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Mysuvichar May 31, 2018

प्रवचन

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.32 : ईश्वर-भक्ति की विशेषता* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 32)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर॥* प्यारी धर्मानुरागिनी जनता ! मैं आज क्या कहूँगा, कल्ह ही विदित कर दिया हूँ। आज का वर्णन है - ईश्वर की भक्ति कैसे की जाएगी? किंतु आपको याद दिलाने के लिए कह दूँ कि इसकी आवश्यकता क्या है। लोग कहते हैं, ईश्वर-भक्ति का प्रचार तो होता ही है, फिर इसका क्या काम? तो ठीक ही है, सब कोई प्रचार करें; किंतु कुछ इस सत्संग को भी थोड़ा मौका मिले कहने-सुनने के लिए। *देखिए मन कैसा है, किधर जाता है? विशेष करके विषय की ओर ही दौड़ता है।* सत्संग करते-करते भी मन भाग जाता है। यदि कहिए कि भक्ति-प्रचार का क्या काम है, तो - *राकापति षोडस उअहिं, तारागन समुदाय। सकल गिरिन्ह दव लाइये, बिनु रवि राति न जाय।। ऐसेहि बिनु हरि भजन खगेसा। मिटहिं न जीवन केर कलेसा।।* इसके लिए भक्ति का प्रचार है। अपने हृदय से पूछिए कि कुछ तकलीफ, दु:ख भी है? प्रति घंटे अपने क्लेश का वर्णन करता है। काम-क्रोधादिक विकार आने पर कैसे करते हैं? विचारिए - *काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।* काम-रूप वात है, लोभ-रूप अपार कफ है और क्रोध-रूप पित्त है, जो सदा हृदय जलाता है। *प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्निपात दुखदाई।।* हे भाई! जब ये तीनों प्रीति करते हैं, तब दुःखदायी सन्निपात (त्रिदोष ज्वर) उत्पन्न होता है। *एक व्याधि बस नर मरहिं, ये असाधि बहु व्याधि। पीड़हिं संतत जीव कहँ, सो किमि लहइ समाधि।।* मनुष्य तो एक ही रोग के वश होकर मर जाते हैं; परंतु ये बहुत से असाध्य रोग हैं, जो जीव को सदा दु:ख दिया करते हैं - इस दशा में वह (जीव) कैसे सुख पा सकता है? बहुत दु:ख है इस संसार में, तो करना क्या है? *ईश्वर-भजन करके ही इन दु:खों से छूट सकते हैं।* सूर्योदय होने से ही अंधकार दूर होता है, उसी प्रकार *ईश्वर-भक्ति से ही क्लेश दूर होगा।* इसी उद्देश्य से ईश्वर-भक्ति का प्रचार करते हैं। *संतो भक्ति सतोगुर आनी। नारी एक पुरुष दुई जाया, बूझो पंडित ज्ञानी।। पाहन फोरि गंग इक निकसी, चहुँ दिसि पानी पानी। तेहि पानी दोउ पर्वत बुड़े, दरिया लहर समानी।। उड़ि माखी तरुवर कै लागै, बोलै एकै बानी। वह माखी को माखा नाहीं, गर्भ रहा बिनु पानी।। नारी सकल पुरुष लै खाये, तातैं रहै अकेला। कहहिं कबीर जो अबकी समझौ, सोइ गुरू हम चेला।। - संत कबीर साहब* जिन्होंने भारती भाषा में प्रवाह रूप से कहने का आरंभ किया, वे संत कबीर साहब थे। उनके बाद और सब कहे। इसलिए मैं उन्हें सुमेरु रूप में रखता हूँ। ये विशेष थे और नानक, तुलसी कम थे, इसलिए नहीं बल्कि इसलिए कि ईश्वर की मौज से पहले संत कबीर साहब आए थे, पीछे ये लोग। इसलिए इनकी दूसरी ही भक्ति है, जो प्रचलित रूप से जानते हैं, वह नहीं। एक स्त्री ने दो पुरुष उत्पन्न किया, उसको पंडित-ज्ञानी बुझिये। नारी प्रकृति को कहते हैं। प्रकृति के बिना कोई जीव पुरुष और ब्रह्म पुरुष नहीं बोल सकते। ब्रह्म और जीव दोनों थे ही, किंतु प्रकृति के पहले जीवत्व और ब्रह्मत्व दशा नहीं हो सकती। व्यापक व्याप्य भेद के बिना ब्रह्म कौन कहे और कैसे कहे? *प्रकृति से शरीर, इन्द्रिय, अंत:करण बने।* शरीर, इन्द्रिय, अंत:करण के बिना जीव कैसे कहा जाय? इसलिए ‘नारी एक पुरुष दुई जाया, बूझो पंडित ज्ञानी।' यह जड़ता पाहन है। यह जीव यदि परमात्मा से मिलना चाहता है, क्लेश से छूटना चाहता है तो जड़ को फोड़कर निकल जाय। वह धारा पवित्र है। इक निकसी = जीव निकला। और चहुँ दिशि पानी पानी = सच्चिदानंद पद में जाना। उस पानी में जाने से जीवत्व दशा नहीं है। *व्याप्य के हट जाने से जीव पुरुष और ब्रह्मपुरुष नहीं कहे जाते; क्योंकि जीव उसमें लय हो गया।* *उड़ि माखी तरुवर कै लागै, बोलै एकै बानी।* मक्खी उड़कर एक वृक्ष पर बैठ गई। एक वाणी बोलने लगी। मक्खी = सिमटी सुरत। सिमटी हुई सुरत अंतराकाश में उड़ी और तरुवर (तरुवर = अछय पुरुष एक पेड़ है, निरंजन वाकी डार। त्रिदेवा साखा भया पात भया संसार।) परमात्मा में लग गया। एकै वाणी = एक शब्द-सारशब्द। *विकारों को पुरुष वर्ग में लिया है, ज्ञान-वैराग्य आदि को वह नारी अपने में पचा ली। अब वह अकेले-अकेले है। इस प्रकार की भी भक्ति है।* इस ज्ञान का कितना विशेष कम प्रचार है, जान लीजिए। इस सत्संग के द्वारा इसी भक्ति का प्रचार होता है। किसकी भक्ति करेंगे? *ईश्वर की भक्ति करेंगे।* परमात्मा के लिए ही कभी ईश्वर और कभी परमात्मा कहूँगा, इसको जान लीजिए। ईश्वर की ओर कैसे लगावें, कल्ह कहा गया था कि जो मन, बुद्धि इन्द्रियों को ग्रहण नहीं हो वह परमात्मा है। वही ‘व्यापक व्याप्य अखंड अनंता' - राम, परशुराम आदि दश अवतारों में होने से वे बँट गए? नहीं। सब रूपों में होते हुए कितना विशेष है, ठिकाना नहीं। *भगत हेतु भगवान प्रभु, राम धेरेउ तनु भूप। किए चरित पावन परम, प्राकृत नर अनुरूप। यथा अनेकन भेष धरि, नृत्य करइ नट कोइ। सोइ सोइ भाव दिखावइ, आपुनहोइन सोइ।। गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानहु भाई।।* कसौटी पर कसकर जानिए कि परमात्मा का स्वरूप क्या है? *राम स्वरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर। अविगत अकथ अपार, नेति नेति नित निगम कह।। प्रकृति पार प्रभु सब उर वासी। ब्रह्म निरीह बिरज अविनासी।।* या आप उपनिषद् को लीजिए - *भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।। - महोपनिषद्, अध्याय 4* परे से परे को (परमात्मा को) देखने पर हृदय की ग्रन्थि खुल जाती है, सभी संशय छिन्न हो जाते हैं और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। *जब दर्शन करें और आपको ऐसा मालूम हो कि कुछ संशय नहीं रहा, कोई बंधन मुझपर नहीं है, जड़-चेतन का प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाय, वही परमात्मा है।* जितने इन्द्रियों के द्वारा दर्शन है, उसके द्वारा ‘भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः’ हो नहीं सकता। इसी बात को गोस्वामीजी ने कहा है – *गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानहु भाई।।* जब ये माया ही है, तब इसे परमात्मा कैसे कहिएगा? अब उसकी भक्ति कैसे की जाय, जो मन, बुद्धि से बाहर है। इन्द्रियाँ पहचान नहीं सकतीं। कितनी बुद्धि कहती है - ईश्वर है, कितनी बुद्धि कहती है - ईश्वर नहीं है। आजकल नास्तिकवाद की भी पताका उड़ रही है। जीव माने ईश्वर नहीं। कोई जीव ईश्वर कुछ नहीं माने। कहते हैं तुम्हारा शरीर है, जड़-जड़ के मिलने से ऐसा कुछ काम करने के योग्य हो गया है। शरीर छूटेगा, कुछ भी बाकी नहीं रहेगा। किंतु हमारा सत्संग तो कहता है - *ईश्वर है, तुम जीव हो, दुःख में पड़े हो। ईश्वर की भक्ति करो सुखी होओगे।* फिर कहेंगे, जब ईश्वर मन-बुद्धि आदि इन्द्रियों से परे हैं, उसे कैसे पकड़ा जाय? हमलोगों को विश्वास है, ईश्वर अवश्य है। *अलख अपार अगम अगोचरि ना तिसु काल न करमा। जाति अजाति अजोनि संभउ ना तिसु भाउ न भरमा।। साचे सचिआर बिटहु कुरबाणु ना तिसु रूप बरणु नहिं रेखिआ साँचे सबदि नीसाणु। - गुरु नानक साहब* एक-एक विषय को एक-एक इन्द्रिय ग्रहण करती है। उसी प्रकार तुम अकेले होकर स्थूल, सूक्ष्मादि चारो शरीरों को छोड़कर कैवल्य दशा में रहो, ईश्वर की प्रत्यक्षता होगी। *मन तुम्हारा नौकर है, इन्द्रियाँ नौकरानी हैं। तुम नौकर-नौकरानी के पंजे में फँस गए हो, इससे निकलो।* तुम इनके भरोसे क्यों रहते हो? तुम स्वयं बहुत शक्तिमान हो, किंतु अपने को भूले हुए हो। कबीर साहब ने कहा है – *बिन सतगुरु नर रहत भूलाना। खोजत फिरत राह नहीं जाना।टेक।। केहर सुत ले आयो गड़रिया, पाल पोष उन कीन्ह सयाना। करत कलोल रहत अजयन संग, आपन मर्म उनहूँ नहिं जाना।। केहर इक जंगल से आयो, ताहि देख बहुतै रिसियाना। पकड़ि के भेद तुरत समुझाया, आपन दसा देख मुसक्याना।। जस कुरंग बिच बसत बासना,खोजत मूढ़ फिरत चौगाना। कर उसवास मनै में देखै, यह सुगंधि धौं कहाँ बसाना।। अर्ध उर्ध बिच लगन लगी है, छक्यो रूप नहिं जात बखाना।। कहै कबीर सुनो भाई साधो, उलटि आपु में आप समाना।।* बकरी और भेड़ को चरानेवाला एक गड़ेरी सिंह के एक बच्चे को ले आया। सिंह के उस बच्चे की आँखें बंद थीं। सिंह-बाघ के बच्चे की आँखें जन्मकाल में बंद रहती हैं। वह सिंह का बच्चा नहीं जान सका कि वह किसका बच्चा है। कुछ दिनों के बाद उसकी आँखें खुलीं तो उसने अपने को बकरी-भेड़ के बच्चों के साथ पाया। जैसे भेड़ बकरी का बच्चा खेल-कूद करता, वैसे ही वह भी उसके साथ खेल-कूद करने लगा। एक दिन एक सिंह जंगल से आ गया। उसने देखा कि यह तो मेरी ही जाति का बच्चा है, लेकिन भेड़-बकरी के साथ रहता है। जंगली सिंह को देखकर गड़ेरी, भेड़ और बकरियाँ सभी भागते हैं, उन सबके साथ सिंह का बच्चा भी भागता है। यह देख जंगली सिंह ने उसको पकड़ा। उसने उसको पकड़कर पानी में अपना और उसका मुँह दिखाया और कहा – ‘देखो, तुम्हारा रंग-रूप जैसा है, मेरा भी वैसा ही है। पानी में अपने रूप को देखकर उसको ज्ञान हो गया कि मैं भी सिंह ही हूँ। ऐसे ही *जीवात्मा, परमात्मा-रूपी सिंह का बच्चा है यानी परमात्मा का अंश है। इन्द्रियाँ जितने हैं, वे भेड़-बकरी के समान हैं।* जीवात्मा इनके साथ रहकर अपने को इन्द्रिय समझता है। जब सच्चे सद्गुरु मिलते हैं तब उसको दिखला देते हैं कि *तुम संसार की ओर से उलटो, अपने अंदर देखो।* वैसे तो विचार में हम ईश्वर के अंश हैं, जानते हैं, लेकिन उलटकर देखने से प्रत्यक्षता होती है। हम ईश्वर को तब प्रकट कर सकते हैं, जब हम शरीर और इन्द्रियों से अपने को छुड़ा सकें। यह कैसे होगा? यह तबतक नहीं होगा, जबतक सद्गुरु नहीं मिलते हैं। सद्गुरु मिलते हैं तो बता देते हैं कि तुम भी आत्म-स्वरूप हो। जो गुण ईश्वर में है, वही गुण तुममें भी है। परमात्मा का गुण शरीरस्थ चेतन-आत्मा में है। जो अपने शुद्ध चेतन रूप को पहचानता है, वही ईश्वर को पहचानता है। कबीर साहब अनपढ़ थे, पर उनका वचन अद्भुत है। गुरुजी से ‘क’, ‘ख’ भी नहीं जाने और उनका वचन इतना दृढ़। तुम अपने स्वरूप को अपने अंदर में देखो। कैसे देखोगे, तो कहा - 'अर्ध-उर्ध बीच लगन लगी है।' *उलटकर बहिर्मुख से अंतर्मुख हो जाओ।* अपने नौकर-नौकरानी का संग छोड़कर कबीर के बतलाए हुए स्थान पर लगन लगावें, तो अवश्य अपने को पहचान पाएँगे। *मायाबस मति मंद अभागी। हृदय जवनिका बहुविधि लागी।। ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अज्ञान राम पर धरहीं।। काम क्रोध मद लोभ रत, गृहासक्त दुःखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहिं, मूढ़ पड़े तम कूप।। - गोस्वामी तुलसीदास* जो काम, क्रोध, मद और लोभ में लिप्त, घर के कामों में फँसे हुए, दुःखरूप हैं, वे अंधकार के कुएँ में गिरे हुए मूर्ख राम को कैसे जान सकते हैं? अर्थात् नहीं जान सकते हैं। *अंधकार के कुएँ से अपने को निकालो। भीतर में जितने स्थूल-सूक्ष्मादि जड़ आवरण हैं, उसको हटावें। यही भक्ति है।* इसी विषय को संत कबीर साहब की वाणी में पाहन फोड़ना कहा गया है। कहेंगे कि यह भक्ति कैसे? तो विचार में जानने में आता है कि जब हम सब आवरणों को पार कर जाएँगे, तब ईश्वर से इस प्रकार सटेंगे कि कभी हटेंगे नहीं। इसलिए *ईश्वर पाने के लिए जो यत्न है, उसको करना भक्ति है।* बाबा नानक ने कहा - *भगता की चाल निराली। चाल निराली भगताह केरी विखम मारगि चलणा।। लबु लोभु अहंकारु तजि त्रिसना बहुतु नाहीं बोलणा। खंनिअहु तीखी बालहु नीकी एतु मारगि जाणा।। गुर परसादी जिनि आपु तजिआ हरि वासना समानी। कहै नानक चाल भगताह केरी जुगहु जुगु निराली।। - नानक साहब* *तलवार की धार से भी तेज और बाल की नोंक से भी महीन वह रास्ता है।* कहेंगे इस पर कैसे चला जाय? आपको डरना नहीं चाहिए। *इस तलवार की धार पर पैर नहीं चलेगा, इसपर मन चलेगा।* कहेंगे - चलना चाहिए चेतन को, कहते हैं मन को? तो जानना चाहिए कि जहाँ दूध रखो, वहीं घी भी है; उसी प्रकार जबतक मन-चेतन संग-संग है। जहाँ मन रखो, वहीं चेतन है। ‘मन उलटे तब सुरत कहावै।' *मन को उलटो अर्थात् सिमटो तो पहले जिस ओर था, उसके विपरीत ओर को हो जाएगा।* स्थूल पसार में हो, इसमें सिमटने से सूक्ष्म में प्रवेश करोगे। *सुरत फँसी संसार में ताते परिगा दूर। सुरत बाँधि सुस्थिर करो आठो पहर हुजुर।। - कबीर साहब* यदि कहिए यह तो कॉलेज की बात है। नीचे वर्ग की पढ़ाई भी कहिए, तो कबीर साहब की वाणी में ही सुनिए - *मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाँव। मूल नाम गुरु वचन है, मूल सत्य सतभाव।।* इससे उलटिए तो - *गगन मंडल के बीच में, तहँवा झलके नूर। निगुरा महल न पावई, पहुँचेगा गुरु पूर।। बाँका परदा खोलि के, सन्मुख ले दीदार। बाल सनेही साईयां, आदि अंत का यार।। - कबीर साहब* *मायाबस मति मंद अभागी हृदय जवनिका बहुविधि लागी।।* अन्धकार बाँका परदा है। यदि मोटी बात ही लीजिए तो तुलसीदासजी की वाणी में है - ‘प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।' संत कबीर साहब भी सत्संग करने कहते हैं। *सब संत सत्संग करने कहते हैं।* शवरी से राम कहते हैं - ‘दूसरी रति मम कथा प्रसंगा।' नवो प्रकार की भक्ति कहते-कहते अंत में कहते हैं - ‘सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरे।' गुरु पद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान। *मान मर्यादा को छोड़कर गुरु की सेवा करो शिवाजी की तरह। अथवा हाल के रायबहादुर शालिग्राम की तरह।* पोस्टमास्टर जनरल होते हुए भी अपने गुरु के लिए अपने से आटा पीसना, रोटी बनाना, जमुनाजी से पैदल पानी लाना, इसपर भी यदि कोई कहे - पानी नहीं है, बच्चा रोता है। तो उसे पानी दे देते थे और फिर अपने पानी लाने चले जाते। गुरु का सेवक अपने समय में शिवाजी ऐसे बहुत कम हैं। वे छत्रपति होते हुए भी अपने हाथ से सब प्रकार की सेवा करते थे। शिवाजी अपने हाथ से अपने गुरु को तेल लगाते थे। अपना संपूर्ण राज्य अपने गुरु को दिए थे। एक दिन समर्थ रामदासजी कुछ चेलों के साथ चले आ रहे थे। चेलों ने कहा - 'हमलोगों को भूख लग गई है। समर्थ रामदासजी ने कहा – ‘देखो, खेत में मकई के भुट्टे लगे हैं, खा लो।' शिष्यों ने वैसा ही किया। तबतक खेतवाले आ गए। वह गुस्से में आकर समर्थ रामदासजी को मकई के डण्ठल से मार बैठा। समर्थ मार बर्दाश्त कर गए और शिष्यों से कहा - ‘शिवा को यह बात मत कहना, नहीं तो इसे भारी दण्ड देगा।' जब समर्थ रामदासजी शिवाजी के यहाँ पधारे, तो शिवाजी उनको अपने से ही स्नान कराने लगे। पीठ में मार का दाग देखकर अन्य शिष्यों से पूछा कि यह दाग पीठ में कैसे आया? सबके सब चुप थे, कोई कुछ बोलते ही नहीं थे। शिवाजी ने कहा - ‘सही-सही बोलिए, नहीं तो आपलोगों को ही इसका दंड भोगना पड़ेगा। तब उनलोगों ने उक्त किसान का नाम कहा, जिसने समर्थ रामदासजी को मारा था। उसको शिवाजी ने पकड़वाकर अपने सामने मँगवाया। शिवाजी के डर से वह किसान बहुत ही कंपित हो रहा था। समर्थ रामदासजी ने कहा, शिवा! देखो, *तुम्हारे डर से यह बहुत दुःखी हो रहा है, इसे क्षमा कर दो। इसका मालपोत (मालगुजारी) माफ कर दो।* *ये महान त्यागी पुरुष गुरु की भक्ति करते थे।* *चौथि भगति मम गुन गण, करइ कपट तजि गान।* *पाँचवीं भक्ति - मंत्र जाप मम दृढ़ विस्वासा। पंचम भजन सो वेद प्रकासा।।* ऐसा नहीं कि - *माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहिं।* बल्कि ऐसा - *तन थिर मन थिर वचन थिर, सुरत निरत थिर होय। कह कबीर इस पलक को, कलप न पावै कोय।।* पहले जैसे मन भागता था, उससे कम भागे। संतों का संग होगा, कथा प्रसंग होगा, उनसे ज्ञान सीखेंगे। ईश्वर-भक्ति कैसे होगी? गुरु की सेवा करेंगे। ईश्वर का गुणगान करेंगे, जप करने कहेंगे। यह क्रमबद्ध है। *छठी भक्ति ‘दम’ आती है।* इन्द्रियों को रोकने का स्वाभाव आपको हो जाय, तब दमशील हो जाइएगा। *बहुत-से कर्मों से अपने मन को हटाइए।* सज्जनों के धर्म के अनुसार संसार में बरतिए। *सज्जनों का धर्म है - झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार नहीं करने का।* इस तरह आप इन्द्रियों के रोकने का स्वभाववाला हो जाइएगा। इन्द्रियों के साथ मन की धार है। इन्द्रियों में मन की धार होने से ही इन्द्रियाँ सचेष्ट होती हैं और काम करती हैं। *मन ही विषयों की ओर इन्द्रियों को ले जाने की प्रेरणा करता है।* इन्द्रिय बेरोक में दमशीलता नहीं होती। जिस केंद्र से इस धार का बिखार हुआ है, उस केन्द्र में केंद्रित करो। *केंद्र में केंद्रित होने पर विषयों की ओर नहीं जाएगा।* इस प्रकार अभ्यास बारंबार करते-करते इन्द्रियों को रोकने का स्वभाववाला बन जाइएगा। आप कहेंगे, मन को विषयों में बड़ा अच्छा लगता है, इससे विपरीत कैसे जाएगा? तो देखिए, *भीतर जाने में भी बड़ा आनंद मालूम होता है।* जाग्रत से तंद्रा में जाने पर बड़ा आनंद मालूम होता है, उस समय कोई गड़बड़ करे तो मन बड़ा रंज हो जाता है। तन्द्रा = जागने से स्वप्न में जाने के बीच रास्ते में जो मिलता है = अधनिनिया। *वहाँ कोई विषय नहीं है, फिर भी आनंद है।* इसलिए कबीर साहब ने कहा - *भजन में होत आनंद आनंद। बरसत बिषद अमी के बादर भींजत है कोई संत।।* अगर अंदर के सरकाव में दुःख होता, तो आप सो नहीं सकते। सब दिन सोते हैं और यह हालत होती है। *छठी भक्ति से सूक्ष्म भक्ति का आरंभ होता है।* अपनी धारों को कैसे और कहाँ पर उलटेंगे? तो कहेंगे - तुम हो कहाँ, वहीं से उलटो। दरिया साहब की वाणी है – *जानि ले जानि ले सत्त पहचानि ले। सुरत साँचि बसै दीद दाना।।* आँख का तिल = शिवनेत्र। दोनों आँखों के मध्य मुकाबले अंदर में। राय शालिग्राम साहब ने कहा है। संत कबीर साहब का वचन लीजिए - *इस तन में मन कहाँ बसत है, निकसि जाय केहि ठौर। गुरु गम है तो परखि ले, नातर कर गुरु और।। नैनों माहिं मन बसै, निकसि जाय नौ ठौर। सतगुरु भेद बताइया, सब संतन सिरमौर।।* ब्रह्मोपनिषद् में है - *जाग्रत्स्वप्ने तथा जीवो गच्छत्यागच्छते पुनः। नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्कण्ठे स्वप्नं समाविशेत्। सुषुप्तं हृदयस्थं तु तुरीयं मूर्ध्निसंस्थितम्।।* जीव जाग्रत, और स्वप्न में पुनः-पुनः आता-जाता रहता है। जीव का वासा जाग्रत में - नेत्र में और स्वप्न में - कण्ठ में, सुषुप्ति में - हृदय में और तुरीयावस्था में - मस्तक में होता है। आप जाग्रत में काम करेंगे, इसलिए यहीं से चलो। जगने में आप आँख में हैं। फिर कहेंगे, कैसे चलेंगे? तो दोनों धारों को एक करो, कैसे करो, यह बात गुरु से जानो। *इससे सरल और कुछ नहीं हो सकता।* 1904 ईस्वी से 1952 ईस्वी तक की मेरी खोज है। मैं इतने दिनों तक क्या करता रहा । यह दृष्टि साधन है। *अमादृष्टि, प्रतिपदादृष्टि और पूर्णिमादृष्टि। ‘तद्दर्शने तिस्रो अमाप्रतिपत्पूर्णिमा चेति निमीलितदर्शनममादृष्टि। अर्थोन्मीलितं प्रतिपत्। सर्वोन्मीलिनं पूर्णिमा भवति।* उसे देखने के लिए तीन दृष्टियाँ होती हैं; अमावस्या, प्रतिपदा और पूर्णिमा। आँख बंदकर देखना अमादृष्टि है, आधी आँख खोलकर देखना प्रतिपदा और पूरी आँख खोलकर देखना पूर्णिमा है। *अंधकार में यत्न करो तो तारा चमकेगा।* ईसा मसीह ने दो आँख को एक आँख करने को कहा। सुषुम्ना में जाना चाहते हो, तो गुरु से जानकर करो। किसी का दोनों हाथ पकड़कर कोई खींचे, तो संपूर्ण शरीर उसी ओर हो जाता है। उसी प्रकार *दोनों दृष्टिधारों को एक करो तो फैली हुई सब धारें उसी ओर हो जाएँगी, यही दमशील होगा।* दृष्टियोग के साधन में कुछ कष्ट नहीं होता है। बिना प्राणनिरोध के ही ध्यानाभ्यास द्वारा श्वास बंद हो जाता है। इस प्रकार होने से छठी भक्ति होगी। अब सप्तमी भक्ति आती है। *सातम सम मोहिमय जग देखा।* जहाँ दम है, वहाँ शम होना ही चाहिए। यदि कहो कि मन का साधन तो हो ही चुका, तो देखिए *मन और इन्द्रियों का संग-संग साधन होना दम है। केवल मन का निग्रह शम है।* यहाँ दृश्य नहीं है, केवल नादानुसंधान है। न नाद सदृशो लयः। मनोलय होकर तब क्या होता है - *सहस कमलदल पार में, मन बुद्धि हिराना हो। प्राण पुरुष आगे चले, सोइ करत बखाना हो।।* निर्मल-चेतन परमपुरुष से जाकर मिलती है। यहाँ दम और शम क्या होता है वर्णन किया। इसी प्रकार की भक्ति सब किया करें। ‘आठम यथा लाभ संतोषा।' जिसको ‘शम' होगा, उसको ‘सम' भी हो जाएगा। इसके लिए अपना-पराया, सुख-दुःख, शीत-उष्ण सब ‘सम' हो जाता है। ऐसा होनेवाले के लिए ‘आठम यथा लाभ संतोषा।‘ उसकी खरीदी हुई चीज हो जाएगी। वह टेढ़ा क्यों होगा? सरल हो जाएगा। एक ईश्वर पर भरोसा रखो। *भक्ति तो सात ही समझिए। बाकी दो भक्ति तो फल है, यही जानिए।* भक्ति को केवल मोटी ही नहीं जाननी चाहिए। उन छठी और सातवीं भक्ति को भी जानिए। इसके लिए *संयम की जरूरत है। झूठ मत बोलो, चोरी मत करो, व्यभिचार मत करो, नशा का सेवन मत करो। पंच पाप मत करो।* आगे बढ़नेवाले को चाहिए - पापों से बचें। *पापों में फैला हुआ आदमी आगे नहीं बढ़ सकता, वह विषयों में अनुरक्त रहता है।* नशा के विषय में तम्बाकू तक मना है। अपना खून आप पीओ तो घृणा होगी, किंतु अपने उच्च रक्त में पशुओं के नीच रक्त को क्यों मिलाते हो? इसी के लिए किसी संत ने कंठी पहनायी, किसी ने कहा - *कंठी पहनो या नहीं पहनो, अपने मन को ठीक करो।* यह प्रवचन सहरसा जिला विशेषाधिवेशन ग्राम-खापुर (अब जिला - मधेपुरा) में दिनांक 6.11.1952 ईo को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.30 : संतों का संग दुर्लभ है* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 30)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर॥* प्यारे धर्मप्रेमी महाशयो! *हमलोग सत्संग, संतों की वाणी के सहारे किया करते हैं।* हमारे गुरु महाराज यही बतलाए हैं। *संत संसर्ग त्रैवर्ग पर परम पद प्राप्य नि:प्राप्य गति त्वयि प्रसन्ने।* संतों के संग का नाम सत्संग है। संतों का संग दुर्लभ है, पहचान दुर्लभ है। संत की पहचान होना साधारण प्राणी से असभव है। संत बड़े ऊँचे होते हैं। त्रयवर्ग पर परमपद तीनों पदों से ऊपर पहुँचे हुए; स्थूल, सूक्ष्म, कारण मण्डलों से ऊपर उठे हुए। विद्वान अर्थ, धर्म, काम; इन तीनों से परे को भी त्रयवर्ग कहते हैं। उनको धन चाहिए ऐसा नहीं। उनको धर्म-शिक्षा की कमी नहीं रहती। इहलोक, परलोक कामना से रहित होते हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण से जो ऊपर होंगे वे अर्थ, धर्म, काम में क्यों हँसेंगे ? अथवा यह कि जो – *अमित बोध अनीह मित भोगी। सत्य सार कवि कोविद योगी।।* संसार में रहकर कुछ-न-कुछ लिया करते ही हैं, मितभोगी होते हैं। *विषयासक्त नहीं होते, स्वल्पभोगी होते हैं।* बिना कुछ लिए संसार में कोई नहीं रह सकते। इसलिए वे थोड़ा लेते हैं। किंतु संसार का बड़ा उपकार करते हैं। संत लिखने-पढ़ने जाने या नहीं जाने; पंडित वे ही नहीं होते, जो खूब पढ़े-लिखे हो; बिना पढ़े-लिखे भी पण्डित होते हैं। पहले लिखना नहीं था, केवल श्रवण-ज्ञान था, सुनते थे। कबीर साहब के लिए लोग कहते हैं कि वे बहुश्रुत थे। किंतु वे कहते हैं - *मैं मरजीवा समुंद का, डुबकी मारी एक। मुट्ठी लाया ज्ञान का, जामें वस्तु अनेक।।* इस प्रकार शरीर में डुबकी लगाने से ये ज्ञानी हुए। बहुश्रुत होने से, अंतर में गोता लगाने से ज्ञानी होते हैं। कोई पढ़े भी, सुने भी, अंतर में गोता भी लगाए। तीनों तरह तथा एक तरह भी; जैसे भगवान बुद्ध। *उनके गुरु अवश्य थे, किंतु उनको उस ज्ञान से तृप्ति नहीं हुई। वे कहते हैं - मैं अपने-आप सीखकर अपना गुरु किसे बताऊँ? पूर्ण योगी वही हैं, जो पूर्ण योग द्वारा पद प्राप्त करते हैं।* तो संत बहुत बोध रखते हैं, अमित बोध। इतने बड़े को साधारण लोग पहचान जाय, कैसे संभव है? कल्याण के एक लेख में आया था - *मैं साधु, महात्मा, ज्ञानी आदि भले कहूँगा; किंतु संत नहीं कह सकता।* संत उसे कह सकते हैं, जिनके लिए यह उपनिषद-वाक्य सार्थक हो चुका हो - *भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।।* अर्थ - परे से परे को (परमात्मा को) देखने पर हृदय की ग्रन्थि खुल जाती है, सभी संशय छिन्नभिन्न हो जाते हैं और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं। तुलसी साहब - *जो कोई कहै साधु को चीन्हा। तुलसी हाथ कान पर दीन्हा।।* इतने बड़े को कौन पहचाने? बरेली स्टेशन के बाद के एक स्टेशन पर एक सज्जन का गाड़ी पर चढ़ना - स्थितप्रज्ञ का लक्षण कहाँ? पूछने से संत की पहचान हो तब सत्संग करे, तो संतों की पहचान असंभव है। फिर सत्संग कैसे हो, तो गुरु महाराज ने कहा - *संतों की वाणी को पढ़ो, यही सत्संग होगा। सत्संग का आधार संत है। बिना संत के सत्संग हो नहीं सकता।* सत्संग भगवान का निज अंग है। *संसार दूर हो जाय, इसके लिए सत्संग है।* क्या संसार छोड़ने योग्य है? देखो, यह सबको मानना पड़ेगा कि यह शरीर माता के पेट में था। लोगों को याद तो नहीं, किंतु यह कहते हैं कि सिर नीचे होता है और पैर ऊपर। माता के पेट में रहना ऊपर लटका हुआ कितना दु:ख होता होगा? अभी कोई वैसे लटका दे, तब देखिए क्या दुःख है? समय पूरा हुआ और निकले, तो क्रन्दन पसार दिया। जनमते समय बच्चा रोवे नहीं, तो लोग समझेंगे मरा हुआ है। *रोना दुःख की पहचान है। इससे जाना जाता है, उसको दुःख अवश्य हुआ होगा।* मुँह से कुछ बात नहीं कर सकते कि भूख लगी है या कुछ रोग। मलमूत्र त्याग हो, उसी पर पड़े रहना। अपने से हिल-डुल नहीं सकता। सोने का झूला हो, मखमल का पलंग हो, कोई बच्चा उसपर पड़ा हुआ हो तो भी उसे क्या सुख? फिर कुछ बढ़े तब क्या हुआ ? जो मुँह में नहीं देने का वही दिया, जो नहीं छूने का वह भी छुआ। फिर बढ़े, कुछ पढ़े-लिखे नहीं, तो उसका भी भारी दु:ख। पढ़ने पर घर-गृहस्थी में गए, पारिवारिक झंझट। फिर दैहिक, दैविक, भौतिक ताप से कौन बच सकता। *श्रीराम भी रोए।* इससे कौन बच सकता है? ‘काम’ आया कुकर्म में चले गए, लोगों की नजर से गिर गए। अपने मन में भारी ग्लानि हुई। ‘क्रोध आया हृदय जल गया, अंधे हो गए, क्या करें, नहीं करें, कुछ सूझता नहीं। ‘लोभ आया, जो नहीं लेने का वह ले लिया, चोरी कर ली, राजा से दंडित हुए; इसी प्रकार सब विकारों को जानिए, तो क्या इस प्रकार संसार में रहना पसंद करते हैं? कभी नहीं। इसीलिए संत कहते हैं - *सत्संग करो।* *प्रबल भव जनित त्रयव्याधि भेषज भक्ति, भक्त भैषज्यमद्वैत दरसी।।* औषध भक्ति है और वैद्य भक्त हैं। यह औषधि लेनी आवश्यक है। इसलिए *सत्संग करना आवश्यक है।* भक्ति करो तो किसकी? परमेश्वर की-ईश्वर की भक्ति समझने के लिए पहले ईश्वर को समझना होगा। *ईश्वर नहीं है, सुनकर रुलाई आती है।* आधार को छोड़कर कैसे रहोगे? आधार को मत छोड़ो। जो आधार तुमको अच्छा बनावेगा, उसको छोड़कर तुम कैसे रहोगे? वह ईश्वर हई है। *व्यापक व्याप्य अखण्ड अनंता। अखिल अमोघ शक्ति भगवंता।।* यह ईश्वर है, जो सबमें भरा हुआ है ही। ईश्वर है, अंतरहित है, नहीं रहेगा सो नहीं, रहेगा ही। हई है, कहीं से आया नहीं है। जब कुछ नहीं था, तब भी वह था, रहेगा ही। सारी प्रकृति को भर कर कितना विशेष है, कहा नहीं जा सकता। इसका नहीं होना असंभव है। यदि कहो, नहीं है। तो प्रश्न उदय होगा, सारे सांतों के पार में क्या होगा? अनंत कहना ही पड़ेगा। यदि कहो अनंत के पार में क्या है, तो तुम्हारा प्रश्न ही गलत है। अनंत का अंत ही नहीं होगा। उसके पार में कैसे क्या होगा? *वह ईश्वर नहीं है, ऐसा कहने से गुंजाइश नहीं है।* वह स्थूल इन्द्रियों से प्राप्त नहीं हो सकता। उपनिषद् में सुना - मन से जिसका मनन नहीं हो सकता, बुद्धि भी नहीं जान सकती। लोग समझते हैं मन, बुद्धि आदि इन्द्रिय नहीं रहेगी तो हम कैसे देखेंगे, समझेंगे। आप बहुत शक्तिशाली हैं, *जैसे एक-एक इन्द्रिय का एक-एक विषय है, उसी प्रकार आपके निज का विषय परमात्मा है।* इन्द्रियों का संग छूटे शरीर-रहित होकर, अकेले होकर रहे तो आप महान हैं, तब परमात्मा को प्राप्त करेंगे। *इन्द्रियों के संग से आपकी शक्ति घट जाती है।* जैसे रोशनी पर आवरण पड़ने से उसका तेज कम हो जाता है। जैसे आँख से जो देखते हो, उसे ही रूप कहते हैं; उसी प्रकार जो चेतन-आत्मा से पकड़ा जाय, वह परमात्मा है। जन्मांध व्यक्ति चीजों के रूप को नहीं देख सकते। आँखवाले पहचानते हैं। यह बात दूसरी है। परमात्मा सबका आधार है, इसी की भक्ति करो। *जो विषयों में फँसते हैं, अपना दुर्नाम करवाते हैं।* कभी-कभी राजा से दंडित होते हैं और अंत में नरक भी होता है, तो इस प्रकार विषय सुख से होता है। यदि परमात्मा की भक्ति करो, तब उस परमात्मा को प्राप्त कर देखो कि वह सुख कैसा है? जिसकी इन्द्रियाँ शांत नहीं, जिसका मन अशांत है, वह आत्मज्ञान द्वारा परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। *पापात्मा को ईश्वर की भक्ति में दिल नहीं लगता।* *सेख सबूरी बाहरा, क्या हज कावे जाय। जाका दिल साबत नहीं, ताको कहाँ खुदाय।।* रूहे पाक से पहचान सकते हो, हवस से नहीं। पवित्र आत्मा से ईश्वर को पहचानो। *शरीरयुक्त इन्द्रियों के संग के कारण जो मलिनता है, उससे जबतक ऊपर नहीं उठेंगे, तबतक ईश्वर को पहचान नहीं सकते।* ईश्वर की भक्ति कैसे हो, इसपर कल्ह कहूँगा। *देहि सत्संग निज अंग श्रीरंग, भवभंग कारण सरन सोकहारी।* मुझे सत्संग दीजिए, वह आपका अपना शरीर है। जन्म को नाश करने का कारण और शरणागत के शोक को हरनेवाला है। यह प्रवचन सहरसा जिला विशेषाधिवेशन ग्राम-खापुर (अब जिला - मधेपुरा) में दिनांक 8.11.1952 ईo को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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Ramit Singh Jan 21, 2021

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.31 : सूर संग्राम को देख भागै नहीं* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 31)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे भाइयो ! आपलोगों ने संतों के वचनों का पाठ सुना। आपलोगों को सुनने में प्रिय लगे, इसलिए कुछ लय और बाजा बजवाया। लय सुनकर जो अच्छा लगा हो तथा अर्थ समझ-समझकर गोता लगाते हों तो बहुत अच्छा। यदि लय-बाजा अच्छा नहीं लगता हो, केवल अर्थ को समझ-समझकर गोता लगाते हो, तो यह भी अच्छा है, किंतु *यदि केवल लय में आनंद हो तो वह अच्छा नहीं है।* *संतों की माला मेरे हृदय में है।* माला में एक सुमेरु होता है। सुमेरु को टपते नहीं हैं। सुमेरु से लौटकर फिर गिनते-गिनते सुमेरु तक जाते हैं। कोई भी सुमेरु को टपते नहीं हैं। मेरी माला संतों की माला है। *सुमेरु में संत कबीर साहब हैं।* इसलिए संत कबीर साहब का वचन मेरे पाठ में सबसे प्रथम आता है। इनको सबसे प्रथम धक्का लगा और धक्का को सह गए। जिस समय सामाजिक और धार्मिक समस्या ऐसी थी कि उसके सामने ठठना मुश्किल था, कबीर साहब ने इन धक्कों को सहा। चूल्हे पर देकर देग में उबाला गया, बाँधकर हाथी के पैरों तले दबवाया गया; सिकंदर लोदी का समय था, उन्होंने बहुत जबरदस्त धक्का दिया। किंतु ये सह गए और अपनी जो उक्ति थी कही, जो उक्ति उपनिषदों में है। नानक, दादू, तुलसी आदि संत कोई कम नहीं थे, किंतु पहले इन्हीं को सब धक्का सहना पड़ा। वे कहते हैं - *सबलोग अंधकार में पड़े हुए हैं।* आपलोग कहेंगे - हमलोग चन्द्र, सूर्य, तारे आदि के प्रकाश से प्रकाशित हैं; अनेक प्रकार की रोशनियों को जलाकर प्रकाश करते हैं, फिर अंधकार में कैसे? कहेंगे विद्या नहीं रहने के कारण। किंतु इससे भी प्रकाश नहीं होता। *इतना पढ़ गए कि पढ़ने का अंत ही कर डाले, किंतु आँख बंदकर देखो तो अंधकार ही मिलेगा।* छान्दोग्योपनिषद् में नारद की कथा है कि - नारद ऋषि सनत्कुमार अर्थात् स्कन्द के यहाँ जाकर कहने लगे - ‘मुझे आत्मज्ञान बतलाओ।‘ तब सनत्कुमार बोले - ‘पहले बतलाओ, तुमने क्या सीखा है, फिर मैं बतलाता हूँ।' इसपर नारद ने कहा - ‘मैंने इतिहास-पुराणरूपी पाँचवें वेद सहित ऋग्वेद प्रभृति समग्रवेद, व्याकरण, गणित, तर्कशास्त्र, कालशास्त्र, नीतिशास्त्र, सभी वेदांग, धर्मशास्त्र, भूतविद्या, क्षेत्रविद्या, नक्षत्रविद्या और सर्पदेवजनविद्या प्रभृति सब कुछ पढ़ा है; परंतु जब इससे आत्मज्ञान नहीं हुआ, तब अब तुम्हारे यहाँ आया हूँ।' इसको सुनकर सनत्कुमार ने यह उत्तर दिया - *तूने जो कुछ सीखा-पढ़ा है, वह तो सारा नाम-रूपात्मक है, सच्चा ब्रह्म इस नाम-रूपात्मक ब्रह्म से बहुत आगे है।* *विद्या का प्रकाश, बाहर का प्रकाश रहते हुए भी आत्मज्ञान नहीं होता है।* अपरोक्ष ज्ञान-अनुभव ज्ञान नहीं हो सकता। अनुभव को लोग विचार में ले लेते हैं, किंतु नहीं। *समाधि द्वारा अनुभव-ज्ञान प्राप्त होता है।* संत कबीर साहब कहते हैं - ‘अपने घट दियना बारू रे।‘ चिराग है, बत्ती है। आग लगा दीजिए, फुन-फुनाकर जलता है, फिर बुत जाता है। यह प्रकाश क्या है? उसी प्रकार कुछ भजन करते हैं, ईश्वर की कृपा से कुछ देखने में आता है, फिर बुत जाता है। तेल नहीं है इसलिए। संत कबीर साहब कहते हैं - *नाम का तेल दो।* अर्थात् प्रकाश में पहुँचकर यदि शब्द को पकड़ो तो वह स्थिर प्रकाश मिलेगा, जो बुतेगा नहीं। *उसमें सुरत की बाती दो।* ब्रह्म अग्नि से जलाओ। ब्रह्मज्योति कहाँ है? संत सूरदासजी के वचन में सुना - *नैन नासिका अग्र है, तहाँ ब्रह्म को वास। अविनाशी विनसै नहीं, हो सहज ज्योति प्रकास।।* इस शरीर-इन्द्रिय से अपने की पहचान नहीं होती है, फिर परमात्मा को कैसे पहचानेगा? *आपुन ही कूँ खोज, मिलै जब राम सनेही।। - सहजोबाई* देह के अतिरिक्त ‘मैं’ कुछ और हूँ, देह नहीं हूँ। देह में हूँ, किंतु देह में अंधकार है। जैसे घर में कुछ वस्तु है, किंतु घर में अंधकार है, फिर क्या देख सकेंगे? इसी प्रकार देह के अंदर अंधकार है, क्या देखेंगे? इसलिए संत कबीर साहब अपने में प्रकाश करने के लिए कहते हैं। *नाम का तेल और सुरत की बत्ती के लिए कहते हैं।* सुरत चेतन को कहते हैं। (प्रोo विश्वानंदजी का प्रश्न - ‘चेतन-आत्मा और चेतन-धार में क्या अंतर है?' परमाराध्य महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज का उत्तर - जैसे सूर्य और सूर्य की किरण।‘) नाम में सुरत लगाकर रखिए, चिराग जलती रहेगी। लोग कहेंगे - चिराग, चाँद, सूर्य देखते ही हैं, इससे क्या होता है? क्या होगा? जिस समय सुरत सिमटती है, स्थूल विषय में फैलाव नहीं रहता। इन्द्रियों में फैलाव तब होता है, जब चेतन-धार इन्द्रियों में रहती है। *इन्द्रियों में रहने पर ही पाप-पुण्य कर्म करते हैं और स्वर्ग-नरक भोगते हैं। इनसे निवृत्ति तभी होगी, जब कोई इन्द्रियों से अपनी चेतन-धारा को सिमट ले।* इसलिए संत कबीर साहब कहते हैं - अपने अंदर प्रकाश करो और जगमग ज्योति को निहारो। देखने से उसमें तल्लीनता आ जाएगी, पापों से छूट जाएँगे। बंगला पद्य में कल्ह सुना - ‘देखे आँखी कोनो मते कीनी ना।' फिर संत कबीर साहब ने कहा - *अपने काम को सँभालो।* अपना काम बनाना यही है। हम सबसे ऊँचे रहें, लोग नीचे रहें, अपना काम बनाना नहीं है। एक मुखिया दूसरे मुखिया को दबाना चाहते हैं। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को दबाना चाहते हैं। यह अपना काम बनाना नहीं है। *सबसे मिलकर रहो, तभी आनंद से रहोगे। भजन करो। मन-इन्द्रियों से युद्ध करो।* *सूर संग्राम को देख भागै नहीं, देख भागै सोई सूर नाहीं। काम व क्रोध मद लोभ से जूझना, मरा घमसान तहँ खेत माहीं।। साँच औ शील संतोष शाही भये, नाम शमशेर तहँ खूब बाजे। कहै कबीर कोई जूझिहैं शूरमा, कायराँ पीठ दै तुरत भाजै।।* सच्चाई, शीलता, संतोष ध्वजा है। जो सूरमा है, वह लड़ाई में लड़ेगा। कायर भागेगा, उसका काम नहीं बनेगा। उन्होंने दिलाशा दिया - *करता की गति अगम है, चल गुरु की उनमान। धीरे धीरे पाँव दे, पहुँचोगे परमान।।* काम बहुत बड़ा है। मन-इन्द्रियों को समेटना, अधोगति से ऊर्ध्वगति करना कठिन है, किंतु कठिन कहकर छोड़ने से काम चलने का नहीं। एमoएo तक पढ़ना बड़ा मुश्किल है। *बच्चे से गुरुजी की मार कौन खाए, फटकार को कौन सहे, कॉलेज में कौन सड़े; यह सोचकर नहीं पढ़ने से कोई विद्वान नहीं हो सकता, उसको पद-प्रतिष्ठा नहीं मिल सकती।* जो पढ़ते हैं - गुरुजी की मार खाते हैं, फटकार सहते हैं, कॉलेज जाते हैं; वे विद्वान होते हैं, उनको पद-प्रतिष्ठा मिलती है। उसी प्रकार यदि तुम पढ़ो, अध्यात्म-ज्ञान सीखो, तो उतने ही बड़े होओगे, जितने बड़े संत कबीर थे। *भगवान कृष्ण ने कहा - भक्त तो मुझसे भी बड़े हैं, इतने ऊँचे दर्जे में हैं कि जिनका दर्शन मैं नहीं कर पाता।* ऊँचा पद पर आसीन होना कोई साधारण काम नहीं। किंतु थोड़ा-थोड़ा करते-करते सरल हो जाएगा। भगवान बुद्ध का वचन - *पानी की बूंदों से घड़ा को भरते-भरते वह भर जाता है, उसी प्रकार थोड़ा-थोड़ा ध्यान करते-करते पूर्णता को प्राप्त करोगे। यही अपना काम है।* अपना काम बनाना क्या है, इसपर कहा। संसार में जो कोई प्रतिष्ठावान होकर हैं, वही अच्छा है। प्रतिष्ठाहीन किस काम का? संसार में प्रतिष्ठा का मोल जितना है, धन का उतना नहीं। *झूठे को, विषयी को प्रतिष्ठा नहीं मिलती। जो झूठे नहीं, विषयी नहीं, उनको प्रतिष्ठा मिलती है।* छपरा के पास एक संत थे। वे बोले थे - ‘दिन में रात होगी, इतने आदमी मरेंगे कि आदमी को आदमी नहीं फेकेंगे। पहली बात सूर्यग्रहण हुआ। पूरा सूर्य डूब जाने पर अंधकार हो गया। जैसे संध्या के समय चिड़िया बोलती है, चिड़िया बोलने लगी। दूसरी बात प्लेग की बीमारी हुई, जिसमें इतने लोग मरे कि लोग नहीं फेंक सकते। नगरपालिकावाले गाड़ी पर भर-भरकर उन लाशों को फेंकते थे। तीसरी बात यह देश स्वतंत्र हो जाने के कारण आजकल संत का राज्य हो गया और संत-राज्य होगा। उनकी तीनों बातें मिल गई। पहली बात हुई सूर्यग्रहण होना, अंधकार होना, चिड़िया बोलना। दूसरी बात प्लेग की इतनी बीमारी हो गई कि लोगों को फेंकना पड़ा। आजकल संत-राज्य हो गया। डाकघर के टिकटों पर संतों का छाप चल रहा है। *दादू जानै न कोई, संतन की गति गोई।।टेक।। अविगत अंत अंत अंतर पट, अगम अगाध अगोई। सुन्नी सुन्न सुन्न के पारा, अगुन सगुन नहिं दोई।। अंड न पिंड खण्ड ब्रह्माण्डा, सुरत सिंध समोई। निराकार आकार न जोती, पूरन ब्रह्म न होई।। इनके पार सार सोइ पइहैं, मन तन गति पति खोई। दादू दीन लीन चरनन चित, मैं उनकी सरनोई।।* अर्थ – अ = नहीं। गोई = कहना। अगोई = अनिर्वचनीय। *अंतर शून्यं बाहर शून्यं, त्रिभुवन शून्यं शून्य। तीनों शून्य को जो कोई जाने, ताको पाप न पुण्यं।।* 1. स्थूलाकाश = अंधकार का आकाश। 2. सूक्ष्माकाश = प्रकाशाकाश। 3. कारण का आकाश = शब्दाकाश। दादू दयालजी का वचन है - ‘सुन्नी सुन्न सुन्न के पारा।' अर्थात् शून्य, महाशून्य और भंवर गुफा के परे जो जाता है, उसको पाप-पुण्य नहीं लगता। त्रैगुण रहितता का गुण है, त्रैगुण का गुण नहीं है। दिव्यगुण-सहित और त्रैगुण-रहित होने से ईश्वर सगुण हैं, किंतु इस प्रकार केवल सगुण कहने से साधारण लोग ओरझा जाएँगे। इसलिए संतों ने सगुण-निर्गुण तथा उसके परे कहकर समझाया। त्रैगुण-सहित सगुण, त्रैगुण-रहित निर्गुण तथा इन दोनों के परे भी। सगुण जड़, निर्गुण चेतन तथा इन दोनों के परे जो है, वही परमात्मा है। बाहर इन्द्रियों से जो हम जानते हैं स्थूल सगुण है। अंतर में प्रकाश तथा अनहद शब्द सूक्ष्म सगुण है तथा सारशब्द सार्थक निर्गुण है। सारशब्द की उपासना निर्गुण उपासना है। इसकी उपासना करनेवाले इसके पार हो जाते हैं। वे निर्गुण-सगुण के परे चले जाते हैं - ‘पूरण ब्रह्म न होई।‘ जो प्रकृति-मंडल में व्यापक है, वही पूरण ब्रह्म है। प्रकृति व्याप्य और वह व्यापक है। किंतु *प्रकृति पार प्रभु सब उरवासी। ब्रह्मनिरीह बिरज अविनाशी।।* जो प्रकृति के पार में है, उसे पूरणब्रह्म नहीं कह सकते। किनके पार? यानी *पिण्ड-ब्रह्माण्ड के परे, सगुण-अगुण के परे और सुन्नी सुन्न सुन्न के परे जो है, वही परब्रह्म परमात्मा है।* यह प्रवचन सहस्सा जिला विशेषाधिवेशन ग्राम-खापुर (अब जिला - मधेपुरा) में दिनांक 6.11.1952 ईo को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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