umasharma
umasharma Jan 5, 2021

🌹🌹🌹🚩jay Shree ram 🚩🌹🌹🌹 🌹🌹🌹🚩Jay hanuman 🚩🌹🌹🌹 🌹🌹🌹🚩 Suprabhatam 🚩🌹🌹🌹

🌹🌹🌹🚩jay Shree ram 🚩🌹🌹🌹
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कामेंट्स

Gour.... Jan 5, 2021
बहुत सुन्दर 🔔🔔🔔राम राम जी 🕉🕉🕉, जय श्री राम जी 🙏🙏 🙏भगवान श्री राम व पवन पुत्र श्री हनुमान जी का आशीर्वाद आप पर हमेशा बना रहे🚩🔱🙏🙏 🙏 आपका हर पल खुशियों से भरा हो जी🙏🙏🙏🔔 हर हर महादेव जी **** जय श्री राधे जय श्री कृष्णा जी

Brajesh Sharma Jan 5, 2021
जय जय श्री राम जय हनुमान..जय बजरंग बली जी ॐ नमः शिवाय, शुभ दिवस की मंगलमय शुभकामनाएं

JAI MAA VAISHNO Jan 5, 2021
जय राम सीता राम जय राम सीता राम जय जय राम सीता राम जय जय राम सीता राम जय जय राम सीता राम जय जय राम सीता राम जय जय राम सीता राम जय जय राम सीता राम जय जय राम सीता राम जय जय राम सीता राम जय जय राम सीता राम जय हनुमान जय श्री राम जय हनुमान जय श्री राम जय हनुमान जय जय हनुमान की जय

HAZARI LAL JAISWAL Jan 5, 2021
जय श्री बजरंग बली जय जय श्री हनुमान पवनसुत हनुमान की जय 🙏🙏 शुभ प्रभात वंदन जी

Gouri Shankar Jan 5, 2021
Jai shree Ram ji 🙏🌹 Jai veer Hanuman ji 🙏🌹 vvvv Nice post ji Uma ji good morning ji aapko 😊☕🌹🌻 Ram Ram Sa 🙏🙏

नीलम शर्मा Jan 5, 2021
🙏🙏 जय श्री राम🙏🙏 जय बजरंग बली सुप्रभात वंदन राधे राधे आपका दिन शुभ और मंगल मय हो।।

Rekchand Bisne Deosarra Post B Jan 5, 2021
🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 🕉️ Ram Ram Ram Ram Ram Ram Ram 🕉️ 🕉️ Ram Ram Ram Ram Ram Ram Ram 🕉️ 🕉️ Ram Ram Ram Ram Ram Ram Ram 🕉️ 🕉️ Ram Ram Ram Ram Ram Ram🕉️ 🕉️ Ram Ram Ram Ram Ram 🕉️ 🕉️ Ram Ram Ram. Ram🕉️ 🕉️ Ram. Ram Ram. 🕉️ 🕉️ Ram. Ram.🕉️ 🕉️. Ram 🕉️

kamala Maheshwari Jan 5, 2021
जय श्री राम जयहनुमान जीजयकानहाकी🚩 कृपा सदैव आप ओर आपकेपरिवार पर बनी रहेशुभ मगलमयबेला का नमस्कार प्रणाम जी जय श्री कृष्ण जी❣️🚩❣️🚩❣️🚩❣️🚩

Arvid bhai Jan 5, 2021
jay shri radhe krisna radhe krisna radhe krisna radhe krisna bhenji nmskar

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Jan 5, 2021
🌹🌿जय श्री राम 🌿🌹 🙏🥗नमस्ते जी🥗🚩 🙏 आप और आपके पूरे परिवार को जनवरी 2021माह के पहले मंगलवार की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏 🎎आप और आपके पूरे परिवार पर शिव के रुद्रा अवतार व श्री राम भक्त हनुमान जी की आशिर्वाद निरंतर बनी रहे जी🙏 👏 आपका मंगलवार का दिन शुभ सुंदर और मंगल ही मंगल व्यतिय हो 🧿

vineeta tripathi Jan 5, 2021
Jai sri ram jai hanuman ji ki 🌹🌹 good evening sister 🌹🌹

Sushil Kumar Sharma 🙏🙏🌹🌹 Jan 5, 2021
Good Night My Sister ji 🙏🙏 Jay Shree Ram 🙏🙏🌹 Jay Veer Hanuman 🙏🙏🌹🌹 Jay Bhajanvali 🙏🙏🌹🌹 Ki Kripa Dristi Aap Our Aapke Priwar Per Hamesha Sada Bhni Rahe ji 🙏 Aapka Har Din Shub Mangalmay Ho ji 🙏🙏🌹🌷🌷🥀🥀🥀🥀🌷💐🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹.

madan pal 🌷🙏🏼 Jan 5, 2021
jai shree ram jiiiii shubh ratari Vandan jiiiíi véer Hanuman jiii Ki karpa AAP v aapka pariwar par bani rahe jiii 🌷🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🌷🙏🏼🙏🏼

kamala Maheshwari Jan 6, 2021
🌷जयगणेशायनमः🌷जयगणेशायनमः🌷     🌷 जयगणेशायनमः🌷जयगणेशायनमः🌷          🌷जयगणेशायनमः🌷जयगणेशायनम🌷 🌷जयगणेशायनमः🌷जयगणेशायनमः🌷        🌷जयगणेशायनम🌷जयगणेशायनम🌷             🌷जयगणेशायनम🌷जयगणेशायनम🌷      🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

Brajesh Sharma Jan 6, 2021
जय श्री गणेश जी... गणपति बप्पा मोरिया हर हर महादेव.... ॐ नमः शिवाय जय जय श्री राधे..जय श्री राधे कृष्णा

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vineeta tripathi Apr 10, 2021

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हिन्दू धर्म बेहद रहस्यमयी धर्म है। अगर देखा जाए तो जितना ये सरल है, कभी-कभार इससे संबंधित कहानियों और घटनाओं को समझना उतना ही जटिल भी हो जाता है। आप खुद इस बात को जानते और समझते होंगे कि आए दिन हमें बहुत सी ऐसी पौराणिक कहानियों को सुनते हैं जिनपर विश्वास करना बहुत कठिन तो होता है लेकिन उनके पीछे छिपी दिव्य कहानियों और चमत्कारों की बात सुनकर हम इनपर संदेह करना छोड़ देते हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही कहानी सुनाने जा रहे हैं जिससे शायद बहुत ही कम लोग परिचित होंगे। यह कथा वाकई अद्भुत है। आपको ये बता दे की हनुमान जी की पूंछ में माता पार्वती देवी निवास करती थी पर आज ये जानकर अच्छर्य में होंगे की ये कैसे हो सकता हैं. तो यह बात जब की है जब भोले शंकर ने माता पार्वती का मनोरथ पूर्ण करने के लिए कुबेर से बोलकर स्वर्ण का भव्य राज महल बनवाया। और जब रावण की नज़र इस महल पर पड़ी तो उसने सोचा की इतना सुंदर महल तो त्रिलोकी में किसी के पास भी नहीं है। अत: अब यह महल तो मेरा ही होना चाहिए। वह ब्राह्मण का रूपधारण कर अपने इष्ट देव भोले शंकर के पास गया और भिक्षा में उनसे स्वर्ण महल की मांग करने लगा। और भोले शंकर जान गए की उनका प्रिय भक्त रावण ब्राह्मण का रूप धार करके उनसे महल की मांग कर रहा है। द्वार पर आए ब्राह्मण को खाली हाथ लौटाना उन्हें धर्म विरूद्ध लगा क्योंकि शास्त्रों में वर्णित है द्वार पर आए हुए याचक को कभी भी खाली हाथ या भूखे नहीं जाने देना चाहिए। एवं भूलकर भी अतिथि का अपमान कभी मत करो। और कहा कि हमेशा दान के लिए अपना हाथ बढाओ। ऐसा करने से सुख, समृद्धि और प्रभु कृपा स्वयं तुम्हारे घर आ जाएगी, लेकिन याद रहे दान के बदले मे कुछ पाने की इच्छा न रखें। निर्दोष हृदय से किया गया गुप्त दान भी महाफल प्रदान करता है। तथा भोले शंकर ने खुशी-खुशी महल रावण को दान में दे दिया। जब देवी पार्वती जी को पता चला की उनका प्रिय महल भोले शंकर ने रावण को दान में दे दिया है तो वह खिन्न हो गई। भोले शंकर ने उनको मनाने का बहुत प्रयास किया लेकिन वह नहीं मानीं। जब सभी प्रयास विफल हो गए तो उन्होंने पार्वती जी को एक वादा किया की त्रेतायुग में जब राम अवतार होगा तो मैं वानर का रूप धारण करूंगा और हनुमान का अवतार लूंगा। तब आप मेरी पूंछ बन जाना। जब राक्षसों का संहार करने के लिए प्रभु राम की माया से रावण माता सीता का हरण करके ले जाएगा तो मैं माता सीता की खोज करने के लिए तुम्हारे स्वर्ण महल में आऊंगा जोकि भविष्य में सोने की लंका के नाम से जानी जाएगी। उस समय तुम मेरी पूंछ के रूप में लंका को आग लगा देना और उस रावण को आप दण्डित करना। पार्वती जी इस बात के लिए मान गई। इस तरह भोले शंकर बने हनुमान और मां पार्वती बनी उनकी पूंछ। हर हर महादेव जय श्री महाकाल जी ॐ नमः शिवाय जय श्री महाकाली जय श्री पार्वती माता की जय श्री गजानन जय श्री भोलेनाथ 🌹 👏 🙏 जय श्री राम जय श्री हनुमान जी जय श्री सिता माता की 💐 जय श्री शनि देव महाराज 👑 शुभ संध्या वंदन 🌄🌹👏🚩✨

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खान देशमें (वर्तमान गुजरात महाराष्ट्र सीमा ) फैजपुर नामका एक नगर है । वहाँ डैढ़ सौ साल पहले तुलसीराम भावसार नामक श्री कृष्ण पंढरीनाथ जी के एक भक्त रहते थे । इनकी धर्मपरायणा पत्नी का नाम नाजुकबाई था । इनकी जीविका का धन्धा था कपडे रँगना। दम्पती बड़े ही धर्मपरायण थे । जीविका मे जो कुछ भी मिलता, उसीमें आनन्द के साथ जीवन निर्वाह करते थे । उसीमे से दान धर्म भी किया करते थे । इन्हीं पवित्र माता पिता के यहाँ यथासमय श्री खुशाल बाबा का जन्म हुआ था । बचपन सेे ही इनकी चित्तवृत्ति भगवद्भक्ति की ओर झुकी हुई थी । भगवान् के लिए नृत्य और कीर्तन करके उन्हें रिझाते और उनकी लीलाओं को सुनकर बड़े प्रसन्न (खुश ) होते , खुश होकर हँसते और मौज में नाचते रहते । इसी से सबलोग इनको खुशाल बाबा कहते थे । यथाकाल पिता ने इनका विवाह भी करा दिया । इनकी साध्वी पत्नी का नाम मिवराबाई था। दक्षिण मे भारत का दूसरा वृंदावन श्री क्षेत्र पंढरपुर बहुत प्रसिद्ध है । वहाँ आषाढ और कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को बडा मेला लगता है । वैष्णव भक्त दोनो पूर्णिमाओं को यहाँ की यात्रा करते है । उन्हें वारकरी कहते है और यात्रा करने को कहते है वारी । ऐसो ही एक पूर्णिमा को श्री खुशलबाबा ‘वारी’ करने पंढरपुर आये । श्रद्धा भक्ति से भगवान् विट्ठलके दर्शन किये और मेला देखने गये । उन्होने देखा कि एक दूकान में श्री विट्ठल का बडा ही सुंदर पाषाण विग्रह है । बाबा के चित्त मे श्री विट्ठलनाथ के उस पाषाण विग्रह के प्रति अत्यंत आकर्षण हो गया । उन्होने सोचा पूजा अर्चा के लिये भगवान् का ऐसा ही विग्रह चाहिये । उन्होचे उसे खरीदने का निश्चय किया और दूकानदार उस विग्रह का मूल्य पूछा । दूकानदार ने विग्रह के जितने पैसे बताये, उतने पैसे बाबा के पास नहीं थे । दूकानदार मूल्य कम करनेपर राजी नहीं था । बाबा को बडा दुख हुआ । उन्होने सोचा अवश्य ही मैं पापी हूं। इसीलिये तो भगवान् मेरे घर आना नहीं चाहते । वे रो रोकर प्रार्थना करने लगे – हे नाथ ! आप तो पतितपावन हैं । पापियो को आप पवित्र करते हैं । बहुत से पापियो का आपने उद्धार किया हे , फिर मुझ पापीपर हे नाथ ! आप क्यो रूठ गये ? दया करो मेरे स्वामी ! मैं पतित आप पतितपावन की शरण हूँ। बाबा ने देखा एक गृहस्थ ने मुंहमांगा दाम देकर उस पाषाण विग्रह को खरीद लिया है । अब उस विग्रह के मिलने की कुछ आशा ही नहीं है । बाबा बहुत ही दुखा हो गये । उस विग्रह के अतिरिक्त उन्हे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था , उनका दिल तो उसी विग्रह की सुंदरता ने चूरा लिया था । उनके अन्तश्चक्षु के सामने बार बार वह विग्रह आने लगा । खाने पीने की सुधि भी वे भूल गये । रात को एकादशी का कीर्तन सुनने के बाद वह गृहस्थ उस पाषाण विग्रह को एक गठरी में बांधकर और उस गठरी को अपने सिरहाने रखकर सो गया । खुशाल बाबा भी श्री विट्ठल भगवन का नाम स्मरण करते हुए एक जगह लेट गये । भगवान् विट्ठल ने देखा कि खुशाल बाबा का चित्त उनमें अत्यधिक आसक्त है और वे हमारी सेवा करना चाहते है। विग्रह के बिना बाबा दुखी हो रहे थे । भक्त के दुख से दुखी होना यह भगवान् का स्वभाव है । गीता में उन्होने अपने श्रीमुख से कहा है- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । इस विरुद के अनुसार खुशाल बाबा के पास जाने का प्रभु ने निश्चय किया । मध्यरात्रि हो गयी । गृहस्थ सो रहा था । भगवान बड़े विचित्र लीलाविहारी ही, उन्होंने लीला करनेकी ठानीे । वे उस गठरी से अन्तर्धान हो गये और खुशाल बाबा के पास आकर उनके सिरहा ने टिक गये ।भगवान् कहने लगे – ओ खुशाल ! मै तेरा भक्ति से प्रसन्न हूं । देख मैं तेरे पास आ गया। बाबा ने आँखे खोली । भगवान् को अपने सिरहाने देखकर उन्हें बहुत हर्ष हुआ । वे प्रेम में उन्मुक्त होकर नाचने और संकीर्तन करने लगे । सुबह वह धनिक भी जागा, उसने अपनी गठरी खोली । देखा तो अन्दर श्रोविट्ठल का विग्रह नही है । वह चौंक गया । वह उसकी खोज मे निकला । घूमते घूमते वह बाबा के पास अस्या । उसने देखा श्रीविग्रह हाथ में लेकर खुशाल बाबा नाच रहे है । उसने बाबापर चोरी का आरोप लगाया और उनके साथ झगडने लगा । बाबा ने उसे शान्ति के साथ सारी परिस्थिति समझा दी और विग्रह उसे लौटा दिया । दूसरे दिन रात को भगवान् ने ठीक वही लीला की और बाबा के पास पहुँच गये । वह धनिक सुबह उठा तो फिर विग्रह गायब ! वह सीधा बाबा के पास गया तो वही कल वाला दृश्य दिखाई पड़ा । बाबा विट्ठल विग्रह को।लेकर नाच रहे है , धनिक ने बहुत झगड़ा किया । बाबा ने उसे फिर से सत्य बात बता दी और विग्रह उसे लौटा दिया । अब उस गृहस्थ ने कडे बन्दोबस्त मे उस विग्रह को रख दिया और सो गया । भगवान् ने स्वप्न मे उसे आदेश दिया कि खुशालबाबा मेरा श्रेष्ठ भक्त है । वह मुझे चाहता है और मैं भी उसे चाहता हूँ । अब आदर के साथ जाकर मेरा यह विग्रह उसे समर्पण कर दो । इसीमे तुम्हारी भलाई है । हठ करोगे तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायगा । इतना कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये । बाबा खुशाल जी भगवान् के विरह मे रो रहे थे । प्रात: काल वह धनिक स्वयं उस श्री विग्रह को लेकर उनके पास पहुंचा और बाबा के चरणो में वह गिर पडा। अनुनय विनय के साथ उसने वह विग्रह बाबा को दे दिया । बाबा बड़े आनन्द से फैजपुर लौट आये । उन्होंने बड़े समारोह के साथ उस श्री विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा की । प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर बाबा स्नान करते और तीन घण्टे भजन पूजन करते । तदनन्तर जीविकाका धंधा करते । सांयकाल भोज़न के बाद भजन कीर्तन करते । काम करते समय भी उनके मुख से भगवान् का नाम स्मरण अखण्ड चलता रहता था । भगवान् बाबा से बहुत बाते करते, समय समय पर अनेको लीला करते रहते थे। भगवान् की कृपा से यथासमय बाबा के एक कन्या हुई थी, वह विवाह योग्य हो गयी । बाबा की आर्थिक स्थिति खराब थी । पासमें धन नहीं था । विवाह कराना भी आवश्यक था । सबने कहा बाबा कर्ज लेलो तब अन्त मे लखमीचंद नामक एक बनिये से उन्होने दो सौ रुपये उधार लेकर कन्या का विवाह कर दिया । ऋण चुकाने की अन्तिम तिथि निकट आ गयी । बाबा के पास कौडी भी नहीं थी । वे बस दिन रात भगवान् के नाम में मस्त रहते थे । एक दिन बनिये का सिपाही बाबा के दरवाजे पर बार बार आका तकाजा करने लगा । बाबाने उस से कहां – मै कल शामतक पैसे की व्यवस्था करता हूँ। आप निश्चिन्त रहिये । बाबा कभी किसीसे कुछ मांगते न थे परंतु अब दूसरा उपाय बचा न था । गाँव में किसीने भी ऋण देना स्वीकार नहीं किया । पडोस के एक दो गाँवों में जाकर बाबा ने पैसे लाने की कोशिश की परतुं ऋण वहुकाने लायक पैसे जमा नहीं हुए । दूसरे दिनतक पैसे नहीं लौटाथे जाते हैं तो बनिया लखमीचंद उनके घर को नीलाम कर देगा । बाबा ने सब हरि इच्छा मानकर घर वापस आ गये और भजन में लग गए । इधर भक्तवत्सल भगवान् को भक्त की इज्जत की चिन्ता हुई । आखिर ऋण को चुकाना ही था । क्या किया जाय ? भगवान् ने दूसरी लीला करने का निश्चय किया । भगवान ने मुनीम का वेष धारण किया । वे उसी वेष में लखमीचंद के घर गये । उन्होने सेठजी को पुकारकर कहा – ओ सेठजी! ये दो सौ रुपये गिन लीजिये । मेरे मालिक खुशाल बाबा ने भेजा है । भली भाँति गिनकर रसीद दे दीजिये । लखमी चंद ने रकम गिन ली ओर रसीद लिख दी । भगवान् रसीद लेकर अन्तर्धान हो गये और बाबा की पोथी में वह रसीद उन्होने रख दी । दूसरे दिन बाबा ने स्नान करके नित्य पाठ की गीता पोथी खोली । देखा तो उसमें रसीद रखी है । रसीद देखकर बाबा आश्चर्यचकीत हो गये और भगवान् को बार बार धन्यवाद देकर रोने लगे । फिर रोते रोते बाबा कहने लगे की मेरे कारण भगवान् को कष्ट हुआ है । वह बनिया बड़ा पुण्यवान् है इसलिये तो भगवान ने उसे दर्शन दिये और मैं अभागा पापी हूँ , द्रव्य का इच्छुक हूँ इसीलिये भगवान् ने मुझे दर्शन नहीं दिये । उनके महान् परिताप और अत्यन्त उत्कट इच्छा के कारण भक्तवत्सल भगवान् ने द्वादशी के दिन खुशालबाबा के सम्मुख प्रकट होकर दर्शन दिये । उसी गाँव में लालचन्द नामक एक बनिया रहता था । उसने नित्य पूजा के लिये भगवान् श्रीराम, लक्ष्मण और भगवती सीता के सुन्दर सुन्दर विग्रह बनवाये । भगवान् श्री राम जी ने देखा की यहां के भक्त खुशलबाबा पांडुरंग के विग्रह की सेवा बड़े प्रेम से करते है ,मधुर कीर्तन सुनाते है हर प्रकार भगवान् की उचित सेवा करते है । श्री राम की इच्छा हुई की पांडुरंग विग्रह जैसी प्रेमपूर्ण सेवा बाबा के हाथो से हमारे विग्रह की भी हो । उस रात मे जब वह बनिया सो गया तो भगवान् श्रीरामचन्द्र स्वप्न मे आये और उन्होने उसको आज्ञा दी- लालचन्द ! हम तुमपर प्रसन्न है किंतु हमारी इच्छा तेरे घर मे रहने की नही है । हमारा भक्त खुशाल इसी नगर में रहता है । उसको तू अब सब विग्रह अर्पित कर । जब भी तुझे दर्शन की इच्छा हो, तब वहाँ जाकर दर्शन कर लेना । इसीमे तेरा क्लयाण है । मनमानी करेगा तो मै तुझपर रूठ जाऊँगा । सुबह नित्यकर्म करने के बाद लालचन्द बनिया वे सब विग्रह लेकर बाबा के चरणो मे उपस्थित हुआ । बाबा से स्वप्न के विषय में निवेदन करके उसने वे सब विग्रह उनको समर्पित कर दिये । खुशाल बाबा भक्ति प्रेमसे उन विग्रहो की पूजा काने लगे । उन्होने नगरवासियो के सम्मुख भगवान् का मंदिर बनवाने का प्रस्ताव रखा । नगरवासियो ने हर्ष के साथ उसे स्वीकार किया और सबके प्रयत्न से भगवान् श्रीराम का भव्य मंदिर बन गया । वैदिक पद्धति से बड़े समारोह के साथ उन विग्रहो की प्रतिष्ठा मंदिरो में की गयी । आज़ भी संत श्री खुशाल बाबा का भक्ति परिचय देता हुआ वह मंदिर खडा है । वृद्धावस्था में जब बाबा ने देखा कि अब मृत्यु आ रही है, तब वे अनन्य चित्त से भजनानन्द में निमग्न रहने लगे । कही भी आना जाना बंद दिया , अधिक किसी से मिलते नहीं । केवल हरिनाम में मग्न रहते । उन्होने अपना मृत्युकाल निश्चित रूप से अपने मित्र मनसाराम को पहले ही बता दिया था । ठीक उसी दिन कार्तिक शुक्ला चतुर्थी शक १७७२ को -रामकृष्ण हरि ,रामकृष्ण हरि ,रामकृष्ण हरि – नाम स्मरण करते हुए बाबा भगवान् की सेवा मे सिधार गये । उनके पुत्र का नाम श्रीहरीबाबा था । वे भी बाबा के समान ही बडे भगबद्भक्त थे । उनके पुत्र रामकृष्ण और रामकृष्ण के पुत्र जानकीराम बाबा भी भगबद्भक्त थे । खुशाल बाबा ने काव्य रचनाएं भी की हैं | करुणास्तोत्र , दत्तस्तोत्र ,दशावतार चरित आदि उनके ग्रन्थ हैं । गुजराती भाषामें लिखे हुए उनके ‘गरबे’ प्रसिद्ध है । जय सियाराम जी। 🙏🙏🙏

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