SHANTI PATHAK
SHANTI PATHAK Dec 4, 2019

🙏जय श्री हरि विष्णु🙏जय मां लक्ष्मी 🙏शुभ गुरुवार, सुप्रभात🙏 🙏जगतपिता भगवान श्री हरि विष्णु जी का आशीर्वाद आप एवं आपके परिवार पर सदैव बना रहे 🙏आपका दिन शुभ हो🙏

🙏जय श्री हरि विष्णु🙏जय मां लक्ष्मी 🙏शुभ गुरुवार, सुप्रभात🙏
🙏जगतपिता भगवान श्री हरि विष्णु जी का आशीर्वाद आप एवं
आपके परिवार पर सदैव बना रहे 🙏आपका दिन शुभ हो🙏

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कामेंट्स

stn Dec 5, 2019
ॐ गोविन्दाय नमः सुप्रभात वन्दन प्रणाम दीदी जी

SHANTI PATHAK Dec 5, 2019
@kanaramchoudhary1 ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः, सुप्रभात वंदन जी ,आपका हर पल मंगलमय हो

SHANTI PATHAK Dec 5, 2019
@ss1995 ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः,, सुप्रभात वंदन भाईजी, आपका हर पल शुभ एवं मंगलमय हो, प्रणाम जी

B Dec 5, 2019
jai shree Radhe krishna je 💗good morning je 💗🙏💗

B Dec 5, 2019
jai shree Radhe krishna je 💗good morning je 💗🙏💗

B Dec 5, 2019
jai shree Radhe krishna je 💗good morning je 💗🙏💗

🌼कृष्णा🌼 Dec 5, 2019
🌷ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🌷जय श्रीमाता की बहन,🌺सादर चरण स्पर्श करता हूँ मेरी प्यारी बहना रानी, श्रीमाता की कृपा आप पर सदा बनी रहे मेरी बहना, हमेशा खुश रहो प्रसन्न रहो मेरी बहना🌹🌹🙏🙏🙏🌹🌹

SHANTI PATHAK Dec 5, 2019
@kishanतiwaripmanजयमाताकी 🌷🙏ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः🙏जय माता की भाई🙏सादर प्रणाम करती हूं मेरे आदरणीय भाई, आपका हर पल मंगलमय हो आप सदा सुखी रहें स्वस्थ रहें भाई,मातारानी का आशीर्वाद आप एवं आपके परिवार पर सदैव बना रहे मेरे प्रिय भाई, जय माता दी भाई 🙏🙏🙏🙏🌷🌷🌷🌷

SHANTI PATHAK Jan 24, 2020

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हरे कृष्णा | हम १३ फरवरी २०२० से श्रीमद्भागवद्गीता श्लोक प्रति श्लोक फिर से शुरू करेंगे | . *कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- ३.४१ अध्याय ३ : कर्मयोग . . तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ | पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् || ४१ || . . तस्मात् - अतः; त्वम् - तुम; इन्द्रियाणि - इन्द्रियों को ; आदौ - प्रारम्भ में; नियम्य - नियमित करके; भरत-ऋषभ - हे भरत वंशियों में श्रेष्ठ; पाप्मानम् - पाप के महान प्रतीक को; प्रजहि - दमन करो; हि - निश्चय ही; एनम् - इस; ज्ञान - ज्ञान; विज्ञान - तथा शुद्ध आत्मा के वैज्ञानिक ज्ञान का; नाशनम् - संहर्ता, विनाश करने वाला | . . इसलिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! प्रारम्भ में ही इन्द्रियों को वश में करके इस पाप का महान प्रतीक (काम) का दमन करो और ज्ञान तथा आत्म-साक्षात्कार के इस विनाशकर्ता का वध करो । . . तात्पर्य : भगवान् ने अर्जुन को प्रारम्भ से ही इन्द्रिय-संयम करने का उपदेश दिया जिससे वह सबसे पापी शत्रु काम का दमन कर सके जो आत्म-साक्षात्कार तथा आत्मज्ञान की उत्कंठा को विनष्ट करने वाला है । ज्ञान का अर्थ है आत्म तथा अनात्म के भेद का बोध अर्थात् यह ज्ञान कि आत्मा शरीर नहीं है । विज्ञान से आत्मा की स्वाभाविक स्थिति तथा परमात्मा के साथ उसके सम्बन्ध का विशिष्ट ज्ञान सूचित होता है । श्रीमद्भागवत में (२. ९. ३ १ ) इसकी विवेचना इस प्रकार हुई है - . ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदङगं च गृहाण गदितं मया || . 'आत्मा तथा परमात्मा का ज्ञान अत्यन्त गुह्य एवं रहस्यमय है, किन्तु जब स्वयं भगवान् द्वारा इसके विविध पक्षों की विवेचना की जाती है तो ऐसा ज्ञान तथा विज्ञान समझा जा सकता है ।' भगवद्गीता हमें आत्मा का सामान्य तथा विशिष्ट ज्ञान (ज्ञान तथा विज्ञान) प्रदान करती है । जीव भगवान् का भिन्न अंश हैं , अतः वे भगवान् की सेवा के लिए हैं । यह चेतना कृष्णभावनामृत कहलाती है । अतः मनुष्य को जीवन के प्रारम्भ से इस कृष्णभावनामृत को सीखना होता है, जिससे वह पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होकर तदनुसार कर्म करे । . काम ईश्र्वर-प्रेम का विकृत प्रतिबिम्ब है और प्रत्येक जीव के लिए स्वाभाविक है । किन्तु यदि किसी को प्रारम्भ से ही कृष्णभावनामृत की शिक्षा दी जाय तो प्राकृतिक ईश्र्वर-प्रेम काम के रूप में विकृत नहीं हो सकता । एक बार ईश्र्वर-प्रेम के काम रूप में विकृत हो जाने पर इसके मौलिक स्वरूप को पुनः प्राप्त कर पाना दुःसाध्य हो जाता है । फिर भी, कृष्णभावनामृत इतना शक्तिशाली है कि विलम्ब से प्रारम्भ करने वाला भी भक्ति के विधि-विधानों का पालन करके ईश्र्वरप्रेमी बन सकता है । अतः जीवन की किसी भी अवस्था में, या जब भी इसकी अनिवार्यता समझी जाय, मनुष्य कृष्णभावनामृत या भगवद्भक्ति के द्वारा इन्द्रियों को वश में करना प्रारम्भ कर सकता है और काम को भगवत्प्रेम में बदल सकता है , जो मानव जीवन की पूर्णता की चरम अवस्था है । . प्रश्न १ : ज्ञान तथा विज्ञान में क्या अन्तर है ? . प्रश्न २ : कृष्णभावनामृत युक्त चेतना किसे कहते हैं ? मनुष्य किस प्रकार काम को ईश्र्वर-प्रेम में बदल सकता है ? . अब आप हमारी भगवद्गीता एप्प में माध्यम से भी ये श्लोक(चित्र व प्रश्नोत्तर सहित) सीधे अपने एंड्राइड फ़ोन में पा सकते हैं | कृपया इसे यहाँ से डाउनलोड करें : Bhagavad Gita Multilingual

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sunita Sharma Jan 24, 2020

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Durga Pawan Sharma Jan 25, 2020

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“ श्री यन्त्र पूजन विधान (संक्षिप्त) “ 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ ( “प्रपञ्चसार तन्त्र”, “श्रीविद्यार्णव तन्त्र” एवं “शारदातिलक तन्त्र” के आधार पर ) विनियोगः- 〰️〰️〰️ ॐ हिरण्य – वर्णामित्यादि-पञ्चदशर्चस्य श्रीसूक्तस्याद्यायाः ऋचः श्री ऋषिः तां म आवहेति चतुर्दशानामृचां आनन्द-कर्दम-चिक्लीत-इन्दिरा-सुताश्चत्वारः ऋचयः, आद्य-मन्त्र-त्रयाणां अनुष्टुप् छन्दः, कांसोऽस्मीत्यस्याः चतुर्थ्या वृहती छन्दः, पञ्चम-षष्ठयोः त्रिष्टुप् छन्दः, ततोऽष्टावनुष्टुभः, अन्त्या प्रस्तार-पंक्तिः छन्दः । श्रीरग्निश्च देवते । हिरण्य-वर्णां बीजं । “तां म आवह जातवेद” शक्तिः । कीर्तिसमृद्धिं ददातु मे” कीलकम् । मम श्रीमहालक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः। ऋष्यादि-न्यासः- 〰️〰️〰️〰️〰️ श्री-आनन्द-कर्दम-चिक्लीत-इन्दिरा-सुतेभ्यः ऋषिभ्यो नमः-शिरसि । अनुष्टुप्-बृहती-त्रिष्टुप्-प्रस्तार-पंक्ति-छन्दोभ्यो नमः-मुखे । श्रीरग्निश्च देवताभ्यां नमः – हृदि । हिरण्य-वर्णां बीजाय नमः गुह्ये । “तां म आवह जातवेद” शक्तये नमः – पादयो । कीर्तिसमृद्धिं ददातु मे” कीलकाय नमः नाभौ ।मम श्रीमहालक्ष्मी-प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमःसर्वांगे। अंग-न्यासः- 〰️〰️〰️〰️ ‘श्री-सूक्त’ के मन्त्रों में से एक-एक मन्त्र का उच्चारण करते हुए दाहिने हाथ की अँगुलियों से क्रमशः सिर, नेत्र, कान, नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों बाहु, हृदय, नाभि, लिंग, पायु (गुदा), उरु (जाँघ), जानु (घुटना), जँघा और पैरों में न्यास करें । १👉 ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम् । चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह ।। – शिरसि २👉 ॐ तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम् ।। – नेत्रयोः ३👉 ॐ अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम् । श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम् ।। – कर्णयोः ४👉 ॐ कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं । पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ।। – नासिकायाम् ५👉 ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम् । तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि ।। – मुखे ६👉 ॐ आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः । तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ।। – कण्ठे ७॰👉 ॐ उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे ।। – बाह्वोः ८👉 ॐ क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात् ।। – हृदये ९👉 ॐ गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम् ।। – नाभौ १०👉 ॐ मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि । पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः ।। – लिंगे ११👉 ॐ कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भव-कर्दम । श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम् ।। – पायौ १२👉 ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ।। – उर्वोः १३👉 ॐ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह ।। – जान्वोः १४👉 ॐ आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह ।। – जंघयोः १५👉 ॐ तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम् ।। – पादयोः षडङ्ग-न्यास〰️कर-न्यास〰️अंग-न्यास 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ हिरण्य-मय्यै नमः अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः ॐ चन्द्रायै नमः तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा ॐ रजत-स्रजायै नमः मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट् ॐ हिरण्य-स्रजायै नमः अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुम् ॐ हिरण्यायै नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट् ॐ हिरण्य-वर्णायै नमः करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट् दिग्-बन्धनः- “ॐ भूर्भुवः स्वरोम्” से दिग्-बन्धन करें । ध्यानः- 〰️〰️ या सा पद्मासनस्था विपुल-कटि-तटी पद्म-पत्रायताक्षी, गम्भीरावर्त्त-नाभि-स्तन-भार-नमिता शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया । लक्ष्मीर्दिव्यैर्गन्ध-मणि-गण-खचितैः स्नापिता हेम-कुम्भैः, नित्यं सा पद्म-हस्ता मम वसतु गृहे सर्व-मांगल्य-युक्ता ।। अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः-पुञ्ज-वर्णा, कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च। मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैः सकल-भुवन-माता ,सन्ततं श्रीः श्रियै नः।। मानस-पूजनः- इस प्रकार ध्यान करके भगवती लक्ष्मी का मानस पूजन करें - 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॐ लं पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-कनिष्ठांगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (अधोमुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-तर्जनी-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ रं वह्नयात्मकं दीपं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि । (ऊर्ध्व-मुख-मध्यमा-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-अनामिका-अंगुष्ठ-मुद्रा) । ॐ शं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं श्रीमहा-लक्ष्मी-श्रीपादुकाभ्यां नमः अनुकल्पयामि (ऊर्ध्व-मुख-सर्वांगुलि-मुद्रा) । अब सर्व-देवोपयोगी पद्धति से( पात्रासादन पूजनं ) अर्घ्य एवं पाध्य -आचमनीय आदि पात्रों की स्थापना करके पीठ-पूजन करें। ‘सर्वतोभद्र-मण्डल′ आदि पर निम्न ‘पूजन-यन्त्र’ की स्थापना करके मण्डूकादि-पर-तत्त्वान्त देवताओं की पूजा करें । तत्पश्चात् पूर्वादि-क्रम से भगवती लक्ष्मी की पीठ-शक्तियों की अर्चना करें। यथा - श्री विभूत्यै नमः, श्री उन्नत्यै नमः, श्री कान्त्यै नमः, श्री सृष्ट्यै नमः, श्री कीर्त्यै नमः, श्री सन्नत्यै नमः, श्री व्युष्ट्यै नमः, श्री उत्कृष्ट्यै नमः। मध्य में – ‘श्री ऋद्धयै नमः ।’ पुष्पाञ्जलि समर्पित कर मध्य में प्रसून-तूलिका की कल्पना करके - “श्री सर्व-शक्ति-कमलासनाय नमः” इस मन्त्र से समग्र ‘पीठ‘ का पूजन करे। ‘सहस्रार’ में गुरुदेव का पूजन कर एवं उनसे आज्ञा लेकर पूर्व-वत् पुनः ‘षडंग-न्यास’ करे। भगवती लक्ष्मी का ध्यान कर पर-संवित्-स्वरुपिणी तेजो-मयी देवी लक्ष्मी को नासा-पुट से पुष्पाञ्जलि में लाकर आह्वान करे। यथा - ॐ देवेशि ! भक्ति-सुलभे, परिवार-समन्विते ! तावत् त्वां पूजयिष्यामि, तावत् त्वं स्थिरा भव ! हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्रजाम् । चन्द्रां हिरण्य-मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह ।। श्री महा-लक्ष्मि ! इहागच्छ, इहागच्छ, इह सन्तिष्ठ, इह सन्तिष्ठ, इह सन्निधेहि, इह सन्निधेहि, इह सन्निरुध्वस्व, इह सन्निरुध्वस्व, इह सम्मुखी भव, इह अवगुण्ठिता भव ! आवाहनादि नव मुद्राएँ दिखाकर ‘अमृतीकरण’ एवं ‘परमीकरण’ करके – “ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः प्राणाः । ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः जीव इह स्थितः । ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः सर्वेन्द्रियाणि । ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हौं हंसः श्रीमहा-लक्ष्मी-देवतायाः वाङ्-मनो-चक्षु-श्रोत्र-घ्राण-प्राण-पदानि इहैवागत्य सुखं चिर तिष्ठन्तु स्वाहा ।। ” इस प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र से लेलिहान-मुद्रा-पूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा करे । उक्त प्रकार आवाहनादि करके यथोपलब्ध द्रव्यों से भगवती की राजसी पूजा करे । यथा - १👉 आसन - ॐ तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम् ।। ।। हे महा-लक्ष्मि ! तुभ्यं पद्मासनं कल्पयामि नमः ।। देवी के वाम भाग में कमल-पुष्प स्थापित करके ‘सिंहासन-मुद्रा’ और ‘पद्म-मुद्रा’ दिखाए । २👉 अर्घ्य-दान - ॐ अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रबोधिनीम् । श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम् ।। ।। हे महा-लक्ष्मि ! एतत् ते अर्घ्यं कल्पयामि स्वाहा ।। ‘कमल-मुद्रा’ से भगवती के शिर पर अर्घ्य प्रदान करे । ३👉 पाद्य - ॐ कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं । पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ।। ।। हे महा-लक्ष्मि ! पाद्यं कल्पयामि नमः ।। चरण-कमलों में ‘पाद्य’ समर्पित करके प्रणाम करे । ४👉 आचमनीय - ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम् । तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै आचमनीयं कल्पयामि नमः ।। मुख में आचमन प्रदान करके प्रणाम करे । ५👉 मधु-पर्क - ॐ आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः । तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ।। ।। श्री महालक्ष्म्यै मधु-पर्क कल्पयामि स्वधा । पुनराचमनीयम् कल्पयामि ।। पुनः आचमन समर्पित करें । ६👉 स्नान (सुगन्धित द्रव्यों से उद्वर्तन करके स्नान कराए) - ॐ उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह । प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै स्नानं कल्पयामि नमः ।। ‘स्नान’ कराकर केशादि मार्जन करने के बाद वस्त्र प्रदान करे । इसके पूर्व पुनः आचमन कराए । ७👉 वस्त्र - ॐ क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै वाससी परिकल्पयामि नमः ।। पुनः आचमन कराए । ८👉 आभूषण - ॐ गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै सुवर्णानि भूषणानि कल्पयामि ।। ९👉 गन्ध - ॐ मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि । पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै गन्धं समर्पयामि नमः ।। १०👉 पुष्प - ॐ कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भव-कर्दम । श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै एतानि पुष्पाणि वौषट् ।। ११👉 धूप - ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ।। ॐ वनस्पति-रसोद्-भूतः, गन्धाढ्यो गन्धः उत्तमः । आघ्रेयः सर्व-देवानां, धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ।। ।।श्री महा-लक्ष्म्यै धूपं आघ्रापयामि नमः ।। १२👉 दीप - ॐ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह ।। ॐ सुप्रकाशो महा-दीपः, सर्वतः तिमिरापहः । स बाह्यान्तर-ज्योतिः, दीपोऽयं प्रति-गृह्यताम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै प्रदीपं दर्शयामि नमः ।। दीपक दिखाकर प्रणाम करे । पुनः आचमन कराए । १३👉 नैवेद्य - देवी के समक्ष ‘चतुरस्र-मण्डल′ बनाकर उस पर ‘त्रिपादिका-आधार’ स्थापित करे । षट्-रस व्यञ्जन-युक्त ‘नैवेद्य-पात्र’ उस आधार पर रखें । ‘वायु-बीज’ (यं) नैवेद्य के दोषों को सुखाकर, ‘अग्नि-बीज’ (रं) से उसका दहन करे । ‘सुधा-बीज’ (वं) से नैवेद्य का ‘अमृतीकरण’ करें । बाँएँ हाथ के अँगूठे से नैवेद्य-पात्र को स्पर्श करते हुए दाहिने हाथ में सुसंस्कृत अमृत-मय जल-पात्र लेकर ‘नैवेद्य’ समर्पित करें - ॐ आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह ।। ॐ सत्पात्र-सिद्धं सुहविः, विविधानेक-भक्षणम् । नैवेद्यं निवेदयामि, सानुगाय गृहाण तत् ।। ।। श्री महा-लक्ष्म्यै नैवेद्यं निवेदयामि नमः ।। चुलूकोदक (दाईं हथेली में जल) से ‘नैवेद्य’ समर्पित करें । दूसरे पात्र में अमृतीकरण जल लेकर “ॐ हिरण्य-वर्णाम्” – इस प्रथम ऋचा का पाठ करके – “श्री महा-लक्ष्म्यै अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा” । श्री महा-लक्ष्मि ! अपोशनं कल्पयामि स्वाहा । तत्पश्चात् “प्राणाय स्वाहा” आदि का उच्चारण करते हुए ‘पञ्च प्राण-मुद्राएँ’ दिखाएँ । “हिरण्य-वर्णाम्” – इस प्रथम ऋचा का दस बार पाठ करके समर्पित करें । फिर ‘उत्तरापोशन’ कराएँ । ‘नैवेद्य-मुद्रा’ दिखाकर प्रणाम करें । ‘नैवेद्य-पात्र’ को ईशान या उत्तर दिशा में रखें । नैवेद्य-स्थान को जल से साफ कर ताम्बूल प्रदान करें । १४👉 ताम्बूल - ॐ तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम् ।। ।। श्री महा-लक्ष्मि ! ऐं हं हं हं इदम् ताम्बूलं गृहाण, स्वाहा ।। ‘ताम्बूल′ देकर प्रणाम करें । आवरण-पूजा पुरश्चरण-विधान आवरण-पूजा भगवती से उनके परिवार की अर्चना हेतु अनुमति माँग कर ‘आवरण-पूजा’ करे । यथा - ॐ संविन्मयि ! परे देवि ! परामृत-रस-प्रिये ! अनुज्ञां देहि मे मातः ! परिवारार्चनाय ते ।। प्रथम आवरण👉 केसरों में ‘षडंग-शक्तियों’ का पूजन करे - १👉 हिरण्य-मय्यै नमः हृदयाय नमः । हृदय-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । २👉 चन्द्रायै नमः शिरसे स्वाहा । शिरः-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ३👉 रजत-स्रजायै नमः शिखायै वषट् । शिखा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ४👉 हिरण्य-स्रजायै नमः कवचाय हुम् । कवच-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ५👉 हिरण्यायै नमः नेत्र-त्रयाय वौषट् । नेत्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ६👉 हिरण्य-वर्णायै नमः अस्त्राय फट् । अस्त्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । प्रथम आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा - ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, प्रथमावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। पुष्पाञ्जलि प्रदान करे । द्वितीय आवरण👉 पत्रों में पूर्व से प्रारम्भ करके वामावर्त-क्रम से ‘पद्मा, पद्म-वर्णा, पद्मस्था, आर्द्रा, तर्पयन्ती, तृप्ता, ज्वलन्ती’ एवं ‘स्वर्ण-प्राकारा’ का पूजन-तर्पण करे । यथा - १👉 पद्मायै नमः । पद्मा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । २👉 पद्म-वर्णायै नमः । पद्म-वर्णा–श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ३👉 पद्मस्थायै नमः । पद्मस्था-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ४👉 आर्द्रायै नमः । आर्द्रा–श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ५👉 तर्पयन्त्यै नमः । तर्पयन्ती-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ६👉 तृप्तायै नमः । तृप्ता-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ७👉 ज्वलन्त्यै नमः । ज्वलन्ती-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । ८👉 स्वर्ण-प्राकारायै नमः । स्वर्ण-प्राकारा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः । द्वितीय आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा - ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, द्वितीयावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। तृतीय आवरण👉 भू-पुर में इन्द्र आदि दिक्-पालों का पूजन-तर्पण करे । यथा - लं इन्द्राय नमः – पूर्वे । रं अग्न्ये नमः – अग्नि कोणे । यं यमाय नमः – दक्षिणे । क्षं निऋतये नमः – नैऋत-कोणे । वं वरुणाय नमः – पश्चिमे । यं वायवे नमः – वायु-कोणे । सं सोमाय नमः – उत्तरे । हां ईशानाय नमः – ईशान-कोणे । आं ब्रह्मणे नमः – इन्द्र और ईशान के बीच । ह्रीं अनन्ताय नमः – वरुण और निऋति के बीच । तृतीय आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा - ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, तृतीयावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। चतुर्थ आवरण👉 इन्द्रादि दिक्पालों के समीप ही उनके ‘वज्र’ आदि आयुधों का अर्चन करें । यथा - ॐ वं वज्राय नमः, ॐ वज्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ शं शक्तये नमः, ॐ शक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ दं दण्डाय नमः, ॐ दण्ड-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ खं खड्गाय नमः, ॐ खड्ग-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ पां पाशाय नमः, ॐ पाश-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ अं अंकुशाय नमः, ॐ अंकुश-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ गं गदायै नमः, ॐ गदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ त्रिं त्रिशूलाय नमः, ॐ त्रिशूल-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ पं पद्माय नमः, ॐ पद्म-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ॐ चं चक्राय नमः, ॐ चक्र-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। चतुर्थ आवरण की पूजा कर फल भगवती को समर्पित करें । यथा - ॐ अभीष्ट-सिद्धिं मे देहि, शरणागत-वत्सले ! भक्तया समर्पये तुभ्यं, चतुर्थावरणार्चनम् ।। पूजिताः तर्पिताः सन्तु महा-लक्ष्म्यै नमः ।। प्रथम ऋचा से कर्णिका में महा-देवी महा-लक्ष्मी का पुष्प-धूप-गन्ध, दीप और नैवेद्य आदि उपचारों से पुनः पूजन करें । तत्पश्वात् पूजा-यन्त्र में देवी के समक्ष गन्ध-पुष्प-अक्षत से भगवती के ३२ नामों से पूजन-तर्पण करें । १👉 ॐ श्रियै नमः । श्री-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २👉 ॐ लक्ष्म्यै नमः । लक्ष्मी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ३👉 ॐ वरदायै नमः । वरदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ४👉 ॐ विष्णु-पत्न्यै नमः । विष्णु-पत्नी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ५👉 ॐ वसु-प्रदायै नमः । वसु-प्रदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ६👉 ॐ हिरण्य-रुपिण्यै नमः । हिरण्य-रुपिणी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ७👉 ॐ स्वर्ण-मालिन्यै नमः । स्वर्ण-मालिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ८👉 ॐ रजत-स्रजायै नमः । रजत-स्रजा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ९👉 ॐ स्वर्ण-गृहायै नमः । स्वर्ण-गृहा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १०👉 ॐ स्वर्ण-प्राकारायै नमः । स्वर्ण-प्राकारा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ११👉 ॐ पद्म-वासिन्यै नमः । पद्म-वासिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १२👉 ॐ पद्म-हस्तायै नमः । पद्म-हस्ता-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १३👉 ॐ पद्म-प्रियायै नमः । पद्म-प्रिया-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १४👉 ॐ मुक्तालंकारायै नमः । मुक्तालंकारा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १५👉 ॐ सूर्यायै नमः । सूर्या-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १६👉 ॐ चन्द्रायै नमः । चन्द्रा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १७👉 ॐ बिल्व-प्रियायै नमः । बिल्व-प्रिया-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १८👉 ॐ ईश्वर्यै नमः । ईश्वरी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। १९👉 ॐ भुक्तयै नमः । भुक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २०👉ॐ प्रभुक्तयै नमः । प्रभुक्ति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २१👉 ॐ विभूत्यै नमः । विभूति-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २२👉 ॐ ऋद्धयै नमः । ऋद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २३👉 ॐ समृद्धयै नमः । समृद्धि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २४👉 ॐ तुष्टयै नमः । तुष्टि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २५👉 ॐ पुष्टयै नमः । पुष्टि-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २६👉 ॐ धनदायै नमः । धनदा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २७👉 ॐ धनेश्वर्यै नमः । धनेश्वरी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २८👉 ॐ श्रद्धायै नमः । श्रद्धा-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। २९👉 ॐ भोगिन्यै नमः । भोगिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ३०👉 ॐ भोगदायै नमः । भोगिनी-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ३१👉 ॐ धात्र्यै नमः । धात्री-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। ३२👉 ॐ विधात्र्यै नमः । विधात्री-श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः। उपर्युक्त ३२ नामों से भगवती के निमित्त हविष्य ‘बलि’ प्रदान करने का भी विधान है । श्री-सूक्त की पन्द्रह ऋचाओं से नीराजन और प्रदक्षिणा करके पुष्पाञ्जलि प्रदान करे । तदुपरान्त पुनः न्यास करके श्री-सूक्त का पाठ करे । ‘क्षमापन-स्तोत्र’ का पाठ करके पूजन और पाठ का फल भगवती को समर्पित करके विसर्जन करे । विशेष👉 पुरश्चरण-काल में और बाद में भी प्रति-दिन सूर्योदय के समय जलाशय में स्नान करके सूर्य-मण्डलस्था भगवती महा-लक्ष्मी का उपर्युक्त ३२ नामों से तर्पण करना ‘श्री-सूक्त’ के साधकों के लिए आवश्यक है ।( संक्षिप्त आराधन ) माँ पराअंबा भगवती राजराजेश्वरी महालक्ष्मी प्रसन्नोस्तु 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Pushpa Sharma Jan 26, 2020

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