Ravindra Singh
Ravindra Singh Oct 29, 2020

विचारों का स्तर हमारे संग पर निर्भर करता है। हमारी संगति जितनी अच्छी होगी हम उतने ही अच्छे विचारों के धनी होंगे॥ “अच्छी संगत...अच्छी सोच" 🔱*जय भोलेनाथ*🙏

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     “अच्छी संगत...अच्छी सोच"
         🔱*जय भोलेनाथ*🙏

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Balraj sethi Oct 29, 2020
🙏Shree Om Namo Bhagvate Vasudevay Namay. 🙏🌹🌹🌷🌷🍁

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Renu Singh Apr 15, 2021

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Archana Singh Apr 15, 2021

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🌹bk preeti 🌹 Apr 15, 2021

🙏🙏*jai mata di 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🌹🌹🌹🌹🙏 ✍️. बात केवल ढाई सौ वर्ष पुरानी है। मधुपुर नामक गांव में एक ब्राह्मण-दम्पत्ति नारायणकान्त और रत्नेश्वरी रहते थे। वे वास्तविक अर्थ में ब्राह्मण थे, सादा, सुखी और संतोषी जीवन। नारायणकान्त अध्यापन का कार्य करते और रत्नेश्वरी अपने आंगन में लगे कपास के पौधों से रुई कातकर गांव भर के यजमानों के लिए जनेऊ बनाती रहती और मन-ही-मन बुदबुदाती रहती... मेरो मन रामहि राम रटै रे। राम नाम जप लीजै मनुआं कोटिक पाप कटै रे।। पूर्ण संतोषी जीवन होने पर भी संतान न होने से ब्राह्मणी का हृदय हाहाकार करता रहता। अंत में भगवान् वैद्यनाथ की शरण लेने पर उन्हें विलक्षण गुणों से सम्पन्न एक कन्या पैदा हुई, नाम रखा लीलावती। दुर्लभ हैं वे लोग जो अपनी संतान के लिए भगवद्भक्ति रूपी सम्पत्ति छोड़ते हैं नारायणकान्त और रत्नेश्वरी का अपनी पुत्री से प्रेम भगवान् की भक्ति से लबालब भरा था। इसी कारण लीलावती की जीवनधारा भी सहज ही भक्ति की ओर मुड़ती गयी। नारायणकान्त जब पूजा में बैठे होते तो वह बालिका चुपचाप उनके शालग्राम को निहारा करती। लीलावती को सबसे मीठी और प्यारी लगती मां के द्वारा ब्राह्ममुहुर्त में गायी गई नाम-धुन... राधाकृष्ण जय कुंजबिहारी। मुरलीधर गोवर्धनधारी।। श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।। प्रतिदिन सुनने से लीलावती को भी यह नाम-धुन याद हो गयी और वह अपनी तोतली बोली में इसे गाती रहती। संध्या समय जब मां तुलसीमहारानी को दीप दिखाने जातीं तो वह घुटनों के बल तुलसी चौबारे में पहुंच जाती और मां का आंचल पकड़कर खड़ी हो जाती और स्वयं चौबारे में दीप रखती। लीलावती जब थोड़ी सयानी हो गयी तो नित्य भगवान् के लिए फूल चुनकर माला बनाती और जब नारायणकान्त विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ कर रहे होते तो उसे ध्यान से सुनती और दोहराती... 👣 श्रीद: श्रीश: श्रीनिवास: श्रीनिधि: श्रीविभावन:। श्रीधर: श्रीकर: श्रेय: श्रीमांल्लोकत्रयाश्रय :।। सांसारिक विषय-भोग रूपी काजल की कोठरी से कोई बिरला ही बेदाग निकलता है समय पाकर लीलावती का विवाह एक सम्पन्न परिवार में हो गया। पति राजपुरोहित, घर में लक्ष्मी का विलास, पुत्र-पुत्री, दास-दासियां। कंचन-कामिनी, भोग-विलास के प्रलोभनों को जीतना बहुत कठिन है। लीलावती भी इस विषवल्लरी में अटक गयी। देर तक सोना, घर का कोई काम नहीं करना, इन्द्रियों का नियमन नहीं, मुख में भगवान् का नाम नहीं, ऐसा विलासपूर्ण दलदल का जीवन मानो भोजन में मक्खी निगल रहे हों। लीलावती पुराने संस्कारों को भूलकर दुनिया के राग-रंग में बेसुध बही जा रही थी । प्रभु जिसे अपनाते हैं उसके सारे बन्धनों और सम्बन्धों को छिन्न-भिन्न करने के लिए ठोकर देते हैं.. जगत के प्रलोभन की मदिरा पीकर जीव जब मदमस्त और बेसुध हो जाता है तो दु:खों की प्यारभरी मार से प्रभु उसे होश में लाते हैं। एकाएक लीलावती के गांव में हैजा फैला और उसके पुत्र व पुत्री हैजे की चपेट में आ गए, उनके प्राण अब-तब थे। उस जमाने में हैजा असाध्य बीमारी थी। कोई दवा काम नहीं कर रही थी और लीलावती अपने बीमार बच्चों की शय्या के सिरहाने बैठी आंसू बहाते हुए एक-एक क्षण गिन रही थी और अपने जीवन को कोसती हुई धाड़ मार कर रोती जा रही थी। चारों ओर से असहाय लीलावती को बचपन का प्रभु-प्रेम स्मरण हो आया और वह पुकार उठी... श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेव।। सच्ची प्रार्थना में प्रभु का स्पर्श मिलता ही है। उसके बच्चे धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे। भगवान् का वचन है कि जिसे वे एक बार अपना लेते है, उसे एक क्षण के लिए भी छोड़ते नहीं। दूसरे दिन का प्रभात लीलावती के जीवन का नया प्रभात था। सुबह-सुबह एक अलमस्त फकीर की तंबूरे पर गाते हुए उसने आवाज सुनी.. राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु भाई रे। नाहिं तो भव बेगारी में परके, छूटत अति कठनाई रे।। इसे सुनते ही लीलावती की मन की आंखें उसी तरह खुल गयीं जैसे बादलों को हटाकर सूर्य झांकने लगा हो और जन्म-जन्मान्तर का संचित अंधकार भाग गया हो। पिता के विष्णुसहस्त्रनाम और माता की नारायण नाम-धुन के संस्कार मन में जाग उठे और वह भगवान् की सच्ची चेरी बन गई। लीलावती ने भगवान् बालकृष्ण की सोने की मूर्ति बनवाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कराई और नित्य उनका षोडशोपचार पूजन करने लगी। परिवार की सेवा तो वह पहले की तरह करती पर सब कर्मों के केन्द्र अब भगवान् हो गए। अब नित्य विष्णुसहस्त्रनाम के पाठ के साथ जिह्वा पर अखण्ड नाम-स्मरण का चस्का लग गया। बालकृष्ण की वह मूर्ति ही उसकी प्राणाधार थी। उसके हृदय के आंगन में बालकृष्ण निरन्तर किलकारी मारते रहते। कभी वे चन्द्रखिलौने के लिए हठ करते तो कभी ‘भूखा हूँ’ कहकर स्तनपान की जिद करते। मन-ही-मन अपने बालकृष्ण की चुम्बियां लेती, कभी उलझी लटें सुलझाती और उसमें मोरपंख व गुंजामाला सजाती। कभी उनके लाल-लाल तलवों की रज को हृदय से लगाती। अंदर ही अंदर वह बालकृष्ण की सेवा व लाड़-प्यार में इतना उलझी रहती कि सांसारिक कार्यों से वह धीरे-धीरे विमुख होती चली गयी। संसार से उसे वैराग्य हो गया था। उसकी प्रगाढ़ साधना से परिवार में भी भक्ति की सुगंध फैल गयी। देवोत्थान एकादशी की रात्रि को घर में बालकृष्ण की झांकी सजाकर महोत्सव मनाया गया। परिवार के सभी लोगों ने आधी रात तक जागरण किया फिर चरणामृत लेकर सब सो गए। मगर, लीलावती की आंखों में नींद नहीं थी। उसके हृदय में आज कुछ अजीब तरह की लहरें उठ रही थीं मानो कन्हैया ने उसके आंचल को कसके पकड़ रखा हो और कह रहा हो कि ‘मैं भूखा हूँ मां, मुझे दूध पिला’। उसने ठान लिया कि आज कन्हैया को स्तनपान कराऊंगी ही। जैसे-जैसे उसके हृदय में संकल्प की लहरें उठ रही थीं, वैसे-वैसे उसकी तरसती और बरसती आंखों ने देखा कि बालकृष्ण की सुवर्ण-प्रतिमा साक्षात् बालकृष्ण बन गयी और यशोदा का लाल किलकारियां मारने लगा। लीलावती का आंचल दूध की धार से भीग गया। तभी मचलते हुए बालकृष्ण दौड़कर लीलावती के आंचल में प्रवेश कर जाते हैं और मां से चिपटकर दुग्धपान करने लगते हैं। कलियुग की यशोदा मां और उसके बालकृष्ण दोनों ही लाड़ लड़ाते हुए एक-दूसरे की इच्छा पूरी करने लगे। लीलावती को दुर्लभ रत्न मिल गया। अब उसकी कोई इच्छा शेष नहीं रह गयी। दूसरे दिन प्रात:काल जब घरवालों ने पूजाघर का द्वार खोला तो देखा कि लीलावती बालकृष्ण की मूर्ति को गोद में चिपटाए बेहोश पड़ी है.. सदा सदा के लिए बेहोश.. किन्तु वह बेहोशी इस संसार के होश और होशियारी से कहीं ज्यादा मूल्यवान है जिसमें उसने सदा-सदा के लिए अपने बालकृष्ण को पा लिया.. और बालकृष्ण ने भी उसका दुग्धपान कर उसे दूसरी यशोदा मां का दर्जा दे दिया। ‘मां’ जब मुझको कहा कृष्ण ने, तुच्छ हो गए देव सभी। इतना आदर, इतनी महिमा, इतनी श्रद्धा कहां कभी ? उमड़ा स्नेह-सिन्धु अन्तर में, डूब गयी आसक्ति अपार। देह, गेह, अपमान, क्लेश, छि: ! विजयी मेरा शाश्वत प्यार।। जय जय श्री राधे *संकलित* Good night 🚩🚩🌹🙏

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Mamta Chauhan Apr 15, 2021

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Devendra Tiwari Apr 15, 2021

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संत सूरदास जी के जीवन का एक प्रसंग- एक बार संत सूरदास जी को किसी ने भजन के लिए आमंत्रित किया.. भजन कार्यक्रम के बाद उस व्यक्ति को सूरदास जी को अपने घर तक पहुँचाने का ध्यान नही रहा और वह अन्य अतिथियों की सेवा में व्यस्त हो गया। सूरदास जी ने भी उसे कष्ट नहीं देना चाहा और खुद लाठी लेकर गोविंद–गोविंद करते हुये अंधेरी रात में पैदल घर की ओर निकल पड़े । रास्ते मे एक कुआं पड़ता था । वे लाठी से टटोलते–टटोलते भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते हुये बढ़ रहे थे और चलते चलते कुएं में गिर गये। तो उन्होंने श्रीकृष्ण को पुकारा। कोई बालक आकर बोला बाबा! आप मेरे हाथ पकड लो… मैं आपको निकाल दुंगा। तो सुरदास जी उस बालक का हाथ पकड लिए… जब वो पकडे उनके तन में बिजली सी दौड गई। शरीर रोमांचित होने लगा… बालक का हाथ कमल से भी कोमल है। ऐसा शरीर मैंने कभी छुआ ही नहीं… बालक की शरीर से महक आ रही थी… चंदन,कस्तूरी, तुलसी का भीनी भीनी सुगंध नाशा में प्रवेश कर रही है… दिव्य अनुभूति हो रहा है। अब उन्हें लगा कि उस बालक ने उनकी लाठी पकड़ ली है… मार्ग दिखाकर ले जाने लगा है। तब उन्होंने पूछा - तुम कौन हो ? उत्तर मिला – बाबा! मैं एक बालक हूँ । मैं भी आपका भजन सुन कर लौट रहा हूँ… आपके पिछे पिछे ही आ रहा था। देखा कि आप कुएं में गिर गये हैं…तो दौड कर इधर आ गया । चलिये, आपको आपके घर तक छोड़ दूँ। सूरदास जी ने पूछा- तुम्हारा नाम क्या है पुत्र ? "बाबा! अभी तक माँ ने मेरा नाम नहीं रखा है।‘ तब मैं तुम्हें किस नाम से पुकारूँ ? कोई भी नाम चलेगा बाबा… लोग मुझे तरह तरह के नाम से पुकारते हैं… कितना गिनाउं आपको ? सूरदास जी ने रास्ते में और कई सवाल पूछे। उन्हे लगा कि हो न हो, यह मेरे कन्हैया ही है। वे समझ गए कि आज गोपाल खुद मेरे पास आए हैं । क्यो नहीं मैं इनका हाथ पकड़ लूँ । यह सोंच उन्होने अपना हाथ उस लकड़ी पर श्रीकृष्ण की ओर बढ़ाने लगे । भगवान श्रीकृष्ण उनकी यह चाल समझ गए… वो तो अंतर्यामी हैं ही… उनसे क्या छुपा है । सूरदास जी का हाथ धीरे–धीरे आगे बढ़ रहा था । जब केवल चार अंगुल अंतर रह गया, तब श्रीकृष्ण लाठी को छोड़ दूर चले गए । जैसे उन्होने लाठी छोड़ी, सूरदास जी विह्वल हो गए… आंखो से अश्रुधारा बह निकली । बोले - "मैं अंधा हूँ ,ऐसे अंधे की लाठी छोड़ कर चले जाना क्या कन्हैया तुम्हारी बहादुरी है ? और.. उनके श्रीमुख से वेदना के यह स्वर निकल पड़े “हाथ छुड़ाये जात हो, निर्बल जानि के मोय । हृदय से जब जाओगे, तो सबल जानूँगा तोय ।।" अर्थात् मुझे निर्बल जानकार मेरा हाथ छुड़ा कर जाते हो, पर मेरे हृदय से जाओ तो मैं तुम्हें बलवान कहूँ…पुरुष समझुं। भगवान तो सदैव भक्त के पिछे पिछे चलते हैं… आज भगवान भक्त सुरदास जी के पिछे पिछे चल रहे हैं… भगवान भक्त के हाथ कभी नहीं छोडते। आज भगवान ने सुरदास जी का हाथ पकड लिया। भगवान श्रीकृष्ण सुरदास जी के बात सुनकर बोले… "बाबा! अगर मैं ऐसे भक्तों के हृदय से चला जाऊं तो फिर मैं कहाँ रहूँ ?… आप ही बताओ। मैं ना वैकुंठ में हुं…ना यज्ञ स्थल पर जहां मंत्रों से आहुति दी जाती है। मैं तो भक्तों के हृदय में रहता हूँ… जब वो मुझको स्मरण करते हैं,मैं भी उनका स्मरण करता हूँ। मुझे मेरे पत्नी लक्ष्मी जी उतनी प्रिय नहीं हैं, मुझे दाउ भैया उतने प्रिय नहीं हैं… मेरे स्वांश भगवान शंकर जी उतने प्रिय नहीं हैं… और क्या कहुं मुझे मेरे प्राण जितने प्रिय नहीं हैं…उतने प्रिय मेरे भक्तजन हैं… उनके लिए मैं स्वयं उपस्थित हुं बाबा!… जो मेरा निंदा करता है मैं उसे क्षमा कर सकता हूँ… पर जो मेरे भक्तों की निंदा, अपमान करता है मैं उसको कभी क्षमा नहीं करता… जब वो भक्त क्षमा करेगा तब मैं क्षमा करुंगा। ऋषि दुर्वासा जी ने महाराज अंबरीष जी का अपमान कर दिया… तो भगवान का सुदर्शन चक्र चल पडा… जब ऋषि दुर्वासा ने महाराज अंबरीष से क्षमा मांगे,तब सुदर्शन चक्र अलक्षित हो गया… ऐसो है हमारा कन्हैया… जय श्री कृष्णा जय जगन्नाथ

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kamlesh Goyal Apr 15, 2021

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