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Dilip Palande Aug 10, 2020

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Dilip Palande Aug 10, 2020

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swamini Aug 10, 2020

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*लोकसत्ता :: एकात्मयोग ३६४. कठोर स्वीकार :: १० ऑगस्ट २०२०* अत्यंत प्रिय व्यक्तीचा मृत्यू तर हृदय विदीर्ण करणारा असतो चैतन्य प्रेम ‘धर्म’ अर्थात यथायोग्य धर्माचरण; ‘अर्थ’ म्हणजेच योग्य मार्गानं संपत्ती मिळवणे, तिचा व्यय व विनियोग आणि ती वाचवणे; तसेच ‘काम’ म्हणजे देहसुखासकट सर्व कामनांच्या पूर्तीसाठी योग्य मार्गानं प्रयत्न करणे; या तीनही गोष्टींचा आधार गृहस्थाश्रम आहे. धर्म, अर्थ, काम आणि मोक्ष हे सनातन संस्कृतीनं चार पुरुषार्थ मानले आहेत. विशेष म्हणजे, अर्थ आणि काम याची माणसाला स्वाभाविक ओढ आहे. पण या दोहोंना धर्म आणि मोक्ष या तटबंदींमध्ये बंदिस्त केलं आहे! म्हणजेच ‘अर्थ’ अर्थात दैहिक, तसेच काम म्हणजे ‘मानसिक’ व ‘भावनिक’ सुखासाठी माणूस जगत असला तरी त्याचा पाया अधर्म नव्हे, तर धर्म असला पाहिजे आणि त्याचं ध्येय मोक्ष अर्थात बंधनरहित जीवन्मुक्तीच असलं पाहिजे, असा विलक्षण दंडक आहे. आपली प्रिया आणि पिल्लं गतप्राण झालेली पाहताच कपोत मनानं खचला. आता धर्म, अर्थ आणि काम या तीन पुरुषार्थाचा आधार असलेला गृहस्थाश्रम भंगला आहे, पण अतृप्त काम उरला आहे! म्हणजे अजून माझी प्रिया जगली असती, तर पिल्लं मोठी झाल्यावर त्यांचं वात्सल्यसुख आम्हाला उपभोगता आलं असतं, अशी कामना हृदयात कायम आहे. आता एवीतेवी गृहस्थाश्रम आटोपलाच आहे, तर चौथा पुरुषार्थ जो मोक्ष तो तरी साधून घ्यावा, असं कुणी म्हणत असेल, तर तेही शक्य नाही! का? तर कपोत म्हणतो की, ‘‘ऐसें म्हणसी जरी निगुतीं। ये अर्थी मानी दुर्मती। विषयवासना नोसंडिती। कैसेनि मुक्ति लाधेल।।६०९।।’’ (‘एकनाथी भागवत’, अध्याय सातवा). मती दुर्मती झाली आहे आणि विषयवासनेचं प्रेम चित्तात खोलवर कायम आहे; मग जीवन्मुक्ती कशी शक्य आहे, असा कपोताचा प्रश्न आहे. मृत्यू कुणालाही आवडत नाही. अत्यंत प्रिय व्यक्तीचा मृत्यू तर हृदय विदीर्ण करणारा असतो. अनेक लोकांचे प्राण वाचवताना प्राणांची आहुती दिलेल्या पुत्राचा मृत्यू धीरोदात्तपणे एका मातेनं स्वीकारल्याची घटना अगदी ताजी आहे. तसा स्वीकार आपण करू शकतो का हो? नाही! आणखी एका ज्येष्ठ साधिकेच्या जीवनातला प्रसंग आठवतो. परगावी राहणारा एकुलता एक मुलगा गेला. तसं त्यांना कळवलं मात्र नाही. ‘‘मुलाची प्रकृती गंभीर झाली आहे, लगेच या,’’ एवढा निरोप गेला होता. मुलाच्या घराजवळ त्या आल्या आणि बाहेरची ताटकळती गर्दी पाहिली. तोच हातातला भ्रमणध्वनी वाजला. त्यांचे सद्गुरू बोलत होते. म्हणाले, ‘‘परमेश्वरानं तुम्हाला सर्व जबाबदाऱ्यांतून आता मुक्त केलं आहे! उरलेलं आयुष्य त्याच्या चरणीं व्यतीत करायचं आहे!’’ त्यांनी मला सांगितलं की, ‘‘त्या एका वाक्यानं मी सावरले! खंबीरपणे सामोरी गेले!’’ आता त्या संन्यस्त जीवन जगत आहेत. ही उदाहरणं आपल्या मनाला भिडतात हो, पण ती आचरणात उतरतील का? ‘‘प्रपंचातल्या जबाबदाऱ्यांतून सद्गुरूंनी मला एकदाचं मोकळं करावं, म्हणजे मी साधना करायला मोकळा होईन,’’ असं अनेक जण म्हणतात. पण प्रपंचात कितीही चढउतार होवो, मी साधनेसाठी मोकळा आहेच, असं कुठे मानतात? किंवा कपोताप्रमाणे प्रपंचच संपणं, ही ‘मोकळं होण्या’ची व्याख्या मानतील का? तेव्हा, जी दशा कपोताची तीच आपली आहे. म्हणूनच कपोत म्हणतो की, विषयसुखाच्या कामना अपूर्त असतानाच विषयसुखाची साधनं नाहीशी झाल्यावर मोक्षसुखासाठी प्रयत्न करण्याची इच्छा मनाला शिवेल तरी का?

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tanvi🍁🍁 Aug 10, 2020

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Dilip Palande Aug 10, 2020

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Mandakini Aug 10, 2020

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K. SUDHA Aug 10, 2020

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arati pawar Aug 10, 2020

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swamini Aug 10, 2020

श्री राधा जी को श्रीकृष्ण की आत्मा कहा जाता है ! ये श्री वृषभानु जी और कीर्तिदा जी की पुत्री थीं। पद्म पुराण में श्री वृषभानु जी को राजा बताते हुए कहा गया है कि यह राजा जब यज्ञ की भूमि साफ कर रहे थे तब उन्हें भूमि कन्या के रूप में श्री राधा मिली ! राजा ने उन्हें अपनी कन्या मानकर पालन पोषण किया। श्रीराधा जी के बारे में एक दूसरी कथा यह भी मिलती है कि भगवान श्रीविष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार लेते समय सभी देवताओं से पृथ्वी पर अवतार लेने के लिए कहा तो भगवान विष्णु की अर्धांगिनी माँ लक्ष्मी, राधा जी बनकर पृथ्वी पर आईं। श्री राधा जी के महात्म वर्णित स्तुति है, त्वं माता कृष्ण प्राणाधिका देवी कृष्ण प्रेममयी शक्ति शुभे, पूजितासी मया सा च या श्री कृष्णेन पूजिता, कृष्ण भक्ति प्रदे राधे नमस्ते मंगल प्रदे ! अर्थात – हे श्री राधा, आप श्री कृष्ण के प्राण (अधिष्ठात्री देवी) हैं तथा आप ही श्री कृष्ण की प्रेममयी शक्ति तथा शोभा हैं ! श्री कृष्ण भी जिनकी पूजा करते हैं वे देवी मेरी पूजा स्वीकार करें ! हे देवी राधा, मुझे कृष्ण भक्ति प्रदान करें मेरा नमन स्वीकार करें तथा मेरा मंगल करें ! हे दीनबन्धो दिनेश सर्वेश्वर नमोस्तुते, गोपेश गोपिका कांत राधा कांता नमोस्तुते ! अर्थात – हे दीनबंधो, दिनेश, सब ईश्वरों के ईश्वर, प्रभु मेरा नमन, मेरी स्तुति स्वीकार करें ! आप गोपिओं के ईश्वर एवं प्राणनाथ हैं तथा श्री राधा जी आपकी प्राण (अधिष्ठात्री देवी) हैं ! प्रभु मेरा नमन मेरी स्तुति स्वीकार करें ! श्री राधा जी का मुख्य मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। यहां की लट्ठमार होली विश्व प्रसिद्ध है। श्रीराधा, भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति हैं। श्रीकृष्ण के प्राणों से ही इनका प्रादुर्भाव हुआ है। श्रीकृष्ण इनकी नित्य आराधना करते हैं। इनके माता पिता श्री वृषभानु जी एवं माँ कीर्तिदा जी ने पूवर्जन्म में पति पत्नी के रूप में कई वर्षों तक कठिन तप करके ईश्वर से श्री राधा जी को पुत्री रूप में पाने का आशीर्वाद प्राप्त किया था ! इस प्रकार द्वापर के अंत में योगमाया ने श्रीराधा के लिए उपयुक्त क्षेत्र की रचना कर दी। भाद्र शुक्ल अष्टमी दिन सोमवार के मध्यान्ह में कीर्तिदा रानी के प्रसूतिगृह में सहसा एक दिव्य ज्योति फैल गयी। उस तीव्र ज्योति से सबके नेत्र बंद हो गये। जब गोप सुंदरियों के नेत्र खुले तो उन्होंने देखा, एक अति सुंदर कन्या कीर्तिदा जी के पास पड़ी है। कीर्तिदा रानी ने अपनी कन्या को देखकर प्रसन्नता से एक लाख गोदान का संकल्प किया। बालिका का नाम राधा रखा गया। एक बार देव ऋषि नारद ने ब्रज में श्रीकृष्ण का दर्शन किया। उन्होंने सोचा जब स्वयं गोलोक विहारी श्रीकृष्ण भूलोक पर अवतरित हो गये हैं तो गोलोकेश्वरी श्रीराधा जी भी कहीं न कहीं गोपी रूप में अवश्य अवतरित हुई होंगी ! घूमते घूमते देव ऋषि श्री वृषभानु जी के विशाल भवन के पास पहुंचे। श्री वृषभानु जी ने उनका विधिवत सत्कार किया। फिर उन्होंने देव ऋषि से निवेदन किया कि, भगवन ! मेरी एक पुत्री है वह सुंदर तो इतनी है मानो सौन्दर्य की खान हो किंतु हमारे विशेष प्रयास के बाद भी वह अपनी आंखें नहीं खोलती है ! आश्चयर्चकित देव ऋषि नारद वृषभानु जी के साथ श्रीराधा के कमरे में गये वहां बालिका का अनुपम सौन्दर्य देखकर देव ऋषि के विस्मय की सीमा न रही। नारदजी के मन में आया निश्चय ही यही श्रीराधा हैं ! वृषभानु को बाहर भेजकर उन्होंने एकांत में श्रीराधा की नाना प्रकार से स्तुति की किंतु उन्हें श्रीराधा के दिव्य स्वरूप का दर्शन नहीं हुआ। जैसे ही देव ऋषि नारद ने श्रीकृष्ण वंदना करना शुरू की वैसे ही दृश्य बदल गया और देव ऋषि नारद को किशोरी श्रीराधिका जी का दर्शन हुआ। सखियां भी वहां प्रकट होकर श्रीराधा को घेर कर खड़ी हो गयीं। श्रीराधा देव ऋषि को अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन कराने के बाद फिर से पालने में बालिका रूप में प्रकट हो गयीं। देव ऋषि नारद गदगद कण्ठ से श्रीराधा का यशोगान करते हुए वहां से चल दिये। ब्रम्हवैवर्तपुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने और श्रीराधा के अभेदता का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि श्रीराधा के कृपा कटाक्ष के बिना किसी को मेरे प्रेम की उपलब्धि हो ही नहीं सकती। वास्तव में श्रीराधा और श्री कृष्ण एक ही देह हैं। श्रीकृष्ण की प्राप्ति और मोक्ष दोनों श्रीराधाजी की कृपा दृष्टि पर ही निभ्रर हैं। उन अनन्त ईश्वर श्री कृष्ण की अनन्त शक्ति श्री राधा को पूरी तरह से जानना, क्या किसी जीव के लिए सम्भव है ! इस प्रश्न का उत्तर भी कोई श्री राधा कृपा प्राप्त साधक ही दे सकता है ! श्री कृष्ण की आराध्या के रूप में श्री राधा रानी की पूजा की जाती है। वृंदावन के सेवाकुंज मंदिर में श्री कृष्ण, श्री राधा की चरण सेवा करते हैं। बेंणी गूंथते हैं और अपनी आराध्या को प्रसन्न करने के हरसंभव प्रयास करते हैं। कहा जाता है कि श्री कृष्ण को पाने के लिए श्री राधा को पाना जरूरी है। यह भी कहा जाता है कि श्री राधा की भक्ति करने वाले के पास प्रभु श्री कृष्ण स्वयं चलकर आते हैं। श्री राधा नाम का स्मरण जप या भजन कर लेने मात्र से प्राणी का निश्चित ही उद्धार हो जाता है !

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