जब देवता हुए नारद से परेशान तथा बंद किये सभी स्वर्ग के द्वार !

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अनिल गोयल Mar 26, 2019
kahan par daraj hai ye kahani... puri galat hai.. dakash prajapati ne narad g ko shaap diya tha ki wo ek jagah tik kar nhi rehege..

🌲💜राजकुमार राठोड💜🌲 Mar 26, 2019
🚩🙏जय श्री राम 🙏🚩 🚩🙏जय बजरंग🙏🚩 🌷🌷#Զเधे_Զเधे ......🌹🌹 ‼️🔰❇️ #जय_श्री_कृष्णा❇️🔰‼️ 🅹🙏शुभ रात्रि वंदन जी 🙏

brijmohan kaseara Mar 26, 2019
जय श्री राम राम जी सादर नमस्कार जी जय श्री महाकाल

Ramkumarchoudhary Mar 27, 2019
iswar sab ko aapna aapna karay diya hai sab ka alag alag mahtab hai jai narad bhagvan ki jai

Ashwani kumar sharma Mar 27, 2019
plz Subscribers Dost Graphic Teachingart My New Channel On Youtube https://youtu.be/hBI40gEByMQ

krishna kumar paliwal Mar 27, 2019
🌷🌷ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🌷🌷 🌷🌷ॐ नमः शिवाय 🌷🌷

matalalratod Mar 27, 2019
आज सबसे बड़ा तैयार है जय शीतला माता

💕Arjun Tiwari Ulhasnagar(MR) Mar 27, 2019
🎉* हे कान्हा"जी 🎉 🎉ना जाने कौन सी दौलत हैै तेरी आँखो मे🎉नजर🎉 उठाते हो तो दिल खरीद लेते हो🎉*मेरे सावरियां*🎉राधे राधे🎉शुभ प्रभात जी 🎉

Girish Patel May 23, 2019

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तृणावर्त का उद्धार तथा उसके पूर्वजन्म का परिचय ================================ भगवान नारायण कहते हैं– नारद! एक दिन गोकुल में सती साध्वी नन्दरानी यशोदा बालक को गोद में लिये घर के कामकाज में लगी हुई थीं। उस समय गोकुल में बवंडर का रूप धारण करने वाला तृणावर्त आ रहा था। मन-ही-मन उसके आगमन की बात जानकर श्रीहरि ने अपने शरीर का भार बढ़ा लिया। उस भार से पीड़ित होकर मैया यशोदा ने लाला को गोद से उतार दिया और खाट पर सुलाकर वे यमुना जी के किनारे चली गयीं। इसी बीच में वह बवंडररूपधारी असुर वहाँ आ पहुँचा और उस बालक को लेकर घुमाता हुआ सौ योजन ऊपर जा पहुँचा। उसने वृक्षों की डालियाँ तोड़ दीं तथा इतनी धूल उड़ायी कि गोकुल में अँधेरा छा गया। उस मायावी असुर ने तत्काल यह सब उत्पात किया। फिर वह स्वयं भी श्रीहरि के भार से आक्रान्त हो वहीं पृथ्वी पर गिर पड़ा। श्रीहरि का स्पर्श प्राप्त करके वह असुर भी भगवद्धाम को चला गया। अपने कर्मों का नाश करके सुन्दर दिव्य रथ पर आरूढ़ हो गोलोक में जा पहुँचा। वह पाण्ड्यदेश का राजा था और दुर्वासा के शाप से असुर हो गया था। श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श पाकर उसने गोलोकधाम में स्थान प्राप्त कर लिया। मुने! बवंडर का रूप समाप्त होने पर भय से विह्वल गोप-गोपियों ने जब खोज की, तब बालक को शय्या पर न देखकर सब लोग शोक से व्याकुल हो भय से अपनी-अपनी छाती पीटने लगे। कुछ लोग मूर्च्छित हो गये और कितने ही फूट-फूटकर रोने लगे। खोजते-खोजते उन्हें वह बालक व्रज के भीतर एक फुलवाड़ी में पड़ा दिखायी दिया। उसके सारे अंग धूल से धूसर हो रहे थे। एक सरोवर के बाहरी तट पर जो पानी से भीगा हुआ था, पड़ा हुआ वह बालक आकाश की ओर एकटक देखता और भय से कातर होकर बोलता था। नन्द जी ने तत्काल बच्चे को उठाकर छाती से लगा लिया और उसका मुँह देख-देखकर वे शोक से व्याकुल हो रोने लगे। माता यशोदा और रोहिणी भी शीघ्र ही बालक को देखकर रो पड़ीं तथा उसे गोद में लेकर बार-बार उसका मुँह चूमने लगीं। उन्होंने बालक को नहलाया और उसकी रक्षा के लिये मंगलपाठ करवाया। इसके बाद यशोदा जी ने अपने लाला को स्तन पिलाया। उस समय उनके मुख से नेत्रों में प्रसन्नता छा रही थी। नारद जी ने पूछा– भगवन! पाण्ड्यदेश के राजा को दुर्वासा जी ने क्यों शाप दिया? आप इस प्राचीन इतिहास को भलीभाँति विचार करके कहिये। भगवान नारायण बोले– एक बार पाण्ड्यदेश के प्रतापी राजा अपनी एक हजार पत्नियों को साथ लेकर मनोहर निर्जन प्रदेश में गन्धमादन पर्वत की नदी-तीरस्थ पुष्पवाटिका में जाकर सुख से विहार करने लगे। एक दिन वे नदी में अपनी पत्नियों के साथ जलक्रीड़ा कर रहे थे। उस समय उन लोगों के वस्त्र अस्तव्यस्त थे। इसी बीच अपने हजारों शिष्यों को साथ लिये महामुनि दुर्वासा उधर से निकले। मतवाले सहस्राक्ष ने उनको देख लिया, पर वे न जल से निकले, न प्रणाम किया, न वाणी से या हाथ से संकेत से ही कुछ कहा। इस निर्लज्जता और उद्दण्डता को देखकर दुर्वासा ने उनको योगभ्रष्ट होकर भारत में लाख वर्षों तक असुरयोनि में रहने का शाप दे दिया और कहा कि ‘इसके अनन्तर श्रीहरि के चरण-कमल का स्पर्श प्राप्त होने पर असुरयोनि से उद्धार होकर तुम्हें गोलोक की प्राप्ति होगी।’ और उनकी पत्नियों से कहा कि ‘तुम लोग भारत में जाकर विभिन्न स्थानों में राजाओं के घरों में जन्म धारण करके राजकन्या होओगी।’ मुनीन्द्र के शाप को सुनकर सब लोग हाहाकार कर उठे। राजा सहस्राक्ष की पत्नियाँ करुण विलाप करने लगीं। अन्त में राजा ने एक बड़े अग्निकुण्ड का निर्माण किया और श्रीहरि के चरणकमलों का हृदय में चिन्तन करते हुए वे पत्नियोंसहित उसमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार वे राजा सहस्राक्ष तृणावर्त नामक असुर होने के पश्चात श्रीहरि का स्पर्श पाकर उनके परमधाम में चले गये और उनकी रानियों ने भारत वर्ष में मनोवांछित जन्म ग्रहण किया।।

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श्रीकृष्ण के रास-विलास का वर्णन ===================== नारद जी ने पूछा– भगवन! तीन मास व्यतीत होने पर गोपांगनाओं का श्रीहरि के साथ किस प्रकार मिलन हुआ? वृन्दावन कैसा है? रासमण्डल का क्या स्वरूप है? श्रीकृष्ण तो एक थे और गोपियाँ बहुत। ऐसी दशा में किस तरह वह क्रीड़ा सम्भव हुई? मेरे मन में इस नयी-नयी लीला को सुनने के लिये बड़ी उत्सुकता हो रही है। महाभाग! आपके नाम और यश का श्रवण एवं कीर्तन बड़ा पवित्र है। कृपया आप उस रासक्रीड़ा का वर्णन कीजिये। अहो! श्रीहरि की रासयात्रा, पुराणों के सार की भी सारभूता कथा है। इस भूतल पर उनके द्वारा की गयी सारी लीलाएँ ही सुनने में अत्यन्त मनोहर जान पड़ती हैं। सूत जी कहते हैं– शौनक! नारद जी की यह बात सुनकर साक्षात नारायण ऋषि हँसे और प्रसन्न मुख से उन्होंने कथा सुनाना आरम्भ किया। श्री नारायण बोले– मुने! एक दिन श्रीकृष्ण चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को चन्द्रोदय होने के पश्चात वृन्दावन में गये। उस समय जूही, मालती, कुन्द और माधवी के पुष्पों का स्पर्श करके बहने वाली शीतल, मन्द एवं सुगन्धित मलयवायु से सारा वनप्रान्त सुवासित हो रहा था। भ्रमरों के मधुर गुंजारव से उसकी मनोहरता बढ़ गयी थी। वृक्षों में नये-नये पल्लव निकल आये थे और कोकिल की कुहू-कुहू ध्वनि से वह वन मुखरित हो रहा था। नौ लाख रासगृहों से संयुक्त वह वृन्दावन बड़ा ही मनोहर जान पड़ता था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुम की सुगन्ध सब ओर फैर रही थी। कर्पूरयुक्त ताम्बूल तथा भोगद्रव्य सजाकर रखे गये थे। कस्तूरी और चन्दन युक्त चम्पा के फूलों से रचित नाना प्रकार की शय्याएँ उस स्थान की शोभा बढ़ा रही थीं। रत्नमय प्रदीपों का प्रकाश सब ओर फैला था। धूप की सुगन्ध से वह वन प्रान्त महमह महक रहा था। वहीं सब ओर से गोलाकार रासमण्डल बनाया गया था, जो नाना प्रकार के फूलों और मालाओं से सुसज्जित था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसर से वहाँ की भूमि का संस्कार किया गया था। रासमण्डल के चारों ओर फूलों से भरे उद्यान तथा क्रीड़ा सरोवर थे। उन सरोवरों में हंस, कारण्डव तथा जलकुक्कुट आदि पक्षी कलरव कर रहे थे। वे जलक्रीड़ा के योग्य सुन्दर तथा सुरत-श्रम का निवारण करने वाले थे। उनमें शुद्ध स्फटिकमणि के समान स्वच्छ तथा निर्मल जल भरा था। उस रासमण्डल में दही, अक्षत और जल छिड़के गये थे। केले के सुन्दर खम्भों द्वारा वह चारों ओर से सुशोभित था। सूत में बँधे हुए आम के पल्लवों के मनोहर बन्दनवारों तथा सिन्दूर, चन्दन युक्त मंगल-कलशों से उसको सजाया गया था। मंगल कलशों के साथ मालती की मालाएँ और नारियल के फल भी थे। उस शोभासम्पन्न रासमण्डल को देखकर मधुसूदन हँसे। उन्होंने कौतूहलवश वहाँ विनोद की साधनभूता मुरली को बजाया। वह वंशी की ध्वनि उनकी प्रेयसी गोपांगनाओं के प्रेम को बढ़ाने वाली थी।राधिका ने जब वंशी की मधुर ध्वनि सुनी तो तत्काल ही वे प्रेमाकुल हो अपनी सुध-बुध खो बैठीं। उनका शरीर ठूँठे काठ की तरह स्थिर और चित्त ध्यान में एकतान हो गया। क्षणभर में चेत होने पर पुनः मुरली की ध्वनि उनके कानों में पड़ी। वे बैठी थीं, फिर उठकर खड़ी हो गयीं। अब उन्हें बार-बार उद्वेग होने लगा, वे आवश्यक कर्म छोड़कर घर से निकल पड़ीं। यह एक अद्भुत बात थी। चारों ओर देखकर वंशीध्वनि का अनुसरण करती हुई आगे बढ़ीं। मन-ही-मन महात्मा श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों का चिन्तन करती जाती थीं। वे अपने सहज तेज तथा श्रेष्ठ रत्नसारमय भूषणों को कान्ति से वनप्रान्त को प्रकाशित कर रही थीं। राधिका की सुशीला आदि जो अत्यन्त प्यारी तैंतीस सखियाँ थीं और समस्त गोपियों में श्रेष्ठ समझी जाती थीं; वे भी श्रीकृष्ण के दिये हुए वर से आकृष्ट-चित्त हो डरी हुई-सी घर से बाहर निकलीं। कुलधर्म का त्याग करके निःशंक हो वन की ओर चलीं। वे सब-की-सब प्रेमातिरेक से मोहित थीं। फिर उन प्रधान गोपियों के पीछे-पीछे दूसरी गोपियाँ भी जो जैसे थीं, वैसे ही– लाखों की संख्या में निकल पड़ीं। वे सब वन में एक स्थान पर इकट्ठी हुईं और कुछ देर तक प्रसन्नतापूर्वक वहीं खड़ी रहीं। वहाँ कुछ गोपियाँ अपने हाथों में माला लिये आयी थीं। कुछ गोपांगनाएँ व्रज से मनोहर चन्दन हाथ में लेकर वहाँ पहुँची थीं। कई गोपियों के हाथों में श्वेत चँवर शोभा पा रहे थे। वे सब बड़े हर्ष के साथ वहाँ आयी थीं। कुछ गोपकन्याएँ कुंकुम, ताम्बूल-पात्र तथा कांचन, वस्त्र लिये आती थीं। कुछ शीघ्रतापूर्वक उस स्थान पर आयीं, जहाँ चन्द्रावली (राधा) सानन्द खड़ी थीं। वे सब एकत्र हो प्रसन्नतापूर्वक मुस्कराती हुईं वहाँ राधिका की वेशभूषा सँवारकर बड़े हर्ष के साथ आगे बढ़ीं। मार्ग में बारंबार वे हरि-नाम का जप करती थीं। वृन्दावन में पहुँचकर उन्होंने रमणीय रासमण्डल देखा, जहाँ का दृश्य स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर था। चन्द्रमा की किरणें उस वनप्रान्त को अनुरंजित कर रही थीं। अत्यन्त निर्जन, विकसित कुसुमों से अलंकृत तथा फूलों को छूकर प्रवाहित होने वाली मलयवायु से सुवासित वह रम्य रासमण्डल नारियों के प्रेमभाव को जगाने वाला और मुनियों के भी मन को मोह लेने वाला था। उन सबको वहाँ कोकिलों की मधुर काकली सुनायी दी। भ्रमरों का अत्यन्त सूक्ष्म मधुर गुंजारव भी बड़ा मनोहर जान पड़ता था। वे भ्रमर भ्रमरियों के साथ रह फूलों का मकरन्द पान करके मतवाले हो गये थे। तदनन्तर शुभ वेला में सम्पूर्ण सखियों के साथ श्रीकृष्ण के चरणकमलों का चिन्तन करके श्रीराधिका ने रासमण्डल में प्रवेश किया। राधा को अपने समीप देखकर श्रीकृष्ण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए। वे बड़े प्रेम से मुस्कराते हुए उनके निकट गये। उस समय प्रेम से आकुल हो रहे थे। राधा अपनी सखियों के बीच में रत्नमय अलंकारों से विभूषित होकर खड़ी थीं। उनके श्रीअंगों पर दिव्य वस्त्रों के परिधान शोभा पा रहे थे। वे मुस्कराती हुई बाँकी चितवन से श्यामसुन्दर की ओर देखती हुई गजराज की भाँति मन्द गति से चल रही थीं। रमणीय राधा नवीन वेशभूषा, नयी अवस्था तथा रूप से अत्यन्त मनोहर जान पड़ती थीं।वे मुनियों के मन को भी मोह लेने में समर्थ थीं। उनकी अंगकान्ति सुन्दर चम्पा के समान गौर थी। मुख शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा को लज्जित कर रहा था। वे सिर पर मालती की माला से युक्त वेणी का भार वहन करती थीं। श्रीराधा ने भी किशोर अवस्था से युक्त श्यामसुन्दर की ओर दृष्टिपात किया। वे नूतन यौवन से सम्पन्न तथा रत्नमय आभरणों से विभूषित थे। करोड़ों कामदेवों की लावण्यलीला के मनोहर धाम प्रतीत होते थे और बाँके नयनों से उनकी ओर निहारती हुई उन प्राणाधिका राधिका को देख रहे थे। उनके पर अद्भुत रूप की कहीं उपमा नहीं थी। वे विचित्र वेश-भूषा तथा मुकुट धारण किये सानन्द मुस्करा रहे थे। बाँके नेत्रों के कोण से बार-बार प्रीतम की ओर देख-देखकर सती राधा ने लज्जावश मुख को आँचल से ढक लिया और वे मुस्कराती हुई अपनी सुध-बुध खो बैठीं। प्रेमभाव का उद्दीपन होने से उनके सारे अंग पुलकित हो उठे। तदनन्तर श्रीकृष्ण एवं राधिका का परस्पर प्रेम-श्रृंगार हुआ। मुने! नौ लाख गोपियाँ और उतने ही गोप-विग्रहधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण – ये अठारह लाख गोपी-कृष्ण रासमण्डल में परस्पर मिले। नारद! वहाँ कंकणों, किंकिणियों, वलयों और श्रेष्ठ रत्ननिर्मित नूपुरों की सम्मिलित झनकार कुछ काल तक निरन्तर होती रही। इस प्रकार स्थल में रासक्रीड़ा करके वे सब प्रसन्नतापूर्वक जल में उतरे और वहाँ जल-क्रीड़ा करते-करते थक गये। फिर वहाँ से निकलकर नवीन वस्त्र धारण करके कौतूहलपूर्वक कर्पूरयुक्त ताम्बूल ग्रहण करके सबने रत्नमय दर्पण में अपना-अपना मुँह देखा। तदनन्तर श्रीकृष्ण राधिका तथा गोपियों के साथ नाना प्रकार की मधुर-मनोहर क्रीड़ाएँ करने लगे। फिर पवित्र उद्यान के निर्जन प्रदेश में सरोवर के रमणीय तट पर जहाँ बाहर चन्द्रमा का प्रकाश फैल रहा था, जहाँ की भूमि पुष्प और चन्दन से चर्चित थी, जहाँ सब ओर अगुरु तथा चन्दन से सम्पृक्त मलय-समीर द्वारा सुगन्ध फैलायी जा रही थी और भ्रमरों के गुंजारव के साथ नर-कोकिलों की मधुर काकली कानों में पड़ रही थी; योनियों के परम गुरु श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के अनेक रूप धारण करके स्थल-प्रदेश में मधुर लीला-विलास किये। इसके बाद राधा के साथ सनातन पूर्णब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण ने यमुना जी के जल में प्रवेश किया। श्रीकृष्ण के जो अन्य मायामय स्वरूप थे, वे भी गोपियों के साथ जल में उतरे। यमुना जी में परम रसमयी क्रीड़ा करने के पश्चात सबने बाहर निकलकर सूखे वस्त्र पहने और माला आदि धारण कीं।तदनन्तर सब गोप-किशोरियाँ पुनः रासमण्डल में गयीं। वहाँ के उद्यान में सब ओर तरह-तरह के फूल खिले हुए थे। उन्हें देखकर परमेश्वरी राधा ने कौतुकपूर्वक गोपियों को पुष्पचयन के लिये आज्ञा दी। कुछ गोपियों को उन्होंने माला गूँथने के काम में लगाया। किन्हीं को पान के बीड़े सुसज्जित करने में तथा किन्हीं को चन्दन घिसने में लगा दिया। गोपियों के दिये हुए पुष्पहार, चन्दन तथा पान को लेकर बाँके नेत्रों से देखती हुई सुन्दरी राधा ने मन्द हास्य के साथ श्यामसुन्दर को प्रेमपपूर्वक वे सब वस्तुएँ अर्पित कीं। फिर कुछ गोपियों को श्रीकृष्ण की लीलाओं के गान में और कुछ को मृदंग, मुरज आदि बाजे बजाने में उन्होंने लगाया। इस प्रकार रास में लीला-विलास करके राधा निर्जन वन में श्रीहरि के साथ सर्वत्र मनोहर विहार करने लगीं। रमणीय पुष्पोद्यान, सरोवरों के तट, सुरम्य गुफा, नदों और नदियों के समीप, अत्यन्त निर्जन प्रदेश, पर्वतीय कन्दरा, नारियों के मनोवांछित स्थान, तैंतीस वन– भाण्डीरवन, रमणीय श्रीवन, कदम्बवन, तुलसी वन, कुन्दवन, चम्पकवन, निम्बवन, मधुवन, जम्बीरवन, नारिकेलवन, पूगवन, कदलीवन, बदरीवन, बिल्ववन, नारंगवन, अश्वत्थवन, वंशवन, दाडिमवन, मन्दरावन, तालवन, आम्रचूतवन, केतकीवन, अशोकवन, खर्जूरवन, आम्रातकवन, जम्बूवन, शालवन, कटकीवन, पद्मवन, जातिवन, न्यग्रोधवन, श्रीखण्डवन और विलक्षण केसरवन– इन सभी स्थानों में तीस दिन-रात तक कौतूहलपूर्वक श्रृंगार किया, तथापि उनका मन तनिक भी तृप्त नहीं हुआ। अधिकाधिक इच्छा बढ़ती गयी, ठीक उसी तरह, जैसे घी की धारा पड़ने से अग्नि प्रज्वलित होती है। देवता, देवियाँ और मुनि, जो रास-दर्शन के लिये पधारे थे, अपने-अपने घर को लौट गये। उन सबने रास-रस की भूरि-भूरि प्रशंसा की और आश्चर्यचकित हो हर्ष का अनुभव करते हुए वे वहाँ से विदा हुए।।

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कच और देवयानी ============== एक बार देवताओं और असुरों के बीच इस बात पर लड़ाई छिड़ गई कि तीनों लोकों पर किसका आधिपत्य हो। बृहस्पति देवताओं के गुरु थे और शुक्राचार्य असुरों के। वेद-मन्त्रों पर बृहस्पति का पूर्ण अधिकार था और शुक्राचार्य का ज्ञान सागर-जैसा अथाह था। इन्हीं दो ब्राह्मणों के बुद्धि बल पर देवासुर संग्राम होता रहा। शुक्राचार्य को मृत-संजीवन विद्या का ज्ञान था। इससे युद्ध में जितने भी असुर मारे जाते, उनको वह फिर जिला देते थे। इस तरह युद्ध में जितने असुर खेत रहते थे, वे शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या से जी उठते और फिर मोर्चे पर आ डटते। देवताओं के पास यह विद्या नहीं थी। देवगुरु बृहस्पति संजीवनी विद्या नहीं जानते थे। इस कारण देवता सोच में पड़ गये। उन्होंने आपस में इकट्ठे होकर मंत्रणा की और एक युक्ति खोज निकाली। वे सब देवगुरु के पुत्र कच के पास गये और उनसे बोले- "गुरुपुत्र! तुम हमारा काम बना दो तो बड़ा उपकार हो। तुम अभी जवान हो और तुम्हारा सौन्दर्य मन को लुभाने वाला है। तुम यह काम बड़ी आसानी से कर सकोगे। करना यह है कि तुम शुक्राचार्य के पास ब्रह्मचारी बनकर जाओ और उनकी खूब सेवा-टहल करके उनके विश्वासपात्र बन जाओ; उनकी सुन्दरी कन्या का प्रेम प्राप्त करो और फिर शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या सीख लो।" कच ने देवताओं की प्रार्थना मान ली। शुक्राचार्य असुरों के राजा वृषपर्वा की राजधानी में रहते थे। कच वहाँ पहुँचकर असुर-गुरु के घर गया और आचार्य को दण्डवत प्रणाम करके बोला- "आचार्य, मैं अंगिरा मुनि का पोता और बृहस्पति का पुत्र हूँ। मेरा नाम कच है। आप मुझे अपना शिष्य स्वीकार करने की कृपा करें। मैं आपके अधीन पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूँगा।" उन दिनों ब्राह्मणों में यह नियम था कि कोई सुयोग्य किसी उपाध्याय या आचार्य का शिष्य बनकर विद्याध्ययन करना चाहता तो उसकी प्रार्थना स्वीकार की जाती थी। शर्त यही रहती कि जो शिष्य बनना चाहे उसे ब्रह्मचर्य-व्रत का पूर्ण पालन करना आवश्यक होगा। इस कारण विरोधी पक्ष का होने पर भी शुक्राचार्य ने कच की प्रार्थना स्वीकार कर ली। उन्होंने कहा- "बृहस्पति-पुत्र! तुम अच्छे कुल के हो। मैं तुम्हें अपना शिष्य स्वीकार करता हूँ। इससे बृहस्पति भी गौरवान्वित होंगे।" कच ने ब्रह्मचर्य व्रत की दीक्षा ली और शुक्राचार्य के यहाँ रहने लगा। वह बड़ी तत्परता के साथ शुक्राचार्य और उनकी कन्या देवयानी की सेवा-सुश्रूषा करने लगा। आचार्य शुक्र अपनी पुत्री को बहुत चाहते थे। इस कारण कच देवयानी को प्रसन्न रखने का हमेशा प्रयत्न करता। उसकी इच्छाओं का बराबर ध्यान रखता। इसका असर देवयानी पर भी हुआ। वह कच के प्रति आसक्त होने लगी, परन्तु कच अपने ब्रह्मचर्य-व्रत पर दृढ़ रहा। इस तरह कई वर्ष बीत गये।असुरों को जब पता चला कि देवगुरु बृहस्पति का पुत्र कच शुक्राचार्य का शिष्य हो गया है तो उनको भय हुआ कि कहीं शुक्राचार्य से वह संजीवनी विद्या न सीख ले। अतः उन्होंने कच को मार डालने का निश्चय किया। एक दिन कच जंगल में आचार्य की गौएं चरा रहा था कि असुर उस पर टूट पड़े और उसके टुकड़े-टुकड़े करके कुत्तों को खिला दिया। शाम हुई तो गौएं अकेली घर लौटीं। जब देवयानी ने देखा कि गायों के साथ कच नहीं है तो उसके मन में शंका पैदा हो गई। उसका दिल धड़कने लगा। वह पिता के पास दौड़ी गई और बोली- "पिता जी, सूरज डूब गया। गाएं अकेली वापस आ गईं। आपका अग्निहोत्र भी समाप्त हो गया। पर फिर भी, न जाने क्यों, कच अभी तक नहीं लौटा। मुझे भय है कि जरूर उस पर कोई-न-कोई विपत्ति आ गई होगी। उसके बिना मैं कैसे जिऊंगी?" कहते-कहते देवयानी की आंखें भर आईं। अपनी प्यारी बेटी का कष्ट शुक्राचार्य से नहीं देखा गया। उन्होंने संजीवनी विद्या का प्रयोग किया और मृत कच का नाम पुकारकर बोले- "आओ, कच! मेरे प्रिय शिष्य कच, आओ!" संजीवनी मंत्र की शक्ति ऐसी थी कि शुक्राचार्य के पुकारते ही मरे हुए कच के शरीर के टुकड़े कुत्तों के पेट फाड़कर निकल आये और जुड़ गये। कच जीवित हो उठा और गुरु के सामने हाथ जोड़कर आ खड़ा हुआ। उसके मुख पर दिव्य आनन्द की झलक थी। देवयानी ने पूछा- "क्यों कच! क्या हुआ था? किसलिये इतनी देर हुई?’’ कच ने सरल भाव से उत्तर दिया- "जंगल में गाएं चराने के बाद लकड़ी का गट्ठा सिर पर रक्खे मैं आ रहा था कि जरा थकावट महसूस हुई। एक बरगद के पेड़ की छाया में जरा देर विश्राम करने बैठ गया। गाएं भी पेड़ की ठंडी छांह में खड़ी हो गईं। इतने में कुछ असुरों ने आकर पूछा- ‘तुम कौन हो?’ "मैंने उत्तर दिया- ‘मैं बृहस्पति का पुत्र कच हूँ।’ इस पर उन्होंने तुरन्त मुझ पर तलवार का वार किया और मुझे मार डाला। न जाने कैसे फिर मैं जीवित हो गया हूँ! बस, मैं इतना ही जानता हूँ।" कुछ दिन और बीत गये। एक बार कच देवयानी के लिए फूल लाने जंगल गया। असुरों ने वहीं उसे घेर लिया और खत्म कर दिया और उसके शरीर को पीसकर समुद्र में बहा दिया। इधर देवयानी कच की बाट जोह रही थी। शाम होने के बाद भी जब कच न लौटा, तो घबराकर उसने अपने पिता से कहा। शुक्राचार्य ने पहले की भाँति संजीवनी मंत्र का प्रयोग किया। कच समुद्र के पानी से जीवित निकल आया और सारी बातें देवयानी को कह सुनाईं।इस प्रकार असुर इस ब्रह्मचारी के पीछे हाथ धोकर पड़ गये थे। उन्होंने तीसरी बार फिर कच की हत्या कर डाली। उसके मृत शरीर को जलाकर भस्म कर दिया और उसकी राख मदिरा में घोलकर स्वयं शुक्राचार्य को ही पिला दी। शुक्राचार्य को मदिरा का बड़ा व्यसन था। असुरों की दी हुई सुरा बिना देखे-भाले ही पी गये। कच के शरीर की राख उनके पेट में पहुँच गई। सन्ध्या हुई, गाएं घर लौट आईं, पर कच नहीं आया। देवयानी फिर पिता के पास आंखों में आंसू भरकर बोली- "पिता जी! कच को पापियों ने फिर मार डाला मालूम होता है। उसके बिना मैं पल भर भी नहीं जी सकती।" शुक्राचार्य बेटी को समझाते हुए बोले- "मालूम होता है, असुर लोग कच के प्राण लेने पर तुल गये हैं। मैं कितनी ही बार उसे क्यों न जिलाऊं, आखिर वे उसे मारकर ही छोड़ेंगे। किसी की मृत्यु पर शोक करना तुम जैसी समझदार लड़की को शोभा नहीं देता। तुम मेरी पुत्री हो। तुम्हें कमी किस बात की है! सारा संसार तुम्हारे आगे सिर झुकाता है। फिर तुम्हें किस बात की चिंता है? व्यर्थ शोक न करो।" शुक्राचार्य ने हज़ार समझाया, किन्तु देवयानी न मानी। उस तेजस्वी ब्रह्मचारी पर वह जान जो देती थी। उसने कहा- "पिता जी, अंगिरा ऋषि का पोता और देवगुरु बृहस्पति को बेटा कच कोई साधारण युवक नहीं है। वह अटल ब्रह्मचारी है, तपस्या ही उसका धन है। वह यत्नशील है और कार्य-कुशल भी। ऐसे युवक के मारे जाने पर मैं उसके बिना नहीं जी सकती। मैं भी उसी का अनुसरण करूँगी।" यह कहकर शुक्र-कन्या देवयानी ने अनशन शुरू कर दिया, खाना-पीना छोड़ दिया। शुक्राचार्य को असुरों पर बड़ा क्रोध आया। उनको लगा कि अब असुरों का भला नहीं, जो ऐसे निर्दोष ब्राह्मण की हत्या करने पर तुल गये हैं। उन्होंने कच को जीवित करने के लिये संजीवनी मंत्र पढ़ा और पुकारकर बोले- "वत्स, आ जाओ!" उनके पुकारते ही कच जीवित हो उठा और आचार्य के पेट के अंदर से ही बोला- "भगवन, मेरा दण्डवत प्रणाम स्वीकार करें!" अपने पेट के भीतर से कच को बोलते सुनकर शुक्राचार्य बड़े अचरज में पड़ गये और पूछा- "हे ब्रह्मचारी! मेरे पेट के अंदर तुम कैसे पहुँचे? क्या यह भी असुरों की ही करतूत है, जल्दी बताओ। मैं इन पापियों का सत्यानाश कर डालूँगा।" क्रोध के मारे शुक्राचार्य के होंठ फड़फड़ाने लगे। कच ने शुक्राचार्य को पेट के अंदर से ही सारी बातें बता दीं।महानुभाव, तपोनिधि तथा असीम महिमा वाले शुक्राचार्य को जब यह ज्ञात हुआ कि मदिरा-पान के ही कारण धोखे में उनसे यह अनर्थ हुआ है तो उन्हें अपने ही ऊपर बड़ा क्रोध आया। तत्काल ही मनुष्य-मात्र की भलाई के लिये यह अनुभव पूत वाणी उनके मुंह से निकल पड़ी- ‘जो मन्द बुद्धि अपनी नासमझी के कारण मदिरा पीता है, धर्म उसी क्षण उसका साथ छोड़ देता है। वह सभी की निन्दा और अवज्ञा का पात्र बन जाता है। यह मेरा निश्चित मत है। लोग आज से इस बात को शास्त्र मान लें और इसी पर चलें।" इसके बाद शुक्राचार्य ने शांत होकर अपनी पुत्री से पूछा- "बेटी, यदि मैं कच को जिलाता हूँ तो मेरी मृत्यु हो जाती है; क्योंकि उसे मेरा पेट चीरकर ही निकालना पड़ेगा। बताओ, तुम क्या चाहती हो?" यह सुनकर देवयानी रो पड़ी। आँसू बहाती हुई बोली- "हाय, अब मैं क्या करूँ? कच के बिछोह का दुःख मुझे आग की तरह जला देगा और आपकी मृत्यु के बाद तो मैं जीवित रह ही न सकूंगी। हे भगवान, मैं तो दोनों तरफ से मरी।" शुक्राचार्य कुछ देर तक सोचते रहे। उन्होंने दिव्य दृष्टि से जान लिया कि बात क्या है। वह कच से बोले- "बृहस्पति-पुत्र, तुम्हारे यहाँ आने का रहस्य मेरी समझ में आ गया है। अब तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी। देवयानी के लिये तुम्हें जिलाना ही पड़ेगा, साथ ही मुझे भी जीवित रहना होगा। इसका केवल एक ही उपाय है और वह यह कि मैं तुम्हें संजीवनी -विद्या सिखा दूँ। उसे मेरे पेट के अंदर ही सीख लो और फिर मेरा पेट चीर कर निकल आओ। उसके बाद उसी विद्या से तुम मुझे जिला देना।" कच के मन की मुराद पूरी हो गई। उसने शुक्राचार्य के कहे अनुसार संजीवनी विद्या सीख ली और पूर्णिमा के चन्द्र ही भाँति आचार्य का पेट चीरकर निकल आया। मूर्तिमान बुद्धि के समान ज्ञानी शुक्राचार्य मृत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। थोड़ी ही देर में कच ने संजीवनी मंत्र पढ़कर उनको जिला दिया। देवयानी के आनन्द की सीमा न रही। शुक्राचार्य उठे तो कच ने उनके आगे दण्डवत की और अश्रुधारा से उनके पांव भिगोता हुआ बोला- "अविद्वान को विद्या पढ़ाने वाले आचार्य माता और पिता के समान हैं। आपने मुझे एक नई विद्या प्रदान की। इसके अलावा अब आपकी कोख ही से मानो मेरा जन्म हुआ, सो आप तो मेरे लिए माँ के समान हैं।"इसके बाद कई वर्ष तक कच शुक्राचार्य के पास ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुए रहा। व्रत के समाप्त होने पर गुरु से आज्ञा लेकर वह देवलोक लौटने को प्रस्तुत हुआ तो देवयानी ने उससे कहा- "अंगिरा मुनि के पौत्र कच, तुम शीलवान हो, ऊंचे कुल के हो। इन्द्रिय-दमन करके तुमने तपस्या की और शिक्षा प्राप्त की। इस कारण तुम्हारा मुखमडंल सूर्य की भाँति तेजस्वी है। जब तुम ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन कर रहे थे, तब मैंने तुमसे स्नेहपूर्ण व्यवहार किया था। अब तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम भी वैसा ही व्यवहार मुझसे करो। तुम्हारे पिता बृहस्पति मेरे लिये पूज्य हैं, अतः तुम अब मुझसे यथाविधि विवाह कर लो।" यह कहकर शुक्र-कन्या सलज्ज खड़ी रही। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी जो देवयानी ने ऐसी स्वतंत्रता से बातें कीं। वह जमाना ही ऐसा था कि जब शिक्षित ब्राह्मण-कन्याएं निर्भय तथा स्वतंत्र होती थी, मन की बात कहते झिझकती न थीं। देवयानी की बातें सुनकर कच ने कहा- "अकलंकिनी, एक तो तुम मेरे आचार्य की बेटी हो, सो मेरा धर्म है कि मैं तुम्हें पूज्य समझूं। दूसरे, मेरा शुक्राचार्य के पेट से पुनर्जन्म हुआ, इससे भी मैं तुम्हारा भाई बन गया हूँ। तुम मेरी बहन हो। अतः तुम्हारा अनुरोध न्यायोचित नहीं।" किन्तु देवयानी ने हठ नहीं छोड़ा। उसने कहा- "तुम तो बृहस्पति के बेटे हो, मेरे पिता के नहीं। तिस पर मैं शुरू से ही तुमसे प्रेम करती आई हूँ। उसी प्रेम और स्नेह से प्रेरित होकर, मैंने पिता से कहकर तुम्हें तीन बार जिलाया। मेरा विशुद्ध प्रेम तुम्हें स्वीकार करना ही होगा।" देवयानी ने बहुत अनुनय-विनय की, पर कच ने उसकी बात न मानी। तब मारे क्रोध के देवयानी की भौंहें चढ़ गईं। विशाल काली-काली आँखें लाल हो गईं। यह देखकर कच ने बड़े ही नम्र भाव से कहा- "शुक्र-कन्ये। तुम्हें मैं अपने गुरु से भी अधिक समझता हूँ। तुम मेरी पूज्य हो, नाराज न होओ! मुझ पर दया करो। मुझे अनुचित कार्य के लिये प्रेरित न करो। मैं तुम्हारे भाई के समान हूँ। मुझे ‘स्वस्ति' कहकर विदा करो। आचार्य शुक्रदेव की सेवा-टहल अच्छी तरह और नियमपूर्वक करती रहना। स्वस्ति!" यह कहकर कच वेग से इन्द्रलोक चला गया। शुक्राचार्य ने अपनी बेटी को समझा-बुझाकर शांत किया।

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मोक्ष पर्यवसायी धर्म, अर्थ और काम ======================= धर्मस्य ह्यापवर्गस्य नार्थाअर्थायोपकल्पते। नार्थस्य धर्मकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः।। कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभे जीवेत यावता। जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः।। धर्म अपवर्ग-मोक्ष साधक है, उसका प्रयोजन केवल अर्थ-धन नहीं है। धर्म साधक अर्थ का फल केवल काम-भोग भी नहीं है।। काम का फल भी इन्द्रिय लालन नहीं है, जीवन का फल भी तत्त्व-जिज्ञासा ही है, इस लोक में यज्ञासि कर्मों के द्वारा प्राप्त होने वाले स्वर्गादि फल ही जीवन की सार्थकता नहीं है।। इन श्लोकों में अपना सारा सिद्धान्त बता दिया। धर्म का मुख्य फल है अपवर्ग भगवत्पद प्राप्ति। बोले-अर्थ भी तो फल है। स्वर्ग मिले, नन्दनवन मिले, चिन्तामणि मिले, कामधेनु मिले, अनन्त-अनन्त भोगसामग्री मिले। इस तरह अर्थ भी तो फल है। अर्थ जो है, वह धर्म का प्रयोजन नहीं, धर्म का प्रयोजन शुद्ध अपवर्ग है। बोले- पर धर्म से तो अर्थ मिलता ही है फिर धन का क्या फल है? धन का परमफल धर्मानुष्ठान है। धन मिल गया, तब यज्ञ करो, व्रत करो, जप करो। परन्तु लोग क्या मानते हैं? लोग मानते हैं कि धर्म का परम फल है अर्थ, अर्थ का फल काम है, काम का फल इन्द्रिय तर्पण है। किसी ने पूछा- क्यों भाई! कर्म बहुत क्यों कर रहे हो? उत्तर दिया- भाई! कर्म न करेंगे तो खायेंगे क्या? पूछा - खाते क्यों हो? उत्तर दिया- खायेंगे नहीं तो कर्म कैसे करेंगे? कुर्वते कर्म भोगाय कर्म कर्तु च भुंजते। नद्यां कीटा इवावर्तादावर्तान्तरमश्नुते। ब्रजन्तो जन्मनो जन्म लभन्ते नैव निर्वृतिम्।। कर्म करते हैं भोग के लिए, भोग भोगते हैं कर्म करने के लिए। जैसे नदी में पड़ा हुआ क्रीड़ा एक भँवर से दूसरे भँवर में, दूसरे से तीसरे में पड़ते रहकर सुख नहीं पाता, वैसे जन्म से जन्मान्तर लाभ करते रहने के कारण प्राणी सुख प्राप्त नहीं करते ।। कर्म करते हैं भोग के लिए और भोग भोगते हैं कर्म के लिए।’ यह गौरख धन्धा कब मिटेगा? कर्म के लिए भोग करते हैं, भोग के लिए कर्म करते हैं तो इस अखण्ड धारा को कौन रोकेगा? इसलिए इससे विमुक्त होने के लिए यही आवश्यक है कि संसार से वैराग्य हो। इस दृष्टि से तो धर्म का परम फल है अपवर्ग। वेदान्त सिद्धान्त है- श्रीमद्भागवत सिद्धान्त है कि ‘भव बन्ध’ और ‘भव-मोक्ष’ यह स्ज्ञा अज्ञान से हुई है- अज्ञानसंज्ञौ भवबन्धमोक्षौ द्वौ नाम नान्यौ स्त ऋतज्ञभावात्। अजस्त्रचिन्त्यात्मनि केवले परे विचार्यमाणे तरणाविवाहनी।। अज्ञान के कारण भवबन्घ और मोक्ष की कल्पना है। वास्तव में अखण्ड सच्चिदानन्द परात्पर-परब्रह्म में न भव बन्धन नाम की कोई वस्तु है न मोक्ष नाम की कोई वस्तु। अध्यात्म रामायण के अनुसार - नाहो न रात्रिः सवितुर्यथा भवेत् प्रकाशरूपाण्यभिचारतः क्वचित्। ज्ञानं तथाअज्ञानसिंह द्वयं हरौ रामे कथं स्थास्यति शुद्धचिद्घने।। जिनकी संज्ञा अज्ञान से ही कल्पित है, वे संसार सम्बन्धी बन्धन और मोक्ष दोनों ही सत्य और ज्ञान स्वरूप परमात्मा से भिन्न नहीं हैं। जिस प्रकार सूर्य में दिन और रात्रि का अभाव है, वैसे ही विचार करने पर अखण्डचेतनस्वरूप अद्वितीय परमात्मा में बन्धन और मोक्ष नहीं है। राम में ज्ञान-अज्ञान दोनों की कल्पना नहीं हो सकती। प्रकाश रूप सूर्य में दिन-रात्रि जैसे संभव नहीं। इन सब दृष्टियों से निवारण परात्पर परब्रह्म ही अपवर्ग है। इसलिए अपवर्ग और भगवत्पद प्राप्ति दोनों एक ही हैं। इसलिए कर्मकाण्ड का परमफल अन्त में भगवत्पद प्राप्ति है। उसका गौणफल है अर्थ। अच्छा तो धन मिल गया तो उसका क्या फल? धन का मुख्य फल तो है धर्मानुष्ठान। धन मिला तो यज्ञ करो, दान करो, तप करो, परोपकार करो, समाज सेवा करो, राष्ट्र सेवा करो, गरीबों की सहायता पहँचाओ। यह सब धन का परम फल है। धन का गौण फल काम भी है। काम अर्थात विषय-भोग। यद्यपि लोग काम का परम फल इन्द्रिय तर्पण मानते हैं, परन्तु वैसा है नहीं है। तब क्या फल है? जीवन धारण करना। पानी पीते हैं किस लिए, इसलिए कि शरीर स्वस्थ रहे, भगवान का भजन हो। भोजन करते हैं किसलिए? इसलिए कि शरीर स्वस्थ रहे, भगवान का भजन करें। उद्देश्य की पवित्रता अत्यावश्य है , हम भोजन भी करें, पानी भी पीयें, कुछ भी करें, उद्देश्य है शरीर स्वस्थ रहे, भगवद् भजन करें, भगवान का ध्यान करें’ समाधि करें, भगवत्पद प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हों। इस ढंग से भोजन करना भी भजन है। पानी पीना भी भजन है। भोजन सामग्री उपार्जन करना भी भजन है। उद्देश्य हमारा भगवत्पद प्राप्ति हो। इस तरह काम का फल इन्द्रिय-तर्पण नहीं, बल्कि जीवन-यापक ही है। फिर जीवन का फल क्या है? लोग तो यही मानते हैं कि जीवन का फल आनन्द लेना-मौज लेना-मजा लेना ही है। जब तक जियो मजा लो। विविध प्रकार के कर्मों को करते रहें और कर्मजा सिद्धियों को ही भोगते रहो। बस, यही है जीवन-सम्पादन का फल। परन्तु ऐसा नहीं। जीवन का फल है तत्त्व जिज्ञासा। जीवन इसलिए कि तत्त्वजिज्ञासा करो। बड़े भाग्य हैं उसके जिसके हृदय में तत्त्व जिज्ञासा होती है। हर-एक को तत्त्व-जिज्ञासा नहीं होती। दुनियाँ की जिज्ञासा होती है। लोग कहते हैं- भाई! गधे के कितने रोएँ होते हैं? बताओ तो सही, गौ के कितने दाँत होते हैं? परन्तु ये निरर्थक जिज्ञासा हैं। करो मत्था-पच्ची। गिनो गधे के दाँत। पर ऐसी जिज्ञासा होनी चाहिए- संसार का मूल क्या है? संसार का परम कारण क्या है? यहा संसार दृश्य क्यों है? दृश्य है तो किसके लिए है? शय्या प्रासादादि शय्या-प्रासादादि के लिए तो नहीं होते। संघात अपने से विलक्षण किसी चेतन के लिए होता है। शय्या शय्या के लिए नहीं, प्रासाद प्रासाद के लिए नहीं। शरीर शरीर के लिए नहीं, इन्द्रियाँ इन्द्रियों के लिए नहीं, प्रासाद प्रासाद के लिए नहीं। सारा संघात परार्थ है। शय्या किसी सोने वाले असंघात चेतन के लिए है, प्रासाद किसी असंघात चेतन के लिए है। ऐसे ही संहत यह देहेन्द्रिय-मन-बुद्धि-अहंकार किसी असंहत निर्विकार अनिर्देश्य अखण्ड बोध आत्मा के लिए है। इन सब बातों को समझना चाहिए। अनर्गल इच्छाएँ तो पैदा होती ही रहती हैं। इच्छा बडे़ भाग्य से होती है।माता पार्वती को जैसे इच्छा हुई, वैसी तो सचमुच में बडे़ भाग्य से होती है- जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।। जन्म-जन्मान्तर कुमारी रहूँगी-तो-रहूँगी, पर शादी करूँगी तो भूतभावन शंकर से ही। सप्तर्षि गये विघ्न मचाने, परीक्षा लेने। शिव जी ने ही भेजा-‘जाकर परीक्षा तो लो। सप्तर्षियों ने कहा-‘‘तुम बड़ी पागल हो। आखिर तो पत्थर की लड़की हो। तुम्हें शंकर मिल भी जाएगें तो क्या होगा? वे तो बस-बस कुछ मत पूछो, मुण्डमाला पहिने होंगे। चिता का भस्म गाए हुए होंगे। साँपों का यज्ञोपवीत होगा। तुम्हारा उनसे विवाह हो भी जायगा तो क्या करोगी? चलो हम तुम्हारी शादी श्रीमन्नारायण परात्पर परब्रह्म विष्णु से करा दें। उनका दामिनी-द्युति-विनिन्दक पीताम्बर देखकर निहाल हो जाओगी। वह दिव्य मकराकृति कुण्डल, वह मंगलमय अंग की आभा-प्रभा कान्ति। अरे, क्या कहना है! गिरिजे! आओ तुम्हारी शादी विष्णु से करा दें।’’ सप्तर्षियों की यह बात सुनकर पार्वती शास्त्रार्थ में नहीं पड़ी। उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि नहीं-नहीं शिव जी अच्छे हैं, विष्णु खराब हैं। इस झंझट में नहीं पड़ी। बोली- महादेव अवगुन भवन विष्णु सकल गुण धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।। ’’आप यही कहना चाहते हो कि महादेव में बहुत दोष हैं। माने लेती हूँ, महाराज! महादेव अवगुण के भवन हैं और विष्णु बडे़ अच्छे हैं, यही कहना चाहते हो, मान्य है, मान्य है। माना कि विष्णु सकल गुणधाम हैं। विष्णु भगवान् अनन्त-अनन्त कल्याण गुण-गणों के धाम हैं। जितना आप कहते हो, उससे भी अनन्त गुणित अधिक गुणधाम विष्णु हैं। महादेव अवगुण के धाम हैं। बस, यही तो। पर क्या करें’’ ‘जाकर मन रम जाइ जहँ.......’ सारा शास्त्रार्थ खत्म हो गया। अगर झंझट में पड़ती तो यह शास्त्रार्थ करो, वह शास्त्रार्थ करो। वह खण्डन हुआ। यह मण्डन हुआ। दुनिया भर का प्रपंच खड़ा होता। यह अडिंग प्रीति है। इसी को लेकर गोस्वामी जी ने कहा- ‘जेहि कर मन..............’ कोई सन्देह ही नहीं, जिसको जिस पर स्नेह है वह अवश्य मिलेगा। कोई शक्ति नहीं जो दुनियाँ में रोक सके। यही बात गोपांगना जनों में है। गोपांगना भी कहती है- असुन्दरः सुन्दरशेखरी वा गुणैविहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेषी मयि स्वात् करुणाम्बुधिर्वा कृष्णः स एवाद्य गतिर्ममायम्।। यह शर्त नहीं कि मेरे श्यामसुन्दर बड़े सुन्दर न हों, चाहे सुन्दर शेखर हों, चाहे सर्व गुणों से रहित हों, चाहे अनन्त-अनन्त कल्याण गुण गणों के धाम हों।यह भी शर्त नहीं कि वे हमसे प्यार करें। हमसे द्वेष करते हों चाहे हम पर बहुत अकारणकरुण करुणावरुणालय हों, वे श्री श्यामसुन्दर ही तो अब मेरे सदा सर्वदा के लिए सर्वस्त्र है, प्राणधन हैं। मां धवो यदि निहन्ति हन्यतां, बान्धवो यदि जहाति हीयताम्। साधवो यदि हसन्ति हस्यतां माधवः स्वयंमुरीकृतो मया।।[ मेरे पति यदि मुझे मारते हों तो भले ही मारें। मेरे भाई-बान्धव यदि छोड़ते हों तो सहर्ष छोड़ दें। साधु गण भी यदि हँसी उड़ाते रहें। क्योंकि मैंने तो श्रीकृष्ण को विचार पूर्वक स्वयं ही अंगीकार किया है। (‘माधवो’ पाठ मानकर--)‘‘मेरे प्राणनाथ मेरे प्रियतम श्याम सुन्दर ब्रजेन्द्र नन्दन मदन मोहन माधव अगर हमारा बध करना चाहते हों तो भले करें, उनकी मर्जी। हमने तो उनको अपना सर्वस्व आत्मा निवेदन कर दिया। हमारे बन्धु-बान्धव यदि हमारा परित्याग कर देते हों तो भले ही करें। साधु-सन्त हँसते हों तो भले हँसें, खूब हँसें, पर मैंने तो माधव को अंगीकार कर लिया। डंका बजाकर अपने मदन-मोहन प्रियतम को, अपने प्राणधन को अंगीकार कर लिया।’’ यहाँ भी कोई शर्त नहीं। शुद्ध प्रीति इसी ढंग की होती है। ब्राह्मण लोग यज्ञ करके, तप करके, दान करके, जप करके, ब्रत करके इसी परात्पर परब्रह्म विषयिणी विविदिषा का लाभ करते हैं। भगवत्तत्त्ववेदन की उत्कट उत्कण्ठा उत्पन्न हो जाय, इसी के लिए पूर्ण यज्ञ, पूर्णतप, पूर्णदान, पूर्णव्रत है। क्यों कि और इच्छाएँ हो सकती हैं, भगवत्तत्त्ववेदन की उत्कट उत्कण्ठा बडे़ भाग्य से उत्पन्न होती है। साक्षात्कार की कहानी अलग है। श्रवण, मनन, निदिध्यासन की कहानी अलग है। ख़ाली विविदिषा भी दुर्लभ हैं। बुभुक्षा सबको हो जायगी, पर मुमुक्षा कहाँ? किसी के सिर में आग लगी, कोई बोला- ‘देखो इस रास्ते से चले जाओ सरोवर मिलेगा, उसमें गोता लगाओ।’ चला सरोवर में गोता लगाने। सिर में, दाढ़ी-मूँछ में आग लगी थी, उधर बीच में ‘टी-पार्टी’ हो रही थी, नर्तकी नृत्य कर रही थी। मित्रों ने कहा- ‘भाई दो मिनट टी-पार्टी में शामिल हो लो। नृत्य देख लो।’ भला बताओ? जिसके सिर में आग लगी हुई है, वह सिनेमा देखेगा या टी-पार्टी में बैठेगा या किसी से इधर-उधर आँख मिलाएगा? कुछ नहीं। ऐसे ही जिसको बुभुक्षा के तुल्य, पिपासा के तुल्य विविदिषा हो जाय तो ‘को न मुच्येत बन्धनात्’ दुनियाँ में कौन प्राणी है जो बन्धन से मुक्त न हो जाय। अवश्य ही बन्धन से विमुक्त हो जायगा। ऐसी इच्छाओं के लिए यज्ञ, दान, तप करना पड़ता है। भगवत्कृपा से भगवत्प्रेप्सा- भगवत्प्राप्ति की उत्कट उत्कण्ठा उदित होती है। विषय तृष्णा तो पिशाची है, पर भगवत्तृष्णा दिव्य है। भगवान के मधुर मनोहर मंगलमय मुखचन्द्र के दर्शन की इच्छा, भगवान के पादारविंद की नखमणिचंद्रिका के दर्शन की ईच्छ, दामिनीद्युतिविनिंदक पीताम्बर के दर्शन की उत्कण्ठा दिव्य है। यह जन्म जन्मान्तरों के पुण्य-पुंजों से मिलती है। यह पुण्य-पुंज का फल है। कृष्णभावरसभाविता मतिः क्रीयतां यदि कुतोअपि लभ्यते। तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं कोटिजन्मसुकृतैनु लभ्यते।। अर्थात् ‘कृष्णभाव रस भाविता मति’ कहीं से खरीदने से मिलती हो तो खरीदो। बोले- मिलेगी कैसे? उसके लिए व्याकुलता होना, यही उसकी कीमत है। जैसे बुभक्षु भोजन के लिए और जैसे पिपासु पानी के लिए व्याकुल हो उठता है, ऐसे ही भक्त प्राणनाथ-प्रियतम मे मुखचन्द्र का दर्शन करने के लिये व्याकुल रहता है। यह कैसे मिलता है? कोटि-कोटि जन्मों के सुकृत से ही मिलता है, बिना उसके नहीं। जन्म-जन्मान्तर का कल्प-कल्पान्तर का पुण्य-पुन्य समुदित हो तब ऐसी उत्कण्ठा होती है। भगवत्पादपंकजसमर्पण-बुद्धि से अनुष्ठित कर्मों के द्वारा ही पुण्य-पुंज हो पाता है। इस तरह ऐसी उत्कृष्ट विवदिषा-तत्त्व जिज्ञासा उत्पन्न हो, यही कर्मो का फल है।

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. परम धर्म------------------- श्रीमद्भागवत अद्भुत है। इसमें परम तत्त्व का निरूपण है। वह भी केवल शुष्क परम तत्त्व नहीं, उस परम तत्त्व का जो निर्गुण-निराकार-निर्विकार होते हुए भी सगुण-साकार-सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। उसकी जो मंगलमयी लीलाएँ हैं, उन्हीं का इसमें वर्णन है। श्रीहरि की अनन्त लीलाएँ है। लीलामृत के आस्वादन में भावुक भक्त रमे रहते हैं। इसमें श्यामसुन्दर मदनमोहन का अर्थात श्याम तेज का वर्णन है।वह भी गौर तेज संवलित श्याम तेज का और श्याम तेज संवलित गौर तेज का वर्णन है। इस संवलित सम्मिलित तेज की आराधना-उपासना बिना किए परम विश्राम नहीं मिलता। इन सब बातों को कहने-सुनने के लिए सूत जी ने उपक्रम (आरम्भ) किया। पहले वन्दना की- नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्।। श्री नारायण ऋषि को, मनुष्यों में श्रेष्ठ नर-ऋषि को, सरस्वती देवी और व्यास जी को नमस्कार कर फिर जय (भागवत) ग्रन्थ का पाठ करो। सूत जी ने कहा- भाई! जो आपने प्रश्न किया, वह तो बहुत अच्छा किया। आपका प्रश्न ऐसा है, जिससे अन्तरात्मा प्रसन्न शुद्ध हो जाता है- मुनयः साधु पृष्टोअहं भवद्भिर्लोकमगंलम्। यत्कृतः कृष्णसम्प्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति।। हे मुनिगण! आपने मुझसे बहुत अच्छी और संसार के लिए मंगलमयी बात पूछी है, क्यों कि आपने यह श्रीकृष्ण विषयक प्रश्न किया है, जिससे कि अन्तःकरण पवित्र एवं आनन्दित होता है। मुनियो! परमधर्म क्या है? प्राणियों का परमधर्म सर्वोत्कृष्ट-धर्म वह है, जिससे भगवान् परात्पर परब्रह्म में प्रीति हो, भक्ति हो- स वै पंसां परो धर्मां यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुक्यप्रतिहता ययाअअत्मा सम्प्रसीदति।। पुरुषों का सबसे उत्तम धर्म वही है जिससे श्रीहरि में निष्काम और अव्यभिचारिणी भक्ति हो जिससे कि चित्त प्रसन्न होता है। ‘अधः कृतानि अक्षजानि ज्ञानानि यस्मात्’ अक्षज-ज्ञान जिससे बहुत निकृष्ट रह जाता है, वही भगवान् हैं। माने अक्षज-ज्ञान का जो अविषय-निर्विकार, सर्वद्रष्टा, सर्वसाक्षी, निर्दृश्य दृक् परात्पर परब्रह्म परमात्मा, वही भगवान् हैं। उनमें भक्ति ही परम धर्म (सबसे बड़ा धर्म) है। भक्ति कैसी हो? अहैतु की अर्थात् हेतु रहित भक्ति। एक आचार्य ने कहा- अहैतुकी का ऐसा अर्थ करोगे तो ‘यतो भक्तिरधोक्षजे’ यहाँ पंचमी नहीं बनेगी। ‘यतः’ पंचमी तो कारण अर्थ में ही है। ‘जिससे भगवान् में भक्ति हो’ कारण तो स्पष्ट ही है। अगर भक्ति का कारण ही नहीं है, अहैतुकी है तो ‘यतो भक्तिः’ बात कैसे बनेगी? इसलिए अहैतुकी का अर्थ----- ‘हेतुः फलानुसन्धान न विद्यते यस्यां सा अहैतुकी’ फलानुसन्धान जिसमें न हो ऐसी भक्ति का नाम अहैतुकी भक्ति है। तो वह अहैतुकी भक्ति कैसी है? जो परम धर्म से होती है। क्या परम धर्म है? श्रीधर स्वामी के मतानुसार वर्णाश्रमानुसारी श्रौत-रमार्त धर्म-कर्म का अनुष्ठान। यज्ञ करना, दान करना, तप करना, व्रत करना, श्राद्ध करना, तर्पण करना, वर्णाश्रमानुसारी श्रौत-स्मार्त्त धर्म-कर्म का अनुष्ठान करना परम धर्म है। वह भी भगवच्चरण-पंकज-समर्पणबुद्ध्या स्वतन्त्र नहीं। जैसे संखिया जहर है, मारक है, लेकिन मारक संखिया भी मल्ल चन्द्रोदय बनकर अपरिगणित रोगों का निवारक बन जाता है। ऐसे ही यद्यपि कर्म निर्बन्धक है, विद्या मोक्षदा है। परन्तु भगवत्पाद पंकज में समर्पित कर्म विमोक्षक होता है। माने भगवत्पादपंकज समर्पण बुद्धि से उसा स्वधर्मानुष्ठान का परिणाम यह होता है कि बुद्धि पवित्र हो जाती है- कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते। तत्मात् कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः।। प्राणी कर्म से बंधता है और विद्या से विमुक्त हो जाता है। जबकि बात ऐसी है, इसलिए जो पारदर्शी यति हैं वे कर्म करते ही नहीं।। नैष्कम्र्यमप्यच्युतभाववर्ति न शोभते ज्ञानमलं निरंजनम्। कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे, न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्।। कैवल्य मोक्ष का कारण रूप उपाधि रहित ज्ञान भी भगवद् भक्ति के बिना सुशोभित नहीं होता, फिर जो कि सदा ही अमंगल रूप है और सत्त्वशुद्धि का कारण नहीं है, वह ईश्वरार्पण बुद्धि से रहित कर्म कैसे सुशोभित हो सकता है? धर्मः स्वनुष्ठितः पुसां विष्वक्सेनकथासु यः। नोत्पादयेद्यति रति श्रम एव हि केवलम्।। मनुष्यों का भली प्रकार अनुष्ठान किया हुआ भी धर्म यदि श्रीविष्वक्सेन नारायण की कथा में प्रेम उत्पन्न न करे तो वह केवल श्रम मात्र ही है। निष्काम कर्म भी करो, अगर भगवान में अर्पण न करो तो श्रम-ही-श्रम है। उसका कुछ फल नहीं। इसलिए भगवत्पादपंकज समर्पणबुद्धि से स्वधर्म का अनुष्ठान करने का परिणाम यह होता है कि बुद्धि पवित्र हो जाती है। जैसा कि भगवान गीताकार श्रीकृष्ण परमात्मा कहते हैं- यज्ञदान तपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।। यज्ञ, दान और तप ये तीन प्रकार के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं बल्कि ये करने योग्य ही है। फल की कामना से रहित ये तीनों पवित्र करने वाले हैं। एतान्यपि तु कर्माणि संग त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्।। इन सब कर्मो को संग त्याग करके, फल त्याग करके भगवत्पादपंकज , स्मर्पण बुद्धि से अनुष्ठान करो। यह मेरा निश्चित उत्तम मत है। यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः।। जिस अन्तर्यामो ईश्वर से समस्त भूतों की प्रवृत्ति-उत्पत्ति या चेष्टा होती है एवं जिस परमात्मा से यह समस्त जगत व्याप्त है, उसका प्रत्येक वर्णाश्रमी मनुष्य अपने-अपने कर्मों से यजन करके ज्ञान निष्ठा की योग्यता रूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है। स्वधर्म का अनुष्ठान करो। यज्ञ, दान, तप, जप, ब्रत, श्राद्ध, तर्पण सब करो परन्तु भगवत्पादपंक समर्पण बुद्धि से, भगवत्पदप्राप्ति की भावना से। गोस्वामी जी कहते हैं- तरपन होम करहिं विधि नाना। विप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।। तर्पण करो, यज्ञ करो, होम करो, दान करो, ब्राह्मणों को भोजन कराओ। पर भगवच्चरणारविन्द में रति ही सबका फल चाहो, कुछ और नहीं। जो यज्ञ करते हैं, तप करते हैं, देवी-देवता का पूजन करते हैं, सबका फल भगवान के चरणों में प्रीति ही चाहते हैं, बस और कुछ नहीं, उनके हृदय में भगवान निर्वास करते हैं- सबु करि मागहिं एक फलु रामचरन रति होउ। तिन्हके मन मन्दिर बसहु सियरघुनन्दन दोउ।। इसी दृष्टि से ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ कहा। इसलिए कर्म हो निष्काम ‘यतो भक्तिरधोक्षजे’। दूसरे आचार्य कहते हैं- एतावानेव लोकेअस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः।। इस लोक में भगवान के नामोच्चारणादि के सहित किया हुआ भक्तियोग ही मनुष्य का सबसे प्रधान धर्म माना गया है। श्रवण कीर्तन विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।। भगवान विष्णु का श्रवण, कीर्तन, स्मरण पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन करना- यह उनकी नवधा भक्ति है।। इस मत में भगवन्नाम कीर्तनादि ही परम धर्म है। यही सर्वोत्कृष्ट धर्म है, निष्काम श्रौत-स्मार्त्त धर्म नहीं। यह सब अवान्तर लीला है। सब आचार्यों ने भिन्न-भिन्न ढंग से रस का अनुभव किया है। इसमें राग-द्वेष की बात नहीं है। सब आचार्य अपने-अपने ढंग से उसी तत्त्व में पर्यवसित होते हैं। पहले पक्ष वाले कहते हैं- ‘अहैतुकी’ का अर्थ क्या है? दूसरे पक्ष वाले कहते हैं- अहैतुकी का अर्थ है हेतु-रहित। पहले वाले कहते हैं- ‘यतः पंचमी कैसे? दूसरे कहते हैं- पंचमी ऐसी है कि जैसे ‘आमाम्र पक्वाम्र’ का हेतु है। वैसे ही भक्ति ही भक्ति का हेतु होती है। क्योंकि भक्ति क्या है? आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगोअय भजनक्रिया। ततोअनर्थनिवृत्तिः स्यात्ततो निष्ठा रुचिस्ततः।। अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदंचति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत्क्रमः।। धन्यस्यायं नवः प्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि। अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठु सुदुर्गमा।। पहले श्रद्धा हो। श्रद्धा क्या है? भक्ति का ही एक रूप है। इसी तरह साधु संग, भजन क्रिया- ये सबके सब भक्ति के ही रूप हैं। किन्तु इतना ही कहना है कि अपक्व भक्ति से ही परिपक्व भक्ति बनती है। इसलिए उससे अतिरिक्त हेतु कोई दूसरा नहीं है। अतः ‘न हेतुः कारणं विद्यते यस्यां सा अहैतुकी’ ऐसा कहना उचित ही है। अहैतुकी है भक्ति और अप्रतिहता है, जो किसी भी प्रकार से प्रतिहत नहीं होती और अव्यवहिता (व्यवधान शून्य) होती है। जिसके बीच में क्षणभर का व्यवधान हो, अखण्ड रूप से भगवत्-परायणता, भगवन्निष्ठा हो। इस तरह ‘स वै पुंसां परो धर्मः’। भक्ति से अन्तरात्मा प्रसन्न होता है। अन्तरात्मा माने अन्तःकरण। अन्तःकरण की प्रसन्नता तो रज, तम के राहित्य से संभव है। रज कम हो जाय, तम कम हो जाय, तम कम हो जाय, सत्त्व का प्राधान्य हो जाय तथी अन्तःकरण की प्रसन्नता संभव है। सत्त्व का प्राधान्य होगा तो प्रकाश होगा, वैराग्य होगा, विवेक होगा। वैराग्यावैराग्य, ऐश्वर्यानेश्वर्य, ज्ञानाज्ञान और धर्माधर्म ये सब अन्तःकरण के धर्म हैं। अन्तःकरण तामस राजस होता है अवैराग्य, अधर्म, और अनैश्वर्य का प्राधान्य होता है। जब सत्य का विकास होता है तो ऐश्वर्य का प्राधान्य होता है, ज्ञान, वैराग्य, धर्म का प्राधान्य होता है। तभी मन प्रसन्न अर्थात निर्मल हो जाता है, निष्कलंक हो जाता है। रजस्तमोलेशाननुविद्ध हो जाता है। तभी भगवत्तत्त्व समझ में आता है। जिसका अन्तरात्मा पवित्र नहीं है, उसे तो तत्त्वोपदेश सुनने पर भी भगवत्तत्त्व समझ में नहीं आता। जिसका अन्तरात्मा पवित्र है, उसी को भगवत्तत्त्व ठीक-ठीक समझ में आता है। जिसका मन अत्यन्त मलिन है, उसे तो भगवान की कथा सुनने में रुचि ही नहीं होती। अत्यन्त पापी को तो कथा-श्रवण का सुयोग भी नहीं प्राप्त होता। अतः कथा-श्रवण में प्रीति और प्रवृत्ति तदर्थ सात्त्विक आहार-विहार और सात्त्विक ही समस्त व्यवहार का सेवन परमावश्यक है- तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः। श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा।। यदनुध्यासिना युक्ताः कर्मग्रन्थिनिबन्धनम्। छिन्दन्ति कोविदास्तस्य को न कुर्यात् कथारतिम्।। शुश्रूषोः श्रद्दधानस्य वासुदेवकथारुचिः। स्यान्महत्सेवया विप्राः पुण्यतीर्थ निषेवणात्।। श्रृण्वतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः। ह्यद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत् सताम्।। नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवत सेवया। भगवत्युत्तमश्लोक भक्तिर्भवति नैष्ठिकी।। तदा रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्च ये। चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति।। एवं प्रसन्नमनसो भगवद्भक्तियोगतः। भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसगंस्य जायते।। अतः सर्वदा एकाग्र चित्त से सात्त्वतों के स्वामी भगवान श्रीहरि का ही श्रवण, कीर्तन, ध्यान और पूजन करना चाहिए। जिनके निरन्तर ध्यान रूप खड्ग से युक्त विवेकीजन कर्म ग्रन्थि के बन्धन को काट डालते हैं, उन भगवान की कथा में कौन प्रेम न करेगा? हे विप्रगण! सुनने की इच्छा वाले श्रृद्धालु पुरुष को महापुरुषों की सेवा करने और पुण्यतीर्थ में रहने से भगवान वासुदेव की कथा में रुचि हो जाती है। जिनका श्रवण, कीर्तन, अत्यन्त पवित्र है, वे साधुजनों के सुहृद् भगवान कृष्ण अपनी कथा सुनने वालों के हृदय में विराजमान हुए उनकी अशुभ वासनाओं को नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार भागवत का निरन्तर सेवन करने से असुभ वासनाओं के प्रायः नष्ट हो जाने पर भगवान् उत्तमश्लोक में निश्चल प्रेम-भक्ति उत्पन्न होती है। उस समय-लोभादि जो राजसतामस भाव हैं, उनसे रहित होकर सत्त्वगुण में स्थित हुआ चित्त प्रसन्न और निर्मल हो जाता है। इस प्रकार भगवान के भक्तियोग से प्रसन्नचित्त हुए आसक्ति रहित साधक को भगवत्तत्त्व का ज्ञान प्राप्त होता है। मुनियो! आप लोग तो आप्तकाल पूर्णकाम हैं। इसलिए लोकमंगल के लिए आपका यह प्रश्न है। सर्वोत्कृष्ट धर्म यही है जिससे भगवान में भक्ति उत्पन्न हो। वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः। जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम्।। भगवान वासुदेव में प्रयुक्त किया हुआ भक्तियोग तुरन्त ही संसार से वैराग्य करता है और शुष्क-तर्कादि से रहित विशुद्ध ज्ञान उत्पन्न करता है। भगवान सर्वान्तरात्मा वासुदेव हैं। ‘वसन्ति सर्वाणि भूतानि यस्मिन् स वासुः द्योतनात्मकः स्वप्रकाशः देवः। वासुश्चासौ देवश्च वासुदेवः।’ सम्पूर्ण प्रपंच जिसमें निवास करता है और जो सबमें निवास करता है, घट-घट वासी सर्वान्तरात्मा, सर्वद्रष्टा, सर्वसाक्षी वह स्वप्रकाशात्मक देव वासुदेव हैं। उन भगवान वासुदेव में भक्तियोग प्रयोजित हो करके शीघ्र ही वैराग्य पैदा करता है। संसार से वैराग्य बहुत जरूरी है। वैराग्य बिना हुए ब्रह्मात्म-तत्त्व का अनुभव नहीं होता! ‘ज्ञानं च यदहैतुकम्’ जो अहैतुक ज्ञान है। हेतु माने तर्क- हेतुस्तर्कः’ जिसमें तर्क का सन्तिवेश नहीं। जो अतर्क है, श्रौत है, श्रुतिगम्य है। श्रुति से- वेदशास्त्र से जिस परात्पर परब्रह्म का अपरोक्ष साक्षात्कार होता है। ऐसा ज्ञान शुद्ध मन में होता है। धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां’ धर्म का शुद्ध रूप से अनुष्ठान करो। वर्णाश्रमानुसारी श्रौत-स्मार्त्त धर्म का सांगोपांग ठीक-ठाक अनुष्ठान करो। द्रव्य भी शुद्ध हो, कर्ता भी शुद्ध हों और ऋत्विज आदि भी शुद्ध हों। देश-काल भी बड़ा पवित्र हो। सांगोपांग समग्र श्रौत स्मार्त्त धर्म का भी अनुष्ठान करो। अगर उसके द्वारा भगवान की मंगलमयी कथा में रति (प्रीति) रुचि नहीं बनी तो श्रम ही है वह। ‘श्रम एव हि केवलम्’ एव कहने के बाद भी केवल कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसा धर्मानुष्ठान बिल्कुल निरर्थक होता है। अगर श्रौत-स्मार्त्त धर्मां का अनुष्ठान करने से भी भगवान के चरणों में प्रीति न हो तो वह बिल्कुल निरर्थक ही है। अतः अत्यावश्यक है कि कथा में रुचि हो। तथी कर्म-त्याग की बात भी सध सकती है। ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्मक्तो वानपेक्षकः। सलिंगानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचरः।। जो ज्ञाननिष्ठ हो विरक्त हो अथवा किसी की वस्तु की अपेक्षा न करने वाला मेरा भक्त हो, वह आश्रमादि को उनके लिंगों (चिह्नों) के सहित त्याग कर वेद-शास्त्र के विधि-निषेध रूप बन्धन से मुक्त हो कर स्वच्छन्द विचरे। ज्ञानी हो, विरक्त हो, संसार तुच्छ प्रतीत होता हो। लौकिक, पारलौकिक दृष्ट और आनुश्रविक सब प्रकार के जो विषय हैं, उनसे वितृष्णता हो। किसी भी विषय में तृष्णा न हो। इन्द्रलोक, कल्पवृक्ष, कामधेनु, नन्दनवन, चिन्तामणि, रम्भा-उर्वशी आदि दिव्यांगनाएँ सबसे जो विरक्त हो। रमा विलासु रामअनुरागी। तजत वमन जिमि नर बड़भागी।। अनन्त-अनन्त ऐश्वर्य हो, दिव्य विमान हो, दिव्य नन्दन वन हो, कल्पवृक्ष हो, चिन्तामणि हो, कामधेनु हो, अनन्त-अनन्त सुख-भोग-सामग्री हो उनकी ओर ऐसी दृष्टि हो जैसे वमन। मधुर, मनोहर पक्वान्न खाकर वमन हो गया हो उसे देखने की बुद्धि नहीं होती। ठीक इसी प्रकार संसार को देखने की जिसकी बुद्धि नहीं होती वह वैराग्य सम्पन्न है। दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।। देखे और सुने हुए विषयों में सर्वथा तृष्णा रहित चित्त की जो वशीकार नामक अवस्था है वह वैराग्य है।। पर वैराग्य तो इससे भी ऊँचा है- तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्। पुरुष के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाना है, वह वैराग्य है। प्रकृति-पुरुष के विवेक से पर वैराग्य होता है। अर्थात अनन्त अखण्ड निर्विकार परात्पर परब्रह्म का अपरोक्ष-साक्षात्कार करने से गुणों में वितृष्णता हो जाती है। साधक कम-से-कम शान्ति तो चाहते हैं। विषयों का त्याग इसलिए करते हैं कि शान्ति मिले। विषय से अशान्ति मिलती है। इसी तरह दान्ति, उपरति चाहते हैं। पुरुष साक्षात्कार चाहते हैं। परन्तु ऊँचे-ऊँचे सात्त्विक परिणाम की भी अपेक्षा न रह जाय, यह अत्यावश्यक है। प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव। न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काड़्क्षति।। हे पाण्डव! गुणातीत सत्त्वगुण के कार्य प्रकाश एवं रजोगुण के कार्य प्रवृत्ति और तमोगुण के कार्य मोह उपलब्ध होने पर न द्वेष करता है और न उनकी निवृत्ति होने पर उनको चाहता है।। उत्कृष्ट-से-उत्कृष्ट सात्त्विक प्रवृत्ति निवृत्त हो जाय तो उसमें व्याकुल नहीं। राजसी प्रवृत्तियों के प्रवृत्त हो जाने पर भी उससे खिन्नता नहीं। इस प्रकार की वितृष्णता बहुत ऊँची चीज है! विशुद्ध अन्तःकरण में ये सब बातें बनती हैं। इस तरह भगवद्भक्त को अनपेक्ष होना आवश्यक है। अपेक्षा होने से ही कथा में बाधा पड़ती है। कथा में बैठे हैं। याद आ रही है जूते की, जूता तो कोई नहीं उठा ले जायेगा। या दुकान याद आ रही है, भिन्न-भिन्न प्रपंच याद आ रहा है। ऐसे व्यक्ति कथा श्रवण के शुद्ध अधिकारी नहीं। कथा श्रवण के शुद्ध अधिकारी तो वे ही हैं जो अनपेक्ष हों। तावत् कर्माणि कुर्वीत न विविद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न यायते ।। तभी तक कर्म करना चाहिए, जब तक कर्ममय जगत और उससे प्राप्त होने वाले स्वार्गादि सुखों से वैराग्य न हो जाय अथवा जब तक मेरी लीला-कथा के श्रवण कीर्तन में श्रद्धा न हो जाय।। तब तक कर्म काण्ड करना चाहिए- यज्ञ, तप, दान करना चाहिए, जब तक पूरा वैराग्य न हो जाय। अथवा भगवान के मंगलमय कथा- सुधा के पान में श्रद्धा जब तक न हो, कर्म करते रहना चाहिए। एतावता कर्म की सीमा है। भगवत्कथा में अखण्ड श्रद्धा अथवा सम्पूर्ण संसार से पूर्ण वैराग्य। इस तरह ज्ञान मार्ग के लिए परम वैराग्य और भक्ति के लिए भगवत्कथा में अखण्ड श्रद्धा। इसके बिना तो ‘श्रम एव हि केवलम्।

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