आज का गीता ज्ञान ।।

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ तेरहवां अध्याय : (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) महात्म्य 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ श्रीमहादेवजी कहते हैं- देवी पार्वती! अब तेरहवें अध्याय की अगाध महिमा का वर्णन सुनो, उसको सुनने से तुम बहुत प्रसन्न हो जाओगी, दक्षिण दिशा में तुंगभद्रा नाम की एक बहुत बड़ी नदी है, उसके किनारे हरिहरपुर नामक रमणीय नगर बसा हुआ है, वहाँ हरिहर नाम से साक्षात् भगवान् शिवजी विराजमान हैं, जिनके दर्शनमात्र से परम कल्याण की प्राप्ति होती है। हरिहरपुर में हरिदीक्षित नामक एक श्रोत्रिय ब्राह्मण रहते थे, जो तपस्या और स्वाध्याय में संलग्न तथा वेदों के पारगामी विद्वान थे, उनकी एक स्त्री थी, जिसे लोग दुराचार कहकर पुकारते थे, इस नाम के अनुसार ही उसके कर्म भी थे, वह सदा पति को कुवाच्य कहती थी, उसने कभी भी उनके साथ शयन नहीं किया, पति से सम्बन्ध रखने वाले जितने लोग घर पर आते, उन सबको डाँट बताती और स्वयं कामोन्मत्त होकर निरन्तर व्यभिचारियों के साथ रमण किया करती थी। एक दिन नगर को इधर-उधर आते-जाते हुये पुरवासियों से भरा देख उसने निर्जन तथा दुर्गम वन में अपने लिये संकेत स्थान बना लिया, एक समय रात में किसी कामी को न पाकर वह घर के किवाड़ खोल नगर से बाहर संकेत-स्थान पर चली गयी, उस समय उसका चित्त काम से मोहित हो रहा था, वह एक-एक कुंज में तथा प्रत्येक वृक्ष के नीचे जा-जाकर किसी प्रियतम की खोज करने लगी, किन्तु उन सभी स्थानों पर उसका परिश्रम व्यर्थ गया, उसे प्रियतम का दर्शन नहीं हुआ। तब उस वन में नाना प्रकार की बातें कहकर विलाप करने लगी, चारों दिशाओं में घूम-घूमकर वियोगजनित विलाप करती हुई उस स्त्री की आवाज सुनकर कोई सोया हुआ बाघ जाग उठा और उछलकर उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ वह रो रही थी, उधर वह भी उसे आते देख किसी प्रेमी आशंका से उसके सामने खड़ी होने के लिये ओट से बाहर निकल आयी, उस समय व्याघ्र ने आकर उसे नखरूपी बाणों के प्रहार से पृथ्वी पर गिरा दिया। इस अवस्था में भी वह कठोर वाणी में चिल्लाती हुई पूछ बैठी- अरे बाघ! तू किसलिए मुझे मारने को यहाँ आया है? पहले इन सारी बातों को बता दे, फिर मुझे मारना, उसकी यह बात सुनकर प्रचण्ड पराक्रमी व्याघ्र क्षणभर के लिए उसे अपना ग्रास बनाने से रुक गया और हँसता हुआ-सा बोला- दक्षिण देश में मलापहा नामक एक नदी है, उसके तट पर मुनिपर्णा नगरी बसी हुई है, वहाँ पँचलिंग नाम से प्रसिद्ध साक्षात् भगवान् शंकर निवास करते हैं। उसी नगरी में मैं ब्राह्मण कुमार होकर रहता था, नदी के किनारे अकेला बैठा रहता और जो यज्ञ के अधिकारी नहीं हैं, उन लोगों से भी यज्ञ कराकर उनका अन्न खाया करता था, इतना ही नहीं, धन के लोभ से मैं सदा अपने वेदपाठ के फल को बेचा करता था, मेरा लोभ यहाँ तक बढ़ गया था कि अन्य भिक्षुओं को गालियाँ देकर हटा देता और स्वयं दूसरो को नहीं देने योग्य धन भी बिना दिये ही हमेशा ले लिया करता था, ऋण लेने के बहाने मैं सब लोगों को छला करता था। तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होने पर मैं बूढ़ा हो गया, मेरे बाल सफेद हो गये, आँखों से सूझता न था और मुँह के सारे दाँत गिर गये, इतने पर भी मेरी दान लेने की आदत नहीं छूटी, पर्व आने पर प्रतिग्रह के लोभ से मैं हाथ में कुश लिए तीर्थ के समीप चला जाया करता था, तत्पश्चात् जब मेरे सारे अंग शिथिल हो गये, तब एक बार मैं कुछ धूर्त ब्राह्मणों के घर पर माँगने-खाने के लिए गया, उसी समय मेरे पैर में कुत्ते ने काट दिया, तब मैं मूर्च्छित होकर क्षणभर में पृथ्वी पर गिर पड़ा और मेरे प्राण निकल गये। उसके बाद मैं इसी व्याघ्रयोनि में उत्पन्न हुआ, तब से इस दुर्गम वन में रहता हूँ तथा अपने पूर्व पापों को याद करके कभी धर्मिष्ठ महात्मा, यति, साधु पुरुष तथा सती स्त्रियों को नहीं खाता, पापी-दुराचारी तथा कुलटा स्त्रियों को ही मैं अपना भक्ष्य बनाता हूँ, अतः कुलटा होने के कारण तू अवश्य ही मेरा ग्रास बनेगी, यह कहकर वह अपने कठोर नखों से उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर के खा गया। इसके बाद यमराज के दूत उस पापिनी को संयमनीपुरी में ले गये, यहाँ यमराज की आज्ञा से उन्होंने अनेकों बार उसे विष्ठा, मूत्र और रक्त से भरे हुए भयानक कुण्डों में गिराया, करोड़ों कल्पों तक उसमें रखने के बाद उसे वहाँ से ले जाकर सौ मन्वन्तरों तक रौरव नरक में रखा, फिर चारों ओर मुँह करके दीन भाव से रोती हुई उस पापिनी को वहाँ से खींचकर दहनानन नामक नरक में गिराया, उस समय उसके केश खुले हुए थे और शरीर भयानक दिखाई देता था। इस प्रकार घोर नरक यातना भोग चुकने पर वह महापापिनी इस लोक में आकर चाण्डाल योनि में उत्पन्न हुई, चाण्डाल के घर में भी प्रतिदिन बढ़ती हुई वह पूर्वजन्म के अभ्यास से पूर्ववत् पापों में प्रवृत्त रही फिर उसे कोढ़ और राजयक्ष्मा का रोग हो गया, नेत्रों में पीड़ा होने लगी फिर कुछ काल के पश्चात् वह पुनः अपने निवासस्थान (हरिहरपुर) को गयी, जहाँ भगवान् शिव के अन्तःपुर की स्वामिनी जम्भकादेवी विराजमान हैं। वहाँ उसने वासुदेव नामक एक पवित्र ब्राह्मण का दर्शन किया, जो निरन्तर गीता के तेरहवें अध्याय का पाठ करता रहता था, उसके मुख से गीता का पाठ सुनते ही वह चाण्डाल शरीर से मुक्त हो गयी और दिव्य देह धारण करके स्वर्गलोक में चली गयी। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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ramkumar verma Apr 20, 2019

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ बारहवाँ अध्याय : भक्तियोग नवम दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ।।20।। जो इस भक्ति के अमर पथ का अनुसरण करते हैं, और जो मुझे ही अपना चरम लक्ष्य बना कर श्रद्धासहित पूर्णरूप से संलग्न रहते हैं, वे भक्त मुझे अत्यधिक प्रिय है। सज्जनों, इस अध्याय में दूसरे श्लोक से अन्तिम श्लोक तक "मय्यावेश्य मनो ये माम्" (मुझ पर मन को स्थिर करके) से लेकर "ये तु धर्मामृतम् इदम्" (नित्य सेवा इस धर्म को) तक भगवान् ने अपने पास पहुँचने तक की दिव्य सेवा की विधियों की व्याख्या की है, ऐसी विधियाँ भगवान् को अत्यन्त प्रिय है और ऐसी विधियों में लगे हुये व्यक्तियों को भगवान् स्वीकार कर लेते हैं। अर्जुन ने यह प्रश्न उठाया था कि जो निराकार ब्रह्म के पथ में लगा है वह श्रेष्ठ है या साकार भगवान् की सेवा में लगा लगा है वह श्रेष्ठ है, भगवान् ने इसका बहुत स्पष्ट उत्तर दिया है कि आत्म-साक्षात्कार की समस्त विधियों में भगवान् की भक्ति निस्सन्देह सर्वश्रेष्ठ है, यानी इस अध्याय में यह निर्णय दिया गया है कि सुसंगति से मनुष्य में भक्ति के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है, जिससे वह प्रामाणिक गुरु बनाता है, और तब वह उससे श्रद्धा, आसक्ति तथा भक्ति के साथ सुनता है, कीर्तन करता है और भक्ति के विधि-विधानों का पालन करने लगता है। इस तरह वह भगवान् की दिव्य सेवा में तत्पर हो जाता है, इस अध्याय में इस मार्ग की संस्तुति की गई है इसलिये इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि भगवत्प्राप्ति के लिये भक्ति ही आत्म-साक्षात्कार का परम मार्ग है, इस अध्याय में परम सत्य की जो निराकार धारणा वर्णित है, उसकी संस्तुति उस समय तक के लिये की गई है, जब तक मनुष्य आत्म-साक्षात्कार के लिये अपने आपको समर्पित नहीं कर देता। सौभाग्यवश यदि कोई शुद्ध भक्ति में सीधे भगवद्भक्ति में लगना चाहता है तो उसे आत्म-साक्षात्कार के इतने सोपान पार नहीं करने होते,भगवद्गीता के बीच के छः अध्यायों में जिस प्रकार भक्ति का वर्णन हुआ है, वह अत्यन्त ह्रदयग्राही है, किसी को जीवन निर्वाह के लिये वस्तुओं की चिन्ता नहीं करनी होती, क्योंकि भगवत्कृपा से सारी वस्तुयें स्वतः सुलभ होती है कोई मुझसे कहे कि चारों युगों (सत, द्वापर, त्रेता और कलयुग) में क्या फर्क है, तो मैं यही कहूँगा कि मनुष्य जैसा आज है, वैसा पहले भी था, जैसा पहले था वैसा आज है, अगर फर्क आया है तो एकमात्र इस बात में कि मनुष्य के मन में अधिक विकृतियाँ आ चुकी है कि उसका मन अब मन्दिर कहलाने योग्य नहीं रहा, हमारे मन के भावों में फर्क आया है मन के संवेगो में फर्क आया है, उद्वेगो में फर्क आया है, विचारों और विकल्पों में फर्क आया है, सभी कहते हैं जमाना बदल गया है, बाहर से कुछ भी नहीं बदला, मगर भीतर से बहुत कुछ बदल गया है, यही बात मैं आप लोगों से कहना चाहता हूँ, जमाना बदल गया है, लेकिन बदला क्या है? इससे हम अनजान है, मन में रहने वाला पुण्य बदल चुका है, अब उसकी जगह पाप आ चुका है, आज सुनसान जगह पर कोई दुर्घटना हो जाय, तो उसको अस्पताल ले जाने की जगह उस दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति के जेवर लेकर चंपत हो जाते हैं, जमाना जरूर बदल गया है। किसी समय घर के बाहर लिखा जाता था- "स्वागतम्" अब लिखा जाता है- "कुत्तो से सावधान" एक समय था जब यह समझा जाता था कि जब तक हमारे द्वार पर कोई याचक आकर दो रोटी न ले जाय, तब तक हमारा भोजन करना पाप समझा जाता था, आज स्थितियाँ बदल गई है, अब तो याचक को अपशकुन समझा जाता है, सारी बाते मन की है, मनुष्य का पहला मन्दिर उसका मन ही होना चाहिये, सभी अपने-अपने मन को पड़तालो कि मन की स्थिति क्या है? मन को समझने के दो मार्ग हो सकते हैं, पहला है ध्यान का, ध्यान में बैठो और मन में किस तरह के विचार, किस तरह के विकल्प उठ रहे हैं, उनको देखों, ईमानदारी से उसको महसूस करो और उनको प्रतिदिन नोटबुक पर लिखो, यह आपकी अपनी आत्मकथा होगी, कुछ अरसे बाद आप पढ़ेंगे तो ताज्जुब करोगे कि मन में ऐसा कचरा? जीवन का परिवर्तन ऐसा होता है, अपने प्रति जागरूक होने से जीवन में बदलाव आता है ध्यान के द्वारा अपने मन को पहचानो। दूसरा तरीका यह होगा कि रात को अगर सपना आ रहा है, तो उस सपने के प्रति सजग बनो, उसके प्रति ध्यान दो, क्योंकि कोई भी सपना, सपना ही नहीं होता, बल्कि वह मन का ही प्रतिबिम्ब होता है, मन को पहचानने के लिये वह सपना बड़ा मददगार हो सकता है, इसलिये दो मार्ग मैंने आपको बताये है मन की निर्मलता को जीवन की निर्मलता समझो, मन के द्वारा अगर पाप हो रहा है तो समझो पाप जारी है, शरीर के द्वारा, व्यवहार के द्वारा जगत में हम पाप नहीं करते, लेकिन मन दिन-रात पाप करने में लगा हुआ है। सज्जनों! मन की निर्मलता और मन की पावनता के लिये ही पहला सूत्र दूँगा कि अपने मन का उद्देश्य बदलो, अपने जीवन का जो ध्येय है, उसे पहचानो कि ध्येय कितना सार्थक है और कितना व्यर्थ है, असार्थक उद्देश्यों को निकाल फेंको, यह मन की बैठक बदलने के लिये सबसे सुगम सूत्र होगा, अनपे ध्येय के प्रति पूरी तरह श्रद्धावान बनो, दूसरा सूत्र यह दूँगा कि मन में जो भी भाव उपजते है उनको करने से पहले अपने प्रति यम-नियम-संयम को आचरण में ले आओ। जीवन में सन्तुलितता, एक नियमितता और एक परिमितता होनी चाहिये, न फालतू का बोलो न फालतू का खाओ, जितनी जरूरत हो उतना ही करो, चाहे व्यवसाय हो या काम हो, न जरूरत से ज्यादा सोओ और न जरूरत से ज्यादा जागो, बोलो, लेकिन इस तरह कि तुम्हारा बोलना भी उपहार देना हो जाय, बड़े प्यार से, बड़े माधुर्य के साथ बोलो, बोलना भी अहिंसा का आचरण बन जाये, बोलना भी परमेश्वर के चरणों की सेवा बन जाय, बोलो ऐसे कि जैसे टेलीग्राम दे रहे हो, नपे-तुले शब्दों में यह वास्तव में संयम की बात है, परिमतता लाने की बात है। तीसरा और अन्तिम सूत्र यह है कि सबसे प्रति एक उदार दृष्टि रखो कि सबमें गुण ही दिखाई दें, दृष्टि में एक मांगल्य भाव चाहिये, एक ऐसी मंगल-मैत्री चाहिये कि हम जिसके साथ भी उठें-बैठें, हमारा उठना-बैठना भी परमात्मा के मन्दिर की परिक्रमा हो जाये और हमारा खाना-पीना भी भगवान् को भोग चढ़ाने जैसा हो जाये, इसलिये मैं कहता ही रहता हूंँ कि भक्त बनो, भक्त को भगवान् प्रिय होते हैं और भगवान् को भक्त, भक्त भगवान् को जीता है, भगवान् भक्त में वास करते हैं, तन्मय भाव से मन से भगवान् को भजो। भजन यानी जिस कर्म से, चिन्तन से, सेवा से गुनगुनाने से वृत्ति भगवत्मय बने, भगवद् स्वरूप बने, वही भजन है, जो कुछ करो उसे पूरा करने को अपना भजन बना दो, आप हर कार्य में भगवान् को, परमात्मा को प्रतिष्ठित कर दो, भगवान् आपमें प्रतिष्ठित हो जायेंगे, आपके ह्रदय के मन्दिर में भगवान् की शय्या लग जायेगी, आप स्वयं वृन्दावन के धाम बन जाओगे, आपके अन्तर की आँखों में श्रीकृष्ण की रासलीला होगी, यानी आपके भीतर एक ऐसा अवतार होगा जो आपको कृतपुण्य करेगा और आनन्दभाव से भर देगा। ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः। इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद्भगवद्गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में भक्तियोग नामक बारहवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ।। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Shiva Gaur Apr 19, 2019

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Shiva Gaur Apr 20, 2019

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ बारहवाँ अध्याय : भक्तियोग अष्टम दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। सर्वारम्भपरित्यागी यो मदभक्तः स मे प्रियः ।।16।। मेरा ऐसा भक्त जो सामान्य कार्य-कलापों पर आश्रित नहीं है, जो शुद्ध है, दक्ष है, चिन्तारहित है, समस्त कष्टों से रहित हैं और किसी फल के लिये प्रयत्नशील नहीं रहता, मुझे अतिशय प्रिय है। सज्जनों, भक्त को धन दिया जा सकता है, किन्तु भक्त को धन अर्जित करने के लिये संघर्ष नहीं करना चाहिये, भगवत्कृपा से यदि उसे स्वयं धन की प्राप्ति हो तो भक्त उद्विग्न नहीं होता, स्वाभाविक है कि भक्त दिनभर में दो बार स्नान करता है और भक्ति के लिये प्रातः जल्दी उठता है, इस प्रकार वह बाहर तथा भीतर से स्वच्छ रहता है, भक्त जीवन के समस्त कार्यकलापों के सार को जानता है और प्रामाणिक शास्त्रों में दृढ़विश्वास रखता है, भक्त कभी किसी दल में भाग नहीं लेता, अतएव भक्त चिन्तामुक्त रहता है। भक्त समस्त उपाधियों से मुक्त होने के कारण कभी व्यथित नहीं होता, वह जानता है कि उसका शरीर एक उपाधि है, शुद्धभक्त कभी भी ऐसी किसी वस्तु के लिये प्रयास नहीं करता, जो भक्ति के नियमों के प्रतिकूल हो, भक्त भगवान् के लिये मन्दिर का निर्माण करा सकता है और उसके लिये भक्त सभी प्रकार की चिन्तायें उठा सकता है, लेकिन वह अपने परिवार वालों के लिये बड़ा सा मकान नहीं बनाता, भक्त तकलीफ उठा सकता है केवल भगवान् के लिये, इसलिये भक्त कभी ऐसे कार्य में हाथ नहीं लगाता, जिससे उसकी भक्ति में प्रगति न होती हो। यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ।।17।। जो न कभी हर्षित होता है, न शोक करता है जो न तो पछताता है, न इच्छा करता है, तथा जो शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार की वस्तुओं का परित्याग कर देता है, ऐसा भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है। सज्जनों! शुद्ध भक्त भौतिक लाभ से न तो हर्षित होता है और नहीं हानि से दुखी होता है, भक्त न तो पाने के लिये उत्सुक रहता है, न ही नहीं मिलने पर दुखी होता है, भक्त अपनी किसी प्रिय वस्तु के खो जाने पर उसके लिये पछतावा नहीं करता, इसी प्रकार यदि भक्त को मन मुताबिक वस्तु की प्राप्ति नहीं हो पाती तो वह दुखी नहीं होता, भक्त समस्त प्रकार के शुभ, अशुभ तथा पापकर्मों से सदैव परे रहता है, भक्त भगवान् की प्रसन्नता के लिये बड़ी से बड़ी विपत्ति सहने को तैयार रहता है, भक्ति के पालन में उसके लिये कुछ भी बाधक नहीं बनता, ऐसा भक्त श्रीकृष्ण को अतिशय प्रिय है। समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ।।18। तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ।।19।। जो मित्रों तथा शत्रुओं के लिये समान है, जो मान तथा अपमान, शीत तथा गर्मी, सुख तथा दुख, यश तथा अपयश में समभाव रहता है, जो दूषित संगति से सदैव मुक्त रहता है, जो सदैव मौन और किसी भी वस्तु से संतुष्ट रहता है, जो किसी प्रकार के घर-बार की परवाह नहीं करता, जो ज्ञान में दृढ़ है और जो भक्ति में संलग्न है, ऐसा पुरूष मुझे अत्यन्त प्रिय है। सज्जनों! भक्त सदैव कुसंगति से दूर रहता है मानव समाज का यह स्वभाव है कि कभी किसी की प्रशंसा की जाती है, तो कभी उसकी निन्दा भी की जाती है, लेकिन भक्त कृत्रिम यश तथा अपयश, दुख या सुख से ऊपर उठा हुआ होता है, भक्त अत्यन्त धैर्यवान होता है और भगवत् चर्चा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बोलता, अतः भक्त को मौनी कहा जाता है, मौनी का अर्थ यह नहीं है कि वह बोले नहीं, अपितु यह कि वह अनर्गल वार्तालाप नहीं करता, मनुष्य को आवश्यकता पर बोलना चाहिये और भक्त के लिये सर्वाधिक अनिवार्य वाणी तो भगवान् के लिये बोलना है। भक्त समस्त परिस्थतियों में सुखी रहता है, कभी उसे स्वादिष्ट भोजन मिलता है तो कभी नहीं, किन्तु वह सन्तुष्ट रहता है, भक्त आवास की सुविधा की चिन्ता नहीं करता, वह कभी वृक्ष के नीचे रह सकता है, तो कभी अत्यन्त उच्च भवन में, किन्तु वह इनमें से किसी के प्रति आसक्त नहीं रहता, क्योकि भक्त अपने संकल्प तथा ज्ञान में दृढ़ होता है, इसलिये वह स्थिर कहलाता है, भले ही भक्त के लक्षणों की कुछ पुनरावृत्ति हुई हो, लेकिन यह इस बात पर बल देने के लिये है कि भक्त को ये सारे गुण अर्जित करने चाहिये। सज्जनों! सद्गुणों के बिना कोई शुद्धभक्त नहीं बन सकता, "हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणाः" जो भक्त नहीं है, उसमें सद्गुण नहीं होता, जो भक्त कहलाना चाहता है, उसे सद्गुणों का विकास करना चाहिये, यह बात पक्की है कि मनुष्य को ऐसे सद्गुण प्राप्ति के लिये अलग से बाह्य प्रयास नहीं करना पड़ता, अपितु भगवद्भक्ति में संलग्न रहने के कारण उसमें ये गुण स्वतः ही विकसित हो जाते हैं, भाई-बहनों! कल की पोस्ट से इस भक्तियोग नाम के बाहरवें अध्याय को विराम देंगे और तेहरवें अध्याय में प्रवेश करेंगे, कल की पोस्ट अवश्य पढ़े, यह मेरा निवेदन है। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Shiva Gaur Apr 19, 2019

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जय श्री कृष्णा हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे राम हरे राम आज का श्लोक: श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति श्लोक--18 *हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।* *हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।।* 🙌🏼🙌🏼 आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 8.18 अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे | रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके || १८ || अव्यक्तात्– अव्यक्त से; व्यक्तयः– जीव; सर्वाः– सारे; प्रभवन्ति– प्रकट होते हैं; अहः-आगमे– दिन होने पर; रात्रि-आगमे– रात्रि आने पर; प्रलीयन्ते– विनष्ट हो जाते हैं; तत्र– उसमें; एव– निश्चय ही; अव्यक्त– अप्रकट; संज्ञके– नामक, कहे जाने वाले | ब्रह्मा के दिन के शुभारम्भ में सारे जीव अव्यक्त अवस्था से व्यक्त होते हैं और फिर जब रात्रि आती है तो वे पुनः अव्यक्त में विलीन हो जाते हैं | ************************************ प्रतिदिन *भगवद्गीता का हिंदी में एक श्लोक* प्राप्त करने हेतु, इस ग्रुप को join करें 🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/3FogE5mFnNS52StVqajFAp ********************************** To receive daily *ONE shloka of Bhagavad Gita in English*, join below group:🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/Bjx2K7CHftX5gnCsEuxeOr

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