murlidhargoyal39
murlidhargoyal39 Nov 3, 2017

श्री लक्ष्मण-गीता

श्री लक्ष्मण-गीता

अयोध्याकाण्ड का एक बहुत ही सुन्दर प्रसंग है -लक्ष्मण गीता *
यहाँ पहली बार रामायण में लक्ष्मणजी एक अलग से व्यक्तित्व में आते हैं -एक उपदेष्टा के रूप में ! तब हमें पता चलता है कि लक्ष्मणजी का ज्ञान, उनकी समझ कैसी थी ! लक्ष्मण गीता में जो उपदेश आरम्भ होता है, वह निषादराज के विषाद से ही होता है !

विषाद का मूल कारण, मूल प्रश्न क्या है ?
भ्रम यह है कि निषादराज के सामने एक परिस्थिति है ? -कुश की शैय्या पर जानकीजी और प्रभु श्रीराम सो रहे हैं ! इस दुखद परिस्थितिका कारण कौन है ? निषादराज की व्याख्या क्या है ?

कोई एक निश्चित व्याख्या नहीं है ! पहले वे ब्रह्माजी को दोषी ठहराते है ! फिर कर्म को दोष देते हैं और फिर कैकई को ! असल में देखें तो निषादराज हम लोगों के ही प्रतिनिधि हैं ! हमलोग भी मन:स्थिति के अनुसार कारण बदलते रहते हैं !

लक्ष्मणजी बोले कि यह भगवान का भक्त भ्रमित हो रहा है, इसे भ्रम में नहीं होना चाहिए ! भ्रम का निवारण के लिए-लक्ष्मण गीता लक्ष्मणजी के मुख से निकली है ।

लक्ष्मणजी कहते हैं कि निषादराज, अपनी दृष्टि को सही करो और किसी को दोष मत दो ! कर्मवाद को स्वीकार करते हो तो किसी दूसरे को दोष नहीं दिया जा सकता !

काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥
भावार्थ:- हे भाई! कोई किसी को सुख-दुःख का देने वाला नहीं है। सब अपने ही किए हुए कर्मों का फल भोगते हैं॥

पूरी कर्म मीमांसा इस एक चौपाई में लक्ष्मणजी ने बता दी ! इसे पूर्व मीमांसा भी कहते हैं ! अब आगे की पाँच चौपाइयों तथा दोहे में उत्तर मीमांसा की विवेचना करते हैं ! उत्तर मीमांसा ही वेदान्त है ! यदि आपने इसका अच्छी तरह से अध्ययन किया है तो अगली पाँच चौपाइयों तथा दोहे में वेदान्त का पूरा विवेचन आपको मिल जायगा !

श्री लक्ष्मणजी के उपदेश में पहली बात तो यह कही गई कि मनुष्य को व्यक्तिवाद या परिस्थितिवाद से उठकर कर्मवाद पर आना चाहिए ! परिस्थितिवाद, माने जब हम अपने सुख दुःख का कारण केवल व्यक्ति या वस्तु या परिस्थिति को मानें !

आप जब कर्मवादी हो जाते हैं, तो आपके मन में एक क्रन्तिकारी परिवर्त्तन आ जाता है ! फिर ऐसा व्यक्ति, परिस्थिति नहीं, अपना कर्म बदलता है ! अब उसके मन में यह दृढ़ धारणा बन जाती है कि यदि मैं अपना कर्म ठीक लूँ तो मेरी परिस्थिति अपने आप ठीक हो जाएगी, इसे होना ही है !

जब आपकी बुद्धि में ऐसा पक्की तरह बैठ जाय, तो फिर आप व्यक्ति या वस्तु या परिस्थिति बदलने में रुचि नहीं रखेंगे ! क्योकि आप जानते हैं कि इनके बदलने से कुछ विशेष परिवर्त्तन नहीं होने वाला है ! फिर आप उस व्यक्ति या वस्तु या परिस्थिति से विशेष राग नहीं करेंगे और जब राग नहीं तो फिर द्वेष भी नहीं ! इस तरह हमारा राग द्वेष शिथिल हो जाता है ! यह एक कर्मवादी का सच्चा लक्षण है !

कर्मवादी होने से जीवन में और भी कई लाभ होते हैं, जैसे कर्मवादी होने से जीवन में सदाचार आता है, दुष्कर्म से डरना शुरू करे तो दुष्कर्म छूटता है ! यदि हमारी धारणा बिलकुल पक्की है कि हमारे सत्कर्म हमें सुखी करेंगे और दुष्कर्म हमें दुःख अवश्य देंगे,तो फिर हम सत्कर्म करने का कोई अवसर नहीं छोड़ेंगे ! ऐसा व्यक्ति हर प्रकार से पुण्य की पूंजी कमाने का प्रयत्न करता है !

सत्कर्म----.> शुभ परिस्थिति------> सुख

कर्म सुख दुख का हेतु है यह ठीक है, परन्तु इतने से ही काम चलता नहीं है क्योकि सत्कर्म निरन्तर नहीं होता है ! बीच-बीच में गड़बड़ भी होती रहती है ! पहली कठिनाई तो यही आती है कि हर समय सत्कर्म ही होए, ऐसा बहुत कठिन है ! कई बार अनजाने में गलत कर्म हो जाते हैं ! दूसरी कठिनाई यह है कि सत्कर्म करने से भी अभिमान तो नहीं जाता है, बल्कि कई बार सत्कर्म करने वाले का अभिमान बढ़ जाता है !

अभिमान से मद चढ़ता है और विवेक कुंठित होता है ! कई बार मद के प्रभाव में जो गलत है, वह भी सही लगने लगता है इसलिए यदि केवल कर्म हमारे जीवन का नियामक तत्त्व रहे तो बहुत सुरक्षित स्थान नहीं है ! परिस्थितिवाद से कर्मवाद बेहतर ज़रूर है, परन्तु उससे भी ऊँची सोच और समझ होना चाहिए, दर्शन होना चाहिए !

जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपति बिपति करमु अरु कालू॥

दरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥

लक्ष्मणजी निषादराज से कहते हैं कि हे निषादराज, जीवन में जो बहुत सारी घटनाएँ होती है, उसके बारे में एक दूसरी दृष्टि से भी सोचो ! क्या क्या हैं वे ?

जोग बियोग - यह जीवन में होता रहता है ! कभी संयोग होता है, कभी वियोग होता है ! और तीसरी घटना है भोग ! और ये तीनों कैसी होती है - भल मंदा, कभी अच्छी और कभी बुरी ! कभी जोग हो गया किसी अच्छे व्यक्ति से, कभी बुरे व्यक्ति से ! कभी अच्छे व्यक्ति से वियोग हुआ, कभी बुरे व्यक्ति से ! कभी अच्छा भोग आया, कभी बुरा भोग आया - जोग बियोग भोग भल मंदा।

लोग कैसे होते हैं ?-हित अनहित मध्यम - ये तीन तरह के लोग होते हैं जिनके साथ हम व्यवहार करते हैं ! कोई हमारा हितैषी है,कोई बुरा चाहने वाला है और कोई उदासीन है ! लक्ष्मणजी बोलते हैं कि ये छह के छह मनुष्य के लिए भ्रम के बड़े-बड़े फंदे हैं, जिनमे सारा संसार फँसा हुआ रहता है !

कैसे फँसते है ? ये हमें संलग्न करते है, जोड़ लेते हैं ! जोग, वियोग, भोग तो आता जाता रहता है, लेकिन इन सबमें हम लिप्त हो जाते हैं ! हित, अनहित, मध्यम के साथ संलग्न हो जाते हैं ! जो हम इनमें संलग्न हो जाते हैं, वही फंदा है, हमें फँसाने का,उलझाये रखने का !

यह एक बहुत बड़ा जाल है, जन्म से मरण होने तक ! जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू- जन्म से मरण होने तक फैला हुआ जाल है ! प्राणी बचकर कहाँ जायगा ! ये जाल में ये छह फन्दे घूमते रहते हैं - जोग, बियोग, भोग, हित, अनहित, मध्यम !

लक्ष्मणजी बोलते है, हे निषादराज, इस जाल से बचकर जाने की बात आप छोड़ दो! संपति बिपति करमु अरु कालू - इस जाल में अभी और भी कई फंदे हैं, रंगीन फंदे हैं ! संपत्ति है, विपत्ति है, काल है, कर्म है, ये सब आपको बांधने वाले फंदे हैं ! जगत के लिए जालू शब्द कहा ! और इस जगत का विस्तार कितना है ? बोले- स्वर्ग, नरक, संपत्ति, विपत्ति, काल, कर्म, जोग, बियोग, भोग, हित, अनहित, मध्यम ऐसा ये जाल फैला हुआ है और यही सब इसके फंदे हैं ! संपत्ति, विपत्ति, काल, कर्म, जोग, बियोग, भोग फँसा लेते हैं !

परन्तु फिर इससे निकलने का रास्ता क्या है ? लक्ष्मणजी कहते हैं कि निकलने का रास्ता यह है कि यह पूरा प्रपंच जिसे मैंने एक जाल के जैसा कहा, वास्तव में केवल मोह का परिणाम है ! अगर इस बात को समझ लिया जाय तो न तो कोई जाल है और न ही कोई फंदा है !

आप कर्म करते हो, तदनुसार परिस्थिति बनती है, उसे भोगना पड़ता है ! उस भोग से सुख दुःख निकलता है, यही हमारा रोज का जीवन है ! यह कार्यक्रम कब तक चलता रहेगा ? तब तक, जब तक आप परम-तत्त्व को जान नहीं लेते हैं ! यह दूसरी दृष्टि है-परमार्थ दृष्टि !

दरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं ॥

भावार्थ:-धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँ तक व्यवहार हैं, जो देखने, सुनने और मन के अंदर विचारने में आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं !!

कितना बड़ा प्रपंच है ! प्रमाणत्रय से प्रतीयमान होता है ! देखिअ, सुनिअ, गुनिअ-प्रत्यक्ष,अनुमान और शब्द- यही तीन प्रमाण हैं, जिनसे प्रमेय का ज्ञान होता है ! इन तीनों प्रमाणों से उपलब्धमान जो यह प्रपंच है, यह मोह मूल है- सच नहीं है -परमारथ नाही !

आप कहेंगे कि यह भ्रम कैसे हुआ ? हमें यह सुख देता है, दुःख देता है ! तो बोले कि सुख -दुःख तो सपने में भी होता है ! तो क्या जो सपने में हम अनुभव करते हैं, वह यथार्थ है ? यह केवल प्रतीति है !

विचारक लोग इस जगत को इतना ठोस नहीं मानते हैं, जितना यह आपको लगता है ! हमारे विज्ञानिक बंधुओ ने तो वेदान्तियों की बड़ी मदद करी है ! उन्होंने प्रत्यक्ष प्रमाण की तो धज्जियां उड़ा है !

अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू॥
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा॥

भावार्थ:-ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिए और न किसी को व्यर्थ दोष ही देना चाहिए। सब लोग मोह रूपी रात्रि में सोने वाले हैं और सोते हुए उन्हें अनेकों प्रकार के स्वप्न दिखाई देते हैं॥

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा॥

भावार्थ:-इस जगत रूपी रात्रि में योगी लोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपंच (मायिक जगत) से छूटे हुए हैं। जगत में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए, जब सम्पूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाए॥

जगत की हमारी अनुभूति है, सुखात्मक या दुखात्मक ! उसका कारण बनती है परिस्थिति और परिस्थिति का कारण है कर्म ! कर्म होता है कर्ता भाव से ! कर्ता कौन है ? बोले - मैं हूँ ! वेदान्त कहता है कि आप इस बात पर विचार करो कि क्या यह बात सच है कि आप कर्ता हो ? क्या कर्तृत्व आपका स्वरूप है ?

हमारे भीतर अपने को लेकर भावनाएँ उठती हैं ! एक है - भोक्तृत्व दूसरी है - कर्तृत्व, भोक्ताभाव और कर्ताभाव ! जब हम अपनी बुद्धि (ज्ञानेन्द्रियों) से तादात्म्य करते हैं, तब भोक्ताभाव उत्पन्न होता है और कर्मेन्द्रियों से तादात्म्य करते हैं, तब कर्ताभाव होता है !

यह कर्तृत्व और भोक्तृत्व ही मेरी पहचान है ! जिसे मैं 'मैं' बोल रहा हूँ, उसमे ये दो चीजे ही तो है ! इस भोक्ता में ही इच्छा उत्पन्न होती है और यह इच्छा ही हमें कर्म करने की प्रेरणा देती है ! यही पूरी समस्या का मूल कारण है ! भोक्तृत्व के कारण इच्छा पैदा होती है ! फिर उस इच्छा से कर्तृत्व प्रेरित होता है ! कर्तृत्व से कर्म होता है !

कर्म से कर्मफल बनता है ! वह फल परिस्थिति बनकर हमारे सामने आता है, सुख दुःख देने के लिए ! उस फल को हम भोगते हैं ! उस फल को भोगने से संस्कार बनता है ! उस संस्कार से भोक्ता में भोगने की इच्छा पैदा होती है ! इस तरह से यह चक्कर चालू रहता है ! इसी को भवसागर भी बोलते हैं !

लक्ष्मणजी कहते है कि यह कर्ता - भोक्ता भाव जो हमारे भीतर बना रहता है, वह अत्यन्त प्रबल है, परन्तु है बिलकुल मिथ्या ! कर्ताभाव हमारे मन बुद्धि में इतना दृढ़ इसलिए हो गया है क्योकि प्रबल अभ्यास पड़ा हुआ है ! कोई चीज अभ्यासवश प्रबल हो जाय तो ऐसा नहीं है कि वह सच है ! मैं इस कर्ता भोक्ता भाव को छोड़ नहीं पाता इसलिए वह मेरा अपना स्वरूप है, ऐसा नहीं है !

स्वरूप की परिभाषा क्या है ? अहेयम् अनुपादेयं यत तत स्वरूपम् -जिस चीज को आप छोड़ न सकें और जिसे बाहर से लाया न गया हो, वह आपका स्वरूप है ! इस परिभाषा के अनुसार आप विचार करके देखें कि क्या कर्तृत्व हमारा स्वरूप हो सकता है ?

एक बात तो आपको अनुभव में सिद्ध है कि कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व, मुझमे एक रस नहीं रहता, वह घटता बढ़ता रहता है, कभी तीव्र, कभी मध्यम और कभी मंद ! इसमें हमेशा विकार होता रहता है ! इसलिए कर्तृत्व एवं भोक्तृत्व, अपना स्वरूप नहीं हो सकता !

असली सिद्धि तो यही है कि हमें अपना असली चिन्मय आनंद स्वरूप मालूम पड़े जो कर्ता और भोक्ता नहीं हैं ! इस स्वरूप के प्रति जो निरन्तर जाग्रत रहता है वह सिद्ध है और जो इस स्वरूप के प्रति जाग्रत नहीं है वह सो रहा है !

उसके लिए लक्ष्मणजी कहते है - मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। जो इस स्वरूप के प्रति अज्ञानी बना हुआ है, वह व्यक्ति - देखिअ सपन अनेक प्रकारा ॥ जो नाना प्रकार का प्रपंच हमारे सामने दिखाई देता है, वह सारा का सारा प्रपंच स्वप्नवत है ! हमने इस प्रपंच को इतना महत्व दे दिया है कि अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान को ही भूल गए हैं और भवसागर में फंसे हैं ! !

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा॥

भावार्थ:-इस जगत रूपी रात्रि में योगी लोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपंच (मायिक जगत) से छूटे हुए हैं। जगत में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए, जब सम्पूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाए॥

मोहरूपी रात्रि में सब लोग सो रहे हैं ! अनेक प्रकार से स्वप्न माने प्रपंच को देख रहे हैं और भोग रहे हैं ! अपने स्वरूप का अविवेक ही रात्रि है ! क्या सभी लोग सोये रहते हैं ? तो बोले कि नहीं, जो योगी हैं, परम को चाहते हैं, तत्त्व के अनुसन्धानी हैं, स्वरूप ध्यानी हैं, वे ही जागते रहते हैं ! यह अपने आप खुलने वाली नींद नहीं है ! और स्वाभाविक है जिसे परम ही चाहिए, वह प्रपंच बियोगी होगा ! उसने परम का वरण कर लिया! वरण ही एक व्यक्ति को साधक बनता है !

जागने की निशानी क्या है ? बोले - जब सब बिषय बिलास बिरागा-जब सारे विषयों से, उनके विलास से वैराग्य हो जाय ! जब विषय से सुख लेने की पराधीनता छूट जाए !

आगे लक्ष्मणजी निषादराज से कहते हैं -
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा॥
सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू॥

भावार्थ:-विवेक होने पर मोह रूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञान का नाश होने पर) श्री रघुनाथजी के चरणों में प्रेम होता है। हे सखा! मन, वचन और कर्म से श्री रामजी के चरणों में प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है !!

जैसे ही यह ज्ञान होता है, मोह दूर हो जाता है और साथ ही सारा प्रपंच भी मिटता है ! मोह ही सारे उपद्रव की जड़ है और उसका निराकरण केवल विवेक से ही हो सकता है ! उसके फलस्वरूप भगवान राम में अनुराग सिद्ध हो जाता है ! मेरे भाई, परम परमार्थ क्या है जिसको आप चाहते हो ? रघुनाथजी तो हमारी अंतरात्मा ही है ! राम ही परम ब्रह्म हैं ! जीव जिसे सबसे ज्यादा चाहता है वही राम हैं ! स्वाधीन, अव्यय, आनन्द, निरूपद्रव,बस !

राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा॥
सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा॥

भावार्थ:-श्री रामजी परमार्थस्वरूप (परमवस्तु) परब्रह्म हैं। वे अविगत (जानने में न आने वाले) अलख (स्थूल दृष्टि से देखने में न आने वाले), अनादि (आदिरहित), अनुपम (उपमारहित) सब विकारों से रहति और भेद शून्य हैं, वेद जिनका नित्य 'नेति-नेति' कहकर निरूपण करते हैं॥

* भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल॥

भावार्थ:-वही कृपालु श्री रामचन्द्रजी भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गो और देवताओं के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके लीलाएँ करते हैं, जिनके सुनने से जगत के जंजाल मिट जाते हैं॥

तो रामजी कौन हैं ? बोले- राम ही ब्रह्म हैं ! जीव जिसे सबसे ज्यादा चाहता है, वही राम हैं ! श्रीराम प्रभु में कोई विकार नहीं है और कोई भेद नहीं है ! इसलिए राम तत्त्व का कोई निरूपण नहीं हो सकता - कहि नित नेति निरूपहिं बेदा॥

रामजी वहाँ सोये हुए हैं और लक्ष्मणजी कहते हैं -अबिगत, अलख !जिनको लखा नहीं जा सकता है ! तो वहाँ सोया हुआ कौन है ?- वह उनका लीला विग्रह है ! जो परमार्थ सत्ता है, वही अपेक्षा से देहधारी बनती है और वही इस समय हमारे सम्मुख अवतार लेकर उपस्थित है !

ये तो थोड़े समय के लिए चरित्र करने के लिए उसी परमार्थ तत्त्व ने मनुष्य का शरीर कर लिया है ! क्यों धारण किया है ?

एक कारण तो यह है कि धर्म की संस्थापन के लिए और दूसरा कारण बताते है कि जब मनुष्य का शरीर धारण करके भगवान एक आदर्श चरित्र स्थापित करते हैं ताकि प्रभु का चरित्र प्रगट हो ! चरित्र प्रगट होगा तभी तो गाया जायगा ! निष्प्रपंच ब्रह्म का कोई चरित्र ही नहीं होता तो गाओगे क्या !

अनुकरण करने के लिए कोई चरित्र तो चाहिए ही ! हर मनुष्य अपने को किसी आदर्श के सामने समर्पित करना चाहता है ! बस, आप भगवान का चरित्र खूब सुनिए, सुनने मात्र से आपके सारे बन्धन कट जाएंगे !

यहाँ लक्ष्मण गीता पूरी होती है...radhe radhe...

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कामेंट्स

Anil Tiwari Nov 3, 2017
sundar vichar hariboll hari jai shri ram jai shri sham thx

Jitusoni Adesara Nov 4, 2017
अभिवादन / नमस्कार !!!!! जय श्री राम, जय श्री हनुमत.................. 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇 🎇जय श्री राम🎇🎇जय श्री राम,🎇🎇जय श्री राम,🎇🎇,जय श्री राम,🎇🎇,जय श्री राम,, ...... SHUBH PRABHAT JI ...............JAI SHRI RAM..... ...........JAI SHRI HANUMAN ...............JAI.SIYARAM........

Neha Sharma, Haryana Jan 27, 2020

*जय श्री राधेकृष्णा*🥀🥀🙏 *शुभ प्रभात् वंदन*🥀🥀🙏 *स्नान कब और कैसे करें घर की समृद्धि बढ़ाना हमारे हाथ में है। सुबह के स्नान को धर्म शास्त्र में चार उपनाम दिए हैं। *1* *मुनि स्नान।* जो सुबह 4 से 5 के बीच किया जाता है। . *2* *देव स्नान।* जो सुबह 5 से 6 के बीच किया जाता है। . *3* *मानव स्नान।* जो सुबह 6 से 8 के बीच किया जाता है। . *4* *राक्षसी स्नान।* जो सुबह 8 के बाद किया जाता है। ▶मुनि स्नान सर्वोत्तम है। ▶देव स्नान उत्तम है। ▶मानव स्नान सामान्य है। ▶राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है। . किसी भी मानव को 8 बजे के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। . *मुनि स्नान .......* 👉घर में सुख ,शांति ,समृद्धि, विद्या , बल , आरोग्य , चेतना , प्रदान करता है। . *देव स्नान ......* 👉 आप के जीवन में यश , कीर्ती , धन, वैभव, सुख ,शान्ति, संतोष , प्रदान करता है। . *मानव स्नान.....* 👉काम में सफलता ,भाग्य, अच्छे कर्मों की सूझ, परिवार में एकता, मंगलमय , प्रदान करता है। . *राक्षसी स्नान.....* 👉 दरिद्रता , हानि , क्लेश ,धन हानि, परेशानी, प्रदान करता है । . किसी भी मनुष्य को 8 के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। . पुराने जमाने में इसी लिए सभी सूरज निकलने से पहले स्नान करते थे। *खास कर जो घर की स्त्री होती थी।* चाहे वो स्त्री माँ के रूप में हो, पत्नी के रूप में हो, बहन के रूप में हो। . घर के बड़े बुजुर्ग यही समझाते सूरज के निकलने से पहले ही स्नान हो जाना चाहिए। . *ऐसा करने से धन, वैभव लक्ष्मी, आप के घर में सदैव वास करती है।* . उस समय...... एक मात्र व्यक्ति की कमाई से पूरा हरा भरा परिवार पल जाता था, और आज मात्र पारिवार में चार सदस्य भी कमाते हैं तो भी पूरा नहीं होता। . उस की वजह हम खुद ही हैं। पुराने नियमों को तोड़ कर अपनी सुख सुविधा के लिए हमने नए नियम बनाए हैं। . प्रकृति ......का नियम है, जो भी उस के नियमों का पालन नहीं करता, उस का दुष्परिणाम सब को मिलता है। . इसलिए अपने जीवन में कुछ नियमों को अपनायें और उन का पालन भी करें । . आप का भला हो, आपके अपनों का भला हो। . मनुष्य अवतार बार बार नहीं मिलता। . अपने जीवन को सुखमय बनायें। जीवन जीने के कुछ जरूरी नियम बनायें। ☝ *याद रखियेगा !* 👇 *संस्कार दिये बिना सुविधायें देना, पतन का कारण है।* *सुविधाएं अगर आप ने बच्चों को नहीं दिए तो हो सकता है वह थोड़ी देर के लिए रोएं।* *पर संस्कार नहीं दिए तो वे जिंदगी भर रोएंगे।* मृत्यु उपरांत एक सवाल ये भी पूछा जायेगा कि अपनी अँगुलियों के नाम बताओ । जवाब:- अपने हाथ की छोटी उँगली से शुरू करें :- (1)जल (2) पथ्वी (3)आकाश (4)वायु (5) अग्नि ये वो बातें हैं जो बहुत कम लोगों को मालूम होंगी । 5 जगह हँसना करोड़ों पाप के बराबर है 1. श्मशान में 2. अर्थी के पीछे 3. शोक में 4. मन्दिर में 5. कथा में सिर्फ 1 बार ये message भेजो बहुत लोग इन पापों से बचेंगे ।। अकेले हो? परमात्मा को याद करो । परेशान हो? ग्रँथ पढ़ो । उदास हो? कथाएं पढ़ो। टेन्शन में हो? भगवत् गीता पढ़ो । फ्री हो? अच्छी चीजें करो हे परमात्मा हम पर और समस्त प्राणियों पर कृपा करो...... *सूचना* क्या आप जानते हैं ? हिन्दू ग्रंथ रामायण, गीता, आदि को सुनने,पढ़ने से कैन्सर नहीं होता है बल्कि कैन्सर अगर हो तो वो भी खत्म हो जाता है। व्रत,उपवास करने से तेज बढ़ता है, सरदर्द और बाल गिरने से बचाव होता है । आरती----के दौरान ताली बजाने से दिल मजबूत होता है । ये मैसेज असुर भेजने से रोकेगा मगर आप ऐसा नहीं होने दें और मैसेज सब नम्बरों को भेजें । श्रीमद् भगवद्गीता, भागवत्पुराण और रामायण का नित्य पाठ करें। . ''कैन्सर" एक खतरनाक बीमारी है... बहुत से लोग इसको खुद दावत देते हैं ... बहुत मामूली इलाज करके इस बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है ... अक्सर लोग खाना खाने के बाद "पानी" पी लेते हैं ... खाना खाने के बाद "पानी" ख़ून में मौजूद "कैन्सर "का अणु बनाने वाले '''सैल्स'''को '''आक्सीजन''' पैदा करता है... ''हिन्दु ग्रंथों में बताया गया है कि... खाने से पहले 'पानी' पीना अमृत" है... खाने के बीच मे 'पानी' पीना शरीर की 'पूजा' है ... खाना खत्म होने से पहले 'पानी' पीना "औषधि'' है... खाने के बाद 'पानी' पीना बीमारियों का घर है... बेहतर है खाना खत्म होने के कुछ देर बाद 'पानी' पीयें ... ये बात उनको भी बतायें जो आपको 'जान' से भी ज्यादा प्यारे हैं ... हरि हरि जय जय श्री हरि !!! रोज एक सेब नो डाक्टर । रोज पांच बादाम, नो कैन्सर । रोज एक निंबू, नो पेट बढ़ना । रोज एक गिलास दूध, नो बौना (कद का छोटा)। रोज 12 गिलास पानी, नो चेहरे की समस्या । रोज चार काजू, नो भूख । रोज मन्दिर जाओ, नो टेन्शन । रोज कथा सुनो मन को शान्ति मिलेगी । "चेहरे के लिए ताजा पानी"। "मन के लिए गीता की बातें"। "सेहत के लिए योग"। और खुश रहने के लिए परमात्मा को याद किया करो । अच्छी बातें फैलाना पुण्य का कार्य है....किस्मत में करोड़ों खुशियाँ लिख दी जाती हैं । जीवन के अंतिम दिनों में इन्सान एक एक पुण्य के लिए तरसेगा ।

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Mahesh Bhargava Jan 26, 2020

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My Mandir Jan 25, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 24, 2020

जय माता दी शुभ प्रभात वंदन *ईश्वर का न्याय* एक बार दो आदमी एक मंदिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे। वहां अंधेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे। थोड़ी देर में वहां एक आदमी आया और वो भी उन दोनों के साथ बैठकर गपशप करने लगा। कुछ देर बाद वो आदमी बोला उसे बहुत भूख लग रही है, उन दोनों को भी भूख लगने लगी थी। पहला आदमी बोला मेरे पास 3 रोटी हैं, दूसरा बोला मेरे पास 5 रोटी हैं, हम तीनों मिल बांट कर खा लेते हैं। उसके बाद सवाल आया कि 8 (3+5) रोटी तीन आदमियों में कैसे बांट पाएंगे?? पहले आदमी ने राय दी कि ऐसा करते हैं कि हर रोटी के 3 टुकडे करते हैं, अर्थात 8 रोटी के 24 टुकडे (8 X 3 = 24) हो जाएंगे और हम तीनों में 8 - 8 टुकडे बराबर बराबर बंट जाएंगे। तीनों को उसकी राय अच्छी लगी और 8 रोटी के 24 टुकडे करके प्रत्येक ने 8 - 8 रोटी के टुकड़े खाकर भूख शांत की और फिर बारिश के कारण मंदिर के प्रांगण में ही सो गए। सुबह उठने पर तीसरे आदमी ने उनके उपकार के लिए दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से 8 रोटी के टुकडो़ के बदले दोनों को उपहार स्वरूप 8 सोने की गिन्नी देकर अपने घर की ओर चला गया। उसके जाने के बाद पहला आदमी ने दुसरे आदमी से कहा हम दोनों 4 - 4 गिन्नी बांट लेते हैं। दुसरा बोला नहीं मेरी 5 रोटी थी और तुम्हारी सिर्फ 3 रोटी थी अतः मै 5 गिन्नी लुंगा, तुम्हें 3 गिन्नी मिलेंगी। इस पर दोनों में बहस और झगड़ा होने लगा। इसके बाद वे दोनों सलाह और न्याय के लिए मंदिर के पुजारी के पास गए और उसे समस्या बताई तथा न्यायपूर्ण समाधान के लिए प्रार्थना की। पुजारी भी असमंजस में पड़ गया, उसने कहा तुम लोग ये 8 गिन्नियाँ मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो, मैं कल सबेरे जवाब दे पाऊंगा। पुजारी को दिल में वैसे तो दूसरे आदमी की 3 - 5 की बात ठीक लगी रही थी पर फिर भी वह गहराई से सोचते सोचते गहरी नींद में सो गया। कुछ देर बाद उसके सपने में भगवान प्रगट हुए तो पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायिक मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की और बताया कि मेरे ख्याल से 3 - 5 बंटवारा ही उचित लगता है। भगवान मुस्कुरा कर बोले- नहीं। पहले आदमी को 1 गिन्नी मिलनी चाहिए और दुसरे आदमी को 7 गिन्नी मिलनी चाहिए। भगवान की बात सुनकर पुजारी अचंभित हो गया और अचरज से पूछा- *प्रभू ऐसा कैसे ?* भगवन फिर एकबार मुस्कुराए और बोले : इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी 3 रोटी के 9 टुकड़े किये परंतु उन 9 में से उसने सिर्फ 1 बांटा और 8 टुकड़े स्वयं खाया अर्थात उसका *त्याग* सिर्फ 1 रोटी के टुकड़े का था इसलिए वो सिर्फ 1 गिन्नी का ही हकदार है। दुसरे आदमी ने अपनी 5 रोटी के 15 टुकड़े किये जिसमें से 8 तुकडे उसने स्वयं खाऐ और 7 टुकड़े उसने बांट दिए। इसलिए वो न्यायानुसार 7 गिन्नी का हकदार है .. ये ही मेरा गणित है और ये ही मेरा न्याय है! ईश्वर की न्याय का सटीक विश्लेषण सुनकर पुजारी उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। इस कहानी का सार ये ही है कि हमारा वस्तुस्थिति को देखने का, समझने का दृष्टिकोण और ईश्वर का दृष्टिकोण एकदम भिन्न है। हम ईश्वरीय न्यायलीला को जानने समझने में सर्वथा अज्ञानी हैं। हम अपने त्याग का गुणगान करते है परंतु ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य एवं भोग तौर कर यथोचित निर्णय करते हैं। किसी के पास 3000 रुपये हैं और उसमें से भी वो 300 रुपये सेवाभाव से दान कर देता है और किसी के पास 10 करोड़ रुपये है और उसमें से वो 1 लाख रुपये सेवाभाव से दान कर देता है तो भी ईश्वर की नजर में 1 लाख वाले दानदाता की जगह 300 रुपये दान करने वाला ज्यादा कीमती और *श्रेष्ठ* है क्योंकि उसने अपने कमतर भोग साधन में भी त्याग और परोपकार की भावना का सम्मान किया। 1 लाख रूपये वाला दानदाता भी जरूर अच्छा ही कहा जाएगा क्योंकि उसमें भी सेवाभाव त्याग की भावना विद्यमान है, परंतु *श्रेष्ठत्व* की तुलना में कमजोर का त्याग ईश्वर की नजर में और भी सर्वश्रेष्ठ कहलाता है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम कितने धन संपन्न है, महत्वपूर्ण यहीं है कि हमारे सेवाभाव कार्य में त्याग कितना है। 🙏🙏 [🔱🔥🔱🔥🔱🔥🔱🔥🔱🔥🔱 : एक बार यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी । जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे । भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्भार के पास पहुँचे । कुम्भार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था । लेकिन जैसे ही कुम्भार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ । कुम्भार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं । तब प्रभु ने कुम्भार से कहा कि 'कुम्भार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है । मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है । भैया, मुझे कहीं छुपा लो ।' तब कुम्भार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया । कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्भार से पूछने लगी - 'क्यूँ रे, कुम्भार ! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या ?' कुम्भार ने कह दिया - 'नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा ।' श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे । मैया तो वहाँ से चली गयीं । अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्भार से कहते हैं - 'कुम्भार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो ।' कुम्भार बोला - 'ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।' भगवान मुस्कुराये और कहा - 'ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ । अब तो मुझे बाहर निकाल दो ।' कुम्भार कहने लगा - 'मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा ।' प्रभु जी कहते हैं - 'चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ । अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।' अब कुम्भार कहता है - 'बस, प्रभु जी ! एक विनती और है । उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।' भगवान बोले - 'वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?' कुम्भार कहने लगा - 'प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है । मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।' भगवान ने कुम्भार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया ।' प्रभु बोले - 'अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।' तब कुम्भार कहता है - 'अभी नहीं, भगवन ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है । उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है - जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे । बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।' कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्भार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया । फिर कुम्भार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया । उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया । प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया । अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये । जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे । लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर । कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते । ! जय जय श्रीराधेकृष्णा.. [ 💐 सोच का फ़र्क 💐 🚩एक शहर में एक धनी व्यक्ति रहता था, उसके पास बहुत पैसा था और उसे इस बात पर बहुत घमंड भी था| एक बार किसी कारण से उसकी आँखों में इंफेक्शन हो गया| आँखों में बुरी तरह जलन होती थी, वह डॉक्टर के पास गया लेकिन डॉक्टर उसकी इस बीमारी का इलाज नहीं कर पाया| सेठ के पास बहुत पैसा था उसने देश विदेश से बहुत सारे नीम- हकीम और डॉक्टर बुलाए| एक बड़े डॉक्टर ने बताया की आपकी आँखों में एलर्जी है| आपको कुछ दिन तक सिर्फ़ हरा रंग ही देखना होगा और कोई और रंग देखेंगे तो आपकी आँखों को परेशानी होगी| अब क्या था, सेठ ने बड़े बड़े पेंटरों को बुलाया और पूरे महल को हरे रंग से रंगने के लिए कहा| वह बोला- मुझे हरे रंग से अलावा कोई और रंग दिखाई नहीं देना चाहिए मैं जहाँ से भी गुजरूँ, हर जगह हरा रंग कर दो| इस काम में बहुत पैसा खर्च हो रहा था लेकिन फिर भी सेठ की नज़र किसी अलग रंग पर पड़ ही जाती थी क्यूंकी पूरे नगर को हरे रंग से रंगना को संभव ही नहीं था, सेठ दिन प्रतिदिन पेंट कराने के लिए पैसा खर्च करता जा रहा था| वहीं शहर के एक सज्जन पुरुष गुजर रहा था उसने चारों तरफ हरा रंग देखकर लोगों से कारण पूछा| सारी बात सुनकर वह सेठ के पास गया और बोला सेठ जी आपको इतना पैसा खर्च करने की ज़रूरत नहीं है मेरे पास आपकी परेशानी का एक छोटा सा हल है.. आप हरा चश्मा क्यूँ नहीं खरीद लेते फिर सब कुछ हरा हो जाएगा| सेठ की आँख खुली की खुली रह गयी उसके दिमाग़ में यह शानदार विचार आया ही नहीं वह बेकार में इतना पैसा खर्च किए जा रहा था| तो जीवन में हमारी सोच और देखने के नज़रिए पर भी बहुत सारी चीज़ें निर्भर करतीं हैं कई बार परेशानी का हल बहुत आसान होता है लेकिन हम परेशानी में फँसे रहते हैं| तो इसे कहते हैं सोच का फ़र्क| 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 💐💐💐💐💐💐💐

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Rammurti Gond Jan 26, 2020

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Rammurti Gond Jan 26, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 25, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ प्रभात् वंदन : मन को जीतना ही सबसे बड़ा तप है 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 एक ऋषि यति-मुनि एक समय घूमते-घूमते नदी के तट पर चल रहे थे। मुनि को मौज आई। हम भी आज नाव पर बैठकर नदी की सैर करें और प्रभु की प्रकृति के दृश्यों को देखें'। चढ़ बैठे नाव को देखने के विचार से नीचे के खाने में जहां नाविक का सामान और निवास होता है, चले गये। जाते ही उनकी दृष्टि एक कुमारी कन्या पर जो नाविक की थी, पड़ी। कुमारी इतनी रुपवती थी कि विवश हो गया, उसे मूर्च्छा सी आ गई।.देवी ने उसके मुख में पानी डाला होश आई। पूछा―'मुनिवर ! क्या हो गया' ? *मुनि बोला―*'देवी ! मैं तुम्हारे सौन्दर्य पर इतना मोहित हो गया कि मैं अपनी सुध-बुध भूल गया अब मेरा मन तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। मेरी जीवन मृत्यु तुम्हारे आधीन है।' *देवी―*'आपका कथन सत्य है, परन्तु मैं तो नीच जाति की मछानी हूं।' *मुनि―*मुझमें यह सामर्थ्य है कि मेरे स्पर्श से तुम शुद्ध हो जाओगी। *देवी―*'पर अब तो दिन है।' *मुनि―*'मैं अभी रात कर दिखा सकता हूं।' *देवी―*'फिर भी यह जल (नदी) है।' *मुनि―*'मैं आन की आन में इसे स्थल (रेत) बना सकता हूं।' *देवी―*'मैं तो अपने माता-पिता के आधीन हूं। उनकी सम्मति तो नहीं होगी।' *मुनि―*'मैं उनको शाप देकर अभी भस्म कर सकता हूं।' *देवी―*'भगवन् ! जब परमात्मा ने आपको आपके भजन, तप के प्रताप से इतनी सामर्थ्य और सिद्धि वरदान दी है तो कितनी मूर्खता है कि अपने जन्म जन्मान्तरों के तप को एक नीच काम और नीच आनन्द और वह भी एक दो मिनट के लिए विनष्ट करते हो। शोक ! आपमें इतनी सामर्थ्य है कि जल को थल, दिन को रात बना सको पर यह सामर्थ्य नहीं कि मन को रोक सको।' मुनि ने इतना सुना ही था कि उसके ज्ञाननेत्र खुल गए। तत्काल देवी के चरणों में गिर पड़ा कि तुम मेरी गुरु हो, सम्भवतः यही न्यूनता थी जो मुझे नाव की सैर का बहाना बनाकर खींच लाई। *दृष्टान्त―* (१) रुप और काम बड़े-बड़े तपस्वियों को गिरा देता है। (२) तपी-जती स्त्री रुप से बचें। (३) कच्चे पक्के की परीक्षा तो संसार में होती है, जंगल में नहीं। (४) जब अपनी भूल का भान हो जावे, तब हठ मत करो। (५) जिन पर प्रभु की दया होती है, उनका साधन वे आप बनाते हैं। इसी सन्देश को मनुस्मृति में बताया गया है- इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु | संयमे यतनमातिष्ठेद्विद्वान यंतेव वाजिनाम || [ मनु - 2 / 88 ] जिस प्रकार से विद्वान सारथि घोड़ों को नियम में रखता है , उसी प्रकार हमको अपने मन तथा आत्मा को खोटे कामों में खींचने वाले विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों को सब प्रकार से खींचने का प्रयत्न करना चाहिए। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 *ऋणमोचक मंगळ स्तोत्र* यदि आपके ऊपर ऋण/कर्ज का बोझ अधिक बढ़ गया है और आप उस कर्ज को चाह कर भी नहीं उतार पा रहे है तब यदि आप ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का नियमित पाठ करते है तो निश्चित ही धीरे धीरे आपका ऋण उतर जाएगा। जैसा की आप जानते है मंगल का सम्बन्ध हनुमानजी से है और हनुमानजी सर्वबाधा मुक्ति प्रदाता है यह श्लोक भी हनुमान जी की ही आराधना के रूप में प्रतिष्ठित है। कैसे आरम्भ करे ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ....?? इस पाठ को प्रारम्भ करने के लिए सर्वप्रथम आपको किसी शुभ तिथि का चयन भारतीय पञ्चाङ्गानुसार कर लेना चाहिए। यह पाठ मंगलवार को ही शुरू करना चाहिए अन्य दिन को नही। इस पाठ को करने से पूर्व लाल वस्त्र बिछाकर मंगल यन्त्र व महावीर हनुमान जी को स्थापित करना चाहिए , सिंदूर व चमेली के तेल का चोला अर्पित कर अपने बाये हाथ की तरफ देशी घी का दीप व दाहिने हाथ की तरफ तिल के तेल का दीप स्थापित करना चाहिए। इसके बाद हनुमान जी को गुड़, चने व बेसन का भोग लगाना चाहिए। मंगल देव (मंगल यन्त्र को प्राण प्रतिष्ठित कर) व हनुमान जी के सामने ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ, लाल वस्त्र धारण करके ही आरम्भ करना चाहिए। यह पाठ अपनी श्रद्धा अनुसार 1, 3, 5, 9 , अथवा 11 पाठ 43 दिन तक नित्य करना चाहिए | इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से निश्चित ही कर्ज, ऋण व आर्थिक बाधा से मुक्ति मिलती है। *ऋणमोचक मंगल स्तोत्र -* मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः। स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1॥ लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः। धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2॥ अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः। व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3॥ एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्। ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्॥4॥ धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥5॥ स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः। न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्॥6॥ अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल। त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय॥7॥ ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः। भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥ 8 || अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः। तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्॥9॥ विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा। तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः॥10॥ पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः। ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः॥11॥ एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्। महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा॥12॥ || इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ||

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