Aman
Aman Dec 1, 2017

जय जिनेन्द्र

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💠 बड़ी सुन्दर सत्य कथा 💠 किसी भक्त के श्रीमुख से..... एक बार मैं ट्रेन से आ रहा था, मेरी साथ वाली सीट पे एक वृद्ध औरत बैठी थी जो लगातार रो रही थी... मैंने बार-बार पूछा मईया क्या हुआ, मईया क्या हुआ? बड़ी मिन्नतों के बाद मईया ने एक लिफाफा मेरे हाथ मे रख दिया। मैंने लिफाफा खोल कर देखा उसमे चार पेड़े, 200 रूपये और इत्र से सनी एक कपड़े की कातर थी। मैंने मईया से पूछा, मईया ये क्या है? मईया बोली मैं वृंदावन बिहारी जी के मंदिर गई थी, मैंने गुल्लक में 200 रूपये डाले और दर्शन के लिऐ आगे बिहारी जी के पास चली गई। वहाँ गोस्वामी जी ने मेरे हाथ मे एक पेड़ा रख दिया, मेने गोस्वामी जी को कहा मुझे दो पेड़े दे दो पर गोस्वामी जी ने मना कर दिया। मैंने उससे गुस्से मे कहा मैंने 200 रूपये डाले है मुझे पेड़े भी दो चाहिए पर गोस्वामी जी नहीं माने। मैंने गुस्से मे वो एक पेड़ा भी उन्हे वापिस दे दिया और बिहारी जी को कोसते हुए बाहर आ कर बैठ गई। मैं जैसे ही बाहर आई तभी एक बालक मेरे पास आया और बोला मईया मेरा प्रसाद पकड़ लो मुझे जूते पहनने है। वो मुझे प्रसाद पकड़ा कर खुद जूते पहनने लगा और फिर हाथ धोने चला गया। लेकिन फिर वो वापस नही आया। मैं पागलो की तरह उसका इंतजार करती रही। काफी देर के बाद मैंने उस लिफाफे को खोल कर देखा। उसमें 200 रूपये, चार पेड़े और एक कागज़ पर लिख रखा था ( मईया अपने लाला से नाराज ना हुआ करो ) ये ही वो लिफाफा है! **🌷 भाव बिना बाज़ार में वस्तु मिले न मोल, तो भाव बिना "हरी" कैसे मिले, जो है अनमोल!! 🌷**देने के बदले लेना तो एक बीमारी है और जो कुछ देकर भी कुछ ना ले वही तो बांके बिहारी हैं🌷 प्रेम से बोलो राधे राधे. 🙏🙏🌹

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*💓 inspirational Story* *💐💐 "विश्वास"💐💐* *एक व्यक्ति की नई नई शादी हुई और वो अपनी पत्नी के साथ वापिस आ रहे थे* ! *रास्ते में वो दोनों एक बडी झील को नाव के द्वारा पार कर रहे थे, तभी अचानक एक भयंकर तूफ़ान आ गया !'* *वो आदमी वीर था लेकिन औरत बहुत डरी हुई थी क्योंकि हालात बिल्कुल खराब थे*! *नाव बहुत छोटी थी और तूफ़ान वास्तव में भयंकर था और दोनों किसी भी समय डूब सकते थे* ! *लेकिन वो आदमी चुपचाप,* *निश्चल और शान्त बैठा था जैसे कि कुछ नहीं होने वाला* ! *औरत डर के मारे कांप रही थी और वो बोली "क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा" ये हमारे जीवन का आखिरी क्षण हो सकता है !* *ऐसा नहीं लगता कि हम दूसरे किनारे पर कभी पहुंच भी पायेंगे ! अब तो कोई चमत्कार ही हमें*बचा सकता है वर्ना हमारी मौत निश्चित है* ! *क्या तुम्हें बिल्कुल डर नहीं लग रहा ? कहीं तुम पागल वागल या पत्थर वत्थर तो नहीं हो ?* *वो आदमी खूब हँसा और एकाएक उसने म्यान से तलवार निकाल ली ?* *औरत अब और परेशान हो गई कि वो क्या कर रहा था* ? . *तब वो उस नंगी तलवार को उस औरत की गर्दन के पास ले आया, इतना पास कि उसकी गर्दन और तलवार के बीच बिल्कुल कम फर्क बचा था क्योंकि तलवार लगभग उसकी गर्दन को छू रही थी* ! *वो अपनी पत्नी से बोला "क्या तुम्हें डर लग रहा है" ?* *पत्नी खूब हँसी और बोली "जब तलवार तुम्हारे हाथ में है तो मुझे क्या डर" ?* *मैं जानती हूं कि तुम मुझे बहुत प्यार करते हो !* *उसने तलवार वापिस म्यान में डाल दी और बोला कि "यही मेरा जवाब है"* ! . *मैं जानता हूं कि भगवान मुझे बहुत प्यार करते हैं और ये तूफ़ान उनके हाथ में है ! इसलिए जो भी होगा अच्छा ही होगा* ! *अगर हम बच गये तो भी अच्छा और अगर नहीं बचे तो भी अच्छा, क्योंकि सब कुछ उस परमात्मा के हाथ में है और वो कभी कुछ भी गलत नहीं कर सकते* ! *वो जो भी करेंगे हमारे भले के लिए करेंगे* । *हमेशा विश्वास बनाये रक्खो ! "व्यक्ति को हमेशा उस परमपिता परमात्मा पर विश्वास रखना चाहिये जो हमारे पूरे जीवन को बदल सकता है।"* *👉😊सदैव प्रसन्न रहिये!!* *जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!* *💓Om Shanti💓*

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ओम सूर्य देवाय नमः ☀️☀️☀️☀️☀️🌹🌹🌹🙏 *🌳🦚आज की कहानी🦚🌳* *💐💐गहरी नदी का शांत भाव*💐💐 करीब 30 वर्ष के अन्तराल के बाद होटल की लाबी मे मेरे एक पुराने मित्र के साथ मुलाकात हुई। हमेशा से अति साधरण, शांत, शिष्ट, भद्र व विनयी वह मित्र अभी भी देखने मे ठीक वैसा ही दिख रहा था। उसका व्यवहार व आचरण पहले जैसा ही साधारण था। आपसी औपचारिक कुशलक्षेम पूछने के उपरांत मैने प्रस्ताव दिया की मै उसे घर तक अपने गाड़ी मे छोड़ सकता हूं। असल मे घर छोड़ने के बहाने मेरा आग्रह अपनी मर्सिडीज गाड़ी को उसे दिखाने हेतु ज्यादा था।पर उसने धन्यवाद कहकर कहा कि वह अपनी ही गाड़ी से घर जायेगा। पार्किंग लाट मे कुछ देर साथ चलने के बाद वह अपनी एक साधारण गाड़ी से लौट गया। अगले हप्ते मैने उसे अपने घर डिनर पर आमंत्रित किया। वह अपने परिवार के साथ मेरे घर आया। एक बहोत ही आडम्बरहीन मर्यादित परिवार, पर मुझे लगा एक खुशहाल परिवार है। मेरे मन के किसी कोने मे यह उत्कंठा थी कि डिनर के बहाने मै उसे अपने इतनी सुन्दर और आभिजात्यपूर्ण कीमती व बहुत आरामदेह, मँहगी और सुंदर विलास की वस्तुओं से भरा हुआ, कीमती साज सज्जा से सुसज्जित घर को दिखा सकूं। एक दूसरे से वार्तालाप मे बीच बीच में मैं यह भी समझाने की कोशिश करता रहा कि आफिस के काम से प्राय: मुझे कितने ही विदेशों मे आना जाना पड़ता है। इशारों इशारों मे यह भी उसे समझाता रहा कि वह चाहे तो किसी बिजनेस को ज्वायन कर सकता है क्योंकि न जाने कितने धनी लोगों के बीच मेरा उठना बैठना रहता है और उनसे मेरा व्यक्तिगत सम्पर्क भी है। इस सिलसिले में किसी बड़े बिजनेस लोन की व्यवस्था करवाना मेरे लिए एक साधारण सी बात है। लेकिन इन सब बातों मे उसने कोई आग्रह या रुचि नहीं दिखाई। विदेशों मे भ्रमण के दौरान विभिन्न दर्शनीय स्थलों, अजायबघरों आदि के एल्बम उसे दिखाते हुये मै उसे जताना चाह रहा था कि हमारा जीवन कितना आकर्षक व मनमोहक है। इतना ही नहीं, आनेवाले दिनों मे शहर मे होने वाले आर्टगैलरी प्रदर्शनी की सूचना उसे देकर जैसे मै उसे बताना चाह रहा था कि मेरे पास केवल सुन्दर व कीमती मकान और गाड़ी ही नही है, हमारे पास एक सुन्दर कलाकृतियों को समझने वाली शिल्पकारी रुचि भी है। एल्बम की सभी फोटो को उसने ध्यान से देखा और प्रशंसा भी किया और लगा कि हमारी उपलब्धियों व सफल जीवन से वह खुश हो रहा था। फिर उसने कहा इन सबको देखने के साथ साथ कभी कभी पुराने यार दोस्तों, अपने उम्रदराज शिक्षकों, अपने आत्मजनों को भी देखा करो और यदि न देख पाओ तो कम से कम उनकी खबर लिया करो। मुझे लगा हमारे व्यवसायिक वार्तालाप को उसने बहोत ज्यादा महत्व नहीं दिया। तब मैने बचपन की बातें करना शुरू किया। पूछा हमारे पुराने उम्रदराज शिक्षक और मित्र कैसे हैं, वगैरह वगैरह। यह सुनकर थोड़ा हृदय आद्र भी हुआ कि कुछ शिक्षक और पुराने दोस्त अब इस दुनिया मे नही रहे। पर मेरी श्रीमती जी को ये सब बीते जमाने की वार्ता बहोत अच्छी नहीं लगी और वह कह बैठी केवल बचपन की यादों मे खोये रहने से आगे नहीं बढ़ा जा सकता, सभी का एक बचपन रहा है, यह कोई बड़ी बात नही है। मुझे यह सुनकर थोड़ा हिचक महसूस हुई। इसके बाद आगे बैठक जमी नही, वे दोनो चले गये। कुछ हप्तों बाद मेरे मित्र का फोन आया, उसने अपने निवास स्थान का पता बताकर लंच पर हम दोनों को उसने आमंत्रित किया। मेरे श्रीमती जी ने इस पर रूचि नहीं दिखाई पर मेरे बहुत कहने पर जाने को राजी हुईं । मित्र के घर आकर देखा कि उसके घर मे ज्यादा कीमती सामानो की चमक तो नहीं थी पर बहोत सलीके व सुन्दर ढंग से और करीने से घर सजा हुआ था। एकाएक मेरी नजर कोने मे रखे टेबल पर रखे एक सुन्दर गिफ्ट बाक्स पर गयी।यह गिफ्ट बाक्स उसी कम्पनी से आया हुआ लग रहा था जहां मै काम करता हूं। मैने कौतूहल वश मित्र से पूछा, यह तो मेरे कम्पनी का ही गिफ्ट है, क्या तुम मेरे कम्पनी के किसी से परिचित हो। उसने कहा डेविड ने भेजा है। मैने कहा कौन डेविड, तुम्हारा मतलब डेविड थाम्पसन से है क्या? उसने कहा हां वही। मै ने आश्चर्यचकित होकर कहा, वह तो मेरे कम्पनी का एम डी है। उससे तुम कैसे और किस प्रकार परिचित हो। मेरे मन बहोत सारे प्रश्न एक साथ खड़े होने लगे। जहां तक मुझे पता था, डेविड उस कम्पनी का 30 प्रतिशत मालिक है और बाकि 70 प्रतिशत का मालिक डेविड का कोई एक दोस्त है और कम्पनी के इतने बड़े भूखंड का मालिक भी वही दोस्त ही है। कुछ सेकेंड पहले मेरी कल्पना मे भी नही था कि कुछ पलों मे मुझे इतने बड़े आश्चर्य का सामना करना होगा। मन के जिस कोने से मैने उसे बार बार अपनी कीमती मर्सिडीज, कीमती मकान व साज सज्जा आदि दिखाकर अपने आभिजात्य के प्रदर्शन का प्रयास कर रहा था, मन के उसी कोने से कब उसे सर सर कहकर सम्बोधित करना शुरू किया, समझ नहीं पा रहा हूं। एक मन बोल रहा है मित्र को सर नही कहना चाहिए और एक मन कह रहा है जो मेरे एम डी सर का दोस्त है, और जो कम्पनी के 70 प्रतिशत का मालिक होने के साथ साथ पूरे जमीन व सम्पत्ति का भी मालिक है उसे अब सर न कह कर और क्या कह कर सम्बोधित करें। मुझे लगा मेरे दम्भ, अहंकार व आभिजात्य के गुब्बारे की हवा एक क्षण मे निकल कर सेव पिचका गई। किसी तरह लंच समाप्त कर घर लौट रहा हूं। गाड़ी मे हम दोनों चुपचाप बैठे है। मेरी श्रीमती जी मुझसे कहीं ज्यादा शांत व मौन दिख रहीं थी। मै स्पष्ट रूप से समझ पा रहा था कि इस समय उनके मन मे क्या चल रहा है। हमारे मे दम्भ, गरिमा व अहंकार की मात्रा जितना अधिक है, उतना ही उसके पास इन भावनाओं की कमी है जिससे हमे वेतन आदि मिल रहे हैं। उसका जीवनयापन कितना आडम्बर हीन, कितना विनम्र और कितना साधारण है। किशोरावस्था मे गुरूजी के बताये ये शब्द अनायास ही बार बार याद आने लगे *"जो नदी जितनी ज्यादा गहरी होती है उसके बहने का शोर उतना ही कम होता है"*। "Indeed Deeper Rivers Flow in Majestic Silence"! कितनी सत्यता है गुरूजी के इन शब्दों मे। *मै, जो सुन्दर शिल्पकारी व नक्कासी किये हुये एक लोटे मे रखा जल हूं,.. . आज एक गहरी नदी देख कर लौट रहा हूं ।* *सदैव प्रसन्न रहिये!!* *जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!* 🙏🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏 *संकलित*

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एक बार एक स्वामी जी भिक्षा माँगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और उन्होंने आवाज लगायी, भीक्षा दे दे माते!! घर से महिला बाहर आयी। उसनेउनकी झोली मे भिक्षा डाली और कहा, “महात्माजी, कोई उपदेश दीजिए!” स्वामीजी बोले, “आज नहीं, कल दूँगा।” दूसरे दिन स्वामीजी ने पुन: उस घर के सामने आवाज दी – भीक्षा दे दे माते!! उस घर की स्त्री ने उस दिन खीर बनायीं थी, जिसमे बादाम- पिस्ते भी डाले थे, वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आयी। स्वामी जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया। वह स्त्री जब खीर डालने लगी, तो उसने देखा कि कमंडल में गोबर और कूड़ा भरा पड़ाहै। उसके हाथ ठिठक गए। वह बोली, “महाराज ! यह कमंडल तो गन्दा है।” स्वामीजी बोले, “हाँ, गन्दा तो है, किन्तु खीर इसमें डाल दो।” स्त्री बोली, “नहीं महाराज,तब तो खीर ख़राब हो जायेगी । दीजिये यह कमंडल, में इसे शुद्ध कर लाती हूँ।” स्वामीजी बोले, मतलब जब यह कमंडल साफ़ हो जायेगा, तभी खीर डालोगी न?” स्त्री ने कहा : “जी महाराज !” स्वामीजी बोले, “मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक चिन्ताओ का कूड़ा-कचरा और बुरे संस्करो का गोबर भरा है, तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ न होगा। यदि उपदेशामृत पान करना है,तो प्रथम अपने मन को शुद्ध करना चाहिए, कुसंस्कारो का त्याग करना चाहिए, तभी सच्चे सुख और आनन्द की प्राप्ति होगी।

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"कैसे दिएं श्रीकृष्ण ने शनि देव को दर्शन" जब श्री कृष्ण ने जन्म लिया तो सभी देवी-देवता उनके दर्शन करने नंदगांव पधारे। कृष्णभक्त शनिदेव भी देवताओं संग श्रीकृष्ण के दर्शन करने नंदगांव पहुंचे। परंतु मां यशोदा ने उन्हें नंदलाल के दर्शन करने से मना कर दिया क्योंकि मां यशोदा को डर था कि शनि देव कि वक्र दृष्टि कहीं कान्हा पर न पड़ जाए। परंतु शनिदेव को यह अच्छा नहीं लगा और वो निराश होकर नंदगांव के पास जंगल में आकर तपस्या करने लगे। शनिदेव का मानना था कि पूर्णपरमेश्वर श्रीकृष्ण ने ही तो उन्हें न्यायाधीश बनाकर पापियों को दण्डित करने का कार्य सोंपा है। तथा सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का शनिदेव सदैव कल्याण करते है। भगवान् श्री कृष्ण शनि देव कि तपस्या से द्रवित हो गए और शनि देव के सामने कोयल के रूप में प्रकट हो कर कहा – हे शनि देव आप निःसंदेह अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हो और आप के ही कारण पापियों – अत्याचारियों – कुकर्मिओं का दमन होता है और परोक्ष रूप से कर्म-परायण, सज्जनों, सत-पुरुषों, भगवत भक्तों का कल्याण होता है, आप धर्मं -परायण प्राणियों के लिए ही तो कुकर्मिओं का दमन करके उन्हें भी कर्तव्य परायण बनाते हो, आप का ह्रदय तो पिता कि तरह सभी कर्तव्यनिष्ठ प्राणियों के लिए द्रवित रहता है और उन्हीं की रक्षा के लिए आप एक सजग और बलवान पिता कि तरह सदैव उनके अनिष्ट स्वरूप दुष्टों को दंड देते रहते हैं। हे शनि देव ! मैं आप से एक भेद खोलना चाहता हूँ, कि यह बृज-क्षेत्र मुझे परम प्रिय है और मैं इस पवित्र भूमि को सदैव आप जैसे सशक्त-रक्षक और पापिओं को दंड देने में सक्षम कर्तव्य-परायण शनि देव कि क्षत्र-छाया में रखना चाहता हूँ इसलिए हे शनि देव – आप मेरी इस इच्छा को सम्मान देते हुए इसी स्थान पर सदैव निवास करो, क्योंकि मैं यहाँ कोयल के रूप में आप से मिला हूँ इसी लिए आज से यह पवित्र स्थान “कोकिलावन” के नाम से विख्यात होगा। यहाँ कोयल के मधुर स्वर सदैव गूंजते रहेंगे, आप मेरे इस बृज प्रदेश में आने वाले हर प्राणी पर नम्र रहें साथ ही कोकिलावन-धाम में आने वाला आप के साथ – साथ मेरी भी कृपा का पात्र होगा ।। जय जय श्रीराधे भक्तों

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किसी भी परिस्थिती में संयम ना खोए । आज की कहानी से शिक्षा लें मित्रों 💐 सही फैसला बहुत समय पहले की बात है, किसी गाँव में एक किसान रहता था. उस किसान की एक बहुत ही सुन्दर बेटी थी. . दुर्भाग्यवश, गाँव के जमींदार से उसने बहुत सारा धन उधार लिया हुआ था. जमीनदार बूढा और कुरूप था. . किसान की सुंदर बेटी को देखकर उसने सोचा क्यूँ न कर्जे के बदले किसान के सामने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रखा जाये. . जमींदार किसान के पास गया और उसने कहा – तुम अपनी बेटी का विवाह मेरे साथ कर दो, बदले में मैं तुम्हारा सारा कर्ज माफ़ कर दूंगा . . जमींदार की बात सुन कर किसान और किसान की बेटी के होश उड़ गए. . तब जमींदार ने कहा – चलो गाँव की पंचायत के पास चलते हैं और जो निर्णय वे लेंगे उसे हम दोनों को ही मानना होगा. वो सब मिल कर पंचायत के पास गए और उन्हें सब कह सुनाया. . उनकी बात सुन कर पंचायत ने थोडा सोच विचार किया और कहा- ये मामला बड़ा उलझा हुआ है अतः हम इसका फैसला किस्मत पर छोड़ते हैं . . जमींदार सामने पड़े सफ़ेद और काले रोड़ों के ढेर से एक काला और एक सफ़ेद रोड़ा उठाकर एक थैले में रख देगा फिर लड़की बिना देखे उस थैले से एक रोड़ा उठाएगी, और उस आधार पर उसके पास तीन विकल्प होंगे : . १. अगर वो काला रोड़ा उठाती है तो उसे जमींदार से शादी करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्ज माफ़ कर दिया जायेगा. . २. अगर वो सफ़ेद पत्थर उठती है तो उसे जमींदार से शादी नहीं करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्फ़ भी माफ़ कर दिया जायेगा. . ३. अगर लड़की पत्थर उठाने से मना करती है तो उसके पिता को जेल भेज दिया जायेगा। . पंचायत के आदेशानुसार जमींदार झुका और उसने दो रोड़े उठा लिए . . जब वो रोड़ा उठा रहा था तो तब तेज आँखों वाली किसान की बेटी ने देखा कि उस जमींदार ने दोनों काले रोड़े ही उठाये हैं और उन्हें थैले में डाल दिया है। . लड़की इस स्थिति से घबराये बिना सोचने लगी कि वो क्या कर सकती है, उसे तीन रास्ते नज़र आये: . १. वह रोड़ा उठाने से मना कर दे और अपने पिता को जेल जाने दे. . २. सबको बता दे कि जमींदार दोनों काले पत्थर उठा कर सबको धोखा दे रहा हैं. . ३. वह चुप रह कर काला पत्थर उठा ले और अपने पिता को कर्ज से बचाने के लिए जमींदार से शादी करके अपना जीवन बलिदान कर दे. . उसे लगा कि दूसरा तरीका सही है, पर तभी उसे एक और भी अच्छा उपाय सूझा, उसने थैले में अपना हाथ डाला और एक रोड़ा अपने हाथ में ले लिया. और बिना रोड़े की तरफ देखे उसके हाथ से फिसलने का नाटक किया, . उसका रोड़ा अब हज़ारों रोड़ों के ढेर में गिर चुका था और उनमे ही कहीं खो चुका था . . लड़की ने कहा – हे भगवान ! मैं कितनी फूहड़ हूँ . लेकिन कोई बात नहीं. आप लोग थैले के अन्दर देख लीजिये कि कौन से रंग का रोड़ा बचा है, तब आपको पता चल जायेगा कि मैंने कौन सा उठाया था जो मेरे हाथ से गिर गया. . थैले में बचा हुआ रोड़ा काला था, सब लोगों ने मान लिया कि लड़की ने सफ़ेद पत्थर ही उठाया था. . जमींदार के अन्दर इतना साहस नहीं था कि वो अपनी चोरी मान ले . . लड़की ने अपनी सोच से असम्भव को संभव कर दिया. **** मित्रों, हमारे जीवन में भी कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जहाँ सब कुछ धुंधला दीखता है, . हर रास्ता नाकामयाबी की और जाता महसूस होता है पर ऐसे समय में यदि हम परमपरा से हट कर सोचने का प्रयास करें तो उस लड़की की तरह अपनी मुशिकलें दूर कर सकते हैं. जय जय श्री राधे राधे जी 👏

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भगवान श्री महावीर यम के सेवक उलटे हैं; भगवान महावीर द्वारा बताई गई कहानी पढ़ें! वह कई, कई साल पहले था। भगवान महावीर अपने शिष्यों के साथ एक गाँव में आए। लोगों को भक्ति का मार्ग बताते हुए। उनके अनमोल वचनों के कारण, कई लोगों ने अच्छे तरीके से स्वीकार किया है। उस गाँव में एक चोर था। उन्हें महावीर की शिक्षाएँ पसंद नहीं थीं। उसके साथ, चोरी करने वाले कई चोर अपना व्यवसाय छोड़कर महावीर की शिक्षाओं का पालन करने लगे थे। इसलिए वह नहीं रुकता कि महावीर कहां थे। एक दिन चोर गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उस समय उन्होंने अपने बेटे को बुलाया और कहा, बघ लुक बेबी, मुझे नहीं लगता कि मैं ज्यादा समय तक जीवित रहूंगा। आप मेरे बाद पीढ़ियों से चली आ रही चोरी का कारोबार करते रहेंगे। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जब तक इस गाँव में महावीर हैं, उनके पास मत जाओ। जहां हैं वहीं से भाग जाओ। कुछ दिनों बाद चोर ने शरीर छोड़ दिया। उनके बेटे ने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए एक विशेषज्ञ चोर बन गया। उन्होंने महान धन अर्जित किया। हालांकि, एक दिन, महावीर के मठ से गुजरते समय, उन्होंने महावीर को देखा। महावीर इकट्ठे हुए भक्तों को उपदेश दे रहे थे। चोर का बेटा महावीर के मठ के पास बिना रुके भाग गया, जैसा कि उसके पिता ने बताया था। उसने अपने कान बंद कर लिए ताकि उसकी सलाह न सुनी जाए। फिर भी, आधा वाक्य उसके कानों पर गिरा। महावीर मृत्यु के बाद की अवस्था का वर्णन करते हुए कह रहे थे, 'यम के सेवक जो प्राण लेते हैं, वे उलटे हैं'। एक दिन साहूकार के घर पर एक बड़ी डकैती हुई। राजा के सैनिकों ने चोर के बेटे को एक संदिग्ध के रूप में पकड़ लिया। वह चोरी को अंजाम देने वाला व्यक्ति था। लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया गया। कई मायनों में वह कबूल करने के लिए बना था, लेकिन व्यर्थ में! अंतिम उपाय के रूप में, उन्हें एक शामक दिया गया। सात-आठ दिनों तक बेहोश रहने के बाद, उसे होश आया। यह कहने के लिए कि वह मर चुकी है, पाँच-छह सुंदर स्त्रियाँ उसके चारों ओर इकट्ठी हो गईं और कहने लगीं, 'हम यमराज के सेवक हैं। हम आपकी जान ले रहे हैं। यदि आप वास्तव में मुझे बताते हैं कि आपने अपने जीवन में क्या गलत किया है, तो हम आपको स्वर्ग ले जाएंगे, और यदि आप झूठ बोलते हैं, तो हम आपको नरक में भेज देंगे। ' चोरी की बात कबूल करने के लिए यह एक साजिश नहीं होगी! उसे ऐसे संदेह थे। उस क्षण उन्होंने महावीर के शब्दों को याद किया। महावीर ने कहा था, 'यमराज के सेवकों के पैर उलटे हैं।' लेकिन उनके पैर हमारे जैसे ही हैं। मेरा मतलब है, निश्चित रूप से, यह आपको दंडित करने की साजिश है। उसे यह पता था। लेकिन दूल्हे को कुछ दिखाए बिना, उन्होंने कहा, जैसा आप कहते हैं, मैं भी स्वर्ग जाना चाहता हूं। लेकिन मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है। ' राजा के प्रयास व्यर्थ गए। कोई सबूत नहीं होने के कारण राजा को उसे जाने देना पड़ा। केवल महावीर की सजा से उनकी सजा बच गई। उन्होंने सोचा कि अगर महावीर का आधा वाक्य हमें कारावास के बंधन से मुक्त कर सकता है, अगर हम उनकी पूरी शिक्षाओं को सुनते हैं, तो जीवन वास्तव में स्वतंत्र होगा। फिर उन्होंने तुरंत महावीर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उसने उन्हें सारी सच्चाई बताई और उनकी कृपा ली और उनके जीवन को खुशहाल बना दिया। नमो अरिहंत🙏🌹शुभ रात्री वंदन 🙏जय श्री जिनेंद्र

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Vijay Anand Jan 17, 2021

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