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Jaikumar Apr 19, 2021

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.113 : नवधा भक्ति का उपदेश* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 113)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! रामचरितमानस का पाठ सुनकर आपलोगों को मालूम हुआ होगा कि आज का क्या विषय है? इस सत्संग में सदा जनाया जाता है कि *ईश्वर की भक्ति करो।* ईश्वर-स्वरूप को जानने के पहले जानना चाहिए कि ईश्वर-भक्ति की क्या आवश्यकता है? सबलोग माया की सेवा में लगे हुए हैं। फल यह होता है कि उससे शान्तिदायक सुख का लाभ नहीं करते हैं - संसार से नहीं छूटते हैं। इसकी बड़ी आवश्यकता है कि संसार से छूटा जाय, सदा का सुख पाया जाय और संतुष्टि-शान्ति प्राप्त की जाय। *एक ईश्वर ही ऐसा है, जिसको पा लेने पर और कुछ पाने को बाकी नहीं रहता। उस संतुष्टि के बाद और कोई इच्छा नहीं रहती। ईश्वर-भक्ति ही आपको सदा के लिए सुखी कर सकती है।* गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है - *राकापति षोडस उअहिं, तारागण समुदाय। सकल गिरिन्ह दव लाइअ, बिनु रवि राति न जाय।। ऐसेहि बिनु हरि भजन खगेसा। मिटइ न जीवन केर कलेसा।। - रामचरितमानस* अर्थात्‌ चन्द्रमा सोलहों कलाओं के साथ उग जाय, सारे तारेगण भी निकल आवें और संसार के सभी पहाड़ों में आग लगा दी जाय, फिर भी बिना सूर्योदय के रात्रि नहीं जाती। उसी तरह बिना ईश्वर-भक्ति किए किन्हीं के जीवन का दुःख-क्लेश नहीं मिट सकता। इसी तरह *सभी अच्छे-अच्छे कर्म करो और ईश्वर-भजन नहीं करो तो उसी तरह है, जैसे कि बिना सूर्य के रात नहीं जाती, सुख-रूप दिन नहीं आता और दुःख-रूप रात नहीं जाती।* पहले ईश्वर-स्वरूप का निर्णय जानना चाहिए। बिना स्वरूप निर्णय के ईश्वर की भक्ति नहीं हो सकती। उसका स्वरूप मन-बुद्धि से परे है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा - *राम स्वरूप तुम्हार, वचन अगोचर बुद्धि पर। अविगत अकथ अपार, नेति नेति नित निगम कह।। - रामचरितमानस* *जबतक स्वरूप-निर्णय नहीं हो, तबतक उसकी भक्ति नहीं हो सकती।* लोगों के मन में होगा कि जब परमात्मा को इन्द्रियों से प्राप्त नहीं कर सकते, तब किससे प्राप्त किया जाय? तो पहले अपने को जानो। इसमें भीतर से ज्ञान आता है। बाहर में केवल अंग हो और भीतर से ज्ञान नहीं आवे, तो यह जड़वत्‌ है। जैसे लोहे को आग में देने से लाल हो जाता है और आग से निकालने से काला का काला रह जाता है। उसी तरह *इस शरीर में चेतनमय-ज्ञानमय पदार्थ है।* किन्तु शरीर जड़ है। इसमें ज्ञान नहीं होगा। शरीर का अन्त होने पर शरीर सदा के लिए जड़ ही रह जाता है। इसके सड़ने से रोग उत्पन्न होगा, इसके लिए इसको जला देते हैं। शरीर के साथ इन्द्रियाँ हैं। अंतःकरण की इन्द्रियाँ जलती नहीं हैं। बाहर की सब इन्द्रियाँ शरीर के साथ लगी हैं। ये सभी जल जाती हैं। अंतःकरण सूक्ष्म शरीर में रहते हुए जीव के अपने कर्मवश उसके संग जाता है। *भीतर की चार इन्द्रियाँ - मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार भी जड़ हैं।* बाहर स्थूल शरीर से यह सूक्ष्म मन जड़ है। जब आप निट्ठाह नींद में सो गए, तब बुद्धि का विचार सब समाप्त हो गया। 'मैं हूँ’ का ज्ञान भी समाप्त हो जाता है। इसमें गति होने का जो चेतन का स्वभाव है, वह बन्द नहीं होता। चेतन का काम बन्द हो गया तो श्वास नहीं लिया जा सकता। चेतन कभी जड़ नहीं होगा। जड़ से बनी हुई बाहर और भीतर की इन्द्रियों से ईश्वर की पहचान नहीं हो सकती। आपको जिस रंग का चश्मा पहना दिया जाय, बाहर में उसी रंग के अनुरूप चीज को देखिएगा। चेतन आत्मा पर मायिक चश्मा लगा हुआ है। इस चश्मे से केवल माया-ही-माया दीखती है। परमात्मा को इस मायिक चश्मे से कोई नहीं पहचान सकता है। परमात्मा सबका आदि है। और स्वयं वह अनादि है। सबसे पहले जो है वह आदि है। सबका आदि यदि ससीम हो, एकदेशी हो तो ऐसा कहते बनता नहीं। क्‍योंकि प्रश्न होगा कि उस ससीम और एकदेशी के बाद और क्या है? यदि इसके पहले कुछ है, तब वह सबका आदि नहीं होगा। परमात्मा सबका आदि और अनादि होते हुए सर्वव्यापक ओर सर्वपर है। प्रकृति में जो व्यापक है, वह सर्वव्यापक है। और प्रकति के परे और कितना बाकी है, जिसका ठिकाना नहीं। इसलिए सर्वव्यापकता के भी परे है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा - *प्रकृति पार प्रभु सब उरबासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।* जो एक अनादि-अनंत है, उसके सामने दूसरा असीम नहीं हो सकता। क्योंकि अनंत दो नहीं हो सकते। जो असीम है, वह एक ही होगा। जो जितना अधिक व्यापक होता है, वह उतना अधिक सूक्ष्म होता है। उस अणु वा त्रसरेणु को मैं झीना नहीं कहता। बल्कि जो आकाशवत्‌ सूक्ष्म है। एक सेर बर्फ का फैलाव जितना होगा, उससे अधिक फैलाव सूक्ष्म एक सेर पानी का होगा। उससे भी अधिक फैलाव एक सेर पानी के वाष्प का होगा। वह वाष्प बर्फ और पानी से अधिक व्यापक और सूक्ष्म होगा। जो जितना अधिक सूक्ष्म होता है, वह उतना विशेष व्यापक होता है। कठिन से तरल और तरल से वाष्पीय विशेष व्यापक होता है। अनादि-असीम से व्यापक विशेष कुछ नहीं हो सकता। इसलिए वह विशेष सूक्ष्म है। वह तो सबसे विशेष सूक्ष और आपकी इन्द्रियाँ अत्यन्त स्थूल। तो स्थूल यंत्र से सूक्ष्म तत्त्व ग्रहण हो सकता है? इसलिए वेद और उपनिषद्‌ में परमात्मा को इन्द्रियातीत कहा गया है। परमात्मा सबसे पहले से है। परमात्मा से प्रकृति, प्रकृति से बुद्धि, बुद्धि से अहंकार, अहंकार से सेन्द्रिय और निरेन्द्रिय दो प्रकार की सृष्टि होती है। इस प्रकार भी परमात्मा से बहुत पीछे बने मन, बुद्धि आदि। यह परमात्मा के समक्ष स्थूल है। इससे वह ग्रहण नहीं हो सकता। एक-एक इन्द्रिय से एक-एक काम होता है। मन-बुद्धि से, शरीर से जो काम करते हैं, सो आप जानते हैं। और इनके संग से अलग होकर - अकेले होकर अपने से क्‍या करते हैं? सो आप नहीं जानते। आँखों से केवल देखते हैं। मन से केवल संकल्प-विकल्प होता है। यह जानते हैं, किन्तु आप अपने से स्वयं क्‍या करते हैं, यह नहीं जान सकते। जबतक दूध से घी को अलग नहीं किया जाय, तबतक नहीं जान सकते कि घी से क्‍या होता है? उसी तरह शरीर-इन्द्रिय, अंतःकरण से अलग हुए बिना नहीं जान सकते कि हम स्वयं क्या कर सकते हैं। वेद-उपनिषद्‌ में आया है कि *केवल चेतन आत्मा से परमात्मा का दर्शन होता है।* कितने कहते हैं कि इसी आँख से श्रीराम का, विष्णु भगवान का दर्शन हुआ। इतने बखेड़े में कौन पड़े कि शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि को छोड़ो, तब दर्शन होगा। तो विचारो श्रीराम या विष्णु भगवान का क्‍या देखा? उनके रूप को देखा। किंतु कितने को दर्शन होने पर भी पहचान नहीं हो सकी। तुलसीदासजी को घोड़े पर राम, लक्ष्मण जाते हुए दिखाई पड़े। किंतु पहचान न सके। फिर हनुमान से तुलसीदासजी ने निवेदन किया, तब दूसरे दिन जब तुलसीदासजी के सामने भगवान श्रीराम प्रकट हुए और उन्होंने बालक रूप में तुलसीदास से कहा - ‘बाबा! हमें चन्दन दो।' हनुमानजी ने सोचा - कहीं इस बार भी ये धोखा न खा जाएँ, इसलिए उन्होंने तोते का रूप धारण करके यह दोहा कहा - *चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर। तुलसिदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुवीर।।* गोस्वामी तुलसीदासजी ने विनय-पत्रिका में बड़ा ही अच्छा लिखा है - *एहि तें में हरि ज्ञान गँवायो। परिहरि हृदय कमल रघुनाथहिं, बाहर फिरत विकल भय धायो।। ज्यों कुरंग निज अंग रुचिर मद, अति मतिहीन मरम नहिं पायो। खोजत गिरि तरु लता भूमि बिल, परम सुगंध कहाँ ते आयो।। ज्यों सर विमल वारि परिपूरन, ऊपर कछु सेंवार तृन छायो। जारत हियो ताहि तजिहौं सठ, चाहत यहि विधि तृषा बुझायो।। व्यापित त्रिविध ताप तन दारुण, तापर दुसह दरिद्र सतायो। अपने धाम नाम सुरतरु तजि, विषय बबूर बाग मन लायो।। तुम्ह सम ज्ञान निधान मोहि सम, मूढ़ न आन पुरानन्हि गायो। तुलसिदास प्रभु यह विचारि जिय, कीजै नाथ उचित मन भायो।।* इसमें मूल बात यह है कि बाहर में उन्होंने नहीं पहचाना, अंदर में ही पहचाना। मृग और सरोवर का मिशाल देकर बताया कि ईश्वर अपने अंदर है, अंदर में पहचानोगे। प्रश्न होगा कि अंदर में दर्शन क्यों होगा? और बाहर में क्‍यों नहीं होगा? इसका उत्तर पहले हो गया कि इन्द्रियों से उसे पहचान नहीं सकते। बाहर में इन्द्रियों का संग रहता है। अंदर में होने से शरीर-इन्द्रियों के ज्ञान से छटता है। सब छूटकर जब केवल चेतन आत्मा रहती है, तब दर्शन होता है। इसलिए ईश्वर की भक्ति ऐसी होनी चाहिए, जो अन्तर्मुखी कर दे। *मन की चंचलता में बहिर्मुखता होती है और मन की स्थिरता में अन्तर्मुखता होती है।* मन का जो सिमटाव होता है, यही अन्तर्मुखी करता है। इसलिए भक्ति के साधन में मन के सिमटाव की बातें हैं। परमात्मा का दर्शन जो चेतन आत्मा से होता है, उसके लिए क्‍या करना चाहिए? शिव बाबा, श्रीराम आदि का जो दर्शन होता है, उसमें उनके शरीर की पहचान होती है, शरीरी की नहीं। आत्म-तत्त्व का दर्शन नहीं हुआ उनके शरीर को देखने से। रूप का दर्शन करो और रूप में अरूप का दर्शन करो, तब पूरा है। और गोस्वामी तुलसीदासजी का यह वचन याद रखें – *गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानहु भाई।।* और उपनिषद्‌ का यह वाक्य – *भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया:। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।।* अर्थात्‌ उस परे-से-परे परमात्मा के दर्शन से हृदय की गाँठ टूट जाती है, सारे संशयों का नाश हो जाता है और सब कर्म नष्ट हो जाते हैं। *जिस दर्शन से ऐसा हो, उसको परमात्मा का ठीक-ठीक दर्शन समझो। जो शरीर-इन्द्रियों के साथ दर्शन हो, वह मायिक दर्शन है। असली दर्शन चेतन आत्मा से होता है।* इसके लिए क्‍या करो? बहुत सरल है। अभी आपलोगों ने नवधा भक्ति का वर्णन सुना। शवरी का पहला जन्म खिखिरनी का था। ऋषि-मुनि की कृपा से वह दूसरे जन्म में रानी हो गई। राजा के राजमहल में उसको साथु-संतों का सत्संग नहीं मिलता था। राजा ने राजमहल में सत्संग-मन्दिर बनवा दिया। संयोग से एक पहुँचे हुए संत उनके यहाँ पहुँच गए। रानी ने बहुत आदरपूर्वक उनकी सेवा की। महात्माजी ने प्रसन्न होकर कहा - ‘माँगो, तुम क्या वरदान माँगती हो।' रानी ने कहा – *मैं शीघ्र मर जाऊँ। दूसरे जन्म में मैं कुरूपा होऊँ और साधारण कुल में मेरा जन्म हो।* महात्माजी के आशीर्वाद से वैसा ही हुआ। उसका जन्म भील के घर हुआ। देखने में भी कुरूपा थी। जब उसकी शादी हुई, उसका पति साथ लेकर जब जाने लगा, तो रास्ते में उसने सोचा, यदि इसको अपने साथ घर ले जाता हूँ तो बच्चे डरेंगे और लोग कहेंगे कि कहाँ से चुड़ैल ले आया है। ऐसा सोचते हुए वह शवरी को छोड़कर तेजी से निकल भागा। शवरी भी यही चाहती थी, उन्होंने भी सोचा-भले हुआ संसार के बंधन से में बच गई। वह मतंग ऋषि के आश्रम में रहने लगी। जब मतंग ऋषि संसार से प्रयाण करने लगे तो शवरी से उन्होंने कहा – ‘तुम धैर्य धारण करके यहाँ रहो। भगवान श्रीराम का दर्शन तुमको यहीं मिलेगा।' गुरु-वचन पर विश्वास करके भजन-साधन करती रही। एक दिन ऐसा समय आया कि भगवान राम शवरी के आश्रम पधारे और नवधा भक्ति का उपदेश किया - *पहली भक्ति में संतों का संग, दूसरी भक्ति कथा-प्रसंग जहाँ हो, वहाँ जाकर सुनो। 3. गुरु की सेवा मान-अहंकार छोड़कर करो। 4. परमात्मा का गुणगान करो। 5. मंत्र जाप करो। 6. इन्द्रिय-दमनशील बनो। 7. शम का साधन करो और मुझसे बढ़कर संत को मानो। 8. यथा लाभ में संतोष करो, दूसरे का दोष मत देखो। 9. सबसे छलहीन होओ। मुझ पर भरोसा रखो, हृदय में हर्ष और दीनता नहीं लाओ। सबमें मनोनिग्रह की बड़ी आवश्यकता है।* गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है - *नित प्रति दरसन साधु के, औ साधुन के संग। तुलसी काहि वियोग तें, नहिं लागा हरि रंग।।* तो उत्तर में पुन: कहा – *मन तो रमे संसार में, तन साधुन के संग। तुलसी याहि वियोग तें, नहिं लागा हरि रंग।।* चार भक्ति तक मन-लगाव, मन-लगाव ही है। मंत्र जपो और मन कहीं फिरे, तो यह जप नहीं है। कबीर साहब की वाणी में है - *माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख माहिं। मनुवाँ तो दहु दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं।। तन थिर मन थिर वचन थिर, सुरत निरत थिर होय। कह कबीर इस पलक को, कलप न पावै कोय।।* केवल पाँच भक्ति तक में ही पूर्ण मनोनिग्रह नहीं होता है। इसके बाद की भक्ति को जानिए। इन्द्रियों को कौन चलायमान करता है? बच्चे को खोज्चावाले को देखकर उसकी चीजों को खाने की इच्छा होती है। वयस्क को इच्छा नहीं होती। इसमें क्‍या है? *मन की धार इन्द्रियों तक है। इन धारों को यदि समेट लीजिए तो इन्द्रियाँ सिमट जाएँगी। यह दृष्टियोग के साधन से होगा।* यही वैष्णवी मुद्रा-शाम्भवी मुद्रा है। इसके बारम्बार अभ्यास से मन की धारा सिमट जाएगी। पहले विचार से भी कुछ रोको। किंतु केवल विचार से ही इन्द्रियों पर काबू नहीं होता। स्थिर विचार-स्थितप्रज्ञ संत हैं। श्रीमद्भगवद्गीता की यह सिद्धावस्था है। *मन की स्थिरता में स्थिरप्रज्ञता होती है। जबतक मन की धारा पसरी हुई है, तबतक स्थिरता नहीं होगी।* ध्यान-अभ्यास विशेष करने से मन की चंचलता छूटती है। तभी विषयों के रस से मन छूटेगा। जब आप सोने लगते हैं, तो पहले तन्द्रा होती है। तन्द्रा में आपको ज्ञात होता है कि बाहर का भी कुछ ज्ञान होता है और हाथ-पैर कमजोर होते जाते हैं। शक्ति अंदर को खिंची जा रही है उस समय में कुछ न खाने को है, न सुनने को, न देखने को है। किंतु केवल अंतर्मुखी वृत्ति होती है। बड़ा चैन मालूम होता है। अंतर्मुखी होने से बहुत चैन मालूम होता है। इसीलिए कबीर साहब ने कहा है – *भजन में होत आनन्द आनन्द।* यह ईश्वर-प्रदत्त है। यह एक नमूना है। ईश्वर बहुत दूर है। केवल थोड़ा-सा अन्तर्मुख होने में चैन होता है यदि और विशेष अंदर हो तो विशेष चैन मिलता है। विषयों से उसका मन हट जाता है। मन हट जाने से इन्द्रियों से उसके सूत हट जाते हैं। इन्द्रियाँ यों ही पड़ी रहती हैं। *छठी भक्ति - इन्द्रियों के दमन का स्वभाववाला बनो और सज्जनों के धर्म के अनुकूल चलो।* सज्जन पापों को नहीं करते। झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार आदि पापों से अलग रहते। इन्द्रियों और मन का साथ-साथ साधन होता है। यह ‘दम’ का साधन है। पहले दम का साधन होता है, फिर शम का साधन होता है। ‘शम' का अर्थ है मनोनिग्रह। 'शम' से ‘सम’ होता है। बिना शम' के 'सम' नहीं हो सकता है। केवल मन का साधन अंतर के अभ्यास से होता है। शिवजी ने शिवसंहिता में कहा है - *न नाद सदृशो लय:।* जैसे नमक घुलते-घुलते समुद्र ही हो गया, सोना गलते-गलते पानी हो गया; वैसे ही मन गलते-गलते उसमें विलीन हो जाता है। प्रकृति मण्डल से छूटकर परमात्मा का दर्शन करता है। नवधा भक्ति में सात भक्ति तक साधन है। आठवीं ओर नवीं भक्ति उसका फल है। इस प्रकार नौ प्रकार की भक्ति का आप साधन कीजिए तो परमात्मा के जिस स्वरूप का वर्णन हुआ, उसको प्राप्त करेंगे। इन्द्रियों के दर्शन-स्पर्श से जो रूप मालूम होता है, वह माया है। इन सब प्रकारों की भक्ति को कीजिए और पापों से बचिए। *पापों से बचने पर संसार में प्रतिष्ठा भी होगी और ईश्वर-प्राप्ति भी होगी।* यह प्रवचन खगड़िया जिलान्तर्गत ग्राम - मानसी में दिनांक 6.6.1955 ई० को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.112 : एक को जानने से शान्ति मिलेगी* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 112)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! मनुष्य बहुत कुछ पहचानता है। कोई थोड़ा पहचानता है, कोई उससे ज्यादे तो कोई उससे भी ज्यादे पहचानता है। आजकल के वैज्ञानिकों ने बहुत चीजों को पहचाना है और बहुत चीजों का आविष्कार किया है, जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है। किंतु इसे जानने से ऐसा नहीं हुआ कि और कुछ जानने को बाकी नहीं। वैज्ञानिकों ने संसार में बहुत तत्त्वों को जाना है, किंतु वे कहते हैं कि अभी कितना जानना बाकी है, ठिकाना नहीं। *अभी तो समुद्र के किनारे के बालकण ही देख रहे हैं, समुद्र भरा पड़ा है।* संतलोग कहते हैं – *एक को जानो तो सब को जान जाओगे।* उस एक को जानने से शान्ति मिलेगी। संतों ने उस एक परमात्मा को जाना और उन्हें शान्ति मिली। संत लोग उसी ईश्वर को जानने कहते हैं। *जानने के लिए केवल बौद्धिक ज्ञान से नहीं, बल्कि उसे पहचानकर जानो। केवल परोक्ष ज्ञान ही नहीं, उसको अपरोक्ष ज्ञान से भी जानो।* अपरोक्ष ज्ञान के लिए बहुत साधन और प्रयास करना पड़ता है। पहले श्रवण-मनन करना पड़ता है। इसमें भी समय लगता है और प्रयास करना पड़ता है। श्रवण, मनन के बाद मनुष्य को पहचानकर जानने के लिए निदिध्यासन करना चाहिए। श्रवण से तत्त्व का कुछ बोध जानने में आता है। किंतु स्वरूपतः वह क्‍या है? उसे पहचानता नहीं है। इसलिए वह बहुत अधूरा ज्ञान है। संसार को देखने के लिए आँखों और कानों को खोलते हैं। उसी तरह *परमात्मा को जानने के लिए आँख और कान की शक्तियों को बढ़ाओ। बाहर की ओर नहीं, अंतर की ओर देखने और सुनने का प्रयास करो।* बाहर में देखने-सुनने से जैसे कोई बाहर का पदार्थ पहचानता है, वैसे ही अंतर में देखने-सुनने से तुम परमात्मा को पहचानोगे। बाहर की ओर इन्द्रियों में रहते हुए स्थूलता में फँसा रहता है - स्थूल बुद्धि होती है। यदि कहो कि वैज्ञानिक यंत्रों के द्वारा बहुत छोटे-छोटे पदार्थों को देखता है, अणु को भी चीर सकता है, तो भी यह स्थूल ही है। इसको स्थूल के अतिरिक्त सूक्ष्म नहीं कह सकते हैं। सूक्ष्म तत्त्व वह है, जो स्थूल इन्द्रियों से नहीं जाना जाता। स्थूल इन्द्रियों से जो जाना जाता है, उससे स्थूल ज्ञान ही होता है। अपने अन्दर देखने के ढंग से यदि देख सको तो सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रकट हो जाता है। *बाहरी इन्द्रियों में जो शक्तियाँ हैं, वे जब उधर से फिरती हैं तो अन्दर में प्रवेश करती हैं, वे ही सूक्ष्म हैं। इन सूक्ष्म धाराओं से काम लो तो जो काम होगा, वह सूक्ष्म काम है। इसको जानो।* संतों ने कहा कि *अपने अंदर देखो, अपने अंदर सुनो।* अपने अन्दर देखने-सुनने से अंत में पता लगेगा कि यही ईश्वर है। फिर तुमको कुछ जानने के लिए बाकी नहीं रहेगा। आवागमन से छूट जाओगे। सभी दुःखों से छूट जाओगे। ईश्वर-स्वरूप के लिए कहा गया है कि वह मन से ग्रहण नहीं हो सकता। वह इन्द्रिय-गोचर पदार्थों में से कुछ नहीं है। *इन्द्रियों को जो कुछ प्रत्यक्ष है, वह माया है।* गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में लिखा है कि श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा – *गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानहु भाई।।* अर्थात्‌ जो सब शरीरों में रहता है, वह शरीरों से निर्लेप रहता है। *सब पदार्थों में भी जो रहते हुए अथवा सब आकारों में रहते हुए सबसे निर्लेप और निराकार है, वही आत्मा है। इसको पहचानो, यही ईश्वर है।* आत्मा कहने से आत्मा परमात्मा दोनों को जानना चाहिए। जैसे आकाश कहने से बाहर के आकाश का और भीतर घर के आकाश का भी ज्ञान होता है। उपनिषदों में आत्मा शब्द का विशेष प्रयोग किया गया है। जबकि यह पृथक किया जाय, तो पिण्ड में व्यापक वह आत्मा, ब्रह्माण्ड में व्यापक वह आत्मा और प्रकृति में व्यापक आत्मा सब एक ही है। सब पिण्डों, ब्रह्माण्डों, सारे प्रकृति मण्डल में व्यापक तथा इन सबको भर कर फिर इन सबके जो परे है, वह है परमात्मा। और शरीरस्थ आत्मा का ज्ञान केवल आत्मा कहने से होता है। सबमें रहता हुआ सबके गुणों से जो निर्लेप है, वह आत्मा ही परमात्मा है, वही ईश्वर एक को जानने से शान्ति मिलेगी है। उससे बाहर कुछ नहीं है। उसको पहचानने से फिर कुछ पहचानने के लिए बाकी नहीं रहेगा। उसको पहचानने के लिए संसार में कहीं जाना, शरीरों में फँसा रहना है। शरीर एक ही नहीं है। हमलोग चार जड़ शरीरों में पड़े हुए हैं। जैसे मूँज होती है। मूँज के अन्दर सींकी होती है। सींकी के ऊपर मूँज के कई खोल होते हैं। एक-एक कर सभी खोलों को उतारने पर सीकीं निकलती है। केले में भी कई परतें होती हैं। उन परतों को एक-एक कर उतारने पर केले का थम्भ निकलता है। इसी तरह चेतन आत्मा इस शरीर में है। एक ही शरीर में नहीं, चार जड़ शरीरों - स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण में है। ऊपर से एक स्थूल शरीर देखने में आता है। साधारणत: एक स्थूल शरीर की मृत्यु होती है, बाकी और तीनों की मृत्यु हो जाती तो बड़ा कुशल होता। जब परमात्मा की पहचान होती है, तब ये तीनों भी झड़ जाते हैं। परमात्मा की पहचान तबतक नहीं हो सकती, जबतक मायिक सभी आवरणों, पापों से छूट नहीं जाएँ। कबीर साहब ने कहा - *राम निरंजन न्यारा रे। अंजन सकल पसारा रे।। अंजन उतपति वो ऊँकार। अंजन मांड्या सब बिस्तार।। अंजन ब्रह्मा शंकर इन्द। अंजन गोपी संगि गोव्यंद।। अंजन वाणी अंजन वेद। अंजन किया नाना भेद।। अंजन विद्या पाठ पुरान। अंजन फोकट कथहि गियान।। अंजन पाती अंजन देव। अंजन की करे अंजन सेव।। अंजन नाचै अंजन गावै। अंजन भेष अनंत दिखावै।। अंजन कहौं कहाँ लगि केता। दान पुनि तप तीरथ जेता।। कहै कबीर कोइ विरला जागे, अंजन छाड़ि निरंजन लागै।।* सब माया ही माया है। तीर्थ, दान, व्रत सब माया है। इसके अच्छे-अच्छे फल तुम पा सकते हो, स्वर्ग-वैकुण्ठ पाओगे, फिर यहाँ आना होगा। किंतु परमात्मा का दर्शन इससे नहीं होता। मनुष्य शुभ कर्मों को करे। पवित्र जल को ही तीर्थ कहते हैं। इसमें स्नान करो, किंतु यह मत समझो कि इसी से सब कुछ हो गया। *परमात्मा का दर्शन या आवागमन से छूटना इससे नहीं हो सकता।* इसके लिए अपने अन्दर में चलना होगा। अंदर में चलने से माया से छूटोगे। बाहर में चलने से माया में ही रहोगे। गुरु नानकदेव ने कहा कि वह परमात्मा अलख, अगम, अगोचर है। उसका बाहर में कोई चिह्न नहीं है। उसका यदि कोई चिह्न है तो ओ३म्‌, प्रणव ध्वनि, सत्शब्द है। हमलोग मुँह से जो ओ३म्‌, सतनाम उच्चारण करते हैं, सतशब्द नहीं है। गहरे ध्यान में जाने से वह ग्रहण होता है। परमात्मा जैसे अव्यक्त है, उसकी प्रतिमा भी अव्यक्त है। वह हई है। कहीं से वह आवेगा सो नहीं। वह सब जगह है। तुम पहचानते नहीं हो। पहचानने की योग्यता ध्यान से होगी। इसलिए ध्यान करो। सब शरीरों में ब्रह्म छिपा हुआ है। उसकी ज्योति सब शरीरों में है। जो निडर ध्यान लगाता है, वह उसको प्राप्त करता है। *पवित्र बर्तन में सत्य अँटता है। अंतःकरण रूप बर्तन को पवित्र करो, तब ईश्वर को पाओगे।* सत्य आचरण करनेवाले बहुत कम होते हैं। सत्य आचरण करनेवाले की संसार में भी प्रतिष्ठा होती है। प्रतिष्ठा-युक्त होने का जीवन पवित्र आचरण से होता है। भ्रष्ट आचरण से नहीं होता। अपवित्रता का जीवन तो मरे हुए के समान है। तुम अपना जीवन पवित्र रखो। इससे बुरे-बुरे कर्मों को निकाल दो। बुरी-बुरी इच्छाओं को छोड़ दो। अच्छे-अच्छे कर्मों को अपने अन्दर लो। झूठ मत बोलो। चोरी मत करो। व्यभिचार मत करो। *व्यभिचार दो तरह के होते हैं - एक तो बलात्कार, दूसरा व्यभिचार मन के मेल से होता है, दोनों से बचो।* एक वकील ने मुझसे पूछा - *मन के मेल से व्यभिचार करने में पाप भी है?’ मैंने कहा - ‘पहले आप पाप-पुण्य को जानिए।* जिस कर्म से आत्मोन्नति हो, वह पुण्य है और जिस कर्म से आत्मा का अधःपतन हो, वह पाप है।' नशा मत खाओ, न पिओ। तम्बाकू तक नशा है। हिंसा मत करो। पंच पापों से बचो, तब अंतःकरण पवित्र हो जाएगा। ईश्वर पाने का शौक हो और उसके लिए जो कर्म करना चाहिए, उससे गिरे रहो तो ईश्वर कैसे मिलेंगे। हिंसा तीन तरह की होती है - मन से, वचन से, और कर्म से। और भी हिंसा के दो विभाग कर लो - वार्य और अनिवार्य। खेत जोतने में कितनी हिंसा होती है? यदि खेती नहीं करो तो संसार के सब लोग समाप्त हो जाएँगे। भोजन नहीं मिले तो बिना एटम बम के ही सब लोग मर जाएँगे। हिटलर लड़ाई के सामानों को बनाने में लगा रहा और भोजन का प्रबंध नहीं किया, तो बिना भोजन के मारा गया। पानीपत की तीसरी लड़ाई में भोजन नहीं मिलने के कारण ही मराठे की हार हुई। कई लाख आदमी एक ही दिन में समाप्त हो गए। मनुस्मृति में अष्टघातक का वर्णन आया है - *अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी। संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातका:।। - अध्याय 5 श्लोक 51* अर्थात्‌ 1. वध करने की आज्ञा करनेवाला, 2 शस्त्र से मांस काटनेवाला, 3. मारनेवाला, 4. बेचने-वाला 5. मोल लेनेवाला, 6. मांस को पकानेवाला, 7. परोसने के लिए लानेवाला, 8. खानेवाला; ये आठो घातक (हिंसा करनेवाला) ही कहलाते हैं। *वार्य हिंसा से बचो और अनिवार्य हिंसा के लिए प्रायश्चित करने कहा गया है।* चोर-डकैत के आने पर लड़ने-भिड़ने में, एक राष्ट्र की दूसरे राष्ट्र की चढ़ाई को रोकने में लड़ाई हो तो यह अनिवार्य है। इसमें लड़ो, वीरता के साथ लड़ो। अन्नोपार्जन जो हो, उसमें से दान दो। यह प्रायश्चित है। सबसे मूल है, ईश्वर का भजन करो। भगवान बुद्ध ने कहा - *अंधकार में पड़े हुए तुम प्रकाश को क्‍यों नहीं खोजते।* ध्यानाभ्यास करो, प्रकाश प्रत्यक्ष होगा। यह प्रवचन खगड़िया जिलान्तर्गत ग्राम-मानसी में दिनांक 6.6.1955 ई० को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।। महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.111 : संसार में खीरा की तरह रहो (साभार – सत्संग-सुधा सागर, 111) बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।। प्यारे लोगो! जहाँ से अनहद सुनने का आरंभ होता है, वह नाम का घर है। कंज = कमल। कंजाकमल = ध्यान का आरंभ जहाँ से होता है। लीलागिरि = कौतुक का पहाड़। शब्द के ध्यान में जो ज्ञान बढ़ा, वह है नाम का प्रकाश अथवा जिस प्रकाश से नाम प्रकट होता है, वह ‘दीपक बारा नाम का’ है। बाती दीन्ही टार = सुरत को आगे बढ़ाया। तल्ली ताल तरंग बखानी = तल पर शब्दों की तरंगें उठती हैं। तल्‍ली = तल। इस सत्संग में कहा जाता है कि अपना उद्धार करो। इस संसार में पूर्णरूप से कोई सुखी नहीं होता है। यहाँ केवल कहलाने के लिए सुख है। दरअसल यह संसार सुख का स्थान नहीं है। इससे पार हो जाना चाहिए। जबतक आप देह में रहिएगा, तबतक संसार में रहना होगा। संसार का अर्थ केवल स्थूल जगत नहीं। जहाँ तक शरीर है, वहाँ तक संसार है। इस स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर है। साधारण मृत्यु में केवल स्थूल शरीर चला जाता है - मर जाता है। जीवात्मा मरता नहीं है। सूक्ष्म, कारण, महाकारण शरीर नहीं मरते हैं। इसके साथ जीवात्मा रहता है। भजन करने से ही इन बचे शरीरों को मार सकते हैं। जिस तरह स्थूल शरीर से जीवात्मा निकल जाता है, तो स्थूल शरीर मर जाता है; उसी तरह सूक्ष्म, कारण, महाकारण शरीर से जीवात्मा के निकल जाने पर इन शरीरों की मृत्यु होती है। किसी भी लोक में रहिए, किसी भी शरीर में रहिए, स्वर्गादि लोक में रहिए, ब्रह्म के लोक में रहिए; सभी जगह कष्ट-ही-कष्ट है। शिवलोक में शिव को भी कष्ट होता है। सभी लोकों में झगड़ा-तकरार, शापा-शापी होते हैं। गोलोक में भी ऐसा होता है। गर्ग-संहिता पढ़कर देखिए। कितनाहूँ सुन्दर-से-सुन्दर देहवाला हो, कितनाहूँ ऊँचा लोक हो, सबमें दुःख है। इसलिए अपने उद्धार के लिए सब शरीरों को छोड़ना होगा। जैसे कोई घर से बाहर जाना चाहे तो पहले घर-ही-घर चलना पड़ता है। उसी तरह शरीरों से निकलने के लिए शरीर-ही-शरीर निकलना होगा और सब शरीरों से निकलने पर परमात्मा की प्राप्ति होती है। अभी आपलोगों ने तुलसी साहब का पद ‘जीव का निबेरा’ सुना। उसमें अन्तमार्ग का वर्णन है। संसार में जो कुछ देखने में आता है, वह अपने अंदर भी देख सकते हैं। सब शरीरों को छोड़ने का अपने अंदर में ही यत्न होना चाहिए। परमात्मा के दर्शन का यत्न अपने शरीर में ही होना चाहिए। बाहर में जो दर्शन होता है, वह माया का दर्शन होता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है - गो गोचर जहँ लगि मन जाईं। सो सब माया जानहु भाई।। अपने अन्दर जो चलता है, तो उसको देव-रूपों का दर्शन होता है और अन्त में परमात्मा का भी दर्शन होता है। इसका यत्न है - अपने घर में रहो, सत्संग भजन करो और यह ख्याल रखो कि यह शरीर छोड़ना होगा। घर बढ़िया-बढ़िया हो, उसमें अपने आराम किया हो, तो उस सोने के महल में भी कोई नहीं रखता, जब इस शरीर से प्राण निकल जाता है। गुरु नानकदेवजी ने कहा है - एक घड़ी कोऊ नहिं राखत, घर तें देत निकार। इसमें आसक्त होने से ठीक नहीं। कोई भी संसार में सदा नहीं रह सकता। संत चरणदासजी की शिष्या सहजोबाई ने बड़ा अच्छा कहा है - चलना है रहना नहीं, चलना विश्वाबीस। सहजो तनिक सुहाग पर, कहा गुथावै शीश।। कोई कितनाहूँ प्यारा हो, सबको छोड़कर जाना होगा। इसलिए संसार में खीरा बनकर रहो। खीरा ऊपर से एक और भीतर से फटा हुआ होता है। इस तरह संसार में रहने से कल्याण होगा। न तो बाल-बच्चों को छोड़ो, न इनमें फँसो। फँसाव को छोड़कर अपने अन्दर साधन-भजन करो। जप करो और ध्यान करो। इसके लिए चाल-चलन अच्छी बनाओ। झूठ एकदम छोड़ दो। जो झूठ बोलेगा, उसी से सब पाप होगा। जो झूठ छोड़ देगा, उससे कोई पाप नहीं होगा। चोरी मत करो। व्यभिचार मत करो। नशा मत खाओ, पिओ। नशा खाने से मस्तिष्क ठीक नहीं रहता। भाँग, तम्बाकू, गाँजा सबको छोड़ दो। हिंसा मत करो जीवों को दुःख मत दो। मत्स्य-मांस मत खाओ। मत्स्य-मांस खाने से जलचर, थलचर, नभचर के जो स्वभाव हैं तासीर हैं, उस स्वभाव को, खानेवाले अपने अन्दर लेते हैं। अपने शरीर पर विचारिए और उन जानवरों के शरीर पर विचारिए। मनुष्य का शरीर तो देवताओं के शरीर से उत्तम है। फिर इतने पवित्र शरीर में अपवित्र मांस को देना ठीक नहीं। हिंसा दो तरह की होती हैं - एक वार्य और दूसरी अनिवार्य। वार्य हिंसा से बच सकते हैं। जिव्हा - स्वाद के लिए नाहक जीवों को मारना वार्य हिंसा है। इससे बचना चाहिए। कृषि कर्म में जो हिंसा होती है, वह अनिवार्य है। अनिवार्य हिंसा से कोई बच नहीं सकता। वार्य हिंसा से बचो। मांस-मछली नहीं खाने से सात्त्विक मन होगा। तब भजन बनेगा। यह प्रवचन खगड़िया जिला के श्रीसंतमत सत्संग मंदिर रामगंज में दिनांक 26.5.1955 ई० को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। श्री सद्गुरु महाराज की जय

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