हनुमानजी

Neha Sharma, Haryana Jan 21, 2020

जय श्री राम जय श्री हनुमान जी शुभ प्रभात वंदन उत्तर रामायण के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात भगवान श्रीराम ने बड़ी सभा का आयोजन कर सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों, किन्नरों, यक्षों व राजाओं आदि को उसमें आमंत्रित किया। सभा में आए नारद मुनि के भड़काने पर एक राजन ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया। ऋषि विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने भगवान श्रीराम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पूर्व श्रीराम ने उस राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को श्राप दे देंगे।   इस पर श्रीराम ने उस राजा को सूर्यास्त से पूर्व मारने का प्रण ले लिया। श्रीराम के प्रण की खबर पाते ही राजा भागा-भागा हनुमान जी की माता अंजनी की शरण में गया तथा बिना पूरी बात बताए उनसे प्राण रक्षा का वचन मांग लिया। तब माता अंजनी ने हनुमान जी को राजन की प्राण रक्षा का आदेश दिया। हनुमान जी ने श्रीराम की शपथ लेकर कहा कि कोई भी राजन का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा परंतु जब राजन ने बताया कि भगवान श्रीराम ने ही उसका वध करने का प्रण किया है तो हनुमान जी धर्म संकट में पड़ गए कि राजन के प्राण कैसे बचाएं और माता का दिया वचन कैसे पूरा करें तथा भगवान श्रीराम को श्राप से कैसे बचाएं। धर्म संकट में फंसे हनुमानजी को एक योजना सूझी। हनुमानजी ने राजन से सरयू नदी के तट पर जाकर राम नाम जपने के लिए कहा। हनुमान जी खुद सूक्ष्म रूप में राजन के पीछे छिप गए। जब राजन को खोजते हुए श्रीराम सरयू तट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राजन राम-राम जप रहा है।   प्रभु श्रीराम ने सोचा, "ये तो भक्त है, मैं भक्त के प्राण कैसे ले लूं"।   श्री राम ने राज भवन लौटकर ऋषि विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही। विश्वामित्र अपनी बात पर अडिग रहे और जिस पर श्रीराम को फिर से राजन के प्राण लेने हेतु सरयू तट पर लौटना पड़ा। अब श्रीराम के समक्ष भी धर्मसंकट खड़ा हो गया कि कैसे वो राम नाम जप रहे अपने ही भक्त का वध करें। राम सोच रहे थे कि हनुमानजी को उनके साथ होना चाहिए था परंतु हनुमानजी तो अपने ही आराध्य के विरुद्ध सूक्ष्म रूप से एक धर्मयुद्ध का संचालन कर रहे थे। हनुमानजी को यह ज्ञात था कि राम नाम जपते हु‌ए राजन को कोई भी नहीं मार सकता, खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी नहीं।  श्रीराम ने सरयू तट से लौटकर राजन को मारने हेतु जब शक्ति बाण निकाला तब हनुमानजी के कहने पर राजन राम-राम जपने लगा। राम जानते थे राम-नाम जपने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं करता। वो असहाय होकर राजभवन लौट गए। विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर श्राप देने को उतारू हो गए और राम को फिर सरयू तट पर जाना पड़ा।   इस बार राजा हनुमान जी के इशारे पर जय जय सियाराम जय जय हनुमान गा रहा था। प्रभु श्री राम ने सोचा कि मेरे नाम के साथ-साथ ये राजन शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है। ऐसे में कोई अस्त्र-शस्त्र इसे मार नहीं सकता। इस संकट को देखकर श्रीराम मूर्छित हो गए। तब ऋषि व‌शिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र को सलाह दी कि राम को इस तरह संकट में न डालें। उन्होंने कहा कि श्रीराम चाह कर भी राम नाम जपने वाले को नहीं मार सकते क्योंकि जो बल राम के नाम में है और खुद राम में नहीं है। संकट बढ़ता देखकर ऋषि विश्वामित्र ने राम को संभाला और अपने वचन से मुक्त कर दिया। मामला संभलते देखकर राजा के पीछे छिपे हनुमान वापस अपने रूप में आ गए और श्रीराम के चरणों मे आ गिरे।  तब प्रभु श्रीराम ने कहा कि हनुमानजी ने इस प्रसंग से सिद्ध कर दिया है कि भक्ति की शक्ति सैदेव आराध्य की ताकत बनती है तथा सच्चा भक्त सदैव भगवान से भी बड़ा रहता है। इस प्रकार हनुमानजी ने राम नाम के सहारे श्री राम को भी हरा दिया। धन्य है राम नाम और धन्य धन्य है प्रभु श्री राम के भक्त हनुमान।  "जिस सागर को बिना सेतु के, लांघ सके न राम। कूद गए हनुमान जी उसी को, लेकर राम का नाम। तो अंत में निकला ये परिणाम कि राम से बड़ा राम का नाम"

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हनुमान जी की चतुरता 🚩 🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌 मित्रों, ऐसी हिन्दी पौराणिक कथा प्रचलित है कि एक समय कपिवर की प्रशंसा के आनन्द में मग्न श्रीराम ने सीताजी से कहा-‘देवी! लंका विजय में यदि हनुमान का सहयोग न मिलता तो आज भी मैं सीता वियोगी ही बना रहता।’ सीताजी ने कहा-‘आप बार-बार हनुमान की प्रशंसा करते रहते हैं, कभी उनके बल शौर्य की, कभी उनके ज्ञान की। अतः आज आप एक ऐसा प्रसंग सुनाइये कि जिसमें उनकी चतुरता से लंका विजय में विशेष सहायता हुई हो।’ ‘ठीक याद दिलाया तुमने।’ श्रीराम बोले- युद्ध में रावण थक गया था। उसके अधिकतर वीर सैनिकों का वध हो चुका था। अब युद्ध में विजय प्राप्त करने का उसने अन्तिम उपाय सोचा। यह था देवी को प्रसन्न करने के लिए चण्डी महायज्ञ। यज्ञ आरंभ हो गया। किंतु हमारे हनुमान को चैन कहां? यदि यज्ञ पूर्ण हो जाता और रावण देवी से वर प्राप्त करने मे सफल हो जाता तो उसकी विजय निश्चित थी। बस, तुरंत उन्होने ब्राह्मण का रूप धारण किया और यज्ञ में शामिल ब्राह्मणों की सेवा करना प्रारंभ कर दिया। ऐसी निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मण अति प्रसन्न हुये। उन्होंने हनुमान से वर मांगने के लिए कहा। ‘पहले तो हनुमान ने कुछ भी मांगने से इनकार कर दिया, किंतु सेवा से संतुष्ट ब्राह्मणों का आग्रह देखकर उन्होंने एक वरदान मांग लिया।’ ‘वरदान में क्या मांगा हनुमान ने?’ सीताजी के प्रश्न में उत्सुकता थी। ‘उनकी इसी याचना में तो चतुरता झलकती है’ श्रीराम बोले- ‘जिस मंत्र को बार बार किया जा रहा था, उसी मंत्र के एक अक्षर का परिवर्तन का हनुमान ने वरदान में मांग लिया और बैचारे भोले ब्राह्मणों ने ‘तथास्तु’ कह दिया। उसी के कारण मंत्र का अर्थ ही बदल गया, जिससे कि रावण का घोर विनाश हुआ।’ ‘एक ही अक्षर से अर्थ में इतना परिवर्तन!’ सीताजी ने प्रश्न किया ‘कौन सा मंत्र था वह?’ श्रीराम ने मंत्र बताया- जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते।। (अर्गलास्तोत्र-2) इस श्लोक में ‘भूतार्तिहारिणि’ मे ‘ह’ के स्थान पर ‘क’ का उच्चारण करने का हनुमान ने वर मांगा भूतार्तिहारिणि का अर्थ है-‘संपूर्ण प्रणियों की पीड़ा हरने वाली और ‘भूतार्तिकारिणि’ का अर्थ है प्राणियों को पीड़ित करने वाली।’ इस प्रकार एक सिर्फ एक अक्षर बदलने ने रावण का विनाश हो गया। ‘ऐसे चतुरशिरोमणि हैं हमारे हनुमान’-श्रीराम ने प्रसंग को पूर्ण किया। सीताजी इस प्रसंग को सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुई। मित्रों आज के युग में हमें हनुमान की आवश्यकता है। ऐसे हनुमान की जो देश भक्त हो, ज्ञानी हो, त्यागी हो, चरित्र सम्पन्न और जिसमें चतुर शीलता हो।

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🕉🕉हनुमते नमः 🌹🌹🙏🙏 🌿🌺🌹🌴🌿🌾🥀🍁🌼🌻☘🍀🌷🌹🌺🍁 एक व्यक्ति ने अपने मित्र से कहा, *मैं आपसे बहुत प्रेम करता हूं।* उसने पूछा कि "क्यों करते हो?" तो पहले व्यक्ति ने उत्तर दिया, *मैं नहीं जानता, कि मैं आपसे प्रेम क्यों करता हूं।* उसके इस कथन में यह तो स्पष्ट है कि वह अपने मित्र से प्रेम करता है, किसी न किसी गुण के कारण ही करता होगा। *क्योंकि गुणों का ही संसार में सम्मान होता है, गुणों के कारण ही प्रेम होता है।* वह इतना तो समझता है, कि इस मित्र में कुछ गुण हैं। परंतु कौन से गुण हैं, कितने गुण हैं, उनको स्पष्टता से नहीं समझ रहा, और बता नहीं पा रहा कि "मैं किन गुणों के कारण आप से प्रेम करता हूं।" लेकिन यदि कोई ऐसा कहे कि *मैं अमुक व्यक्ति से बहुत घृणा करता हूं।* तो घृणा का कारण पूछने पर वह स्पष्ट बता देता है कि, *अमुक व्यक्ति में यह दोष है, इस दोष के कारण मैं उस से घृणा करता हूं।* उसके इस उत्तर से पता चलता है कि जब कोई व्यक्ति, किसी दूसरे से प्रेम करता है तो अनेक बार वह कारण को स्पष्ट नहीं कर पाता। परंतु जब घृणा करता है, तो स्पष्टता से उत्तर देता है कि "मैं इन दोषों के कारण घृणा करता हूं।" इससे यह पता चला कि प्रेम उतना अभिव्यक्ति कारक नहीं है, जितनी की घृणा। इसलिए यदि आप किसी से प्रेम करते हैं, तो उसका कारण - उसके गुणों को भी समझें, पहचानें। आवश्यकता पड़ने पर उन गुणों को बताएं भी, कि *मैं इन गुणों के कारण आपसे प्रेम करता हूं. जैसे घृणा का कारण स्पष्टता से बतला पाते हैं।* बल्कि हो सके, तो उन गुणों को अवश्य पहचानें, जिनके कारण आप उस से प्रेम करते हैं।* और *घृणा तो न ही करें, क्योंकि यह हानिकारक है। घृणा करने से दूसरे की हानि तो नहीं होती, या कम होती है, बल्कि अपनी हानि अधिक होती है।* तो बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी हानि नहीं करनी चाहिए, इसलिये गुणों के कारण दूसरों से प्रेम अवश्य करें, घृणा नहीं। - *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक* #✍️

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Dr. Seema Soni Jan 21, 2020

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simran Feb 18, 2020

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