ी भी हो या नही ? बस अब बंसीवाले से ये ही माँग रही थी कि वह मेरी मुश्किल आसान कर दे..!!

डाक्टर की आंखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा है....वह भर्राई हुई आवाज़ मे बोला !
माई...आपकी दुआ ने हवाई जहाज़ को नीचे उतार लिया , आसमान पर बिजलियां कौदवां दीं , मुझे रस्ता भुलवा दिया , ताकि मैं यहां तक खींचा चला आऊं ,हे भगवान! मुझे यकीन ही नही हो रहा....कि कन्हैया एक दुआ क़बूल करके अपने भक्तौं के लिए इस तरह भी मदद कर सकता है.....!!!!

दोस्तों वह सर्वशक्तीमान है....परमात्मा के बंदो उससे लौ लगाकर तो देखो...जहां जाकर इंसान बेबस हो जाता है , वहां से उसकी परमकृपा शुरू होती है...।यह आप सबसे अधिक लोगो को भेजे ताकि मुझ जैसे लाखो लोगो की आँखे खुले।

+226 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 117 शेयर

कामेंट्स

Chandrashekhar Karwa May 22, 2019

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर
Chandrashekhar Karwa May 22, 2019

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
आकाश May 21, 2019

+13 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 6 शेयर
Shiva Gaur May 21, 2019

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 6 शेयर
Sandeep Saini May 21, 2019

मैं सांड़ हूं ,लोग कहते हैं कि मैं तुम्हारी फसल उजाड़ रहा हूँ ,सड़कों पर कब्जा कर रहा हूँ ,मैं तुम मनुष्यों से पूंछता हूँ कि कितने कम समय में मैं इतना अराजक हो गया !मैं मनुष्यों का दुश्मन कैसे बन गया । अभी कुछ सालों पहले तो लोग मुझे पालते थे ,चारा देते थे ,लेकिन मनुष्य ज्यादा सभ्य हो गया ट्रैक्टर ले आया ,पम्पिंग सेट से पानी निकालने लगा और मुझे खुला छोड़ दिया ,मैं कहाँ जाता ?कहाँ चरता ?मनुष्य ने चरागाहों पर कब्जा कर लिया ,अब पापी पेट का सवाल है अपने पेट के लिए अपने मित्र मनुष्य से संघर्ष शुरू हो गया । यहां तक कि कुछ लोगों ने अपना पेट भरने के लिए मुझे काटना भी शुरू कर दिया ,मैं फिर भी चुप रहा ,चलो किसी काम तो आया तुम्हारे ।मेरी माँ ने मेरे हिस्से का दूध देकर तुम्हे और तुम्हारे बच्चों को पाला लेकिन अब तो तुमने उसे भी खुला छोड़ दिया । इधर पिछले सालों से कई मनुष्य मित्रों ने मुझे कटने से बचाने के लिए अभियान चलाया ,लेकिन जब मैं अपना पेट भरने गलती से उनकी फसल खा गया तो वही मित्र मुझे बर्बादी का कारण बताने लगे ,शायद अब यही चाहते हैं कि मैं काट ही दिया जाता । मित्र बस इतना कहना चाहता हूं कि मैं तुम्हारी जीवन भर सेवा करूंगा तुम्हारे घर के सामने बंधा रहूँगा ,थोड़े से चारे के बदले तुम्हारे खेत जोत दूंगा ,रहट से पानी निकाल दूंगा ,गाड़ी से सामान ढो दूंगा ,बस मुझे अपना लो लेकिन क्या मेरे इस निवेदन का तुम पर कोई असर होगा ?अरे तुम लोग तो अपने लाचार मां बाप को भी घर से बाहर निकाल देते हो ,फिर मेरी क्या औकात ?

+3 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 4 शेयर
hari om May 22, 2019

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Chandrashekhar Karwa May 20, 2019

+7 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 5 शेयर
hari om May 22, 2019

0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
hari om May 20, 2019

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर
sanket Jamdar May 20, 2019

*भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी॥* *असि हरि भगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई॥* भावार्थ:-जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्ति के लिए और उस भोजन को जठराग्नि अपने आप (बिना हमारी चेष्टा के) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देने वाली हरि भक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा?॥ मित्रों, जो भगवद्भक्ति के कारण मुक्तिपथ पर है वह प्रत्येक जीव को प्रिय होता है और प्रत्येक जीव उसके लिये प्यारा है, यह भगवद्भक्ति के कारण होता है, ऐसा व्यक्ति किसी भी जीव को श्रीकृष्ण से पृथक् नहीं सोच पाता, जिस प्रकार वृक्ष की पत्तीयाँ तथा टहनियाँ वृक्ष से भिन्न नहीं होती, वह भलीभाँति जानता है कि वृक्ष की जड़ में डाला गया जल समस्त पत्तियों तथा टहनियों में फैल जाता है। अथवा आमाशय को भोजन देने से शक्ति स्वतः पूरे शरीर में फैल जाती है, चूँकि भगवद्भक्ति में कर्म करने वाला सबों का दास होता है, अतः वह हर एक को प्रिय होता है, चूँकि प्रत्येक व्यक्ति उसके कर्म से प्रसन्न रहता है, अतः उसकी चेतना शुद्ध रहती है, चूँकि उसकी चेतना शुद्ध रहती है इसलिये उसका मन पूर्णतया नियन्त्रण में रहता है, मन के नियन्त्रित होने से उसकी इन्द्रियाँ संयमित रहती है चूँकि उसका मन सदैव श्रीकृष्ण में स्थिर रहता है, अतः उसके विचलित होने का प्रश्न ही नहीं उठता, न ही उसे श्रीकृष्ण से सम्बद्ध कथाओं के अतिरिक्त अन्य कार्यों में अपनी इन्द्रियों को लगाने का अवसर मिलता है, वह कृष्णकथा के अतिरिक्त और कुछ सुनना नहीं चाहता, वह श्रीकृष्ण को अर्पित किये हुये भोजन के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं खाना चाहता और न ऐसे किसी स्थान में जाने की इच्छा रखता है, जहाँ श्रीकृष्ण सम्बन्धी कार्य न होता हो, अतः उसकी इन्द्रियाँ वश में रहती है। ऐसा व्यक्ति जिसकी इन्द्रियाँ संयमित हो, वह किसी के प्रति अपराध नहीं कर सकता, इस पर कोई यह प्रश्न कर सकता है, तो फिर अर्जुन अन्यों के प्रति युद्ध में आक्रामक क्यों था? क्या वह भगवद्भक्त नहीं था? वस्तुतः अर्जुन ऊपर से ही आक्रामक था, क्योंकि जैसा कि द्वितीय अध्याय में बताया जा चुका है, आत्मा के अवध्य होने के कारण युद्धभूमि में एकत्र हुये सारे व्यक्ति अपने-अपने स्वरूप में जीवित बने रहेंगे। अतः आध्यात्मिक दृष्टि से कुरूक्षेत्र की युद्धभूमि में कोई मारा नहीं गया, जहाँ पर स्थित श्रीकृष्ण की आज्ञा से केवल उनके वस्त्र बदल दिये गये, अतः अर्जुन कुरूक्षेत्र की युद्धभूमि में युद्ध करता हुआ भी वस्तुतः युद्ध नहीं कर रहा था, वह तो पूर्ण भगवद्भक्ति में श्रीकृष्ण के आदेश का पालन मात्र कर रहा था, ऐसा व्यक्ति कभी कर्मबन्धन से नहीं बँधता। नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्‌ गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ।।8।। प्रलपन्विसृजन्गृहमन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।।9।। दिव्य भावनामृत युक्त पुरूष देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूँघते, खाते, चलते-फिरते, सोते तथा श्वास लेते हुये भी अपने अन्तर में सदैव यही जानता रहता है कि वास्तव में वह कुछ भी नहीं करता, बोलते, त्यागते, ग्रहण करते या आँखे खोलते-बन्द करते हुये भी वह यह जानता रहता है कि भौतिक इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त है और वह इन सबसे पृथक् है। सज्जनों! चुँकि भगवद्भक्तिभावित व्यक्ति का जीवन शुद्ध होता है, इस कारण उसे निकट तथा दूरस्थ पाँच कारणों - कर्ता, कर्म, अधिष्ठान, प्रयास तथा भाग्य पर निर्भर किसी कार्य से कुछ लेना-देना नहीं रहता, इसका कारण यहीं है कि वह भगवान् की दिव्य सेवा में लगा रहता है, यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपने शरीर तथा इन्द्रियों से कर्म कर रहा है, किन्तु वह अपनी वास्तविक स्थिति के प्रति सचेत रहता है जो कि आध्यात्मिक व्यस्तता है। भौतिक चेतना में इन्द्रियाँ इन्द्रियतृप्ति में लगी रहती है, किन्तु भगवद्भक्ति में वे श्रीकृष्ण की इन्द्रियों की तुष्टि में लगी रहती है, अतः भगवद्भक्तिमय व्यक्ति सदा मुक्त रहता है, भले ही वह ऊपर से भौतिक कार्यों में लगा हुआ दिखाई पड़े, देखने तथा सुनने के कार्य ज्ञानेन्द्रियों के कर्म है जबकि चलना, बोलना, मल त्यागना आदि कर्मेन्द्रियों के कार्य है, भगवद्भक्तिभावित व्यक्ति कभी भी इन्द्रियों के कार्यों से प्रभावित नहीं होता, वह भगवत्सेवा के अतिरिक्त कोई दूसरा कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि उसे ज्ञात है कि वह भगवान् का शाश्वत दास है। जय श्री कृष्ण! ओऊम् नमो भगवते वासुदेवाय्

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB