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R.K.Soni
R.K.Soni Jun 19, 2019

Jai ganesh deva g🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Jai ganesh deva g🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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कामेंट्स

Jigar Mehta Jun 19, 2019
ૐ નમો ભગવતે વાસુદેવાય

Swami Lokeshanand Jul 16, 2019

भक्ति देवी सीताजी को, संसार के सुख के लिए गिरवी रख छोड़ने की बात से, यदि किन्हीं को दुख हुआ हो, कि सीताजी के लिए "गिरवी रखने" जैसा शब्द प्रयोग किया गया है, तो यह बड़ी क्रांतिकारी बात है, इसमें मुझे हैरानी नहीं है। हैरानी तो उन पर है जिन्हें दुख नहीं हुआ, दुख होना ही चाहिए, क्योंकि सत्य यही है। रामलीला में मंचस्थ सीताजी को, अशोक वाटिका में दुखी बैठी देख, मुट्ठियाँ भींच कर, आँसू बहाने वाले दर्शकों को, अपने जीवन की सीताजी का, अपने प्रेम का, अपने जीवन के रावण से, मोह से, मैं और मेरे से, त्रस्त होना नहीं दिखता, यह बड़ी ही हैरानी की बात है। एक बड़ा सरल तरीका है यह जानने का कि आपका प्रेम जगत में लगा है या जगदीश में? जिसके जीवन में आनन्द है, शांति है, संतुष्टि है, अहोभाव है, उसका प्रेम जगदीश से जुड़ा है, और जिसके जीवन में दुख है, तनाव है, चिंता है, उद्वेग है, अशांति है, उहापोह है, उधेड़बुन है, भविष्य के प्रति आशंका है, काम क्रोध है, उसका प्रेम जगत से जुड़ा है। यह निर्विवाद सत्य है कि "भक्ति" और "सीताजी" पर्यायवाची शब्द हैं, इस कथन में रत्ती भर भी अतिशयोक्ति नहीं है, और वास्तव में ही इस बात को समझने वाले का, कि हमने अपने जीवन में, अपने प्रेम को नहीं, सीताजी को ही दाँव पर लगा रखा है, कलेजा कट जाना चाहिए, नींद उड़ जानी चाहिए, उसे तो ग्लानि से भरकर, तत्पर होकर, तुरंत प्रयास करना चाहिए। कि- "सबकी ममता ताग बटोरी। मम पद मनहिं बांधि बर डोरी॥" तत्क्षण सीताजी को संसार से मुक्त कर भगवान के चरणों में समर्पित करना चाहिए। क्योंकि यही सत्य है, यही सत्य है। मेरे कईं मित्रों के कमेंट्स ने मुझे बहुत प्रेरणा दी है, इस प्रेरणा को "विभीषण को शरणागति" प्रसंग में उपयोग में लाने का प्रयास करूंगा। पुन: उनके लिए मेरा मन प्रफुल्लता पूर्वक अहोभाव से भर गया है, जिनको भी कल की पोस्ट से दुख हुआ। लोकेशानन्द समझता है कि उन पर भगवान की विशेष कृपा हुई है।

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दिया जरूर जलाऊँगा मुझे ईश्वर मिले या मिले ,, क्या कम है रोशनी से मुसाफिर को ठोकर ना लगे, दीये की जोत से मिलते हैं अनेकों लाभ ज्योति (दीये में जलाने वाली जोत) दो प्रकार ही होती है। प्रातः कालीन व सायंकालीन लेकिन समयानुसार या साधना अनुसार या नियम अनुसार यह दोपहर व रात्रि को भी अनेकों उत्सवों में प्रज्ज्वलित की जाती है। प्रातः कालीन दीप मंजरी से यह अभिप्राय है कि हे प्रभु! हमारा सारा समय उत्तम प्रकार से सत्कर्मों को करते हुए व्यतीत हो। हम अपने जीवन में अपने परिवार की लिए लौकिक-आलौकिक सुखों को आप के माध्यम से प्राप्त करके परिवार को समर्पित करें। सभी अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर उन्नति करें व संस्कारो को उन्नत करें। अत: प्रातः कालीन जोत संस्कार देती है, यश प्रदान करती है, दीर्घायु देती है, धन में वृद्धि करती है और मानसिक संतापों को हरने वाली होती है। प्रातः कालीन जोत करने वाले जीव जिस कार्य में भी हाथ डालते हैं वह कार्यों उनकी यथारूचि पूर्ण होता है। कारण, यह अखंड सौभाग्य देने वाली होती है और सौभाग्यशाली जीव जहां भी जाएगा, वहां स्वयं खुशहाली आ जाएगी। अनेकों प्रकार के दुर्भाग्य भाग जाते हैं, अनेकों रोगों से मुक्ति होती है और खाया हुआ भोजन सुपाच्य हो जाता है व शरीर की रचना स्वयं में सही प्रकार से संचालित होती है। रक्त चाप उच्च या निम्न नहीं होता, हृदय गति अवरुद्ध नहीं होती नेत्र ज्योति सम्पूर्ण रूप से कार्य करती है और असमय सिर के बाल नहीं झड़ते, एवं कान, नासिक व दांत यह दीर्घायु तक भी सुचारू कार्ये करते रहते है। ज्वर आदि प्रकोप नहीं होते, गलकंठ नहीं होती। कार्य करने की क्षमता स्वतः ही उत्साही हो जाती है। आलस्य का परित्याग हो जाता है इसलिए कहा है की प्रथम सुख निरोगी काया। इस प्रातः कालीन जोत से एक अचूक परिवर्तन जो जीवन में होता है वह बहुत चमत्कारी होता है क्रोध जो शरीर को हानि पहुंचाता है नियंत्रण में रहता है। लालसाएं, द्वेष, कुविचार और आत्मगलानि जैसे कोई भी कर्म जीवन में प्रवेश नहीं करते। तर्क, सुतर्को में बदल जाते हैं बुद्धि तीव्र हो जाती हैं व निर्णय लेने की क्षमता परिपक्व हो जाती है। जिससे समय के मापदंड को पहचानते हुए समय का सदुपयोग होता है। व्यर्थ के दिखावे, खर्चे, आमोद-प्रमोद व मनोरंजन आदि इन सबसे समय रहते हुए प्राणी बच जाता है और जहां इतना कुछ केवल मात्र प्रातः कालीन जोत प्रज्ज्वलित करने से मिलता हो, तो इतने बड़े उल्लासित संस्कार को आजीवन करने में क्या हानि है। दादी और बाबा के संस्कार व किए गए सत्कर्म व कुकर्म तीसरी और पांचवी पीढ़ी तक मिलते हैं इससे यह सिद्ध होता है कि इतना बड़ा सत्कर्म हम कर रहे हैं वह हमारी आने वाली पीढ़ियों को प्राप्त होगा व जीवन का सही निर्वाह होगा यह सौ प्रतिशत वचनबद्धता है,,,, हर हर महादेव जय शिव शंकर

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कर बहियाँ वल आपने छोड़ विरानी आस,,, परिश्रम ही धन है सुन्दरपुर गावं में एक किशन रहेता था । उसके चार बेटे थे । वे सभी आलसी और निक्कमे थे । जब किशन बुढा हुआ तो उसे बेटो की चिंता सताने लगी । एक बार किशान बहोत बीमार पड़ा । मृत्यु निकट देखकर उसने चार बेटो को अपने पास बुलाया । उसने उस चारो को कहा “ मैने बहुत सा धन अपने खेत में गाड रखा है । तुम लोग उसे निकल लेना ।” इतना कहते – कहते किशान के प्राण निकल गए । पिता का क्रिया-क्रम करने के बाद चारो भाइयो ने खेत की खुदाई शुरू कर दी । उन्होंने खेत का चप्पा-चप्पा खोद डाला, पर उन्हें कही धन नहीं मिला । उन्होंने पिता को खूब कोसा ।वर्षा रुतु आनेवाली थी । किशान के बेटों ने उस खेत में धान के बिज बो दिए । वर्षा का पानी पाकर पौधे खूब बढे । उन पर बड़ी-बड़ी बालें लगी । उस साल खेत में धान की बहोत अच्छी फसल हुई । चारों भाई बहुत खुश हुए । अब पिताकी बात का सही अर्थ उनकी समझ में आ गया । उन्होंने खेत की खुदाई करने में जो परिश्रम किया था, उसी से उन्हें अच्छी फसल के रूप में बहुत धन मिला था । इस प्रकार श्रम का महत्व समझने पर चारो भाई मन लगाकर खेती करने लगे । सीख : परिश्रम ही सच्चा धन है ,,, हर हर महादेव जय शिव शंकर

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जब सोचना ही है तो हम अच्छा ही सोचे,,, प्राणायाम ही कल्पवृक्ष नारद जी एक बार किसी नगर में गए। वहाँ उन्हें पुराना मित्र मिला। वह बेचारा दुखों का मारा था। नारद जी बोले - " यहाँ व्यर्थ ही संकटों में फँसे हो। आओ, तुम्हें स्वर्ग ले चलूँ। " मित्र खुशी से बोला - " और क्या चाहिए ! " दोनों पहुँच गए स्वर्ग में। वहाँ सुंदर पत्तों वाला, घनी छाया देने वाला कल्पवृक्ष खड़ा था। नारद जी बोले - " तुम इस वृक्ष के नीचे बैठो, मै अंदर से मिलकर आता हूँ। " नारद जी चले गए तो मित्र ने इधर-उधर झाँका। मीठी छाया, शीतल वायु, रमणीक स्थान में आनंद आया तो सोचा - यदि आरामकुर्सी होती तो बैठ के सुख लेता ! वह खड़ा था कल्पवृक्ष के नीचे, जहाँ जो इच्क्षा करो वही पूरी हो जाती है। आरामकुर्सी चाही थी, सो आ गई। बैठ गया उसपर। तब सोचा - यदि पलँग होता तो दो घड़ी लेट ही जाता ! सोचते ही पलँग आ गया। उसपर लेटते ही सोचा - घर होता तो पत्नी से कहता कि मेरी टाँगे दबा दे, मेरा सिर ही सहला दे ! सोचते ही कई अप्सराएँ आ गईं ! कोई पाँव दबाने लगी, कोई सिर सहलाने लगी, कोई गीत गाने लगी, कोई ठुमके लगाने लगी। उस व्यक्ति ने सोचा - यदि इन अप्सराओं के साथ पत्नी देख लेती तो झाड़ू से मेरी मरम्मत कर डालती ! सोचते ही झाड़ू लेकर पत्नी आ धमकी। लगी उसकी झाड़ू से पिटाई करने। पति पलँग से उठकर दौड़ा। आगे-आगे वह था, पीछे-पीछे झाड़ू उठाए पत्नी। तभी नारद जी लौटे। दूर से ही यह तमाशा देखा तो उसे फटकारा - " मूर्ख ! सोचना ही था तो कोई अच्छी बात सोचते। यह क्या सोच बैठे तुम ? यह तो कल्पवृक्ष है ! " सो मेरे भाइयों ! प्राणायाम भी कल्पवृक्ष है। इसके नीचे बैठो तो अच्छी बातें सोचना, बुरी बातें न सोचना ,,,, हर हर महादेव जय शिव शंकर

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Swami Lokeshanand Jul 14, 2019

हनुमानजी कंचन, कीर्ति और कामिनी रूपी बाधाओं से बचकर, सागर पार कर गए। लोग कहें कि हनुमानजी ने गजब कर दिया, तो तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि हनुमानजी ने एक ही छलांग में सागर पार कर लिया, तो इसमें क्या हैरानी है? "प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहिं। जलधर लांघि गए अचरज नाहिं॥" यह तो विचार करें कि हनुमानजी के मुख में क्या है? वह मुद्रिका आप अपने मुख में रख लो, आप भी सागर पार कर जाएँगे। हनुमानजी जी की विशेषता यह है कि उन्होंने बाधाएँ आने पर भी मुद्रिका गिराई नहीं। लोग पूछते हैं कि बाबा! वह मुद्रिका कौन से सुनार की दुकान से मिलेगी? हम भी ले लें। तुलसीदासजी कहते हैं वह मुद्रिका किसी दुकान से नहीं मिलती, वह तो किसी संत से मिलती है। राम नाम ही मुद्रिका है, संकोच और कपट त्यागकर, विनय भाव से, किसी संत के चरणों में, अपनी श्रद्धा निवेदन कर, उन्हें अपनी सेवा से संतुष्ट कर, यह नाम का दान पाया जाता है। लंका आई तो हनुमानजी को लंका की चमक दमक दिखाई दी। पर वह चमक हनुमानजी को बांध नहीं सकती। क्योंकि जगत के विषय नहीं बाँधते, उन विषयों के प्रति आसक्ति बाँध देती है। जो जरा सा वैराग्य चढ़ते ही घर छोड़ भागते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि घर तो जड़ है, वह चेतन को कैसे बाँध सकता है? गृहासक्ति बंधनकारी है। ध्यान दें, सबके अंत:करण में भक्ति है, भक्ति विहीन कोई है ही नहीं। प्रेमस्वरूप परमात्मा का अंश, जीव, प्रेम विहीन होगा भी कैसे? अंतर केवल इतना है कि आपने वह प्रेम लगाया कहाँ है? जो प्रेम परमात्मा में लगाना था, उसे आपने स्त्री पुत्रादि में, धन सम्पत्ति में, पद प्रतिष्ठा की दौड़ में लगा दिया। भक्तिदेवी को, श्रीसीताजी को, आपने कुछ कागज के कतरों, सोने चाँदी के ठीकरों, माँस के लोथड़ों के लिए दूसरों के पास गिरवी रख छोड़ा है। आपने उन्हें चौक चौराहों पर, बाजारों में, दो दो कौड़ियों के लिए, नुमाइश पर लगा रखा है। यही प्रेम यदि परमात्मा में लग जाता तो भक्ति बन जाता, संसार में लगकर आसक्ति बन गया है। यही आसक्ति बनकर आपको दुख, चिंता, उद्वेग, जन्म मरण के बंधन में डाल रहा है, यही यदि पुन: भगवान से लगा दें, तो आपकी मुक्ति का हेतु बन सकता है। यह नियम है कि जिससे प्रेम होता है, उसे याद करना नहीं पड़ता, उसकी याद अपने आप आती है। यदि आपका प्रेम का पात्र बदल जाए, तो लक्ष्य विस्मृति कैसे हो? मुद्रिका कैसे गिरे? नाम कैसे छूटे? जगत की चमक दमक लक्ष्य से कैसे भटका दे? विडियो-प्रभु मुद्रिका- https://youtu.be/70mHorKLWgs

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Purvin kumar Jul 14, 2019

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Sanjay Garg Jul 14, 2019

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आप सही संसार सही ,, जो रहीम उत्तम प्रवृत्त का कर सके कुसंग, चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग, धर्म हमेशा जोड़ता है तोड़ता नहीं महाभारत में लिखा है-'धर्मो रक्षति रक्षित:।' मनुष्य धर्म की रक्षा करे तो धर्म भी उसकी रक्षा करता है। यह विनियम का सिद्धांत है। संसार में ऐसा व्यवहार चलता है। भौतिक सुख की चाह में लोग धर्म की ओर प्रवृत्त होते हैं। कुछ देने की मनौतियां- वायदे होते हैं, स्वार्थो का सौदा चलता है। पाप को छिपाने के लिए पुण्य का प्रदर्शन किया जाता है। यदि ऐसा होता है, तो धर्म से जुड़ी हर परंपरा, प्रयत्न और परिणाम गलत हैं, जो हमें साध्य तक नहीं पहुंचने देते। आचार्य तुलसी ने इसीलिए ऐसे धर्म को आडंबर माना। 'धर्मो रक्षति रक्षित:'-यह एक बोधवाक्य है, जीवन का वास्तविक दर्शन है। मनुष्य की धार्मिक वृत्ति उसकी सुरक्षा करती है, यह व्याख्या सार्थक है। ऐसा इसलिए क्योंकि वास्तव में धर्म का न कोई नाम होता है और न कोई रूप। व्यक्ति के आचरण, व्यवहार या वृत्ति के आधार पर ही उसे धार्मिक या अधार्मिक होने का प्रमाणपत्र दिया जा सकता है। धार्मिक व्यक्ति के जीवन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं आता, उसे बुढ़ापा, बीमारी या आपदा का सामना नहीं करना पड़ता, ऐसी बात नहीं है। धार्मिक व्यक्ति के जीवन में भी बुढ़ापा का समय आता है, लेकिन उसे यह सताता नहीं है। बीमारी आती है, पर उसे व्यथित नहीं कर पाती। आज मनुष्य अनेक प्रकार की समस्याओं से घिरा है। कभी वह बीमारी की समस्या से जूझता है तो कभी उसे वृद्धावस्था सताती है, कभी वह मौत से घबराता है तो कभी व्यवसाय की असफलता का भय उसे बेचैन करता है। कभी अपयश का भय उसे तनावग्रस्त कर देता है और भी न जाने कितने प्रकार हैं भय के। मनुष्य इन सब समस्याओं से निजात चाहता है। हर इंसान की कामना रहती है कि उसके समग्र परिवेश को ऐसा सुरक्षा कवच मिले, जिससे वह निश्चित होकर जी सके, समस्यामुक्त होकर जी सके। जीवन एक संघर्ष है। इसे जीतने के लिए धर्मरूपी शस्त्र जरूरी है। इसलिए दुनिया का हर धर्म इंसान को इंसान से जोड़ने का काम करता है,,, हर हर महादेव जय शिव शंकर

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