🙏🌹जय श्री महाकाल 🌹🙏 श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का भस्म आरती श्रृंगार दर्शन उज्जैन मध्यप्रदेश से 🔱 26 जनवरी 2021 ( मंगलवार ) 🔱

🙏🌹जय श्री महाकाल 🌹🙏
श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का भस्म 
आरती श्रृंगार दर्शन उज्जैन मध्यप्रदेश से
🔱 26 जनवरी 2021 ( मंगलवार ) 🔱
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आरती श्रृंगार दर्शन उज्जैन मध्यप्रदेश से
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कामेंट्स

K.N.pandey Jan 26, 2021
🌷🙏Jai shree Uma pati mahadeo Jai shree mahakal baba Har Har mahadeo sambhoo kailashpati Om namah shivaya Jai shiv Shankar 🙏🌷🙏🥀🙏🍁🙏🌺🙏⚘🌻🌲🌴🌵🌾⚘🌺

Navin jha Jan 26, 2021
Jai mahakaal Jai mahadev jai shiv shankar ki Jai Ho Jai Ho Jai baba bhole nath ki jai ho Jai Ho Jai Ho

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Neeta Trivedi Feb 28, 2021

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*"लालची आदमी"* 🙏🏻🚩🌹 👁❗👁 🌹🚩🙏🏻 एक नगर में एक लोभी व्यक्ति रहता था. अपार धन-संपदा होने के बाद भी उसे हर समय और अधिक धन प्राप्ति की लालसा रहती थी. एक बार नगर में एक चमत्कारी संत का आगमन हुआ. लोभी व्यक्ति को जब उनके चमत्कारों के बारे में ज्ञात हुआ, तो वह दौड़ा-दौड़ा उनके पास गया और उन्हें अपने घर आमंत्रित कर उनकी अच्छी सेवा-सुश्रुषा की. सेवा से प्रसन्न होकर नगर से प्रस्थान करने के पूर्व संत ने उसे चार दीपक दिए. चारों दीपक देकर संत ने उसे बताया, “पुत्र! जब भी तुम्हें धन की आवश्यकता हो, तो पहला दीपक जला लेना और पूर्व दिशा में चलते जाना. जहाँ दीपक बुझ जाये, उस जगह की जमीन खोद लेना. वहाँ तुम्हें धन की प्राप्ति होगी. उसके उपरांत पुनः तुम्हें धन की आवश्यकता हुई, तो दूसरा दीपक जला लेना. जिसे लेकर पश्चिम दिशा में तब तक चलते जाना, जब तक वह बुझ ना जाये. उस स्थान से जमीन में गड़ी अपार धन-संपदा तुम्हें प्राप्त होगा. धन की तुम्हारी आवश्यकता तब भी पूरी ना हो, तो तीसरा दीपक जलाकर दक्षिण दिशा में चलते जाना. जहाँ दीपक बुझे, वहाँ की जमीन खोदकर वहाँ का धन प्राप्त कर लेना. अंत में तुम्हारे पास एक दीपक और एक दिशा शेष रहेगी. किंतु तुम्हें न उस दीपक को जलाना है, न ही उस दिशा में जाना है.” इतना कहकर संत लोभी व्यक्ति के घर और उस नगर से प्रस्थान कर गए. संत के जाते ही लोभी व्यक्ति ने पहला दीपक जला लिया और धन की तलाश में पूर्व दिशा की ओर चल पड़ा. एक जंगल में दीपक बुझ गया. वहाँ की खुदाई करने पर उसे एक कलश प्राप्त हुआ. वह कलश सोने के आभूषणों से भरा हुआ था. लोभी व्यक्ति ने सोचा कि पहले दूसरी दिशाओं का धन प्राप्त कर लेता हूँ, फिर यहाँ का धन ले जाऊँगा. वह कलश वहीं झाड़ियों में छुपाकर उसने दूसरा दीपक जलाया और पश्चिम दिशा की ओर चल पड़ा. एक सुनसान स्थान में दूसरा दीपक बुझ गया. लोभी व्यक्ति ने वहाँ की जमीन खोदी. उसे वहाँ एक संदूक मिला, जो सोने के सिक्कों से भरा हुआ था. लोभी व्यक्ति ने वह संदूक उसी गड्ढे में बाद में ले जाने के लिए छोड़ दिया. अब उसने तीसरा दीपक जलाया और दक्षिण दिशा की ओर बढ़ गया. वह दीपक एक पेड़ के नीचे बुझा. वहाँ जमीन के नीचे लोभी व्यक्ति को एक घड़ा मिला, जिसमें हीरे-मोती भरे हुए थे. इतना धन प्राप्त कर लोभी व्यक्ति प्रसन्न तो बहुत हुआ, किंतु उसका लोभ और बढ़ गया. वह अंतिम दीपक जलाकर उत्तर दिशा में जाने का विचार करने लगा, जिसके लिए उसे संत ने मना किया था. किंतु लोभ में अंधे हो चुके व्यक्ति ने सोचा कि अवश्य उस स्थान पर इन स्थानों से भी अधिक धन छुपा होगा, जो संत स्वयं रखना चाहता होगा. मुझे तत्काल वहाँ जाकर उससे पहले उस धन को अपने कब्जे में ले लेना चाहिए. उसके बाद सारा जीवन मैं ऐशो-आराम से बिताऊंगा. उसने अंतिम दीपक जला लिया और उत्तर दिशा में बढ़ने लगा. चलते-चलते वह एक महल के सामने पहुँचा. वहाँ पहुँचते ही दीपक बुझ गया. दीपक बुझने के बाद लोभी व्यक्ति ने महल का द्वार खोल लिया और महल के भीतर प्रवेश कर महल के कक्षों में धन की तलाश करने लगा. एक कक्ष में उसे हीरे-जवाहरातों का भंडार मिला, जिन्हें देख उसकी आँखें चौंधियां गई. एक अन्य कक्ष में उसे सोने का भंडार मिला. अपार धन देख उसका लालच और बढ़ने लगा. कुछ आगे जाने पर उसे चक्की चलने की आवाज़ सुनाई पड़ी. वह एक कक्ष से आ रही थी. आश्चर्यचकित होकर उसने उस कक्ष का द्वार खोल लिया. वहाँ उसे एक वृद्ध व्यक्ति चक्की पीसता हुआ दिखाई पड़ा. लोभी व्यक्ति ने उससे पूछा, “यहाँ कैसे पहुँचे बाबा?” “क्या थोड़ी देर तुम चक्की चलाओगे? मैं ज़रा सांस ले लूं. फिर तुम्हें पूरी बात बताता हूँ कि मैं यहाँ कैसे पहुँचा और मुझे यहाँ क्या मिला?” वृद्ध व्यक्ति बोला. लोभी व्यक्ति ने सोचा कि वृद्ध व्यक्ति से यह जानकारी प्राप्त हो जायेगी कि इस महल में धन कहाँ-कहाँ छुपा है और उसकी बात मानकर वह चक्की चलाने लगा. इधर वृद्ध व्यक्ति उठ खड़ा हुआ और जोर-जोर से हँसने लगा. उसे हँसता देख लोभी व्यक्ति ने पूछा, “ऐसे क्यों हंस रहे हो?” यह कहकर वह चक्की बंद करने लगा. “अरे अरे, चक्की बंद मत करना. अबसे ये महल तेरा है. इस पर अब तेरा अधिकार है और साथ ही इस चक्की पर भी. ये चक्की तुम्हें अब हर समय चलाते रहना है क्योंकि चक्की बंद होते ही ये महल ढह जायेगा और तू इसमें दब कर मर जायेगा.” गहरी सांस लेकर वृद्ध व्यक्ति आगे बोला, “संत की बात न मानकर मैं भी लोभवश आखिरी दीपक जलाकर इस महल में पहुँच गया था. तब से यहाँ चक्की चला रहा हूँ. मेरी पूरी जवानी चक्की चलाते-चलाते निकल गई.” इतना कहकर वृद्ध व्यक्ति वहाँ से जाने लगा. “जाते-जाते ये बताते जाओ कि इस चक्की से छुटकारा कैसे मिलेगा?” लोभी व्यक्ति पीछे से चिल्लाया. “जब तक मेरे और तुम्हारे जैसा कोई व्यक्ति लोभ में अंधा होकर यहाँ नहीं आयेगा, तुम्हें इस चक्की से छुटकारा नहीं मिलेगा.” इतना कहकर वृद्ध व्यक्ति चला गया. लोभी व्यक्ति चक्की पीसता और खुद को कोसता रह गया. 🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹 🚩🙏🏻 *जय शिव ओंकारा🙏🏻🌹 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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*💐वास्तविक पुण्य 💐* *किसी आश्रम में एक साधु रहता था। काफी सालों से वह इसी आश्रम में रह रहा था। अब वह काफी वृद्ध हो चला था और मृत्यु को वह निकट महसूस कर रहा था, लेकिन संतुष्ट था कि 30 साल से उसने प्रभु का सिमरन किया है, उसके खाते में ढेर सारा पुण्य जमा है इसलिए उसे मोक्ष मिलना तो तय ही है।* *एक दिन उसके ख्याल में एक स्त्री आयी। स्त्री ने साधु से कहा~ "अपने एक दिन के पुण्य मुझे दे दो और मेरे एक दिन के पाप तुम वरण कर लो।"* *इतना कह कर स्त्री लोप हो गयी।* *साधु बहुत बेचैन हुआ कि इतने बरस तो स्त्री ख्याल में ना आयी, अब जब अंत नजदीक है तो स्त्री ख्याल में आने लगी।* *फिर उसने ख्याल झटक दिया और प्रभु सुमिरन में बैठ गया।* *स्त्री फिर से ख्याल में आयी। फिर से उसने कहा कि~* *"एक दिन का पुण्य मुझे दे दो और मेरा एक दिन का पाप तुम वरण कर लो।"* *इस बार साधु ने स्त्री को पहचानने की कोशिश की लेकिन स्त्री का चेहरा बहुत धुंधला था, साधु से पहचाना नहीं गया! साधु अब चिंतित हो उठा कि एक दिन का पुण्य लेकर यह स्त्री क्या करेगी! हो ना हो ये स्त्री कष्ट में है!* *लेकिन गुरु जी ने कहा हुआ है कि आपके पुण्य ही आपकी असल पूंजी है, यह किसी को कभी मत दे बैठना। और इतनी मुश्किल से पुण्यो की कमाई होती है, यह भी दे बैठे तो मोक्ष तो गया। हो ना हो ये मुझे मोक्ष से हटाने की कोई साजिश है।* *साधू ने अपने गुरु के आगे अपनी चिंता जाहिर की।* *गुरु ने साधु को डांटा~* *'मेरी शिक्षा का कोई असर नहीं तुझ पर? पुण्य किसी को नहीं देने होते। यही आपकी असली कमाई है।"* *साधु ने गुरु जी को सत्य वचन कहा और फिर से प्रभु सुमिरन में बैठ गया।* *स्त्री फिर ख्याल में आ गयी। बोली~ तुम्हारा गुरु अपूर्ण है, इसे ज्ञान ही नहीं है, तुम तो आसक्ति छोड़ने का दम भरते हो, बीवी-बच्चे, दीन-दुनिया छोड़ कर तुम इस अभिमान में हो कि तुमने आसक्ति छोड़ दी है। तुमने और तुम्हारे गुरु ने तो आसक्ति को और जोर से पकड़ लिया है। किसी जरूरतमंद की मदद तक का चरित्र नहीं रहा तुम्हारा तो।"* *साधु बहुत परेशान हो गया! वह फिर से गुरु के पास गया। स्त्री की बात बताई। गुरु ने फिर साधु को डांटा~ "गुरु पर संदेह करवा कर वह तुम्हे पाप में धकेल रही है। जरूर कोई बुरी आत्मा तुम्हारे पीछे पड़ गयी है।"* *साधु अब कहाँ जाए! वह वापिस लौट आया और फिर से प्रभु सुमिरन में बैठ गया। स्त्री फिर ख्याल में आयी। उसने फिर कहा~ "इतने साल तक अध्यात्म में रहकर तुम गुलाम भी बन गए हो। गुरु से आगे जाते। इतने साल के अध्ययन में तुम्हारा स्वतंत्र मत तक नहीं बन पाया। गुरु के सीमित ज्ञान में उलझ कर रह गए हो। मैं अब फिर कह रही हूँ, मुझे एक दिन का पुण्य दे दो और मेरा एक दिन का पाप वरण कर लो। मुझे किसी को मोक्ष दिलवाना है। यही प्रभु इच्छा है।"* *साधु को अपनी अल्पज्ञता पर बहुत ग्लानि हुई। संत मत कहता है कि पुण्य किसी को मत दो और धर्म कहता है जरूरतमंद की मदद करो। यहां तो फंस गया। गुरु भी राह नही दे रहा कोई, लेकिन स्त्री मोक्ष किसको दिलवाना चाहती है।* *साधु को एक युक्ति सूझी। जब कोई राह ना दिखे तो प्रभु से तार जोड़ो। प्रभु से राह जानो। प्रभु से ही पूछ लो कि उसकी रजा क्या है???* *उसने प्रभु से उपाय पूछा। आकाशवाणी हुई।* *वाणी ने पूछा~ "पहले तो तुम ही बताओ कि तुम कौन से पुण्य पर इतरा रहे हो???"* *साधु बोला~ "मैंने तीस साल प्रभू सुमिरन किया है। तीस साल मैं भिक्षा पर रहा हूँ। कुछ संचय नही किया। त्याग को ही जीवन माना है। पत्नी बच्चे तक सब त्याग दिया।"* *वाणी ने कहा~ "तुमने तीस बरस कोई उपयोगी काम नही किया। कोई रचनात्मक काम नही किया। दूसरों का कमाया और बनाया हुआ खाया। राम-राम, ॐ नमः शिवाय, जय माता की जपने से पुण्य कैसे इकठा होते है मुझे तो नही पता। तुम डॉलर-डॉलर, रुपिया-रुपिया जपते रहो तो क्या तुम्हारा बैंक खाता भर जायेगा? तुम्हारे खाते में शून्य पुण्य है।"* *साधु बहुत हैरान हुआ। बहुत सदमे में आ गया। लेकिन हिम्मत करके उसने प्रभु से पूछा कि~ "फिर वह स्त्री पुण्य क्यो मांग रही है।"* *प्रभु ने कहा~ "क्या तुम जानते हो वह स्त्री कौन है???"* *साधु ने कहा~ "नही जानता लेकिन जानना चाहता हूं।"* *प्रभु ने कहा~ "वह तुम्हारी धर्मपत्नी है। तुम जिसे पाप का संसार कह छोड़ आये थे। कुछ पता है वह क्या करती है???"* *साधु की आंखे फटने लगी। उसने कहा~ "नही प्रभु। उसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता!"* *प्रभु ने कहा~ "तो सुनो, जब तुम घर से चुपचाप निकल आये थे तब वह कई दिन तुम्हारे इन्तजार में रोई। फिर एक दिन संचय खत्म हो गया और बच्चों की भूख ने उसे तुम्हारे गम पोंछ डालने के लिए विवश कर दिया। उसने आंसू पोंछ दिए और नौकरी के लिए जगह-जगह घूमती भटकती रही। वह इतनी पढ़ी लिखी नही थी। तुम बहुत बीच राह उसे छोड़ गए थे। उसे काम मिल नही रहा था इसलिए उसने एक कुष्ठ आश्रम में नौकरी कर ली। वह हर रोज खुद को बीमारी से बचाती उन लोगो की सेवा करती रही जिन्हे लोग वहां त्याग जाते हैँ। वह खुद को आज भी पापिन कहती है कि इसीलिए उसका मर्द उसे छोड़ कर चला गया!"* *प्रभु ने आगे कहा~ "अब वह बेचैन है तुम्हे लेकर। उसे बहुत दिनों से आभास होंने लगा है कि उसका पति मरने वाला है। वह यही चाहती है कि उसके पति को मोक्ष मिले जिसके लिए वह घर से गया है। उसने बारंबार प्रभु को अर्जी लगाई है की प्रभु मुझ पापिन की जिंदगी काम आ जाये तो ले लो। उन्हें मोक्ष जरूर देना। मैंने कहा उसे कि अपना एक दिन उसे दे दो। कहती है मेरे खाते में पुण्य कहाँ, होते तो मैं एक पल ना लगाती। सारे पुण्य उन्हें दे देती। वह सुमिरन नहीं करती, वह भी समझती है कि सुमिरन से पुण्य मिलते हैं।"* *"मैंने उसे नहीं बताया कि तुम्हारे पास अथाह पुण्य जमा हैं। पुण्य सुमिरन से नहीं आता। मैंने उसे कहा~ कि एक साधु है उस से एक दिन के पुण्य मांग लो, अपने एक दिन के पाप देकर। उसने सवाल किया~ कि ऐसा कौन होगा जो पाप लेकर पुण्य दे देगा। मैंने उसे आश्वस्त किया कि साधु लोग ऐसे ही होते हैं।"* *"वह औरत अपने पुण्य तुम्हे दे रही थी और तुम ना जाने कौन से हिसाब किताब में पड़ गए। तुम तो साधु भी ठीक से नहीं बन पाए। तुमने कभी नहीं सोचा कि पत्नी और बच्चे कैसे होंगे। लेकिन पत्नी आज भी बेचैन है कि तुम लक्ष्य को प्राप्त होवो। तुम्हारी पत्नी को कुष्ठ रोग है, वह खुद मृत्यु शैया पर है लेकिन तुम्हारे लिए मोक्ष चाह रही है। तुम सिर्फ अपने मोक्ष के लिए तीस बरस से हिसाब किताब में पड़े हो।"* *साधू के बदन पर पसीने की बूंदे बहने लगी, सांस तेज होने लगी, उसने ऊँची आवाज में चीख लगाई~* *"यशोदा$$$$$$!:"* *साधु हड़बड़ा कर उठ बैठा, उसके माथे पर पसीना बह रहा था।* *उसने बाहर झाँक कर देखा, सुबह होने को थी। उसने जल्दी से अपना झोला बाँधा और गुरु जी के सामने जा खड़ा हुआ।* *गुरु जी ने पूछा~ "आज इतने जल्दी भिक्षा पर???"* *साधु बोला~ "घर जा रहा हूँ।"* *गुरु जी बोले~ "अब घर क्या करने जा रहे हो???"* *साधु बोला~ "धर्म सीखने"* 〰️🙏🏻〰️ 💛🧡❤️ 💖💖💖 🙇🏻‍♂️🙇🏻‍♂️🙇🏻‍♂️ *धर्म वह नहीं है कि मंदिरों की घंटी बजाएं घंटों पूजा करें। मस्जिदों में जाकर नमाज पढ़ें, गिरजाघरों में जाकर प्रार्थना करें, गुरु ग्रंथ साहब का पाठ करें, धर्म तो वह है किसी भूखे को खाना खिलाएं, किसी अंधे को सड़क पार कराएं, किसी जरूरतमंद की सहायता करें, किसी बीमार असहाय का इलाज कराएं, किसी छात्र की पढ़ने में सहायता करें, यही असली धर्म है, यही असली पुण्य है, पूजा-पाठ दिखावा करने से आपके पुण्य नहीं बढ़ेंगे वास्तविक किसी की सच्ची मदद करेंगे तभी आपके वास्तविक पुण्य का खाता बढ़ेगा।* *◇◆◇◆◇🧘🏻‍♂️🔥🧘🏻‍♂️◆◇◆◇◆*

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