. "सन्त चरित्र" "दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी महाराज" दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी का जन्म एक अति निर्धन ब्राह्मण-परिवार में कुरुक्षेत्र भूमि के अन्तर्गत जिला जीन्द में रामहृद (रामराय) में हुआ था। वे बाल ब्रह्मचारी और बहुत कम पढ़े-लिखे थे, परंतु संतों के मुख से सुने शास्त्रों पर विश्वास करते थे। ब्रह्मचारी जीवन उन्होंने अपने जन्म-स्थान रामराय में ही माता कृष्णा देवी के आश्रम में बिताया। माताजी के देह त्याग देने के बाद उनको कृष्णाधाम आश्रम रामराय जिला जीन्द हरियाणा की गद्दी पर बिठा दिया गया, परंतु मात्र एक माह के बाद ही वे रात को आश्रम को छोड़ ऋषिकेश में आकर संन्यास लेकर मौन धारण करके रहने लगे। आश्रम के लोग ढूँढ़ते रहे। हरिद्वार में भी उनका कृष्णाधाम आश्रम 'खड़खड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ पर उन्होंने देवीस्वरूप शास्त्रीजी को प्रबन्धक बनाया था। शास्त्रीजी ने उनको ढूँढ़ लिया तथा उनसे आग्रह किया, जैसे आप ऋषिकेश में रह रहे हैं, वैसे ही आप अपने आश्रम में रहिये। इसपर वे हरिद्वार आ गये। दुर्भाग्य से देवीस्वरूप शास्त्रीजी का निधन हो गया। शास्त्रीजी के निधन के बाद आश्रम को स्वामी केवलाश्रमजी महाराज को सँभालना पड़ा। वे नित्य-प्रति गंगा-स्नान करते थे। आश्रम के अधिष्ठाता होते हुए भी भिक्षा करके भोजन करते थे। उत्तरी हरिद्वार में उस समय पशु-अस्पताल नहीं था। जिस किसी आश्रम की गाय बीमार हो जाती, वे लोग स्वामीजी को बुलाकर ले जाते। वे गाय के स्वस्थ होने की दवाई एवं टोटके जानते थे। कोई भी व्यक्ति बीमार गाय के उपचार के लिये उन्हें बुलाने आता तो वे भजन छोड़कर तुरन्त उसके साथ चले जाते। एक दिन मैंने कहा, भजन करने के बाद चले जाना। उन्होंने कहा गोसेवा भी भजन ही है। वे आश्रम की गाय स्वयं चराने जाते थे। एक दिन उनको साँप ने काट लिया। आकर कहने लगे साँप ने मुँह लगा दिया। साँप का दोष नहीं था। मेरा ध्यान गाय की तरफ था। मेरा पैर साँप पर पड़ गया। हमने कहा, अस्पताल चलो। जहाँ सर्प ने काटा था, वहाँ नीला एवं बहुत बड़ा निशान पड़ गया था। कहा-ठीक हो जायगा। चिन्ता ना करो, बहुत आग्रह करने पर भी अस्पताल नहीं गये। कहने लगे, 'अभी मेरी मृत्यु नहीं है। तुम चिन्ता न करो'। कभी भी हमने उनको क्रोध आदि करते हुए नहीं देखा। गंगा-स्नान, गो-सेवा, भजन उनके नित्य के कार्य थे। आश्रम में अनेक दण्डी स्वामी महात्मा रहते थे। उनमें बहुत-से अतिवृद्ध महात्मा भी थे। वे उनकी नित्य-प्रति स्वयं सेवा करते थे। बीमार होने पर सभी महात्माओं की स्वयं सेवा करते थे। वर्ष १९८७ में श्रीस्वामीजी हरियाणा गये थे। वहाँ एक पागल कुत्ते ने काट लिया। उनको अस्पताल लेकर में गये, वहाँ पर संयोग से कुत्ते के काटने के उपचार सम्बन्धी इंजेक्शन नहीं मिले। दुबारा बहुत प्रयास किया गया, पर वे अस्पताल नहीं गये। कहा-यदि प्रभु चाहते तो मैं अस्पताल गया था। इंजेक्शन मिल जाता, उनकी अब यही इच्छा है। वे जीवन में बीमार पड़ते तो कभी दवाई नहीं लेते। अपने-आप ही काढ़ा आदि बनाकर पी लेते थे। दवाई कभी नहीं ली। महीनों के बाद मैं हरियाणा से आया था। जैसे मेरी आवाज सुनी, कमरे से बाहर आकर कहने लगे-भाई, आज जितनी दवाई देनी है, दे दे। जिस डॉक्टर को दिखाना हो दिखा ले। नहीं तो कहेगा कि स्वामीजी को दवाई दिला देते तो बच जाते। अब तू अपने मन की कर ले। उस समय आश्रम में गाड़ी नहीं थी। हम टैम्पो करके उनको जी०डी० अस्पताल में ले गये। डॉक्टर ने देखते ही कह दिया पागल कुत्ते के काटने से होने वाली बीमारी हो गयी है। अब ये बच नहीं सकते। हम वापस आश्रम में ले आये और सबसे पीछे के कमरे में लिटा दिया। सभी आश्रम वाले पता लगते ही आ गये। उनके प्रति सभी लोग श्रद्धा रखते थे। तीन-चार आश्रमवालों ने अपने स्तर से तीन-चार डॉक्टर, जो उस समय बहुत प्रसिद्ध थे, बुला लिये। सभी डॉक्टरों ने एक मत से कहा ये ७२ घण्टे तड़पेगे, दीवारों पर सिर पारेंगे, काटने दौड़ेंगे, जिसको भी इनके नाखून लार या दाँत लगा जायगा, वे भी ऐसे ही मरेंगे। अतः तुरन्त इनको जी०डी० अस्पतालय दाखिल कराओ। जब डॉक्टर लोग इस प्रकार की बात कर रहे थे, तो श्रीस्वामी जी ने एक छात्र को भेजकर मुझे बुलवाया तथा कहा- भाई, इन डॉक्टरों की बातों में नहीं आना, मेरे कारण आश्रय में कोई हानि नहीं होगी। मुझे सायं ०५ बजे तक जीना है। अगर तेरा दिल मानता है तो मुझको आश्रय में ही मरने दें, नहीं तो मेरे को गंगाजी के किनारे डाल दो। अस्पताल नहीं भेजना। वे मात्र 'ओम् ओम् ' बोल रहे थे। जब उनको बहुत अधिक कष्ट होता था तो 'ओम् ओम्' करके दीवार की तरफ मुख कर लेते, फिर दर्द कम होते ही 'ओम-ओम' करके मुँह इधर कर लेते। डॉक्टरों ने कहा था कि पानी देखते ही बेहोश हो जायेंगे, परंतु उन्होंने एक कमण्डलु गंगाजल पीया उसी दिन परम पूज्य शंकराचार्य दण्डी स्वामी माधवाश्रमजी महाराज हरिद्वार में भागवत की कथा कर रहे थे। वे भी इनके अन्तिम दर्शनों के लिये आये और उन्होंने कथा में कह दिया ओ समाज के लोगों! अगर तुम्हें भजन का प्रभाव देखना है तो कृष्णाधाम आश्रम खड़खड़ी हरिद्वार में चले जाओ। अगर ये बीमारी तुम किसी को भी होती तो तड़पते, रोते, बिलखते, परंतु एक सन्त इस बीमारी से संघर्ष कर रहे हैं। सिवाय 'ओम्' के एक शब्द नहीं बोल रहे। शंकराचार्यजी के इतना कहने के बाद कृष्णाधाम में मेला लग गया। हजारों लोग आते उनके दर्शन करके चले जाते, उनका कमरा अन्तिम समय तक खुला रहा। दो महात्मा उनकी सेवा के लिये उनके पास रहे, जो लोग आ रहे थे। उनके पैर छूकर जाते, उनसे किसी को भय नहीं लगा और ना ही वे 'ओम् ओम् के सिवाय कुछ बोले और उन्होंने आने-जाने वालो का ध्यान भी नहीं किया। उस समय मेरठ से पं० फूलचन्दजी आये हुए थे। उनको बुलाकर कहने लगे पण्डितजी मुहूर्त देखो। पण्डितजी ने कहा-किसी विषय का मुहूर्त देखूँ ? कहने लगे, मेरा मुहूर्त तो ५ बजे का है। इससे पहले मरने का मुहूर्त बनता हो तो मैं पहले चला जाऊँ। जागेराम शास्त्री बहुत दुखी हो रहा है। पण्डितजी कुछ नहीं बोले, रोने लग गये, ठीक ५ बजे एक सन्त आये। वे आकर रोने लगे। स्वामी जी कहने लगे, सन्तजी! क्यों रोते हो, मुझे कहने लगे तेरे आश्रम में सन्तजी आये हैं। इसको दूध पिला। यह कहकर फिर 'ओम ओम' कहने लगे। इतने में सन्त को गेट तक छोड़कर आया। उस समय उनके पास दण्डी स्वामी श्रीमुरारी आश्रम तथा दण्डी स्वामी श्रीरामानन्द आश्रम सेवा में थे। स्वामी जी के कहने पर उन्होंने उन्हें नीचे आसन बिछाकर बैठाया। पद्मासन उन्होंने स्वयं लगा लिया। जब कमण्डलु से उनको गंगाजल पिला रहे थे तब मैंने कहा-नीचे क्यों बैठाया ? अभी मैं पूरा बोल भी नहीं पाया कि उन्होंने 'ओम ओम्' का उच्चारण किया और गंगाजल मुख में लेते ही उन्होंने प्राण छोड़ दिये। स्वामी मुरारी आश्रमजी कहने लगे-ये तो सदा के लिये ही बैठ गये। उस समय तक तीनों डॉक्टर आश्रम में ही थे। डॉक्टरों ने स्वयं कहा कि ये हमारे मेडिकल साइंस के एकदम विपरीत अद्भुत घटना घटी है। एक डॉक्टर बंगाली सिपाहा नाम से थे। कहने लगे-मैंने जीवन में ऐसी घटना कभी नहीं देखी। तीनों डॉक्टरों ने स्वामीजी के शरीर को प्रणाम किया। उस घटना से यह सिद्ध होता है। कर्म के भोग तो हर हालत में सभी महापुरुषों को भोगने पड़ते हैं। कुत्ते का काटना तथा वह बीमारी होना तो कर्म के भोग निश्चित थे। परंतु गौसेवा, श्रीगंगासेवा, सन्त सेवा, भगवद्धजन डॉक्टरों के अनुसार मेडिकल साइंस को मात दे सकते हैं। आज श्रीदण्डी स्वामी केवलाश्रमजी महाराज के मात्र आशीर्वाद से कृष्णाधाम अन्नक्षेत्र में सैकड़ों महात्मा और जरूरतमन्द निशुल्क भोजन करते हैं। दान देने वाले भी स्वतः आते हैं और खाने वाले भी स्वत: आते हैं। यह भगवान् के भजन, गोसेवा, गंगासेवा, सन्तसेवा का अनुपम प्रभाव है। ----------:::×:::---------- -श्रीआगेरामजी शास्त्री पत्रिका: कल्याण (९३।८) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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            "दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी महाराज"

          दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी का जन्म एक अति निर्धन ब्राह्मण-परिवार में कुरुक्षेत्र भूमि के अन्तर्गत जिला जीन्द में रामहृद (रामराय) में हुआ था। वे बाल ब्रह्मचारी और बहुत कम पढ़े-लिखे थे, परंतु संतों के मुख से सुने शास्त्रों पर विश्वास करते थे। ब्रह्मचारी जीवन उन्होंने अपने जन्म-स्थान रामराय में ही माता कृष्णा देवी के आश्रम में बिताया। माताजी के देह त्याग देने के बाद उनको कृष्णाधाम आश्रम रामराय जिला जीन्द हरियाणा की गद्दी पर बिठा दिया गया, परंतु मात्र एक माह के बाद ही वे रात को आश्रम को छोड़ ऋषिकेश में आकर संन्यास लेकर मौन धारण करके रहने लगे। आश्रम के लोग ढूँढ़ते रहे। हरिद्वार में भी उनका कृष्णाधाम आश्रम 'खड़खड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ पर उन्होंने देवीस्वरूप शास्त्रीजी को प्रबन्धक बनाया था।
          शास्त्रीजी ने उनको ढूँढ़ लिया तथा उनसे आग्रह किया, जैसे आप ऋषिकेश में रह रहे हैं, वैसे ही आप अपने आश्रम में रहिये। इसपर वे हरिद्वार आ गये। दुर्भाग्य से देवीस्वरूप शास्त्रीजी का निधन हो गया। शास्त्रीजी के निधन के बाद आश्रम को स्वामी केवलाश्रमजी महाराज को सँभालना पड़ा। वे नित्य-प्रति गंगा-स्नान करते थे। आश्रम के अधिष्ठाता होते हुए भी भिक्षा करके भोजन करते थे। उत्तरी हरिद्वार में उस समय पशु-अस्पताल नहीं था। जिस किसी आश्रम की गाय बीमार हो जाती, वे लोग स्वामीजी को बुलाकर ले जाते। वे गाय के स्वस्थ होने की दवाई एवं टोटके जानते थे। कोई भी व्यक्ति बीमार गाय के उपचार के लिये उन्हें बुलाने आता तो वे भजन छोड़कर तुरन्त उसके साथ चले जाते।
          एक दिन मैंने कहा, भजन करने के बाद चले जाना। उन्होंने कहा गोसेवा भी भजन ही है। वे आश्रम की गाय स्वयं चराने जाते थे। एक दिन उनको साँप ने काट लिया। आकर कहने लगे साँप ने मुँह लगा दिया। साँप का दोष नहीं था। मेरा ध्यान गाय की तरफ था। मेरा पैर साँप पर पड़ गया। हमने कहा, अस्पताल चलो। जहाँ सर्प ने काटा था, वहाँ नीला एवं बहुत बड़ा निशान पड़ गया था। कहा-ठीक हो जायगा। चिन्ता ना करो, बहुत आग्रह करने पर भी अस्पताल नहीं गये। कहने लगे, 'अभी मेरी मृत्यु नहीं है। तुम चिन्ता न करो'। कभी भी हमने उनको क्रोध आदि करते हुए नहीं देखा। गंगा-स्नान, गो-सेवा, भजन उनके नित्य के कार्य थे। आश्रम में अनेक दण्डी स्वामी महात्मा रहते थे। उनमें बहुत-से अतिवृद्ध महात्मा भी थे। वे उनकी नित्य-प्रति स्वयं सेवा करते थे। बीमार होने पर सभी महात्माओं की स्वयं सेवा करते थे।
          वर्ष १९८७ में श्रीस्वामीजी हरियाणा गये थे। वहाँ एक पागल कुत्ते ने काट लिया। उनको अस्पताल लेकर में गये, वहाँ पर संयोग से कुत्ते के काटने के उपचार सम्बन्धी इंजेक्शन नहीं मिले। दुबारा बहुत प्रयास किया गया, पर वे अस्पताल नहीं गये। कहा-यदि प्रभु चाहते तो मैं अस्पताल गया था। इंजेक्शन मिल जाता, उनकी अब यही इच्छा है। वे जीवन में बीमार पड़ते तो कभी दवाई नहीं लेते। अपने-आप ही काढ़ा आदि बनाकर पी लेते थे। दवाई कभी नहीं ली। महीनों के बाद मैं हरियाणा से आया था। जैसे मेरी आवाज सुनी, कमरे से बाहर आकर कहने लगे-भाई, आज जितनी दवाई देनी है, दे दे। जिस डॉक्टर को दिखाना हो दिखा ले। नहीं तो कहेगा कि स्वामीजी को दवाई दिला देते तो बच जाते। अब तू अपने मन की कर ले।
          उस समय आश्रम में गाड़ी नहीं थी। हम टैम्पो करके उनको जी०डी० अस्पताल में ले गये। डॉक्टर ने देखते ही कह दिया पागल कुत्ते के काटने से होने वाली बीमारी हो गयी है। अब ये बच नहीं सकते। हम वापस आश्रम में ले आये और सबसे पीछे के कमरे में लिटा दिया। सभी आश्रम वाले पता लगते ही आ गये। उनके प्रति सभी लोग श्रद्धा रखते थे। तीन-चार आश्रमवालों ने अपने स्तर से तीन-चार डॉक्टर, जो उस समय बहुत प्रसिद्ध थे, बुला लिये। सभी डॉक्टरों ने एक मत से कहा ये ७२ घण्टे तड़पेगे, दीवारों पर सिर पारेंगे, काटने दौड़ेंगे, जिसको भी इनके नाखून लार या दाँत लगा जायगा, वे भी ऐसे ही मरेंगे। अतः तुरन्त इनको जी०डी० अस्पतालय दाखिल कराओ। जब डॉक्टर लोग इस प्रकार की बात कर रहे थे, तो श्रीस्वामी जी ने एक छात्र को भेजकर मुझे बुलवाया तथा कहा- भाई, इन डॉक्टरों की बातों में नहीं आना, मेरे कारण आश्रय में कोई हानि नहीं होगी। मुझे सायं ०५ बजे तक जीना है। अगर तेरा दिल मानता है तो मुझको आश्रय में ही मरने दें, नहीं तो मेरे को गंगाजी के किनारे डाल दो। अस्पताल नहीं
भेजना। वे मात्र 'ओम् ओम् ' बोल रहे थे। जब उनको बहुत अधिक कष्ट होता था तो 'ओम् ओम्' करके दीवार की तरफ मुख कर लेते, फिर दर्द कम होते ही 'ओम-ओम' करके मुँह इधर कर लेते।
          डॉक्टरों ने कहा था कि पानी देखते ही बेहोश हो जायेंगे, परंतु उन्होंने एक कमण्डलु गंगाजल पीया उसी दिन परम पूज्य शंकराचार्य दण्डी स्वामी माधवाश्रमजी महाराज हरिद्वार में भागवत की कथा कर रहे थे। वे भी इनके अन्तिम दर्शनों के लिये आये और उन्होंने कथा में कह दिया ओ समाज के लोगों! अगर तुम्हें भजन का प्रभाव देखना है तो कृष्णाधाम आश्रम खड़खड़ी हरिद्वार में चले जाओ। अगर ये बीमारी तुम किसी को भी होती तो तड़पते, रोते, बिलखते, परंतु एक सन्त इस बीमारी से संघर्ष कर रहे हैं। सिवाय 'ओम्' के एक शब्द नहीं बोल रहे। शंकराचार्यजी के इतना कहने के बाद कृष्णाधाम में मेला लग गया। हजारों लोग आते उनके दर्शन करके चले जाते, उनका कमरा अन्तिम समय तक खुला रहा। दो महात्मा उनकी सेवा के लिये उनके पास रहे, जो लोग आ रहे थे। उनके पैर छूकर जाते, उनसे किसी को भय नहीं लगा और ना ही वे 'ओम् ओम् के सिवाय कुछ बोले और उन्होंने आने-जाने वालो का ध्यान भी नहीं किया। उस समय मेरठ से पं० फूलचन्दजी आये हुए थे। उनको बुलाकर कहने लगे पण्डितजी मुहूर्त देखो। पण्डितजी ने कहा-किसी विषय का मुहूर्त देखूँ ? कहने लगे, मेरा मुहूर्त तो ५ बजे का है। इससे पहले मरने का मुहूर्त बनता हो तो मैं पहले चला जाऊँ। जागेराम शास्त्री बहुत दुखी हो रहा है। पण्डितजी कुछ नहीं बोले, रोने लग गये, ठीक ५ बजे एक सन्त आये। वे आकर रोने लगे। स्वामी जी कहने लगे, सन्तजी! क्यों रोते हो, मुझे कहने लगे तेरे आश्रम में सन्तजी आये हैं। इसको दूध पिला। यह कहकर फिर 'ओम ओम' कहने लगे। इतने में सन्त को गेट तक छोड़कर आया।
          उस समय उनके पास दण्डी स्वामी श्रीमुरारी आश्रम तथा दण्डी स्वामी श्रीरामानन्द आश्रम सेवा में थे। स्वामी जी के कहने पर उन्होंने उन्हें नीचे आसन बिछाकर बैठाया। पद्मासन उन्होंने स्वयं लगा लिया। जब कमण्डलु से उनको गंगाजल पिला रहे थे तब मैंने कहा-नीचे क्यों बैठाया ? अभी मैं पूरा बोल भी नहीं पाया कि उन्होंने 'ओम ओम्' का उच्चारण किया और गंगाजल मुख में लेते ही उन्होंने प्राण छोड़ दिये। स्वामी मुरारी आश्रमजी कहने लगे-ये तो सदा के लिये ही बैठ गये। उस समय तक तीनों डॉक्टर आश्रम में ही थे। डॉक्टरों ने स्वयं कहा कि ये हमारे मेडिकल साइंस के एकदम विपरीत अद्भुत घटना घटी है।
          एक डॉक्टर बंगाली सिपाहा नाम से थे। कहने लगे-मैंने जीवन में ऐसी घटना कभी नहीं देखी। तीनों डॉक्टरों ने स्वामीजी के शरीर को प्रणाम किया। उस घटना से यह सिद्ध होता है। कर्म के भोग तो हर हालत में सभी महापुरुषों को भोगने पड़ते हैं। कुत्ते का काटना तथा वह बीमारी होना तो कर्म के भोग निश्चित थे। परंतु गौसेवा, श्रीगंगासेवा, सन्त सेवा, भगवद्धजन डॉक्टरों के अनुसार मेडिकल साइंस को मात दे सकते हैं। आज श्रीदण्डी स्वामी केवलाश्रमजी महाराज के मात्र आशीर्वाद से कृष्णाधाम अन्नक्षेत्र में सैकड़ों महात्मा और जरूरतमन्द निशुल्क भोजन करते हैं। दान देने वाले भी स्वतः आते हैं और खाने वाले भी स्वत: आते हैं। यह भगवान् के भजन, गोसेवा, गंगासेवा, सन्तसेवा का अनुपम प्रभाव है।
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                                              -श्रीआगेरामजी शास्त्री
                                          पत्रिका: कल्याण (९३।८)
                                                 गीताप्रेस (गोरखपुर)

                           "जय जय श्री राधे"
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पं विजय तिवारी Sep 1, 2019
@radhajikidasi जय श्री राधे कल्याण मासिक हमें अपने आश्रम के लिए मंगानी है कृप्या मार्ग दर्शन करें 🙏🙏

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